मंगलवार, 12 मई 2009

चैनलों का हिन्दी चलन

हिंदी, राष्ट्र के माथे की बिंदी, यह वाक्य अनजाना नहीं है और न ही अस्वाभाविक। वैश्वीकरण की धुन में विश्व की सभी भाषाओं के रूपों में परिवर्तन हो रहा है तो भला हिंदी क्यों पीछे रहे। इसके भी रूप-रंग में कई परिवर्तन हो रहा हैं पर जितने करीब और स्पष्टता से भारतीय चैनलों पर हिंदी के विविध रंग दिखलाई पड़ते हैं, उतने किसी दूसरी विधा में नहीं। भारतीय जनमानस को सहजता से छू लेनेवाला और गहराई से प्रभावित करने की क्षमता रखनेवाला चैनल रूपी जीव अपनी वर्चस्वता का झंडा नित-प्रतिदिन सतत् उँचाई की और लिए जा रहा । इस उँचाई के संग-संग हिन्दी भी उँची होती जा रही है। ना...ना...उँचाई का अर्थ कृपया प्रगति से मत लीजिएगा, यहाँ तो उँचाई का तात्पर्य हिन्दी की सहज, स्वाभाविक और मौलिक रूप से दूर जाने की और इंगित कर रही है। प्राय: हिन्दी के प्रचलित शब्दों की जगह अंग्रेज़ी शब्दो का प्रयोग करनेवाले चैनलों के सूत्रधार (एंकर) आधुनिकीकरण की छाया में और हिन्दी के बजाए अंग्रेज़ी शब्दों को अधिक लोकप्रिय मानते हुए प्रचलित हिन्दी शब्दों को छोड़ते जा रहे हैं। दर्शक यह देख हतप्रभ रह जाता है हिन्दी के अच्छे-खासे शब्द यॉ किस तरह ऐतिहासिक दस्तावेज़ बनाए जा रहे हैं।

इन चैनलों ने अपनी दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ नाम से धड़ाधड़ वाक्य प्रदर्शन कर रहे हैं। इस तेज़ गति में प्राय: हिन्दी पर से नियंत्रण छूट जाता है तथा अशुद्ध शब्द बार-बार प्रदर्शित होते रहते हैं। इस प्रकार के प्रदर्शन से जिनकी हिन्दी अच्छी है वह लोग इस अशुद्धि को अनदेखा कर देते हैं किन्तु अधिकांश दर्शक उस शब्द को सही मानकर उसका प्रयोग करने लगते हैं। किसी-किसी चैनल में तो अंग्रेज़ी से किए गए अनुवाद में भी अनगढ़ और अशुद्ध शब्द होते हैं। दर्शक इस प्रकार की भाषागत उलझनों में अनजाने में उलझे जा रहे हैं।

इन चैनलों के समाचार वाचकों, सूत्रधारों, अनुवादकों, सम्पादकों आदि के अतिरिक्त दर्शकों का भी दायित्व है कि हिन्दी के बिगड़ते रूप की तरफ ध्यान दें और अपेक्षित पहल करें। हिंग्लिश का प्रयोग क्या हमारे देश की वर्तमान आवश्यकता है ? चैनलों का व्यावसायीकरण की अंधड़ बीच हिन्दी की मौलिकता पर एक कृत्रिम पर्त को जमाना क्या अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण की वर्तमान आवश्यकता है ? हिन्दी के क्लिष्ट शब्दों की दुहाई देते हुए अंग्रेजी के शब्दों को उन्मुक्तता से अपनाते जाना क्या हिन्दी भाषा के क्षरण का एक आरम्भिक लक्षण नहीं है ? इस दिशा में जागरूक दर्शक अपनी पहल से आवश्यक परिवर्तन ला सकते हैं। चैनलों ने हिन्दी के साथ जिस तरह से अबाध गति से खेलना आरम्भ किया है वह हिन्दी के लिए अहितकर प्रतीत हो रहा है।
धीरेन्द्र सिंह.