सोमवार, 5 जुलाई 2010

राजभाषा और शब्द


राजभाषा कार्यान्वयन की एक प्रमुख समस्या है शब्द। प्राय: यह मांग की जाती है कि राजभाषा के शब्द सरल नहीं हैं। यद्यपि इस समस्या का सार्थक समाधान करने के लिए शब्दावली आयोग के अतिरिक्त विभिन्न विभाग भी सक्रिय हैं किंतु उसके प्रभावशाली प्रयासों का प्रतिफल नहीं मिल पा रहा है। इसी प्रकार बोलचाल की हिंदी के भी की रूप हैं जैसे शुद्ध हिंदी, दक्खिनी हिंदी, बम्बईया हिंदी, मद्रासी हिंदी आदि। इस प्रकार बोलचाल की हिंदी में राष्ट्र के विभिन्न राज्यों के शब्द जुड़ते रहते हैं जिनमें से अधिकांश शब्द लेखन में प्रयुक्त नहीं होते हैं। यदि भाषा के विश्व पटल का आकलन किया जाए तो कुछ महीने पहले प्रकाशित जानकारी के अनुसार प्रमुख भाषाओं की स्थिति निम्नलिखित है –

विश्व में बोली जानेवाली प्रमुख भाषाएं


1. चीनी (मंदारिन)       1.28 मिलियन


2. स्पैनिश                 329 मि


3. अंग्रेजी                  328 मि


4. हिंदी                    260 मि


5. अरबी                  221 मि


6. पुर्तगाली              203 मि


7. बंगला                193 मि


8. रूसी                  144 मि


9. जापानी               122 मि


10. जर्मन               90 मि


स्त्रोत- Ethnologue,16th Edition


उक्त आंकड़ों पर विवाद की संभावना हो सकती है किंतु यहॉ यह तो स्पष्ट है कि मंदारिन भाषा पनी वर्चस्वता बनाए हुए है तथा अंग्रेजी की संख्या को छूने के लिए हिंदी को अभी काफी प्रयास करने पड़ेंगे। स्पेनिश की तथा बँगला की संख्या भी ध्यानाकर्षण करती हैं। इसके अतिरिक्त यदि हम इंटरनेट पर शीर्ष दस भाषाओं का आकलन करें तो निम्नलिखित स्थिति निर्मित होती है –

इंटरनेट की शीर्ष भाषाएं


1. अंग्रेजी           452 मिलियन


2. चीनी             321 मि


3. स्पैनिश         129 मि


4. जापानी         94 मि


5. फ्रेंच             73 मि


6. पुर्तगाली       73 मि


7. जर्मन          65 मि


8. अरबी          41 मि


9. रुसी            38 मि


10. कोरियन     37 मि


स्त्रोत – Internate World States


उक्त आंकड़ों के आधार पर इंटरनेट पर हिंदी की उपयोगिता अत्यधिक कम है। अब हमारे सामने यह स्थिति स्पष्ट हो चुकी है कि हिंदी बोलनेवालों की तुलना में इंटरनेट पर हिंदी का उपयोग करनेवालों की संख्या में काफी अंतर है। भाषा के इन तथ्यों को बाद विश्व के विभिन्न भाषाओं के शब्दों की संख्या का आकलन करते हे हिंदी के शब्द संख्या की स्थिति को भी जान लेना आवश्यक है -
विभिन्न भाषाओं में शब्दों की संख्या


1. अंग्रेजी           999,600


2. चीनी            500,000 +


3. जापानी        232,000


4. स्पैनिश       225,000 +


5. रूसी           195,000


6. जर्मन         185,000


7. हिंदी           120,000


8. फ्रेंच           100,000


9. अरबी        45,000


10. टोकी पोंडा 197


स्त्रोत – Global Language Monitor


यदि हम हिंदी को राजभाषा के रूप में पूर्णतया विकसित कर स्थापित करना चाहते हैं तथा लोकप्रिय बनाना चाहते हैं तो उक्त आंकड़ों की तरह हमें भी अपनी एक व्यवस्था निर्मित करनी चाहे जहॉ अंतर्ष्ट्रीय भाषाओं के अतिरिक्त भारतीय भाषाओं की स्थितियों पर भी निगरानी रखी जा सके। मैं बार-बार एक शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ विवादित। विवादित शब्द के प्रयोग का प्रयोजन यह है कि भाषा विषयक उक्त पहल और प्रयास अनेकों तर्कों और तथ्यों को जन्म देते हैं जिसके आधार पर इस प्रणाली में आवश्यकतानुसार सुधार होता है. आरम्भ में प्रतिक्रियाएं आक्रामक होती हैं जो क्रमश: कम होती जाती हैं। इसी स्थिति से ग्लोबल लैंग्वेज मॉनिटर के अध्यक्ष तथा मुख्य शब्द विश्लेषक पॉल जे.जे. पेएक को गुजरना पडा।


यद्यपि विभिन्न प्रकार की राजभाषा शब्दावलियॉ निरन्तर जुड़ती जा रही हैं तथा उनका प्रयोग भी किया जाता है फिर भी यह कह पाना कठिन है कि प्रति वर्ष या प्रति तिमाही में राजभाषा के कितने नए शब्द जुड़ते हैं। ग्लोबल लैगेवेज मॉनिटर के शोध टीम के अनुसार प्रत्येक 98 मिनट में अंग्रेजी में एक नया शब्द जुड़ता है। शब्द केवल जुड़ते ही नहीं हैं बल्कि लुप्त भी होते हैं। राजभाषा में अनेकों ऐसे शब्द हैं जिन्हें कठिन शब्द कह कर प्रयोग नहीं किया जाता है और धीरे-धीरे ऐसे शब्द प्रयोग में लुप्त हो जाते हैं। उपरोक्त आंकड़ों के अनुसार यह स्पष्ट है कि हिंदी विश्व को अपने प्रभाव में लेने को तत्पर है किंतु प्रश्न यह उभरता है कि इस तत्परता के साथ-साथ क्षमताएं भी होनी चाहिए। क्षमताएं न केवल अभिव्यक्ति की बल्कि नित नए शब्दों को स्वंय में बखूबी रचाने-बसाने की भी। अनिवासी भारतीयों तथा हिंदी फिल्मों. गीतों आदि ने हिंदी के विस्तार में अपनी उल्लेखनीय भूमिकाओं को बखूबी प्रदर्शित किया है और अब भी कार्यरत हैं, इन्हें अब एक विश्व स्तरीय सशक्त आधार की आवश्यकता है। हिंदी के विस्तार संग राजभाषा कार्यान्वयन का प्रयास जुड़ा है।

यहॉ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह कार्य कैसे किया जा सकता है ? लिए हमें ग्लोबल लैंग्वेज मॉनिटर से सीखना पड़ेगा। आधारभूत शब्दों को ही गणना में सम्मिलित किया जाना चाहिए जैसे दौड़, दौड़ता, दौड़ रहा है को एक शब्द ही गिना जाएगा। इस ग्रह पर कुल बोली जानेवाली 6919 भाषाओं में से सभी भाषाओं का अपना सांस्कृतिक महत्ता है। अन्य भाषाओं से शब्दों को ग्रहण कर कुशलतापूर्वक आत्मसात करनेवाली भाषा ही वर्तमान की जीवंत और सक्रिय भाषा कही जाएगी। भाषा की जीवंतता के लिए उसमें प्रयुक्त शब्दों की निगरानी एवं विश्लेषण समय की मॉग है। बैंकिग शब्दावली, प्रशासनिक शब्दावली, बीमा शब्दावली, विधि शब्दावली आदि अनेकों शब्दावलियों का राजभाषा में प्रयोग हो रहा है किन्तु इनका एक सामान्य मंच नहीं है अतएव एक-दूसरे की उपलब्धियों की जानकारी इन्हें नहीं है जो हिंदी भाषा और राजभाषा दोनों के लिए लाभकारी नहीं है।

भाषाविदों का कहना है कि शब्द क्या है इसकी प्रकृति पर ही विवाद है इसलिए शब्द गणना संभव नहीं है। ग्लोबल लैग्वेज मॉनिटर शब्दों तथा मुहावरों, वैश्विक मुद्रण तथा इलेक्ट्रॉनिक मिडिया, इंटरनेट, ब्लॉग में प्रयुक्त शब्द की बारंबराता के अनुसार शब्दों का चयन करता है. इसमें शब्दकोश भी सहायक होते हैं। इस तुलना में यदि हिंदी को देखा जाए तो शब्दकोशों के प्रकाशन की अवधि निर्धारित नहीं है। अतएव हिंदी शब्दों पर निगरानी रखना एक कठिन कार्य हो जाता है। ग्लोबल लैंग्वेज मॉनिटर का मुख्य ध्येय वैश्विक अंग्रेजी के रूप में इंग्लिश के शब्दों पर निगरानी रखना है। हिंदी के ले से पहल की आवश्यकताएं हैं क्योंकि इस कार्य की क्षमता तथा संभावना तो पहले से ही विद्यमान है। कौन शुरू करे, कैसे शुरू करे, कहॉ शुरू करे आदि प्रश्नों से हटकर इस कार्य को आरम्भ कर देना है शेष समस्याएं खुद-ब-खुद हल हो जाएंगी। नि:संदेह यह कार्य राष्ट्रीय स्तर की संस्था ही कर सकती है। एक नए आरंभ की आशा भी है, जिज्ञासा भी है।





धीरेन्द्र सिंह