मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

प्रौद्योगिकी से प्रीत

व्यक्ति की चाहत हो या ना हो प्रौद्योगिकी से प्रीत करनी ही पड़ती है। आज प्रौद्योगिकी ललकार रही है कि मुझसे बच कर दिखाओ तो जानें। चमकती स्क्रीन से आँखें प्रभावित हो सकती है, चश्मा आँखों से या आँखें चश्मे से बेपनाह मुहब्बत शुरू कर सकती हैं, अंगुलियों में दर्द उठ सकता है या फिर स्पांडलायसिस हो सकता है। इतनी सारी चुनौतियों सह भय के बावजूद भी मन है कि मानता नहीं। कम्प्यूटर, एक मित्र है, हमराज है, खुशियों का अलहदा साज है अजी अल्हड़ता के झूले पर पगलाया सा मधुमास है। कल तक इसे समय की बर्बादी के अंदाज़ से देखनेवाले, सामाजिक गतिविधियों से दूर ले जानेवाली मुसीबत के रूप में पहचाननेवाले आज ख़ुद कम्प्यूटर से नैन-मटक्का करते पाए जाते हैं। कितना मज़ा आता है जब गुगल महाराज से कहते हैं कि हमें फलां जानकारी दो या फलां चीज़ दिखलाओ और पलक झपकते ही वह हाज़िर। अलादीनी चिराग के टक्कर का मामला है यह तो।

जब तक कम्प्यूटर से व्यक्ति अपरिचित है तब तक उसके स्वर इसके बाबत या तो निष्पक्ष या निष्क्रिय होते हैं या फिर एनाकोंडा की तरह विरोध में फुंफकारते रहते है। यद्यपि इस वर्ग के व्यक्ति अब धीरे-धीरे लुप्तप्राय प्राणियों में आने लगे हैं। अब तो कम्प्यूटर उपयोगिता की लहलहाती फसलों का मौसम है जिसमें सम्प्रेषण के नित नए प्रवाह चलते हैं तथा सोच और चिंतन को पुरवैया का ख़ुमार दर ख़ुमार मिलते रहता है। अब तो यह तय करना मुश्किल है कि सोच की गति तेज़ है अथवा सम्प्रेषण की गति और इन दोनों की संगति में मति के भ्रमित हो जाने का अंदेशा बना रहता है। जिसका यदा-कदा नमूना देखने को मिलते रहता है। ख़ैर यह सब छोटी-छोटी कलाकारियाँ चलती ही रहेंगीं क्योंकि भावनाओं और विचारों पर भला कभी नियंत्रण लग सका है। अभिव्यक्ति की इस आजादी पर यदि अपनी मनमानी न किया तो फिर क्या किया ?

कम्प्यूटर पर हिंदी में कुछ टाइप कर लेना अथवा कुछ इ-मेल कर द्नेना ही फिलहाल हिंदी में कम्प्यूटरी महारत है परन्तु दर्द यह है कि यह भी ठीक से नहीं हो पाता है। आजकल के युवा तो कम्प्यूटर से यूँ चिपके रहते हैं जैसे दीवाल से छिपकली मानों छिपकली की तरह एक उचित अवसर की तलाश में हों और अवसर मिलते ही लपक लें। युवाओं के लिए कम्प्यूटर तलाश की भूमिका सर्वाधिक निभाता है। यहां पर चिन्ताजनक बात यह है कि युवाओं द्वारा कम्प्यूटर पर अंग्रेज़ी का ही प्रयोग अधिकांश किया जा रहा है तथा हिंदी से उनका कोई खास वास्ता नहीं है। आवश्यक है कि केवल देवनागरी लिपि में प्रविष्टियॉ भेजने के विभिन्न फोरम बनाए जाएं तथा उन्हें लोकप्रिय बनाया जाए। युवाओं की भी रूचि केवल संदेशों के आदान-प्रदान की है। उन्हें तो दिलों की सदाओं में ही विशेष रूचि है, कम्प्यूटर की शेष विधाएं तो नौकरी के लिए सीखना आवश्यक है।

कार्यालयों में कम्प्यूटर उपयोगिता की अनेकों स्थितियॉ हैं। एक वक्त में यह कहा जाता था कि कम्प्यूटर के साथ मित्रता कार्यालय कर्मी नहीं कर पाएंगे क्योंकि उनकी उम्र 45 के आसपास है किन्तु कार्यालय कर्मियों ने जिस हौसले से कम्प्यूटर से मित्रता की उससे लोग दांतो तले उंगलियॉ दबाने लगे। अपनी इस कामयाबी पर खुश होकर कर्मी गुनगुनाने लगे – ओ मेरी ]ज़ोहराजबीं...। सफलताएं इस तरह गुनगुनाने का स्वाभाविक अवसर देती हैं। यहॉ भी वही परेशानी है कि काम अंग्रेज़ी में होता है अथवा निर्धारित कमांड से किन्तु हिंदी अभी भी माथे की बिंदी जैसे शोभित नाम लेकर अपनी सूक्ष्म इयत्ता पर भविष्य में पसरने का मंसूबा बनाए हुए है। कार्यालयों में अब भी कई कर्मी मिल जाएंगे जिन्हें फ्लापी ड्राइव के बारे में कुछ भी नहीं मालूम। ऐसी स्थिति में प्रौद्योगिकी से हिंदी को जोड़ने की बात एक कठिन चुनौती लग रही है। कम्प्यूटर की देहरी पर हिंदी सजी संवरी खड़ी है और प्रतीक्षा कर रही है उंगलियों को देवनागरी की बोर्ड पर दौड़ते हुए जिससे कम्प्यूटर की दुनिया में वह अपना आसमान, एक नायाब ज़हान निर्मित कर सके।

धीरेन्द्र सिंह.