बुधवार, 1 जुलाई 2009

भाषा के दृष्टिकोण से भारत और चीन

दक्षिण एशिया में सुपर पॉवर बनने की होड़ भारत और चीन के मध्य जारी है तथा दोनों देश समय-समय पर अपनी वर्चस्वता का दावा करते रहते हैं। सुपर पॉवर बनने के लिए किसी भी देश को सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक आदि क्षेत्रों में अपनी वर्चस्वता बनानी पड़ती है तथा इस वर्चस्वता के प्रयासों में भाषा के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। भारत और चीन दोनों बहुसंख्यक और बहुभाषी देश हैं तथा दोनों देशों की अपनी राजभाषा है। हिंदी भारत की राजभाषा है तथा मन्दारिन चीन की राजभाषा है परन्तु दोनों देशों की राजभाषाओं में काफी समानताऍ हैं। भारत की राजभाषा हिंदी अभी भी कार्यान्वयन की स्थिति में है जबकि चीन की राजभाषा मन्दारिन चीन की धड़कनों को अभिव्यक्त करने का सर्वप्रमुख माध्यम है। भारत में अंग्रेजी भाषा का भी बोलबाला है जबकि चीन में मन्दारिन तथा अन्य चीनी भाषाओं का ही प्रयोग होता है।

चीन की अन्य विशेषताओं में से एक प्रमुख विशेषता चीनी भाषा में संपूर्ण शिक्षा प्रदान करना है। बारम्बार विभिन्न मंचों से कहा जाता रहा है कि मातृभाषा में शिक्षा प्रतिभा विकास में अत्यधिक सहायक सिद्ध होती है। भारत में भी मातृभाषा में शिक्षा पर बल दिया जाता है परन्तु अंग्रेजी भाषा यहाँ लोगों को मोहित करती नज़र आती है। चीन में अपनी भाषा के प्रति आदर सराहनीय है तथा चीनी भाषा के प्रति सजग भी प्रतीत होते हैं। भाषा के प्रति सम्मान भारत में भी है। चीन के पेकिंग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष श्री जियांग जिंगूकी का कहना है कि “ मेरे को ” शब्द का प्रयोग भारतीय क्यों करते हैं यह अशुद्ध है ‘मेरे को’ के स्थान पर ‘मुझको’ शब्द का प्रयोग करना चाहिए। चीन अब विदेशी भाषाओं में भी अपनी दख़ल बनाने में लग गया है। चीनी हिंदी सीखने में भी पीछे नहीं हैं। भाषा के प्रति ऐसी ललक भारत में बहुत कम दिखलाई पड़ती है। भारत देश में भाषा विषयक मुद्दों पर व्यापक सार्वजनिक चर्चाऍ नहीं हो पाईं यद्यपि आंदोलन अवश्य हुए जिसने भाषा की सोच की प्रक्रिया को तितर-बितर कर दिया।

भारत में चीन के किसी भाषा या मन्दारिन का किस स्तर तक अध्ययन किया जा रहा है तथा चीनी भाषाओं की भारत में क्या संभावनाऍ हैं इसपर जानकारियॉ सहज रूप से अनुपलब्ध हैं जबकि इससे विपरीत चीन में हिंदी को लेकर एक उत्साहजनक स्थिति है। वर्तमान में लगभग सात करोड़ स्नातक नौकरी की तलाश में हैं फिर भी चीन के कैम्पस में हिंदी तथा अन्य भाषाओं के अध्ययन करनेवालों के लिए नौकरी के प्रस्ताव आ रहे हैं। क्या भारत में भाषाओं के प्रति इस प्रकार की संचेतना है। चीन में हिंदी भाषा सीखनेवाले विद्यार्थियों ने अपना नाम हिंदी में लिखकर अपनी एक वैकल्पिक पहचान बनाई है। इन विद्यार्थियों के नाम अजय, सागर, विष्णु आदि हैं तथा यह भारतीय संस्कृति का अध्ययन करते हैं और रामायण और महाभारत सीरिअल देखते हैं। भारत को गहराई तक जानने की यह ललक यह दर्साती है कि चीन में हिंदी की काफी संभावनाऍ हैं। पिछले वित्तीय वर्ष के आर्थिक मंदी के बावजूद भी भारत तथा चीन के बीच कारोबार 34 प्रतिशत रहा किंतु दोनों देशों के व्यापारी शायद ही एक-दूसरे की भाषा और संस्कृति को समझ पाते हैं। वर्तमान में चीन के सात हिंदी विभागों में लगभग 200 विद्यार्थी हिंदी का अध्ययन कर रहे हैं।

भारत में भाषा का अध्ययन या तो शिक्षण के लिए होता है या फिर मीडिया के लिए। भाषा की अन्य विधाओं की और रूझान अधिक नहीं है। हिंदी प्रमुखतया साहित्य, मनोरंजन और मीडिया की भाषा बनी हुई है तथा इसके विस्तार की आवश्यकता है। शिक्षा में हिंदी की प्रभावशाली उपस्थिति अभी भी नहीं है, प्रशासन में इसकी उपयोगिता में प्रगति धीमी है, राजभाषा के रूप में अपनी छवि बनाने में प्रयत्नशील है आदि कई क्षेत्र हैं। समस्या हिंदी भाषा की क्षमता की नहीं है बल्कि उलझन हिंदी के उपयोगिता की है। मन्दारिन भाषा में प्रयोग किए जानेवाले कुल शब्द 500,000 से भी अधिक हैं जबकि हिन्दी में शब्दों की संख्या 120,000 है। इंटरनेट पर चीनी भाषा प्रयोग करनेवाले 321 करोड़ लोग हैं तथा यह विश्व की दूसरी भाषा है किंतु इंटरनेट की श्रेष्ठ 10 भाषाओं में हिंदी का नाम नहीं है। चीन की भाषागत सोच आधुनिक है तथा भविष्य के लिए चीन अपनी तैयारियॉ कर रहा है और उसका इज़हार भी कर रहा है। भारत में भाषागत ऐसी खनक नहीं है।

धीरेन्द्र सिंह.