सोमवार, 15 जून 2009

भाषाई जाल - अस्तित्व और अस्मिता

भारत देश की परम्परा में वसुधैव कुटुम्बकम का सिद्धान्त पल्लवित होते रहता है जिसे भूमंडलीकरण ने और गति प्रदान की है। वसुधैव कुटुम्बकम पूरे ब्रह्मांड को एक परिवार के रूप में मानता है जिसके अनेकों कारण हैं। आज मानव यह बखूबी अनुभव करने लगा है कि दुनिया सिमटती जा रही है और व्यक्ति इस दुनिया में एक नए विस्तार में जीने लगा है। सात समंदर पार जाना अब स्वप्न नहीं रह गया है। यह मानवीय क्रांति भूगोल, समाजशास्त्र, साहित्य, कारोबार आदि को गहराई से प्रभावित करने लगा है जिसमें अभिव्यक्ति विशाल चुनौतियों से गुज़र रही है। दो सुदूर देशों के व्यक्तियों का मिल पाना तो आसान है किन्तु उनकी आपसी बातचीत आसान नहीं है। कल तक अंग्रेज़ी को विश्वभाषा मानने का विश्वास वसुधैव कुटुम्बकम के यथार्थ ने बखूबी तोड़ा है। अब अंग्रेजी के अतिरिक्त भी विदेशी भाषाएं सीखने की आवश्यकता प्रतीत होने लगी है।

भाषा के इस द्वंद्व का ताजा अनुभव आई.पी.एल. मैच के दौरान हुआ। विश्व के कई देशों के खिलाड़ी एक टीम में खेल रहे थे इसमें से किसी को अंग्रेज़ी भाषा के सिवा अन्य भाषाओं की जानकारी नहीं थी तो कोई हिंदी नहीं जानता था तथा किसी को ना तो अंग्रेज़ी आती थी और ना ही हिंदी का ज्ञान था। इस विकट परिस्थिति में आपस में बातें भी स्पष्ट नहीं हो पातीं थीं जिससे अक्सर यह होता था कि कहा कुछ जाता था और समझा कुछ जाता था जिसके परिणामस्वरूप टीम का कार्यनिष्पादन प्रभावित होता था और आपसी ताल-मेल पर भी प्रतिकूल असर पड़ता था। यही स्थिति सैलानियों के साथ भी होता होगा, व्यापार में भी इस भाषा दीवार से खासी दिक्कतें पैदा होती होंगी। ऐसी स्थिति में भारत देश की कौन सी भाषा प्रयोग में लाई जाती है ? उत्तर सर्वविदित है – अंग्रेजी। यह अंग्रेजी विश्व के कितने देशों में सफल सम्प्रेषण में सहायक होती है ? इस बारे में अनेकों आंकड़ें, कथ्य-तथ्य आदि हैं परन्तु इन सबके बावजूद भी विश्व के आधे देशों तक में अंग्रेज में सफल सम्प्रेषण नहीं किया जा सकता है। फिर हिंदी को क्यों छोड़ दिया गया है। गीत-संगीत, मनोरंजन, भाव-निभाव आदि में जिस हिंदी का वर्चस्व है वह कारोबार, वैश्विक संपर्क में मूक क्यों हो जाती है ?

भाषाई जाल तथा अस्तित्व अस्मिता का एक ताज़ातरीन उदाहरण अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स के 2 मई, 09 के मुंबई संस्करण में पढ़ने को मिला। वर्ष 2010 में दिल्ली में आयोजित होनेवाले कॉमनवेल्थ खेलों के लिए भिखारियों ने विदेशी भाषाओं को सीखना आरम्भ कर दिया है। यह एक चौंकानेवाली सूचना है क्योंकि अशिक्षित भिखारी कैसै विदेशी भाषा सीख सकते हैं ? समाचार में यह सूचना दी गई थी कि अनुभवी भिक्षुक राजू सांसी दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में एक विद्यालय खुले आसमान के तले चला रहा है जिसमें चयनित 45 बच्चों को भीख मांगने के ज्ञान और गुर को सिखाया जा रहा है जिससे इन बच्चों के भीख मांगने के कौशल में वृद्धि हो सके। इसके अतिरिक्त दिल्ली के पटेल नगर की कटपुतली कॉलोनी में पतलू द्वारा दूसरा विद्यालय चलाया जा रहा है जिसमें विदेशी भाषाओं के प्रमुख शब्दों और वाक्यों के साथ-साथ वास्तविक विदेशी करेंसी रूपयों की सही पहचान का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इन भिखारियों को सिखाई जानेवाली प्रमुख भाषाएं अंग्रेजी, फ्रेंच तथा स्पैनिश हैं। रोटी के साथ भाषा का मेल काफी पुराना हो चला है अब तो संपन्नता के साथ भाषा के मेल का दौर चल पड़ा है जिसमें कई स्तरों पर उपेक्षा जैसी त्रासदी के बीच भी हिंदी प्रगति कर रही है। कॉमनवेल्थ के इस खेल में भाषा का यह खेल कुछ लोगों को संपन्न अवश्य बनाएगा यह इन भिखारियों के परिप्रेक्ष्य में एक सटीक बात प्रतीत होती है।

भाषा के इस वैश्विक संघर्ष में हिंदी अपने अस्तित्व के लिए कितना प्रयासरत है इसकी व्यापक समीक्षा समय की मांग है। मीडिया और मनोरंजन के अतिरिक्त व्यापार तथा अंतर्राष्ट्रीय समारोहों आदि में जब तक हिंदी का खुलकर प्रयोग नहीं किया जाएगा तब तक हिंदी अन्य विश्व भाषाओं से प्रतिद्वद्विता करने के लिए स्वंय को सक्षम नहीं बना सकती है। यद्यपि हिंदी की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता है लेकिन इन क्षमताओं का प्रभावशाली प्रदर्शन भी किया जाना अत्यावश्यक है। इसके लिए सम्पूर्ण देश में भाषागत जागरूकता की आवश्यकता है। भिक्षुकों द्वारा की जा रही अपनी भाषागत तैयारियॉ यह दर्शाती हैं कि यदि लक्ष्यपरक कार्य किया जाए तो भारत देश के विभिन्न कार्यालयों के कामकाज में हिंदी का प्रयोग न तो कठिन है और न हीं दोयम दर्ज़े का है। इन सबके बावजूद भी राजभाषा कार्यान्वयन को एक “राजू सांसी” तथा एक “पतलू” की तलाश है जिनमें राजभाषा कार्यान्वयन की दीवानगी भी हो तथा साथ ही साथ कामकाजी हिंदी की वास्तविक प्रगति के आकलन की दृष्टि भी हो। खेल का मैदान हो या कि कारोबारी दुनिया हर जगह हिंदी को ले जाने की ईच्छाशक्ति की आवश्यकता है। हिंदी हर क्षेत्र तथा हर विधा को बखूबी अभिव्यक्त करने की क्षमता रखती है तथा इसमें सतत विकास हो रहा है। भूमंडलीकरण में भाषाई जाल में हिंदी अपने अस्तित्व और अस्मिता का लड़ाई लड़ रही है तथा उसे आप जैसे योद्धा की आवश्यकता है। क्या आप तैयार हैं ?

धीरेन्द्र सिंह.