शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

राजभाषा का राष्ट्रीय नेतृत्व - वर्तमान की आवश्यकता

राजभाषा, की प्रगति के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक गैर सरकारी सशक्त नेतृत्व की आवश्यकता है। देश के सभी केन्द्रीय कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों में राजभाषा के बारे में आवश्यक जानकारियॉ हैं किंतु इसके बावजूद भी वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्यों के अनुरूप राजभाषा गतिशील प्रतीत नहीं हो रही है। आखिर क्या कारण हैं इस धीमी गति के ?  इस विषय में एक सोच यह भी दर्शाती है कि राष्ट्रीय स्तर पर राजभाषा का कोई एक सशक्त नेतृत्व नहीं है जिससे राजभाषा की प्रखर गरिमा से लोग परिचित नहीं हो पा रहे हैं। कार्यालयों में अब भी यही सामान्य धारणा है कि चूंकि सरकार चाह रही है इसलिए राजभाषा कार्यान्वयन की दिशा में कार्रवाई हो रही है। आज तक कोई भी सरकारी कार्यालय इस तथ्य को प्रतिपादित नहीं कर सका है कि राजभाषा इस देश की एक अनिवार्यता है। राजभाषा के प्रचार-प्रसार में किए जा रहे प्रयासों में से असंख्य संगोष्ठियों, बैठकों, सेमिनारों, आयोजनों आदि के बाद भी यदि राजभाषा के महत्व को नहीं बतलाया जा सका है तो यह स्थित यह संकेत देती है कि राजभाषा के प्रचार-प्रसार में भव्यता के संग एक चमक-दमक उत्पन्न की जाए जिससे सहज ही लोग आकर्षित हो सकें। आधुनिक युग में सहज, सामान्य शैली में किया गया कार्य लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता है इसके लिए इसका विज्ञापन किया जाना आवश्यक है। यहॉ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कौन करेगा विज्ञापन ? सरकार को जिस तरह जितना करना चाहिए वह कर रही है इसलिए अब आवश्यक है कि सरकारी प्रयासों से हटकर राजभाषा के विकास के लिए सोचा जाए।

सर्वप्रथम प्रश्न यह उभरता है कि कौन सोचे इस तरह ? निश्चित ही राजभाषा अधिकारी अथवा राजभाषा से जुड़े लोग ही राजभाषा के बारे में गहराई और विस्तारपूर्वक सोच सकते हैं और तदनुसार कार्रवाई कर सकते हैं। यदि यह सत्य है तो राजभाषा अधिकारियों अथवा राजभाषा से जुड़े लोगों की समीक्षा करनी पड़ेगी जिससे इनमें आवश्यक सुधार किया जा सके या ज़रूरी पक्षों का समावेश किया जा सके। इस विश्लेषण के लिए हमें महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग में झांकना होगा तथा देखना होगा कि स्नातकोत्तर स्तर पर राजभाषा किस रूप में है। लगभग 27 वर्ष पहले मुंबई विश्वविद्यालय में प्रयोजनमूलक हिंदी का आरम्भ किया गया जिसे एक विषय के रूप में  पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया। उस समय केवल राजभाषा नीति की ही चर्चा की जाती थी। विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए डॉ.विनोद गोदरे की प्रयोजनमूलक हिंदी पुस्तक विद्यार्थियों को सहज ही आकर्षित कर लेती थी। अभी हाल ही में एक प्राध्यापक से जब मैंने इस विषय पर चर्चा की तो ज्ञात हुआ कि अभी भी राजभाषा की स्थिति असंतोषप्रद है। क्या यह आवश्यक नहीं है कि प्रयोजनमूलक हिंदी या कामकाजी हिंदी पर कक्षा में चर्चा करने के लिए संबंधित प्राध्यापकों से राजभाषा के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पक्षों पर समय-समय पर अद्यतन जानकारियॉ दी जाती रहें। इस कार्य के लिए राजभाषा से सक्रिय रूप से जुड़े लोगों का सहयोग लिया जा सकता है। इस विषय पर चर्चा करने का मुख्य उद्देश्य यह है कि बाज़ार से प्रचुर संख्या में नए राजभाषा अधिकारी नहीं मिल पा रहे हैं।

राष्ट्रीय स्तर के गैर सरकारी नेतृत्व एक ऊँची उड़ान कही जा सकती है किन्तु आधारहीन उड़ान के रूप में इसे नहीं देखा जा सकता है। प्रश्न यह भी उठता है कि यहॉ गैर सरकारी से क्या अभिप्राय है ?  क्या सरकारी कार्यालय में कार्यरत व्यक्ति नेतृत्व का पात्र नहीं है ? यूं भी सर्वविदित है कि नेतृत्व प्राप्त करनेवाले नेतृत्व प्राप्त कर ही लेते हैं। गैर सरकारी से अभिप्राय है सरकार पर पूर्णतया आश्रित हुए बगैर। जिस तरह बैंकों, उपक्रमों की नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियॉ कार्यरत रहती हैं उसी तरह वृहद आयोजनों द्वारा कुछ राष्ट्रीय स्तर के राजभाषा के व्यक्तित्व प्राप्त होंगे जिससे राजभाषा में  एक नएपन का अनुभव होगा। यहॉ यह आशय नहीं है कि वर्तमान में प्रखर नेतृत्व नहीं है, यदि देखा जाए तो प्रत्येक मंत्रालय में कुछ लोग तो अवश्य हैं किंतु जब तक राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय कार्यालय, बैंक, उपक्रम एक मंच पर एकत्र होकर सम्मलित रूप से राजभाषा कार्यान्वयन की चर्चा नहीं करेंगे तब तक राजभाषा कार्यान्वयन की विशालता से लोग पूर्णतया परिचित नहीं हो पाएंगे। यह कार्य न तो कठिन है और ना ही असुविधापूर्ण है। राजभाषा के अनेकों मंच हैं जहॉ इस मुद्दे को उठाया जा सकता है तथा यथार्थ में परिणित किया जा सकता है। बस आवश्यकता है इस तरह की सोच पर एक सार्थक सोच और चर्चा की।

यहॉ मंतव्य ना तो राजनीति प्रेरित है और ना ही किसी व्यक्तिगत लाभोन्मुखी है बल्कि यह वर्तमान राजभाषा की दशा और दिशा से ऊभरी परिस्थितियों का संकेत है, पुकार है, गुहार है। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कार्यालय स्तर तक राजभाषा की बागबानी की आवश्यकता है अन्यथा समय की मॉग के अनुरूप न तो राजभाषा अधिकारी मिल पाएंगे और न ही राजभाषा कार्यान्वयन कुलांचे भर पाएगी। समय यदि सावधान होने का संकेत दे तो सावधान हो जाना है युक्तिसंगत है। राजभाषा यदि राष्ट्र की कामकाज की भाषा है तो राष्ट्रीय स्तर के राजभाषा व्यक्तित्व की तलाश राजभाषा से जुड़े लोगों का कर्तव्य है।