शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

बैंकिंग का बदलता स्वरूप-प्रशिक्षण और हिंदी

आर्थिक जगत के भूमंडलीय परिवेश में पिछले दो दशक से व्यापक परिवर्तन हो रहा है जिसमें से पिछले दशक में आर्थिक जगत में नित नए परिवर्तनों की ऑधी सी आ गई है. किसी भी समाज या राष्ट्र के आर्थिक जगत की धूरी उस देश की बैंकिंग व्यवस्था होती है. सामाजिक परिवर्तनों के साथ-साथ आवश्यकताएँ, आकांक्षाएँ और अभिलाषाएँ भी परिवर्तित होती हैं जिससे नव चेतना, नव उमंग का प्रादुर्भाव होता है. इन सबके परिणामस्वरूप बैंकिंग को भी तदनुसार परिवर्तन करना पड़ता है. भूमंडलीकरण के साथ-साथ देशगत परिस्थितियों ने भी बाजार के स्वरूप में लगातार परिवर्तन करना आरंभ किया. इस परिवर्तन से जनसामान्य के जीवन में भी बदलाव आना शुरू हुआ जिसके परिणामस्वरूप उनके आर्थिक जीवन में भी प्रगति की नई किरणें आनी शुरू हुई और फिर आरंभ हुआ नवधनाड्य¬ वर्ग जिसने उपभोक्तावाद संस्कृति को बढ़ाना शुरू किया. हमारे देश की उदार आर्थिक नीतियों से विश्व बाजार देश के बाजारों में दिखना आरंभ हुआ जिसे बाजार में नए उत्पादों के आगमन के साथ जनसामान्य में एक आकर्षण पैदा होने लगा. देश की आर्थिक स्थिति के सुधार होने की प्रक्रिया से जीवन शैली में वैभव की झलक मिलने लगी तथा बेहतर सुख और सुविधाओं की मांग बढ़ने लगी. इस प्रकार की आर्थिक प्रगति, सामाजिक परिवर्तन आदि ने जनसामान्य के मन में सपने सजाने शुरू किए तथा हैसियत से बढ़कर जीने की ललक ने व्यक्ति को बैंकों की ओर मुड़ने पर विवश किया. बैंकों ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाया और नई-नई योजनाओं के साथ बेहतर सेवा प्रदान कर ग्राहक आधार बनाने लगा.

बैंकिंग के इस बदलते स्वरूप को एक प्रतियोगितापूर्ण तेज गति देने में विदेशी बैंकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया. विदेशी बैंकों की ग्राहक सेवा एक गति और आकर्षण लिए हुए थी. विदेशी बैंकों के परिसरों ने भी राष्ट्रीयकृत बैंकों के परिसर परिकल्पना को एक नई उर्जा प्रदान की. बैंकों के सामने एक तरफ शहरीय तथा महानगरीय जनता की आवश्यकताएँ थीं तो दूसरी ओर ग्रामीण जनता की जरूरतों को पूरा करने का दायित्व भी था. इन दायित्वों के अंतर्गत राष्ट्रीयकृत बैंक अपने बड़े आधार और विस्तृत ग्राहक अपेक्षाओं को दृष्टिगत रखते हुए स्वंय में इतना व्यापक परिवर्तन लाना आरंभ किया कि बैंक के स्टाफ तक हतप्रभ रह गए. बैंकों ने अपनी कार्यशैली में परिवर्तन लाया जिसमें सूचना और प्रौद्योगिकी पर निर्भरता लगातार बढ़ती गई. बैंको की योजनाओं को नए नाम उत्पाद से जाना जाने लगा. बैंक ग्राहकों के पास जाने लगा ता उनके घर तक अपनी सेवाएॅ पहुँचाने लगा. प्रौद्योगिकी ने बैंकिंग के लगभग सभी कार्यकलापों को अपने अंदर समेट लिया जिसे कार्यनिष्पादन की गति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई. परिवर्तनों को बैंकिंग के सभी स्तरों पर देखा जाने लगा ता इन परिवर्तनों में बैंकों के बीच बेहतर होने की होड़ सी लग गई. ग्राहक शाहंशाह बन गया. इस प्रकार बैंकिग के नए रूप में आकर्षक सेवाएॅ, बेहतर शाखा परिसर, रोमांचकारी ग्राहक सेवाओं ने बैंकिंग सेवा की वि·ासनीयता में वृद्धि किया तथा 24 घंटे बैंकिंग को साकार किया.
एक अत्यधिक तेज गति के साथ प्रगति करती हुई बैंकिंग दुनिया को बहुत जल्दी समझ में आने लगा कि ग्राहकों के लिए सारी व्यवस्थाएँ और सुविधाएँ एकत्र कर लेने के बावजूद भी ग्राहक के बौद्धिक और भावनात्मक रूप को भी समझना आवश्यक है. इस जरूरत को पूर्ण करने के लिए बैंक को विज्ञापन तथा ग्राहक संपर्क का सहारा लेना पड़ा ता यहॉ पर भाषा का महत्व प्रमुखता से उभरकर आया. बैंकों की आपसी होड़ में उनके उत्पाद, उनकी ब्याज दरें आदि सभी लगभग एकसमान हो गर्इं तब इस स्थिति में स्टाफ की कुशलता में निखार लाने के लिए गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता का भी अनुभव किया जाने लगा.
बैंकों के प्रशिक्षण महाविद्यालयों पर एक नया दायित्व आने लगा तथा बेहतर और प्रभावशाली सम्प्रेषण के लिए अधिकांश महाविद्यालयों में प्रशिक्षण मिली-जुली भाषा हिंदी और अंग्रेजी में दिया जाना आरंभ किया गया. इस प्रकार के प्रशिक्षण प्रदान करने से पहली बार बैंकिंग प्रशिक्षण में राजभाषा की उपयोगिता का सफल प्रशिक्षण हो सका तथा साथ ही साथ प्रशिक्षणार्थियों की उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया ने इस दिशा में आगे बढ़ने का प्रोत्साहन दिया. महाविद्यालयों द्वारा केवल हिंदी में भी प्रशिक्षण दिया जाना आरंभ किया गया. केवल हिंदी में दिए गए प्रशिक्षण को प्रशिक्षणार्थियों ने एक प्रयोग के रूप में सराहा किंतु इसमें कुछ कठिनाईयों का भी अनुभव किया गया. इस प्रकार प्रशिक्षण में हिंदी ने अपने महत्व और उपयोगिता को सफलतापूर्वक स्थापित किया तथा संकाय-सदस्यों में भी हिंदी प्रशिक्षण के प्रति आत्मवि·ाास पैदा किया. बैंकिंग और हिंदी के आपसी ताल-मेल में एक स्वाभाविक लयबद्धता भी स्पष्ट हुई. राजभाषा हिंदी के सरलीकरण, हिंदी में तैयार किए गए हैंडआउट, बैंकिंग के विभिन्न विषयों पर हिंदी में लिखी पुस्तकों की मॉग बढ़ने लगी.

बैंकिंग के विभिन्न विषयों पर अंग्रेजी में जितनी पुस्तकें उपलब्ध हैं उसकी तुलना में हिंदी में लिखी पुस्तकें काफी कम है. इस दिशा में भारतीय रिज़र्व बैंक तथा भारतीय बैंक संघ द्वारा उठाए गए कदम उल्लेखनीय है. हिंदी में बैंकिंग की नई विधाओं पर पुस्तकें हिंदी में आनी शुरू हो गई हैं जो अनुदित नहीं हैं बल्कि मूल रूप से हिंदी में लिखी गई हैं. हिंदी की इन पुस्तकों द्वारा यह तथ्य स्पष्टतया उभरा है कि बैंकिंग के गंभीरतर विषयों को हिंदी में अभिव्यक्त किया जा सकता है. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि साहित्य, रंगमंच, फिल्मों तथा बोलचाल में अपनी उपयोगिता और धाक जमानेवाली हिंदी के लिए बैंकिंग प्रशिक्षण के लिए साहित्य सरल, सहज और सर्वमान्य भाषा में दे पाना हिंदी भाषा की विशिष्टता का द्योतक है. यदि बैंककर्मियों की हिंदी भाषा के प्रति रूझान का विश्लेषण किया जाए तो अभी भी वह लिखित रूप की तुलना में बोलचाल के रूप में ज्यादा प्रयोग में लाई जाती है. बैंकिंग प्रशिक्षण में उपयोग में लाई जानेवाली मिलीजुली भाषा सर्वाधिक लोकप्रिय है जिसमें यह स्वतंत्रता रहती है कि जब चाहें तब हिंदी और अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करें. भारतीय रिज़र्व बैंक मिली-जुली भाषा के स्थान पर हिंदी भाषा के प्रयोग की सिफारिश करता है तथा रिपोर्ट में भी मिली-जुली भाषा विषयक कोई कॉलम नहीं है. यह संकाय-सदस्यों के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य है क्योंकि यदि अखिल भारतीय स्तर का कार्यक्रम है तो उसमें केवल हिंदी में चर्चा करने पर सम्प्रेषण की समस्या हो सकती है. हिंदी में सहजतापूर्वक कार्य करनेवाले ही हिंदी माध्यम से प्रशिक्षण का लाभ ले सकते हैं.
हिंदी में हैंडआउट तैयार करना प्रशिक्षण में हिंदी की दूसरी चुनौती है. अंग्रेजी के हैंडआउटों का अनुवाद किया जाना इस समस्या का एक अल्पकालिक व आपातकालीन उपाय है. जब तक संबंधित विषय के संकाय द्वारा हिंदी में मूल रूप से हैंडआउट तैयार नहीं किया जाता है तब तक प्रशिक्षण में हिंदी अपनी जड़ें गहरी नहीं जमा सकती हैं. अनुदित हैंडआउट की अपनी सीमाएँ होती हैं जिसमें विषय की सही अभिव्यक्ति, भाषा की सहजता आदि की समस्याएॅ उभर सकती हैं. प्रशिक्षण महाविद्यालयों के लिए यह आवश्यक है कि सर्वप्रथम वे अपने सभी हैंडआउटों का अनुवाद कर लें जिससे कि मूल रूप में हैंडआउट तैयार करने की एक रूपरेखा संकाय-सदस्यों को मिल सके. इस दिशा में बैंकिंग प्रशिक्षण महाविद्यालयों को एक सार्थक पहल करनी चाहिए. इस दिशा में प्रगति कर चुके महाविद्यालय हिंदी का प्रभावशाली उपयोग सफलतापूर्वक कर रहे हैं. प्रशिक्षणार्थियों की ओर से भी हिंदी के हैंडआउटों की मॉग बढ़ रही है किंतु मूल रूप से हिंदी के अधिकांश हैंडआउट न बन पाने के कारण अंग्रेजी के हैंडआउटों पर निर्भरता अभी भी ज्यादा है. हैंडआउट को अधिकाधिक हिंदी में तैयार किया जाए इसके लिए बैंकों को अपनी योजनाएॅ तैयार करनी चाहिए. इस विषय पर संकाय-सदस्यों की संगोष्ठी एक कारगर उपाय हो सकता है. हैंडआउटों को हार्ड प्रतियों के साथ-साथ सॉफ्ट प्रति जैसे सी.डी. के रूप में भी महाविद्यालयों ने देना आरम्भ किया है जिसमें केवल सी.डी. की मॉग ही होती है. यदि हिंदी हैंडआउटों की भी सी.डी. तैयार करा ली जाए तो प्रशिक्षण में हिंदी की उपयोगिता को गति मिलेगी यद्यपि इस दिशा में अभी पहल करना शेष है.
प्रशिक्षण में हिंदी का प्रयोग बढ़ाने में हिंदी में बनाए गए पॉवर प्वांइट का भी सराहनीय योगदान है. विषय पर चर्चा करनेवाले संकाय को हिंदी के पॉवर प्वांइट से जहॉ एक तरफ हिंदी के शब्द सरलता से मिलते हैं वहीं दूसरी तरफ प्रशिक्षणार्थियों को भी विषय को और गहराई से समझने में सुविधा होती है. बैंकिंग के बदलते स्वरूप में विपणन एक प्रमुख नायक के रूप में उभरा है. प्रत्येक बैंक एक निर्धारित राशि विज्ञापन पर खर्च कर रहा है जिसमें राज्य विशेष की भाषाओं के साथ प्रमुखतया हिंदी और अंग्रेजी को स्थान दिया जा रहा है. बैंककर्मियों को अब शाखा से बाहर निकलकर अपने उत्पादों को बेचने के लिए नए ग्राहकों को तलाशना पड़ता है जिसमें भाषा की प्रमुख भूमिका रहती है. प्रशिक्षण महाविद्यालय भी भविष्य की भाषा आवश्यकता को समझकर अपनी नई-नई भूमिकाएॅ निर्धारित कर रहे हैं. हिंदी अब तक शाखा के फाइलों के बीच घूमती रहती थी जिसमें प्रशासन, बैंकिंग आदि की गंभीर और शुष्क शब्दावलियॉ रहती थीं किंतु बैंकिंग के बदलते प्रवेश ने हिंदी को फाइलों से बाहर खींचकर जनता के बीच खड़ा कर दिया है. ऐसी स्थिति में हिंदी को अपने कार्यालयीन शैली को बरकरार रखते हुए भाषा में भावुकता का भी मिश्रण करना है जिसे कि लोग आकर्षित होकर बैंक के उत्पाद को खरीद सकें.
बैंकिंग के बदलते स्वरूप में प्रशिक्षण में हिंदी के उत्तरोत्तर प्रयोग को बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि भाषा प्रयोगशाला की स्थापना की जाए. विभिन्न भाषा-भाषियों को राजभाषा हिंदी सीखने में क्या-क्या कठिनाईयॉ होती हैं इन मुश्किलों को हल करने के उपाय किए जाए. हिंदी में तैयार प्रशिक्षण सामग्री का समय-समय पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए तथा उसमें आवश्यक सुधार किया जाना चाहिए. हिंदी में मूल रूप से हैंडआउट तैयार करनेवाले संकाय को प्रोत्साहित करना चाहिए जिससे कि वे मूल रूप से हिंदी में अपने विषय की पुस्तक लिख सकें. प्रति तिमाही में आंचलिक स्तर और अखिल भारतीय स्तर पर एक-एक कार्यक्रम प्रत्येक प्रशिक्षण महाविद्यालय द्वारा आयोजित किए जाने चाहिए तथा छमाही में इनकी समीक्षा की जानी चाहिए. इस प्रकार प्रशिक्षण में हिंदी की आकर्षक, आसान और आत्मसक्षम छवि निर्मित हो सकती है