बुधवार, 21 जुलाई 2010

राजभाषा और नेतृत्व

राजभाषा का प्रचार और प्रसार ही राजभाषा के कामकाज को गति और उन्नति प्रदान करता है। राजभाषा जगत का तथ्य यह है कि इसमें गति तो है किन्तु प्रगति  अपेक्षित नहीं है। इस तथ्य के समर्थन में केवल एक ही उदाहरण काफी है कि प्रत्येक कार्यालय की हिंदी की तिमाही प्रगति रिपोर्ट निर्धारित लक्ष्य से अधिक आंकड़े दर्शा रही है किन्तु कार्यालय में उन आंकड़ों के समर्थन में दस्तावेज, आंकड़े उपलब्ध नहीं है। बिना स्पष्ट आधार के यह गति एक अस्वाभाविक छवि निर्मित कर यह विश्वास दिलाने का प्रयास करती है कि राजभाषा का कार्यालयों में बखूबी प्रचार-प्रसार हो रहा है। वर्तमान में राजभाषा अधिकांश समय अपने प्रगति का विश्वास ही दिलाने में व्यतीत कर रही है। यह एक उदाहरण वर्तमान के राजभाषा कार्यान्वयन की वर्तमान दशा और दिशा की स्थिति का बयान कर रही है। कहॉ हो रही है चूक? किसकी वजह से राजभाषा की यह गति हो रही है? उत्तर स्पष्ट है – नेतृत्व।

क्या है राजभाषा का नेतृत्व? प्रत्येक कार्यालय में स्थित राजभाषा विभाग का विभागाध्यक्ष जो कहीं वरिष्ठ प्रबंधक है,कहीं मुख्य प्रबंधक है तो कहीं सहायक महाप्रबंधक है। राजभाषा विभाग के इन नेतृत्वकर्ताओं के लिए कार्यालयीन कार्यों से निकलकर कुछ नया करने की फुरसत ही नहीं मिलती। नैत्यिक कार्यों की यह व्यस्तता स्वंय में पत्राचार और अनुवाद को ही समेटे रहती है। इन व्यस्तताओं से निकल पाना इन नेतृत्वकर्ताओं की सबसे बड़ी चुनौती है। कार्यालय के सामान्य शब्दावली में इन्हें राजभाषा प्रभारी के रूप में जाना जाता है। राजभाषा कार्यान्वयन के लिए सामान्यतया संपूर्ण कार्यालय इन प्रभारी के सुझावों को अत्यधिक महत्व देता है अर्थात व्यावहारिक तौर पर राजभाषा कार्यान्वयन का नेतृत्व इन्हीं प्रभारियों पर होता है। यदि कोई कार्यालय राजभाषा कार्यान्वयन में उल्लेखनीय कार्य करता है अथवा उपलब्धि प्राप्त करता है तो इसका प्रमुख श्रेय राजभाषा प्रभारी को ही जाता है।

विभिन्न कार्यालयों का यह आम प्रचलन है कि वरिष्ठ कार्यालयों अथवा सरकार से प्राप्त अनुदेशों, आदेशों, दिशानिर्देशों के हद तक ही राजभाषा कार्यान्वयन किया जाए। इस कार्य में भी न्यूनतम समय में अधिकाधिक परिणाम का लक्ष्य रखा जाता है। स्वंय की पहल से कुछ नया और नवीन कार्य करने के कठिन कार्य से प्राय: प्रभारी बचते हुए पाए जाते हैं। वह ना तो शीर्ष प्रबंधन को इस विषयक सूचित करते हैं और ना ही किसी अभिनव कार्य के लिए  अपनी उत्सुकता दर्शाते हुए सार्थक पहल करते हैं। यदि सभी राजभाषा प्रभारी अपनी सार्थक एवं नवीन कार्नीतियों को अपनाएं तो राजभाषा की दुनिया में उल्लेखनीय विकास हो सकता है और राजभाषा स्टाफ में अपनी लोकप्रियता में प्रभावशाली वृद्धि दर्शा सकती है। यह मात्र कल्पना नहीं है बल्कि शुद्ध यथार्थ है। सभी राजभाषा प्रभारी आवधिक तौर पर किसी न किसी मंच पर मिलते हैं और राजभाषा कार्यान्वयन की चर्चाएं करते हैं। ऐसे मंचों पर गिनती के सक्रिय राजभाषा प्रभारी होते हैं जो हर बैठक में अपनी सक्रियता से प्रभावित करते रहते हैं परन्तु अधिकांश मात्र एक आदर्श श्रोता होते हैं।

राजभाषा में नेतृत्व की समस्या वर्तमान में ही नहीं है बल्कि पिछले दशक से यह समस्या गंभीर बनी हुई है। अस्सी तथा नब्बे के दशक में अनेकों राजभाषा प्रभारी थे जिनकी कार्यनीतियॉ तथा कार्यनिष्पादन से राजभाषा कार्यान्वयन को न केवल नई गति मिली बल्कि कई नवोन्मेषी कार्य भी हुए। राजभाषा प्रभारी का जब तक राजभाषा विषयक निजी व्यक्तित्व प्रभावशाली नहीं रहेगा तब तक राजभाषा के तीव्र विकास की संभावना दूर प्रतीत होती रहेगी। वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन की सबसे बड़ी चुनौती विभिन्न कार्यालयों में राजभाषा नेतृत्व का है। वरिष्ठता के आधार पर जब तक राजभाषा प्रभारी का कार्य़भार सौंपा जाता रहेगा तब तक इसमें शिथिलता स्वाभाविक है। राजभाषा प्रभारी के पद को वरिष्ठता के बजाए प्रतिभा और कार्यनिष्पादन के आधार पर करना चाहिए। मानव संसाधन विभाग द्वारा इसमें पहल की आवश्यकता है। प्राय: यह होता है कि वरिष्ठता के आधार पर एक या दो अभ्यर्थी होते हैं जो एक शोचनीय स्थिति है। एक पद और एक या दो अभ्यर्थी ?

वर्तमान समय राजभाषा कार्यान्यवन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ समय है। जिन कार्यालयों के राजभाषा प्रभारी प्रभावशाली हैं उस कार्यालय तथा उसके राजभाषा प्रभारी दोनों की दीप्ति को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। यदि इस दिशा में कार्यालय एक योजनाबद्ध तरीके से कार्य करें तो राजभाषा कार्यान्वयन नए युग में अपनी नई पहचान बखूबी स्थापित कर सकेगी।