सोमवार, 27 अप्रैल 2009

ओ मेरे मितवा

इन्टरनेट जगत में राजभाषा विषय पर गिने-चुने लोग ही दिखलाई पड़ते हैं जिनके स्वर में हमेशा एक पुकार सुनाई पड़ती है जैसे विरह वेदना में मन पुकार उठे “आ जा तुझको पुकारे मेरे गीत रे ओ मेरे मितवा”। यह पुकार किसी व्यक्तिगत हित के लिए नहीं है बल्कि यह आवाज़ एक कारवॉ बनाने की है जिससे राजभाषा को और गुंजायमान किया जा सके। यहॉ प्रश्न उठता है कि यह पुकार क्यों ? क्या पुकारनेवाले राजभाषा जगत के नहीं हैं? यदि यह लोग राजभाषा जगत के हैं तो क्यों नहीं रू-ब-रू मिलकर अपनी समस्याओं को सुलझाते हैं आखिरकार राजभाषा की अनेकों समितियॉ कार्यरत हैं, अनेकों सशक्त मंच हैं फिर यह नेट पुकार क्यों? इस प्रश्न का उत्तर कोई भी राजभाषा अधिकारी नहीं देना चाहेगा क्योंकि यह एक सामान्य प्रश्न नहीं है बल्कि राजभाषा का एक यक्ष प्रश्न है। राजभाषा की नेट पुकार करनेवाले राजभाषा के ख्वाबों के मसीहा हैं जिसे पूरा करने के लिए उन्हें सक्षम प्रतिभाओं की आवश्यकता है। ज्ञातव्य है कि प्रतिभा को तलाशना पड़ता है तथा इस खोज़ के लिए नेट दुनिया से बेहतर जगह और नहीं है।

राजभाषा अधिकारियों ने राजभाषा को राजभाषा नीतियों के अंतर्गत एक तालाब मानिंद मर्यादित बना रखा है। राजभाषा कार्यान्वयन एक दशक से कार्यान्वयन के चौराहे पर खड़ी है तथा विभिन्न दिशाओं में ताक-झांक रही है पर किसी एक दिशा में कदम बढ़ाने की कोशिश नहीं कर रही है। यह उलझन अनेकों चुनौतियों से परिपूर्ण है। कहीं पर कर्मचारियों का अंग्रेज़ी में कार्य करने की आदत है, कहीं प्रौद्योगिकी की चुनौतियॉ हैं, कहीं राजभाषा पुरस्कार की अपार चाहत की बेचैनी है, कहीं काल्पनिक प्रशासनिक अड़चनों की दीवार है और इस प्रकार राजभाषा कार्यान्वयन की समस्याओं के अनेकों मदें हैं जिनके समाधान का प्रयास नेट पर आरम्भ हो चुका है। यहॉ प्रश्न उठता है कि इन समस्याओं के समाधान के लिए राजभाषा कार्यान्वयन समिति है, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति है तथा इससे भी सक्षम समितियॉ हैं फिर नेट पुकार क्यों? नेट पुकार इसलिए क्योंकि इन सब मंचों तक प्रत्येक राजभाषा अधिकारी नहीं पहुँच सकते तथा कभी-कभी तो इन समितियों में प्रत्येक उपस्थितों को अपनी बात रखने का अवसर ही नहीं मिल पाता है अतएव इन समितियों की अपनी सीमाएं और मर्यादाएं हैं जिसके अंतर्गत निश्चित एवं निर्धारित संख्या रहती है। नेट जैसी व्यापकता इन समितियों में नहीं मिलती इसलिए नेट पुकार समय की मॉग बन गई है।

राजभाषा अधिकारियों के अपने-अपने राजभाषाई टापू हैं जिसके अंतर्गत एकसमान मानसिकता वाले राजभाषा अधिकारी राजभाषा का अपना आसमान निर्मित करते रहते हैं। एक राजभाषाई टापू दूसरे राजभाषाई टापू की तीखी आलोचना करने से बाज नहीं आता है जिसके परिणामस्वरूप राजभाषा का कारवॉ गठित नहीं हो पाता है। यह हिंदी की एक त्रासदी है। राजभाषा कार्यान्वयन में जब तक एकलक्ष्यी, एकमार्गी, एकजुट होकर कार्य नहीं किया जाएगा तब तक सफलता नहीं मिल सकती है। कटु य़थार्थ यह है कि विभिन्न सार्थक-निरर्थक कारणों से राजभाषा अधिकारियों में एकजुटता नहीं हो पा रही जिसका प्रतिकूल परिणाम राजभाषा कार्यान्वयन पर पड़ रहा है। एकजुट ना हो पाने का प्रमुख कारण हिंदी की बौद्धिक वर्चस्वता को जतलाना है। एक राजभाषा अधिकारी स्वंय को दूसरे से श्रेष्ठ मानता है। इस सोच के संघ्रष में राजभाषा फंसी है तथा कुछ कर्मठ राजभाषा अधिकारी भी फंसे हैं जैसे अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंसे थे।

कभी भी किसी की आलोचना अथवा प्रतिकूल टिप्पणियों से राजभाषा कार्यान्वयन नहीं किया जा सकता है बल्कि इससे कार्यान्वयन की गति को क्षत्ति अवश्य पहुँचाया जा सकता है। अपने-अपने कार्यालयों की परिधि से बाहर निकलकर यदि कोई राजभाषा अधिकारी नेट पर एक कारवॉ बनाने का प्रयास कर रहा है तो यह एक उल्लेखनीय पहल है। इस प्रकार हिंदी की अन्य प्रतिभाओं को राजभाषा कार्यान्वयन से किसी ना किसी रूप से जोड़ा जा सकता है। यह प्रयास राजभाषा के प्रचार-प्रसार की गति को तेज़ करने के लिए अत्यधिक आवश्यक है। कामना यही है कि अनेकों मितवाओं तक यह आवाज़ जाए तथा उनके विचार राजभाषा कार्यान्वयन को और विशाल तट प्रदान करता रहे।

धीरेन्द्र सिंह.