मंगलवार, 17 अगस्त 2010

हिंदी दिवस- अनजानी सी, अनचीन्ही सी

हिंदी दिवस, 2010 की दस्तक आने लगी है तथा एक बार फिर राजभाषा अधिकारी के रूप में मैं अनेकों सार्थक, अनर्थक, सुघड़ और अनगढ़ टिप्पणियों से रू--रू होने के लिए तैयार होने लगा हूँ। केवल मैं ही नहीं बल्कि राजभाषा से जुड़े सभी लोग इसके लिए तैयार हैं। वर्षों से हिंदी दिवस विशेषकर राजभाषा अधिकारियों के लिए प्रश्नों की बारिश लेकर आती है। इन प्रश्नों की बारिश में हिंदी भाषा से जुड़े सभी लोग भींगते हैं परन्तु केंद्र में रहता है राजभाषा अधिकारी। रहना भी चाहिए अन्यथा वर्ष भर ना तो राजभाषा अधिकारी की चर्चा होती है और ना ही राजभाषा की। मैं चर्चा का उल्लेख लोकप्रियता को दृष्टिगत रखकर नहीं कर रहा हूँ मेरा आशय तो राजभाषा और राजभाषा अधिकारी से लोगों का परिचय का है। हिंदी दिवस पर लिखे तमाम लेख, कविताओं आदि में या तो हिंदी की क्षमताओं, विशिष्टताओं की गाथा रहती है अथवा राजभाषा और अधिकारी पर प्रतिकूल टिप्पणियॉ रहती हैं। हिंदी दिवस का यह सिलसिला अनवरत चलते आ रहा है, किसी भी प्रकार का फेर-बदल नहीं हुआ है जिससे प्रमाणित होता है कि राजभाषा और राजभाषा अधिकारी अभी भी लोगों के लिए अनजाने और अनचीन्हें हैं।

हिंदी दिवस को यह माना जाना कि यह एक सरकारी आयोजन है जो हिंदी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के बजाए उसकी लोकप्रियता को कम करने में अधिक कारगर रही है, एक भ्रामक मानसिक स्थिति का द्योतक है, अपरिचय का द्योतक है। इस प्रकार की सोच रखनेवाले यदि अस्सी के दशक के कार्यालयों में राजभाषा की स्थिति से वर्तमान में कार्यालयों के राजभाषा कार्यान्वयन की तुलना करें तो उन्हें अति व्यापक परिवर्तन नज़र आएगा। यदि हिंदी दिवस का समर्थन राजभाषा को न प्राप्त होता तो वर्तमान की राजभाषा तक पहुंच पाना असम्भव होता। अंग्रेजी के कार्यालयीन साहित्य को राजभाषा में परिवर्तित करते समय साहित्यिक हिंदी का अत्यधिक कम भूमिका होती है और बोलचाल की हिंदी के उपयोग की तो संभावना ही नहीं ऊभरती है तब ऐसी स्थिति में कौन सी शब्दावली दी जाए का भाव लिए प्रश्न उभरता है। इस प्रकार की स्थिति में आडमान, दृष्टिबंधक, पावती आदि जैसे शब्द निकलते हैं। सभी भारतीय भाषाओं को तलाशना पड़ता है अंग्रेजी शब्दों के भावों को बखूबी दर्शाते हुए हिंदी के या भारतीय भाषाओं के सटीक अर्थी शब्दों के लिए। कामकाजी भाषा की इस आरम्भिक क्रिया को अनगढ़, अप्राकृतिक, दुरूह, उबाऊ आदि नाम देकर नकारने की कोशिश करना आसान है परन्तु अंग्रेजी के उस पाठ का सटीक अर्थ अभिव्यक्त करते हुए शब्द देना कठिन है। इसलिए हिंदी दिवस पर जब राजभाषा की आधारहीन आलोचना होती है तो राजभाषा चुप रहती है। वह निरंतर अपने विकास की प्रक्रिया में संलग्न रहती है।

हिंदी दिवस पर सरकारी कार्यालयों में कई आयोजन होते हैं जो समय और धन की बर्बादी करते हैं जैसे अनेकों वाक्य संजाल में घूम रहे हैं जैसे अश्वमेध का घोड़ा दौड़ रहा हो यह चुनौती देते हुए कि पकड़ सकते हो पकड़ कर दिखाओ वरना मान लो कि सत्य यही है। अंग्रेजी के कामकाजी साम्राज्य में राजभाषा का महल खड़ा करना उतना ही कठिन हाँ जितना सागर की तूफानी लहरों के बीच नौका के मस्तूल को बनाए रखना। वर्षों से कार्यालय की आबोहवा में घुली अंग्रेजी को हिंदी दिवस धूप की तरह राजभाषा को प्रसारित कर राजभाषा को स्थापित करती है। जिन कर्मचारियों को आदतन अंग्रेजी में काम करने की आदत पड़ चुकी है उन्हीं कर्मचारियों को हिंदी दिवस की विभिन्न प्रतियोगिताओं,आयोजनों आदि में सम्मिलित कर लेने पर राजभाषा के प्रति उनकी झुकाव बढ़ता है,कार्य की गति बढ़ती है,राजभाषा कार्यान्वयन के प्रभाव की समीक्षा होती है। वर्षों से हिंदी दिवस अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभा रही है और स्वंय को अति उपयोगी साबित कर रही है। लोग हिंदी दिवस पर प्रतिकूल टिप्पणियॉ देते रहे हैं परन्तु हिंदी दिवस वर्ष दर वर्ष राजभाषा की उपलब्धियों के नए मुकाम हासिल करती रही है।

हिंदी दिवस का अभिन्न हिस्सा राजभाषा अधिकारी तो इतना अपरिचित है जितना कि दूसरे ग्रह का प्राणी एलियन। अंग्रेजी के कार्यालयीन साहित्य से लेकर अंग्रेजी मानसिकता से जूझता राजभाषा अधिकारी कभी राजभाषा के सरल शब्दों की तलाश में रहता है तो कभी अनुवाद की जटिलता को कम करने में प्रयासरत रहता है। कभी वह हिंदी की कसौटी पर कसा जाता है तो कभी लक्ष्य के अनुसार परिणाम न दे पाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। हिंदी कार्यशालाओं के आयोजन तथा प्रशिक्षण का दायित्व निर्वहन करते हुए कभी वह प्रशिक्षक की भूमिका निभाता है तो कभी कार्यालयीन आयोजनों के मंच पर संचालन की चुनौतीपूर्ण कार्य को सम्पादित करता है। कार्यालय की पत्रिका के सम्पादन से लेकर प्रौद्योगिकी में हिंदी की उपयोगिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राजभाषा अधिकारी की होती है। अधीनस्थ कार्यालयों में राजभाषा निरीक्षण से लेकर राजभाषा की विभिन्न बैठकों में राजभाषा अधिकारी अपनी संस्था की राजभाषा उपलब्धियों की कुशलतापूर्वक प्रस्तुति करता है। इस तरह के और भी कई राजभाषा के कार्य हैं जो राजभाषा अधिकारी करता है जिसकी जानकारी अन्य लोगों को नहीं होती परिणामस्वरूप इनके विरूद्ध आधारहीन टिप्पणियॉ कर विशिष्ट विशेषणों से इन्हें नवाज़ा जाता है। राजभाषा अधिकारी अपने विभिन्न लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु जूझता रहता है इसलिए अपनी बातें कहने के लिए समय नहीं निकाल पाता जिससे प्रतिकूल टिप्पणी करनेवाले इस भ्रम में रहते हैं कि वह जो बोल रहे हैं वह सच है।

हिंदी दिवस के बल पर तथा राजभाषा अधिकारियों की पहल से राजभाषा की प्रगति तेज़ गति से हो रही है। हिंदी दिवस पर किसी भी प्रकार की प्रतिकूल टिप्पणी राजभाषा से न जुड़े लोगों की सोच को प्रभावित करते हैं जबकि राजभाषा से जुड़े लोग ऐसी टिप्पणियों से यही अर्थ लगाते हैं कि अभी भी राजभाषा अनजानी सी, अनचीन्ही सी है जिसके लिए और अथक सार्थक प्रयास करने हैं, हिंदी दिवस की व्यापकता और प्रभाव में और वृद्धि करनी है। यह सच है कि हिंदी दिवस पर की गई सभी प्रतिकूल टिप्पणियॉ राजभाषा से जुड़े लोगों को और प्रभावी राजभाषा कार्यान्वयन के लिए ही प्रेरित करती हैं किन्तु राजभाषा, को यह दुःख अब भी है कि इतने वर्षों के बाद हिंदी दिवस अब भी अनजानी सी, अनचीन्ही सी है, आखिर क्यों ?