बुधवार, 13 मई 2009

हिंदी और अंग्रेज़ी तथा हिंदीभाषी

हिंदी भाषा का उपयोग करनेवाले तथा हिंदी के शुभचिंतक सामान्यतया हिंदीभाषी माने जाते हैं। हिंदीभाषियों में हिंदी भाषा विषयक प्रमुखतया दो वर्ग है जिसमें एक वर्ग (इसे आगे प्रथम वर्ग के नाम से जाना जाएगा) हिंदी के स्वाभाविक विकास के संग उसकी विशिष्टता को बनाए रखता है जबकि दूसरा वर्ग (इसे आगे द्वितीय वर्ग के नाम से जाना जाएगा) निर्बंध ढंग से अंग्रेज़ी शब्दों को सम्मिलित करने में प्रयत्नशील हैं। प्रथम वर्ग हिंदी भाषा में बैंक, चेक जैसे अंग्रेज़ी के जुबां पर चढ़ गए शब्दों का प्रयोग करता है तथा क्लियरिंग जैसे शब्दों को भी स्वीकार कर हिंदी भाषा को निखारने का प्रयास करता है। इस वर्ग की अंग्रेज़ी भाषा से शब्दों की स्वीकारोक्ति नियंत्रित तथा मर्यादित है तथा यह वर्ग अंग्रेज़ी के बजाय अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द स्वीकारने का हिमायती है जैसे पावती, विल्लंगम आदि शब्द। यह वर्ग हिंदी भाषा का विकास चाहता है किंतु उससे भी अधिक हिंदी के मूल स्वरूप को बनाए ऱखने का पक्षधर है।

द्वितीय वर्ग स्वंय को अत्याधुनिक विचारों का मानता है तथा बोलचाल के वाक्य में अक्सर आधे शब्द अंग्रेज़ी का प्रयोग करता है। इस वर्ग की मूल धारणा यह है कि अंग्रेज़ी भाषा को अपनाए बिना विकास कर पाना संभव नहीं है तथा केवल हिंदी के दम पर प्रगति की बात कोरी कल्पना है। भूमंडलीकरण के दौर में प्रत्येक वस्तु को विश्व मानक का बनाने की होड़ विकास की गति है अथवा एक अंधी दौड़ ? यह प्रश्न अब लोगों को प्रश्न नहीं लगता बल्कि मानसिक दिवालियेपन का प्रतीक नज़र आता है। इस सोच के परिणामस्वरूप यह वर्ग हिंदी भाषा सुविधा की भाषा बनाते जा रहा है जब जी में आए हिंदी तथा जब मूड करे अंग्रेज़ी। भाषा के नियम, व्याकरण, उसकी पाकृतिक विशेषताएं, स्वाभाविक लोच आदि इस वर्ग के लिए विशेष महत्व नहीं रखते हैं बल्कि सम्प्रेषणीयता सर्वोपरि है। यदि हिंदी की बात आती है तो यह वर्ग हिंदी के सरलीकरण पर ज़ोर देता है तथा इस वर्ग की यह भी कोशिश रहती है कि अंग्रेज़ी शब्द को यथासंभव हू-ब-हू उसी तरह देवनागरी लिपि में लिखा जाए। यह वर्ग आर्थिक आधार पर नहीं पहचाना जा सकता बल्कि यह हर भारतीय समाज में आसानीपूर्वक पाया जाता है।

हिंदी की उस तथाकथित शुद्धता का तो मैं भी हिमायती नहीं हूँ जिसमें अंग्रेज़ी के शब्दों की नाकाबंदी कर दी जाए तथा रेल्वे स्टेशन को अंग्रेज़ी का शब्द मान उसके स्थान पर लौहपथगामिनी विराम स्थल जैसे शब्दों के प्रयोग की वकालत की जाए। यह भी हिंदी भाषा के लिए उचित नहीं होगा कि मध्यमार्ग अपनाते हुए जो भी अंग्रेज़ी का शब्द आए उसे स्वीकारा जाए। अंग्रेज़ी के ऐसे शब्द जो सामान्य जनता की ज़ुबान पर रच-बस गए हों उनको खुले दिल से अपनाया जाए उदाहरण के तौर पर प्रौद्योगिकी के शब्द। स्क्रीन, कर्सर, पेन ड्राइव, सी.डी. आदि शब्दों का हिंदी में विकल्प तलाशने के बजाए उसे जस का तस स्वीकार करना उचित है। यदि हिंदी में अंग्रेज़ी के शब्दों को खींचकर लाया जाता है तब हिंदी की मूल प्रकृति के साथ जबरन छेड़छाड़ की जाती है जैसे “ कल मॉर्निंग की ट्रेन है और 6 आवर्स की ज़र्नी है। पहुँचकर मैं कॉल करूँगा, सीयू।“ इस प्रकार की वाक्य रचनाओं की बाढ़ सी आ गयी है तथा समाज में ऐसी भाषा को बौद्धिक होने का प्रतीक माने जाने लगा है। द्वितीय वर्ग हिंदी भाषा का कुछ ऐसा ही ताना-बाना बुन रहा है।

हिंदी प्रेमियों को अब और ज्यादा सचेत होकर इस दिशा में अपने-अपने स्तर से कार्य करना चाहिए। हिंदी भाषा के द्वितीय वर्ग के प्रयासों को समर्थन न देकर हिंदी की मूल प्रकृति की विशेषताओं को सँवारते-निखारते रहना चाहिए। सरकारी, गैर-सरकारी स्तर पर हिंदी के विकास के लिए प्रयास किए जा रहे हैं जिसका अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहा है। यदि हिंदी प्रेमी हिंदी भाषा के प्रथम वर्ग के हिमायती बन जाएं तो विश्व की उन्नत भाषाओं को हिंदी सहजतापूर्वक चुनौती दे सकती है और स्वंय को उन्नत भाषाओं के शीर्ष पर बखूबी स्थापित कर सकती है। हिंदी साहित्य के अतिरिक्त कार्यालयों के कामकाज में, उच्च शिक्षा में, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में, प्रौद्योगिकी आदि में हिंदी को अपनी पहचान के लिए अथक प्रयास की आवश्यकता है और हिंदी प्रेमी इस कार्य के प्रमुख दायित्व निर्वाहक हैं इसलिए देर किस बात की ? आपकी प्रतिभा की हिंदी मुँहताज है। एक नई योजना, एक नए स्वप्न, एक लक्ष्य लिए और गतिशील हो जाईए, आखिररकार हिंदी भाषा के कारवॉ का नेतृत्व की जिम्मादारी भी तो आपकी ही है। इस प्रकार प्रतिभा नमन सुखकारी लगता है, हमेशा।

धीरेन्द्र सिंह.