रविवार, 26 अक्तूबर 2014

नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति - प्रयोजन, प्रयास, प्रतिबद्धता

नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति प्रत्येक भारतीय नगर में राजभाषा का एक मुखर मंच है। केंद्रीय कार्यालय, बैंक, उपक्रम, बीमा कंपनियाँ इस समिति की सदस्य हैं। यदि सम्पूर्ण भारत की नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के कार्यनिष्पादन का विश्लेषण किया जाये तो यह स्पष्ट होता है कि इन समितियों के कार्यनिष्पादन में भिन्नता है जबकि लक्ष्य सबका एक है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के वार्षिक कार्यक्रमों के विभिन्न लक्ष्यों को प्राप्त करने में नराकास (नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति) के सभी सदस्य प्रयासरत रहते हैं तथा यह समिति मिलजुलकर और एक दूसरे को सहायता प्रदान कर प्रगति करती है। यद्यपि अभी भी कई नगर ऐसे हैं जहां पर नराकास गठित नहीं की गयी है किन्तु ऐसे नगरों में नराकास के गठन की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है।

गठन : किसी भी नगर में स्थित कार्यालयों में से किसी एक कार्यालय का चयन राजभाषा विभाग द्वारा किया जाता है जिसे नराकास के संयोजन का दायित्व दिया जाता है । नगर के एक कार्यालय का चयन चयनित कार्यालय के कार्यालयाध्यक्ष की सहमति से होता है। सामान्यतया यह कोशिश रहती है कि नगर में स्थित ऐसे कार्यालय को नराकास के संयोजन का दायित्व दिया जाये जहां नगर स्थित कार्यालयों के वरिष्ठतम प्राधिकारी पदस्थ हों। यह स्थिति सामान्यतया केंद्रीय कार्यालयों के नराकास में दिखलाई पड़ती है। यहाँ पर यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि किसी नगर में अधिकतम तीन प्रकार के नराकास का गठन हो सकता है यथा - केंद्रीय कार्यालयों की नराकास, बैंको की नराकास और उपक्रमों की नराकास। यह तीनों नराकास सामान्यतया महानगरों में गठित होते हैं अन्यथा केंद्रीय कार्यालयों की  नराकास और बैंकों की नराकास अधिकांश नगरों में पाये जाते हैं। इसके बावजूद बहुत छोटे नगरों में केवल एक नराकास गठित होती है जिसमें केंद्रीय कार्यालय, बैंक और उपक्रम सदस्य होते हैं।

सदस्य -सचिव : यह एक पदेन पद है तथा संयोजक कार्यालय का राजभाषा अधिकारी स्वतः समिति का सदस्य - सचिव बन जाता है। यह पद नराकास की एक ऐसी धुरी है जिसपर नराकास की गतिविधियां व गति पूरी तरह निर्भर रहती है। संबन्धित क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय से सदस्य-सचिव का सीधा संबंध जुड़ा रहता है तथा कार्यान्वयन, प्रशिक्षण आदि के अधिकारियों से समय-समय पर संपर्क होते रहता है तथा तदनुसार नगर में राजभाषा कार्यान्वयन गतिशील रहता है। सदस्य-सचिव एक तरफ समिति के पदेन अध्यक्ष को राजभाषा कार्यान्वयन विषयक सहायता प्रदान करता है तो दूसरी ओर समिति के सदस्यों के विचारों, सोच और सहयोग के आधार पर राजभाषा विषयक विविध गतिविधियों को अंतिम रूप प्रदान करता है। सामान्यतया सदस्य-सचिव की गतिशीलता के अनुरूप समिति गतिशील रहती है यद्यपि समिति पर नियंत्रण अध्यक्ष का रहता है। 

अध्यक्ष : समिति का अध्यक्ष पद एक पदेन पद होता है जो संयोजक कार्यालय के कार्यालय प्रमुख के लिए है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के दिशानिर्देशानुसार तथा राजभाषा नीति के परिप्रेक्ष्य में नगर में राजभाषा कार्यान्वयन की प्रगति की जाती है। समिति की बैठक का आयोजन, समिति की गतिविधियों को मंजूरी, समिति के सदस्य कार्यालयों के हिन्दी की रिपोर्ट की समीक्षा आदि महत्वपूर्ण कार्यों का दायित्व अध्यक्ष का होता है। इस समिति में लिए गए निर्णय केवल अध्यक्ष द्वारा लिए गए निर्णय नहीं होते हैं बल्कि समिति के सभी सदस्यों से विचार-विमर्श कर निर्णय लिए जाते हैं। इस समिति के अध्यक्ष की दोहरी भूमिका होती है जिसमें एक तरफ तो समिति के सदस्यों के पक्ष को ध्यान में रखना पड़ता है तो दोसारी ओर राजभाषा नीति, वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्यों आदि को वरीयता देते हुये समिति को गतिशील बनाए रखना पड़ता है। अध्यक्ष का पद अत्यधिक दायित्व वाला पद है। 

क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय : : प्रत्येक समिति का संबन्धित क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय में उप-निदेशक (कार्यान्वयन) पदस्थ होते हैं। इस कार्यालय की भूमिका प्रेरक और प्रोत्साहक की भूमिका होती है। राजभाषा नीति एवं वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्यों के अनुसार प्रगति का जायजा लेने के लिए सामान्यतया इस समिति के प्रत्येक बैठक में क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के प्रतिनिधि होते हैं जो उप-निदेशक (कार्यान्वयन) होते हैं या सहायक निदेशक (कार्यान्वयन) होते हैं अथवा शोध अधिकारी (कार्यान्वयन) उपस्थित होते हैं। इन अधिकारियों द्वारा भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के दिशानिर्देशों को समिति तक प्रभावशाली ढंग से संप्रेषित की जाती है। क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय की निगरानी के अंतर्गत नराकास कार्य करता है।  

संयोजक कार्यालय के प्रधान कार्यालय की भूमिका : नराकास के संयोजनकर्ता यदि  केंद्रीय कार्यालय, बैंक, उपक्रम के प्रधान कार्यालय नहीं हैं तब उस कार्यालय के नरकस की बैठकों में कार्यालय के प्रधान कार्यालय की भूमिका रहती है। कुछ लोग इस मत के भी होते हैं कि नराकास में संबन्धित बैंक के प्रधान कार्यालय की क्या भूमिका है ? यहाँ इस तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है कि राजभाषा कार्यान्वयन के निर्धारित लक्ष्य होते हैं तथा स्पष्ट राजभाषा नीति है जिसके अनुसार राजभाषा कार्यान्वयन करना होता है। संयोजक कार्यालय चूंकि राजभाषा विषयक महत्वपूर्ण दायित्यों का निर्वहन करता है अतएव नराकास में लिए गए निर्णयों के उचित एवं प्रभावशाली कार्यान्वयन के लिए समिति के अध्यक्ष को उपयुक्त मशवरा दे सकता है और सदस्य-सचिव को कार्यान्वयन के लिए यथोचित दिशानिर्देश दे सकता है। नराकास के निर्णयों के कुशल एवं प्रभावशाली कार्यान्वयन के लिए संयोजक बैंक के प्रधान कार्यालय की भूमिका मत्वपूर्ण है अतएव नराकास की प्रत्येक बैठक में प्रधान कार्यालय के प्रतिनिधि की उपस्थिती जरूरी है। 
  
प्रयास एवं पहल :  नराकास द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन को अब केवल समिति के सदस्य कार्यालयों तक सीमित रखने की आवश्यकता नहीं है। राजभाषा कार्यान्वयन के अंतर्गत अब समय आ गया है की राजभाषा की गूंज को समिति के सदस्यों से बाहर ले जाया जाये। इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि नराकास नगर के महाविद्यालयों, विश्वविद्यालय में राजभाषा की जानकारी का प्रचार-प्रसार करें। ग्राहकों के बीच राजभाषा को लेकर जाएँ। इस प्रकार नगर की स्थानिक परिस्थितियों और विशेषताओं को दृष्टिगत रखते हुये नए प्रयास और पहल की जा सकती है। यह समय की और राजभाषा कार्यान्वयन की मांग है कि नराकास अपने सशक्त मंच का प्रयोग करते हुये राजभाषा को नए प्रयासों और पहल से एक नयी गति, ऊर्जा और दिशा प्रदान करे।   

प्रतिबद्धता : प्रतिबद्धता किसी भी कार्य एवं लक्ष्य के लिए परम आवश्यक है। नराकास के संयोजन, संचालन और नवोन्मेषी राजभाषा कार्यान्वयन के लिए प्रतिबद्धता अत्यावश्यक है। यदि समिति के सदस्य-सचिव की प्रतिबद्धता प्रबल होगी तो समिति के सदस्य कार्यालयों में पदस्थ राजभाषा अधिकारियों की प्रतिबद्धता उच्च स्तर की होगी। यदि किसी नराकास में यह स्थिति है तो सदस्य बैंकों के कार्यालय प्रमुख सहित समिति के अध्यक्ष कार्यान्वयन को अपना उत्साहपूर्ण सहयोग उल्लासित मन से देते रहेगे और ऐसी समिति अपनी एक विशेष पहचान बनाने में कामयाब होगी। प्रतिबद्धता के लिए प्रमुख प्रेरक की भूमिका संयोजक बैंक के प्रधान कार्यालय और क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय बखूबी निभा सकते हैं। 


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शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

पुरस्कारों से दबी राजभाषा

राजभाषा कार्यान्वयन प्रेरणा और प्रोत्साहन से किया जाता है, यह सर्वविदित है। इसी क्रम में श्रेष्ठ  राजभाषा कार्यान्वयन के विभिन्न महत्वपूर्ण पुरस्कारों को भी प्रदान किया जाता है। पुरस्कार जीतना हमेशा अच्छा होता है और प्रत्येक कार्यालय इसे पाने के लिए राजभाषा कार्यान्वयन में श्रेष्ठ कार्यनिष्पादन में व्यस्त रहता है। इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार प्राप्त करना प्रत्येक कार्यालय की चाहत होती है क्योंकि वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन की श्रेष्ठता प्रमाणित करने के लिए इससे बड़ा पुरस्कार कोई नहीं है। सब लोग जानते हैं कि प्रत्येक योजना अपने आप में विशिष्ट और विशेष लक्ष्यों के प्राप्ति के लिए एक प्रेरक होती है। इस प्रकार राजभाषा के कई पुरस्कार हैं जो अपनी विशिष्टता के लिए राजभाषा जगत में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। राजभाषा के इन पुरस्कारों को पाने के लिए होड सी लगी हुयी है। ऐसी प्रबल और स्वस्थ प्रतिद्वंदिता में कुछ ऐसी भी घटनाएँ हो जाती हैं जो राजभाषा कार्यान्वयन के इस प्रयास को प्रभावित करती हैं। 

किसी भी सरकारी कार्यालय के उच्च प्रशासक से राजभाषा विषयक चर्चा करने पर राजभाषा पुरस्कार चर्चा का एक प्रमुख विषय रहता है। इन चर्चाओं में यह भी टिप्पणी रहती है कि पुरस्कारों को "मैनेज" किया जाता है। यहाँ यह प्रश्न उभरता है कि उच्च प्रशासक किस आधार पर अपरोक्ष में इस प्रकार कि बातें कर जाते हैं? यहाँ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि सभी सरकारी कार्यालयों के प्रशासक अपरोक्ष में ऐसी ही बातें करते  हैं । कभी कहीं किसी उच्च प्रशासक से इस तरह कि बातें अनौपचारिक बातचीत के दौरान सुनने को मिलती है। यदि उनसे इस तरह कि बातों का आधार पूछा जाय तो प्रायः यही उत्तर मिलता है कि उनके कार्यालय के राजभाषा अधिकारी द्वारा यह बात बार-बार उनसे कही जाती है। यदि देखा जाय तो इस प्रकार कि बातें अक्सर ऐसे ही राजभाषा अधिकारी करते हैं जिन्हें अपने कार्यकाल में राजभाषा का एक भी पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ है।

क्या राजभाषा कार्यान्वयन वस्तुतः राजभाषा के विभिन्न पुरस्कारों से दबी है या कि चतुराईपूर्वक उसे पुरस्कारों से दबाने की असफल कोशिशें की जा रही हैं। राजभाषा कार्यान्वयन के विभिन्न चुनौतीपूर्ण कार्यों को करने की आवश्यक कौशल न रखनेवाले राजभाषा अधिकारी इस प्रकार के अतार्किक शोर मचाते हैं और अपनी राजभाषा कार्यान्वयन विषयक कमजोरी को छुपने का प्रयास करते हैं। राजभाषा के विभिन्न पुरस्कारों के निर्णय का आधार होता है। सरकारी कार्यालयों के राजभाषा का प्रत्येक सजग विभाग अन्य कार्यालयों की राजभाषा प्रगति की जानकारी रखता है। राजभाषा की विभिन्न बैठकों में कार्यालयों के राजभाषा विषयक प्रगति की चर्चा व समीक्षा की जाती है। सब कुछ स्पष्ट रहता है फिर भी उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को कल्पित कथा सुनाकर कुछ राजभाषा अधिकारी राजभाषा को बदनाम करने की भूमिका निभाते हैं। 

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि उच्च प्रशासनिक अधिकारी सामान्यतया राजभाषा विषयक सूचनाओं के लिए अपने कार्यालय के राकभाषा विभाग पर निर्भर रहते हैं। उच्च प्रशासनिक अधिकारी राजभाषा कार्यान्वयन की वास्तविकता से परिचित हों इसीलिए नगर राजभाषा कार्यन्वयन समिति की बैठकों में कार्यालय प्रमुख की सहभागिता पर बल दिया जाता है। अब समय आ गया है कि वृहद परिप्रेक्ष्य में राजभाषा को  संबन्धित राजभाषा विभाग से बाहर निकाल कर एक नयी व्यापकता दें जिससे राजभाषा कार्यालय के प्रत्येक स्तर तक अपने स्पष्ट रूप में रहे। राजभाषा कार्यन्वयन के लिए पुरस्कार अति आवश्यक है किन्तु राजभाषा पुरस्कारों को विचित्र अफवाहों के दल-दल से बचाना भी बहुत जरूरी है। 

रविवार, 17 अगस्त 2014

बैंकों में राजभाषा का क्रान्ति वर्ष 2013-14

भारत सरकार की राजभाषा नीति के कार्यान्वयन के लिए बैंकों द्वारा प्रयास में काफी तेजी आई है। इस तेज़ी का एक प्रमुख कारण यह भी है कि भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग द्वारा तथा वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन के प्रति पिछले एक वर्ष के दौरान जो तेज़ी, गति और दिशानिर्देशों संग अनुवर्ती कार्रवाई की जा रही है उससे बैंकों के राजभाषा विभाग में एक नयी गति तथा तत्परता आई है। कृपया इसका यह अर्थ मत निकालिएगा कि इससे पहले बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन धीमी गति में था वस्तुतः इससे पहले कुछ गिने-चुने बैंकों में ही राजभाषा गतिशील थी अन्यथा शेष बैंक धारा 3(3) के अनुपालन तक ही सिमटे हुये थे। पिछले एक वर्षों से अर्थात वर्ष 2013 से विभिन्न राजभाषा विभागों द्वारा जितनी अनुवर्ती कार्रवाई की गयी उतनी पहले नहीं दिखलाई देती थी अतएव राजभाषा के इतिहास में वर्ष 2013 से राजभाषा कार्यान्वयन के परंपरागत ढंग में नवीनता लायी गयी जिसे सभी बैंकों ने खुले दिल से स्वीकारा और उसका कार्यान्वयन भी किया। यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। 

अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसा क्या हो गया वर्ष 2013 में कि राजभाषा में एक नवीन परिवर्तन संग नयी गति आई। इस विषय पर बहुत अधिक चर्चा ना कर यह कहा जा सकता है कि भारत सरकार, राजभाषा विभाग के सचिव द्वारा बैंकों के प्रशासनिक कार्यालयों तथा शाखाओं का सघन और गहन  निरीक्षण का अभियान तथा इस अभियान के अंतर्गत तात्कालिक समीक्षा और दिशनिर्देशों ने राजभाषा कार्यान्वयन को अधिक स्पष्ट और सरल बना दिया। बैंकों की प्रत्येक बैठक में संबन्धित बैंकों के उच्चाधिकारियों तथा कार्यपालकों की उपस्थिती ने बैंकों  में राजभाषा के प्राथमिकता में वृद्धि की । यहाँ यह भी उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि वर्ष 2013 से पहले भारत सरकार, राजभाषा विभाग के सचिव को अधिकांशतः सरकारी आयोजनों में ही सुना जा सकता था। जबकि अब सचिव विभाग के निदेशक संग स्वयंउपस्थित होकर संवाद करती हैं।  सचिव द्वारा इस पहल ने राजभाषा को एक नयी गरिमा और बैंकिंग कार्य के एक अनिवार्यता का स्वरूप प्रदान किया जो किसी अति कुशल शिल्पकार की कलाकृति से कम नहीं है।

प्रायः यह अनुभव किया गया है कि यदि उच्च स्तर से किसी कार्य के प्रति तेज़ी दिखलाई पड़ती है तो स्वतः वह प्रवाह सम्पूर्ण कार्यालयीन व्यवस्था को प्रभावित करता है। भारत सरकार, राजभाषा विभाग द्वारा नए दृष्टिकोण से राजभाषा कार्यान्वयन से प्रभावित होकर वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग ने सघन अनुवर्ती कार्रवाई आरंभ की । सघन शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया कि जब तक किसी पत्र का संतोषप्रद उत्तर वित्तीय सेवाएँ विभाग को प्राप्त नहीं हो जाता है तब तक लगातार अनुस्मारकों की बौछार लगी रहती है। यहाँ पर यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि वर्ष वर्ष 2013 से पहले वित्तीय सेवाएँ विभाग द्वारा पत्रों और अनुस्मारकों के इतने कार्रवाई को अनुभव नहीं किया गया था। वित्तीय सेवाएँ विभाग ने आपसी संवाद-सार्थक दिशा अभियान द्वारा राजभाषा को बैंकिंग कामकाज का अभिन्न हिस्सा बनाने की योजना आरंभ की जो मूलतः राजभाषा विभाग द्वारा की गयी पहल का प्रभाव था।

भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के वार्षिक कार्यक्रम के आधार पर वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग के सचिव ने राजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए विशेषकर उन बैंकों को दिशानिर्देश दिया जिन बैंकों के कार्यालय या शाखाएँ विदेशों में स्थित हैं। तदनुसार कुछ बैंकों के शीर्ष कार्यपालक विदेशों में राजभाषा कार्यान्वयन के लिए विभिन्न आयोजन किए। एक बैंक के कार्यपालक निदेशक ने विदेश स्थित अपने कार्यालय और शाखा में भारत से बैनर तैयार कर स्वयं ले गए और वहाँ प्रदर्शित किए। इसके अतिरिक्त आपसी संवाद-सार्थक दिशा पर चर्चा भी की। आपसी संवाद-सार्थक दिशा का मॉडल -2 भी तैयार होकर कार्यान्वयन की दिशा में अग्रसर है। वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग की यह एक उल्लेखनीय पहल और दिशानिर्देश है जिसने बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन को गति प्रदान की ।    

भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग और वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग की जुगलबंदी ने राजभाषा अधिकारियों की चेतना को और प्रखर कर धारदार बनाया जिससे कई बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन में उल्लेखनीय प्रगति हुयी जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यहाँ यह सोचना पूर्ण सत्य नहीं होगा कि चूंकि भारत सरकार, राजभाषा विभाग अति सक्रिय होकर निरीक्षण आदि करने लगा तो राजभाषा अति गतिशील हो गया। यद्यपि इस सोच में बहुत अधिक सत्यता तो है किन्तु इससे भी प्रमुख सत्य यह है कि बैंक कर्मियों को एक ऐसी सशक्त और स्वाभाविक प्रेरणा मिली कि वे स्वतः प्रेरित होकर राजभाषा में कार्य करने लगे। श्रेष्ठ राजभाषा कार्यान्वयन वही है जिसमें कर्मचारी स्वतः प्रेरित होकर कार्य करने लगें। 

लगभग एक वर्ष से कम समय में राजभाषा इतनी सशक्त हो गयी कि अब सभी बैंक ए टी एम से पर्ची द्विभाषिक (हिन्दी और अँग्रेजी ) देना आरंभ कर रहे हैं। ग्राहकों को उनके खाते की विवरणियाँ, पास बूक में प्रविष्टियाँ, डिमांड ड्राफ्ट आदि हिन्दी में देने की तैयारी को पूर्ण करने के अंतिम चरण में बैंक है। अब विभिन्न बैंकों के राजभाषा विभाग अपने दायित्वों को पूर्ण करने में व्यस्त हैं तथा इससे राजभाषा की लोकप्रियता में वृद्धि हुई है। यह भी अति महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है कि अपने सभी निरीक्षणों में और आयोजनों में सचिव राजभाषा द्वारा स्थानीय भाषा के महत्व को स्पष्ट किया जाता है तथा यह आग्रह भी किया जाता है कि राजभाषा में यथासंभव स्थानीय शब्दों को सम्मिलित किया जाये। सचिव द्वारा स्थानीय भाषा के महत्व को सुनकर स्थानीय स्टाफ और ग्राहक खुश होते हैं और राजभाषा से जुड़ जाते हैं। सचिव केवल बैंक कर्मियों को ही संबोधित नहीं करतीं हैं बल्कि ग्राहकों, विद्यार्थियों,हिन्दी के प्राध्यापकों, पत्रकारों आदि से भी राजभाषा विषय पर चर्चा कर राजभाषा पर आम सोच का विश्लेषण करती हैं और यथावश्यक दिशानिर्देश देती हैं। 

राजभाषा की उक्त गतिविधियां जारी हैं और आगे कुछ नया और क्या होनेवाला है इसकी उत्सुकता भी है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग और वित्त मंत्रालय,वित्तीय सेवाएँ, राजभाषा विभाग के राजभाषा कार्यान्वयन की उक्त नयी शैली ने वर्ष 2012-13 को राजभाषा कार्यान्वयन का क्रान्ति वर्ष बना दिया है। प्रसंगवश उल्लिखित किया जा रहा है कि जब भी कोई नया कदम उठाया जाता है तो ऐसा भी होता है कि कुछ लोगों को असुविधा होती है क्योंकि ढर्रे पर चल रहे कार्य में कई घुमाव आ जाते हैं जिससे आरंभिक दौर में कुछ अनावश्यक हलचल होती है। इस क्रान्ति वर्ष में उपलब्धियों के अंबार विरुद्ध कुछ असुविधाओं के टीले भी उभरते और लुप्त हो जाते  हैं। राजभाषा कार्यान्वयन की यह नयी गति ऐसे टीलों को राजभाषाई जुगनू मानकर अनदेखा कर प्रगति मार्ग प्रशस्त करते जा रही है।   
  


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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन – आयोजन, संयोजन

 क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन का आयोजन हमेशा प्रतिभागियों के लिए मोहक होता है पुरस्कार विजेताओं के लिए सम्मोहक होता है तथा कुछ प्रतिभागियों की दृष्टि में आलोचक होता है। इन तीन प्रमुख धाराओं में अनवरत नियमित क्षेत्री राजभाषा सम्मेलन सम्पन्न हो रहा है और अपनी प्रभावशीलता में गुणात्मक वृद्धि कर रहा है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के सचिव, संयुक्त सचिव, विभाग के विभिन्न निदेशक, राजभाषा भारती पत्रिका की टीम, राजभाषा विभाग की टीम, संबन्धित क्षेत्रीय कार्यान्यवन कार्यालय के उप-निदेशक और उनकी टीम, संबन्धित नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति के अध्यक्ष और टीम आदि मिलकर इस सम्मेलन को प्रभावशाली बनाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं और यह प्रयत्न हमेशा सफलता को प्राप्त करता है। इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण सचिव, राजभाषा विभाग होते हैं जिनसे कुछ नयी बातें, राजभाषा की कतिपय नयी राहें, राजभाषा के उन्नयन के लिए नयी दृष्टि और नई निगाहें आदि की अनन्य अभिलाषा प्रतिभागियों में होती है। यह अभिलाषा इतनी प्रबल होती है कि इस सम्मेलन के आयोजन की सूचना मिलते ही नवीन जानकारियों की कामना में मन मोहित हो जाता है और सम्मेलन की तिथि का बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगता है।
मोहक आयोजन स्थल भी होता है क्योंकि देश के प्रत्येक राज्य में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक आदि विविधताएँ लिए कई स्थल होते हैं जहां नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति कार्यरत होती है। अन्य कार्यालयों के मित्रों, परिचितों, नवागंतुकों आदि से मिलकर उनके कार्यालय के राजभाषा कार्यान्यवन में सुविधापूर्वक और स्वतंत्रतापूर्वक ताकने-झाँकने और जाँचने का अवसर मिलता है। इस प्रकार मोहकता के विभिन्न रूप हैं जिनकी यहाँ पर पूर्णरूपेण चर्चा कर पाना संभव नहीं है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आवश्यकता में यदि मोहकता का मिश्रण हो जाता है तब वह सम्मेलन महज एक कामकाजी आवश्यकता नहीं रह जाता बल्कि राजभाषा के सुरों से सजा एक एक ऐसा अनुपम गुलदस्ता हो जाता है जिसकी सुरभि प्रेरणा, प्रोत्साहन और प्रीति से ओत –प्रोत कर देती है। क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन में प्रत्येक प्रतिभागी को बोलने और सुनने का मौका मिलता है जिससे सम्प्रेषण केवल एकतरफा नहीं रहता बल्कि अभिव्यक्ति का एक ऐसा सशक्त मंच बन जाता है जहां न केवल भावनाओं, विचारों को प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है बल्कि उनपर निर्णय लिए जाने का प्रस्ताव भी पारित होता है। यह वस्तुतः एक रोमांचकारी अनुभव है।

यह सम्मलेन एक दिवसीय होता है किन्तु इसके आयोजन, संयोजन में कई दिनों का अथक परिश्रम जुड़ा  होता है। जिस नगर या महानगर में इसका आयोजन होता है उससे संबन्धित क्षेत्रीय कार्यान्यवन कार्यालय के उप-निदेशक के कंधों पर काफी ज़िम्मेदारी होती है। इन जिम्मेदारियों में से कुछ प्रमुख ज़िम्मेदारी निम्नलिखित हैं :
(1)   कार्यस्थल का चयन : सम्मेलन के लिए उचित कार्यस्थल का चयन काफी महत्वपूर्ण है। न्यूनतम 250 से 300 प्रतिभागियों के बैठने की व्यवस्था आवश्यक है। चयनित सभागार में यथोचि ध्वनि व्यवस्था का होना आवश्यक है। मंच कम से कम मध्यम आकार का होना चाहिए। पार्किंग की व्यवस्था होनी चाहिए। चयनित कार्यस्थल परिसर में चाय, भोजन के लिए उपयुक्त स्थान होना चाहिए। पंजीकरण तथा पत्रिका आदि प्रदर्शन के लिए परिसर में उचित जगह होनी चाहिए। सुविधापूर्वक जहां सब पहुँच सके ऐसा स्थल होना चाहिए।
(2)   सचिव से तिथि की प्राप्ति : चूंकि इस सम्मेलन के एक प्रमुख आकर्षण राजभाषा विभाग के सचिव होते हैं इसलिए सर्वप्रथम सम्मेलन आयोजन की तिथि का अनुमोदन सचिव से प्राप्त करना होता है। यदि किसी सम्मेलन के आयोजन तिथि से कुछ दिन पहले यह भनक तक लग जाती है कि सम्मेलन में सचिव की उपस्थिती संदेहपूर्ण है तो तत्काल 25% उपस्थिती में गिरावट आ जाती है विशेषकर वरिष्ठ प्रबंधन के अधिकारियों में। उप-निदेशक (कार्यान्यवन) पर यह दबाव रहता है कि सम्मेलन की तिथि निर्धारण से पहले तिथि का अनुमोदन सचिव से अवश्य करवाएँ और तिथि की घोषणा से पूर्व सचिव से तिथि अनुमोदन की पुष्टि अवश्य प्राप्त कर लें।
(3)   सूचना प्रेषण : प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय के अंतर्गत आनेवाले सभी कार्यालयों को यदि सम्मेलन में आमंत्रित किया जाये तो संभवतः आयोजन स्थल छोटा पड़ जाये। प्रायः ऐसा होता है कि आमंत्रण में उन कार्यालयों को प्राथमिकता दी जाती है जो राजभाषा कार्यान्यवन में सक्रिय हैं। आमंत्रण के दूसरे क्रम में ऐसे कार्यालय आते हैं जिनके अधीन कई छोटे कार्यालय (जैसे बैंकों की शाखाएँ) होते हैं। तीसरे क्रम में छोटे कार्यालय आते हैं। अक्सर यह तीसरे कार्यालय छूट जाते हैं क्योंकि इनमें ना तो राजभाषा विभाग होता है ना ही राजभाषा अधिकारी पदस्थ होता है। ऐसा आवश्यक नहीं कि निमंत्रित सभी कार्यालय सम्मेलन में सहभागी हों। सम्मेलन सभागार भर जाएगा कि खाली रहेगा यह अंदेशा आयोजन तिथि तक रहता है।
(4)   भोजन बनानेवाले का चयन : सम्मेलन में मंच, विशिष्ट अतिथियों, सहभागियों के बाद यदि कुछ महत्वपूर्ण होता है तो वह है चाय-पान और भोजन। इसके चयन में आयोजन कार्यस्थल के नाराकास की सक्रिय सहभागिता होती है। निर्धारित बजट में संतोषप्रद भोजन प्रदान करना भी एक चुनौतीपूर्ण कारी है, जिसे आखिर में सफलतापूर्वक अंजाम दे ही दिया जाता है।
(5)   सक्रिय कार्यकर्ताओं का चयन : आयोजन में विभिन्न कार्यों के लिए मानव श्रम की भी आवश्यकता होती है। कुशल और तत्काल उचित निर्णय ले सकनेवाले अधिकारियों का चयन कठिन कार्य है। निम्नलिखित कार्यों के लिए कुशल कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है :
(1)   पंजीकरण और फ़ाइल आदि प्रदान करने के लिए। (अक्सर यह कार्य राजभाषा विभाग के स्टाफ संभालते हैं)
(2)   सम्मेलन सभागार में बैठने की व्यवस्था नियंत्रित करने के लिए।
(3)   उद्घोषक/उद्घोषिका का चयन।
(4)   मंच पर पुरस्कार वितरण की प्रक्रिया को नियंत्रित करना। (प्रायः यह कार्य राजभाषा विभाग के अधिकारी संभालते हैं)
(5)   वाहन व्यवस्था का नियंत्रण।
(6)   आयोजन नगर में विभिन्न स्थलों पर बैनर लगाने के लिए उपयुक्त स्थल चयन।
(7)   अतिथियों को विमानपत्तन/रेल्वे स्टेशन से ले आना-ले जाना।
(8)   विशिष्ट व्यक्तियों की देखभाल।
(6)   सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु : सम्मेलन में स्थल विशेष की सांस्कृतिक विरासत की झलक के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया जाता है। एक राजी में अनेकों सांस्कृतिक विधाएँ होती हैं उनमें से प्रमुखतम विधाओं का चयन तथा उन्हें बखूबी प्रदर्शित करनेवाले कलाकारों के चयन के लिए कार्यकर्ता की आवश्यकता होती है।
(7)   प्रेस नोट और पत्रकारों के लिए कार्यकर्ता : सम्मेलन से पहले और सम्मेलन के दिन तक स्थानीय प्रेस में सम्मेलन विषयक समाचार प्रकाशित करना और सम्मेलन की रिपोर्ट पत्रकारों को प्रदान करने के लिए कार्यकर्ता की जरूरत होती है। यद्यपि सम्मेलन रिपोर्ट में राजभाषा विभाग के अधिकारियों का सहयोग होता है किन्तु रिपोर्ट तैयार करने के लिए एक अनुभवी कार्यकर्ता की आवश्यकता होती है।      
      उक्त प्रकार से और कई मदें हैं जिनमें सक्रिय कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। अधिकांश कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजन स्थल से ही मिल जाते हैं, यदा-कदा क्षेत्रीय कार्यान्यवन कार्यालय आयोजन स्थल से बाहर के अपने सदस्य कार्यालय से कोई अनुभवी कार्यकर्ता की सहायता प्राप्त करता है। यद्यपि क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन में सम्पूर्ण नियंत्रण गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग, नयी दिल्ली का होता है किन्तु यह नियंत्रण निगरानी और आवश्यक दिशानिर्देश का होता है। सम्मेलन गरिमापूर्ण तरीके से सम्पन्न हो जाये राजभ्शा विभाग का यह मुख्य उद्देश्य होता है। निर्धारित ढांचे के अंतर्गत सम्मेलन को कौन सा क्षेत्र कितनी भव्यता और कुशलता से सम्पन्न कर पाता है इसका बहुत अधिक दारोमदार उस क्षेत्र के उप-निदेशक (कार्यान्यवन) के कंधों पर होता है।  



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बुधवार, 5 जून 2013

ग क्षेत्र की गुहार

ज्ञातव्य है कि पूरे देश को तीन भाषिक क्षेत्र क, ख और ग में बांटा गया है। राजभाषा कार्यान्यवन की दृष्टि से ग क्षेत्र पर विशेष ध्यान देने की बात कही जाती है क्योंकि ग क्षेत्र की लिपि देवनागरी लिपि से काफी भिन्न है जिससे इस क्षेत्र में राजभाषा कामकाज में अन्य भाषिक क्षेत्रों की तुलना में कठिनाई अधिक होती है। क क्षेत्र हिन्दी भाषी क्षेत्र के रूप में जाना जाता है जबकि ख क्षेत्र के राज्यों की लिपि देवनागरी और देवनागरी लिपि सदृश्य होने के कारण हिन्दी भाषा के काफी करीब मानी  जाती है। इसके विपरीत ग क्षेत्र के राज्यों की लिपि देवनागरी लिपि से भिन्न होने के कारण राजभाषा से उतनी सहजता और सुगमता से अपना ताल-मेल नहीं बिठा पाती है। इसलिए ग क्षेत्र में राजभाषा कार्यान्यवन की कार्यनीतियाँ बिलकुल अलग और विशेष होती हैं। इस तथ्य पर विशेष ध्यान दिये बिना अधिकांश केंद्रीय कार्यालय, बैंक और उपक्रम ग क्षेत्र के लिए राजभाषा कार्यान्यवन के लिए विशेष योजना नहीं बनाते हैं फलस्वरूप परिणाम उत्साहवर्धक नहीं होते हैं।

      परिणामों में केवल राजभाषा के विभिन्न पुरस्कार ही नहीं सम्मिलित हैं बल्कि इसमें सम्प्रेषण भी सम्मिलित है। संपर्क, संवाद और संयोजन की एक सशक्त कड़ी सम्प्रेषण है और यदि सम्प्रेषण बाधित हो जाये तो क्या किया जा सकता है ? कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि जो संप्रेषित हो चुका है वह अपने श्रोता की भाषिक समझ के अनुसार अपना प्रभाव डाल चुका होता है। इसी भाव को यदि दूसरे शब्दों में अभिव्यक्त किया जाये तो उपमाओं और अलंकारों में अपनी बात कहनेवाला राजभाषा अधिकारी क और ख क्षेत्र में एक रोचक वक्ता के रूप में लोकप्रिय हो सकता है किन्तु ग क्षेत्र में ऐसे वक्ता को समझने के लिए कर्मचारियों को अधिक अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है। इतना ही नहीं बल्कि हिन्दी में सम्प्रेषण का  कहीं-कहीं अर्थ का अनर्थ भी निकल जाता है। अर्थ का अनर्थ निकलना एक स्वाभाविक घटना है न कि एक भाषिक दुर्घटना। शब्दों का भी अपना एक निजी स्पंदन होता है जिसमें देश, काल, स्थान की सांस्कृतिक, सामाजिक आदि अभिव्यक्ति निहित होती है।

      सम्प्रेषण और अभिव्यक्ति के बीच किसी भी भाषा के शब्द एक सेतु की भूमिका निभाते हैं। सेतु जितना सीधा, सपाट और सहज होगा गतिशीलता उतनी ही प्रखर और प्रयोजनमूलक होगी। ग क्षेत्र की भाषाएँ यद्यपि संस्कृत के शब्दों को भी अपने में समेटे हुये हैं किन्तु यदि उर्दू मिश्रित हिन्दी का प्रयोग किया जाता है तो कठिनाई उत्पन्न हो जाती है। ग क्षेत्र के कार्यालयों आदि में राजभाषा के खालिस रूप में जो भी सम्प्रेषण किया जाएगा उसका परिणाम अच्छा निकलेगा। हिन्दी को आकर्षक बनाने के लिए यदि उर्दू की शब्दावली का सहारा लिया गया, या उपमा और अलंकार से सजाने की कोशिश की गयी तो समझिए अस्पष्ट अर्थ की ओर बढ़ने का खतरा उठाया जा रहा है। ऐसे में कहा या लिखा कुछ जाएगा और समझा कुछ जाएगा। ग क्षेत्र में भाषा को लेकर भावों की उड़ान नहीं भरी जा सकती बल्कि कार्यालय के धरातल पर रहकर छोटे-छोटे सरल, सीधे वाक्यों में अभिव्यक्ति ही सफल होती है। ना तो कविता चल पाएगी, ना ही ग़ज़ल अपना प्रभाव छोड़ पाएगा यदि कुछ चल पाएगा तो हिन्दी फिल्मों का लोकप्रिय गीत चल सकेगा। बस ग क्षेत्र में भाषिक रूप से उड़ान की सामान्यतया यही सीमा है।

      ग क्षेत्र के कार्यालयों में स्थानांतरण करते समय सामान्यतया इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि ऐसे राजभाषा अधिकारियों को स्थानांतरित किया जाये जो ग क्षेत्र के किसी एक राज्य की भाषा या संस्कृति से बखूबी परिचित हों। ऐसे राजभाषा अधिकारी भी सफल रहते हैं जो अंग्रेजी भाषा की तरह राजभाषा में जो लिखते हैं वही बोलते हैं। ग क्षेत्र के कर्मियों में राजभाषा को सीखने की लगन है किन्तु सीखने की यह लालसा विशेषकर राजभाषा की शब्दावली पर निर्भर करती है। इस क्षेत्र के लोग जितनी सहजता से राजभाषा शब्दावली को सीख लेते हैं उतनी आसानी से हिन्दी बोलचाल के शब्दों को नहीं सीख पाते हैं। यह फर्क इसलिए है क्योंकि राजभाषा के शब्द अंग्रेजी में पहले से ही जबान पर रहते हैं उसका हिन्दी शब्द अपनाने में अधिक समय नहीं लगता। राजभाषा का शब्द अंग्रेजी शब्द का प्रतिरूप रहता है इसलिए पूर्णतया अपरिचित नहीं लगता है। छोटे सरल वाक्य और राजभाषा के शब्द इस क्षेत्र में राजभाषा की सरिता निर्मित करने की क्षमता रखते हैं। इस क्षेत्र में पदस्थ राजभाषा अधिकारी को अपने राजभाषा के सामान्य पत्राचार में लंबे-लंबे पत्रों को नहीं लिखना चाहिए। हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट की समीक्षा या शाखा निरीक्षण की रिपोर्ट आदि स्वभावतः लंबे हो जाते हैं जिसे लिखते समय यथासंभव इन्हें स्पष्ट और छोटा रखना आवश्यक है। ग क्षेत्र में प्रायः हिन्दी में लिखे लंबे पत्र अपने उद्देश्य में पूर्णतया सफल नहीं हो पाते हैं।


      ग क्षेत्र की यही गुहार है कि वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्यों की तरह विभिन्न केंद्रीय कार्यालय, बैंक और उपक्रम अपने स्तर पर भी ग क्षेत्र के लिए विशेष योजना बनाएँ जिसमें राजभाषा अधिकारी की पदस्थापना, हिन्दी कार्यशाला प्रशिक्षण की समय सारिणी, कार्यशाला सामग्री, हिन्दी माह, पखवाड़ा, सप्ताह का आयोजन, क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न प्रोत्साहन योजनाएँ, नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति की क्षेत्र विशेष की लोकप्रिय राजकीय भाषा को दृष्टिगत रखते हुये विशेष योजनाएँ आदि सम्मिलित हैं। राजभाषा कार्यान्यवन में उल्लेखनीय प्रगति और उपलब्धि के लिए एक विशेष सोच को लागू करना समय की मांग है। व्यवहार में इसमें आरंभिक कठिनाई हो सकती है किन्तु एक बार गति मिल जाने से इसमें निरंतर सहजता और सरलता आती जाएगी। आवश्यकता है बस एक सार्थक पहल की।       

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