गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

अंग्रेज़ी की कठिनाई.

भारत देश में प्राय: यह कहा जाता है कि अंग्रेज़ी एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा है तथा इस भाषा के द्वारा विश्व के ज्ञान, सूचनाओं आदि की खिड़कियॉ खुलती हैं। इस सोच के विरोध में भारत देश में अनेकों बार स्वर उठते रहे हैं तथा इस कथन की सत्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं किंतु ऐसे स्वरों को अनसुना किया जाता रहा है। इस प्रकार देश के जनमानस में यह प्रचारित किया जा चुका है कि और प्रचारित किया जा रहा है कि भारतीय भाषाओं की तुलना में अंग्रेज़ी भाषा प्रगति का एकमात्र रथ है जिसे अपनाने से तरक्की की गारंटी मिल जाती है। यद्यपि देश में अनेकों ज्वलंत उदाहरण हैं जिनके आधार पर यह बखूबी बतलाया जा सकता है कि प्रगति के लिए अंग्रेज़ी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाएं भी हैं जिनसे तरक्की की जा रही है। अंग्रेज़ी भाषा के संग हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के द्वंद्व में राष्ट्र प्रगति करते जा रहा है फिर भी उपलब्धियों की बुलंदी तक पहुँचना बाकी है। किसी भी राष्ट्र और भाषा का प्रगति में कितना तालमेली योगदान होता है इसके विश्व में कई ज्वलंत उदाहरण हैं। लेकिन बात तो अंग्रेज़ी भाषा के कठिनाई की करनी है तो इतनी लंबी भूमिका क्यों ?

हॉ, इस लेख का प्रेरक दिनांक 16 अप्रैल, 2009 को अंग्रेज़ी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स (मुंबई) के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित एक चौंकानेवाला समाचार है। समाचार के शीर्षक का यदि हिंदी अनुवाद किया जाए तो कुछ ऐसा होगा – शहर के एयरपोर्ट पर भाषा-संबंधी विलंब को गपशप ने सुलझाया। इस शीर्षक में भाषा संबंधी विलंब में एक चुम्बकीय आकर्षण था जिसके प्रभाव में मैं एक सांस में पूरा समाचार पढ़ गया। इस समाचार के पठन के बाद यह सोच उत्पन्न हुई कि भाषा का द्वंद्व ज़मीन से आसमान तक कैसे पहुँच गया ? हमारे देश की सोच में अंतर्राष्ट्रीय भाषा अंग्रेज़ी का दबदबा है फिर यह भाषा की आसमानी लड़ाई कैसी ? क्या सचमुच अंग्रेज़ी बौनी होती जा रही है ? क्या भूमंडलीकरण ने अन्य तथ्यों के संग-संग भाषा की सत्यता को भी प्रकट करना शुरू कर दिया है ? क्या अंग्रेज़ी भाषा के प्रति भारत की सामान्य सोच में परिवर्तन होगा ? क्या संकेत दे रहा है यह समाचार ?

दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स में यह दर्शाया गया है कि क़ज़ाकिस्तान, रूस तथा कोरिया आदि देश के पायलट को एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) से अंग्रेज़ी में प्राप्त अनुदेशों को समझने में असुविधा होती है। अंग्रेज़ी भाषा के अतिरिक्त अंग्रेज़ी बोलने के लहज़े से उनको काफी कठिनाई होती है। इस कठिनाई का हल निकालने के लिए यह निर्णय लिया गया कि एटीसी और इस प्रकार के विदेशी पायलटों के बीच गपशप हो जिससे पायलट अंग्रेज़ी के लहज़े को भी समझ सकें। समाचार में इसका भी उल्लेख है कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अनुसार मार्च, 2008 तक भारत में विदेशी पायलटों की संख्या 944 थी। इस क्षेत्र की चूँकि निर्धारित शब्दावली एवं सीमित वाक्य होते हैं जिससे एक अभ्यास के बाद इसे सीखा जा सकता है परन्तु सामान्य बातचीत में कठिनाई बरकरार रहेगी। भविष्य में अंग्रेज़ी के अतिरिक्त अनेकों भाषाएं विश्व में अपना दबदबा बनाने का प्रयास करेंगी अतएव हिंदी को अब और व्यापक रूप में अपनाने की आवश्यकता है। अंग्रेज़ी भाषा की इस प्रकार की कठिनाई की तरह कहीं भविष्य हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए घोर संकट न पैदा कर दे।
धीरेन्द्र सिंह.