मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

अंग्रेज़ी की दुहाई.

अभिव्यक्ति के लिए ही नहीं बल्कि राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति के लिए भी उस राष्ट्र की भाषा का महत्व होता है। भाषा विज्ञान भी इस तथ्य को मानता है। यह तथ्य है कि किसी भी समाज के विकास में केवल भाषा का योगदान नहीं रहता है किन्तु विकास के क्रम में भाषा के महत्व को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता है। सर्वविदित है कि किसी भी राष्ट्र की सामान्यतया लिखित और मौखिक भाषा का स्वरूप एक सा नहीं रहता है। भाषाओं की तुलना भी नहीं की जा सकती है क्योंकि प्रत्येक भाषा अपनी ज़मीन का सोंधापन लिए होती है। प्रत्येक भाषा अपने आधार विस्तार के संग-संग दूसरी भाषाओं की विभिन्न खूबियों को स्वंय में मिलाकर अपना विकास करते रहती है। इस प्रकार साहित्य, प्रौद्योगिकी, प्रशासकीय कामकाज आदि में सहजतापूर्वक प्रयोग में लाई जानेवाली भाषा एक विकसित भाषा के रूप में जानी जाती है। इस क्रम में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएं स्वंय को वर्षों से विकसित भाषा के रूप में प्रमाणित कर रही हैं। हमारे देश में विकसित भाषा के रूप में मानी जानेवाली अंग्रेज़ी भाषा कभी अविकसित भाषा के रूप में जानी जाती थी। वर्तमान में हमारे देश में अंग्रेज़ी भाषा के सामने हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को अपेक्षित महत्व नहीं दिया जा रहा है जीसकी अनुभूतियों से आए दिन गुज़रना पड़ता है।

भारतीय संविधान भी हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के विकास की बात कहता है। भारत देश के सार्वजनिक जीवन में मौखिक प्रयोग के रूप में भी हिंदी की लोकप्रियता तथा उपयोगिता अपने चरम पर है। संघ की राजभाषा हिंदी का प्रशासकीय कामकाज में उपयोग अपेक्षाकृत काफी कम है। इस कार्य हेतु कोशिशें जारी हैं किंतु जितनी उर्जा, समर्पण तथा स्वप्रेरणा की आवश्यकता है उतनी उपलब्ध नहीं हो पा रही है परिणामस्वरूप हिंदी तथा भारतीय भाषाएं एक औपचारिकता के आवरण में लिपटी दिखलाई पड़ रही है। इस क्रम में राष्ट्र के हिस्से से यह आवाज़ उठती है कि अंग्रेजी को हटाया जाना चाहिए तब उसपर काफी शोर क्यों मचाया जा रहा है? क्या किसी के कह देने मात्र से कोई भाषा समाप्त हो जाती है ? या कि यह भाषा विषयक किसी भय का शोर है ? गौरतलब है कि भारत देश के संविधान में देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिंदी संघ की राजभाषा है जिसके कार्यान्वयन के लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं, तो क्या इस संवैधानिक शक्ति से विभिन्न सरकारी कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों आदि में राजभाषा हिंदी का प्रयोग लक्ष्य के अनुरूप किया जा रहा है ? यदि नहीं तो यह प्रमाणित करता है कि किसी भाषा के हटा देने की आवाज बुलन्द करने मात्र से कोई भाषा नहीं हटती है तो फिर मीडिया द्वारा अंग्रेज़ी की दुहाई क्यों दी जा रही है ?


ज्ञातव्य है कि भारत देश की सम्पर्क भाषा हिन्दी है तथा इसका सशक्त जनाधार है। देश के विभिन्न राज्यों में संबंधित राज्य की भाषा का बोलबाला है। इन सबके बावजूद भी अंग्रेजी का प्रयोग कम करना कठिन क्यों लग रहा है यह एक विचारणीय प्रश्न है। अंग्रेज़ी हटाओ के पीछे क्या धारणा है इसकी व्यापक समीक्षा नहीं की जा रही है। “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति खा मूल” विचार का गहराई से विश्लेषण नहीं किया जा रहा है। भाषा विचार को प्रभावित करती है या कि विचार भाषा पर अपनी वर्चस्वता बनाए रखता है, से स्पष्ट नहीं किया जा रहा है। स्वतंत्रता और परतंत्रता में भाषा की भूमिका स्पष्ट नहीं की जा रही है। भाषा का प्रयोग एक आदत का या भाषागत व्यवस्था की सहजता का परिणाम है इसे सार्वजनिक तौर पर निरूपित नहीं किया जा रहा है। राष्ट्र की एक भाषा का प्रशासकीय कार्यों में पयोग में लाया जाना राष्ट्रहित में है इसपर खुलकर बहस नहीं की जा रही है। हिंदी को पूर्णतया प्रशासकीय कार्यों में प्रयोग में लाने की बाधाओं का उल्लेख नहीं किया जा रहा है। यह भी नहीं समझाया जा रहा है कि एक भाषा को पूर्णतया सक्षम कर उसके पद पर आसीन करने के लिए एक धमाकेदार प्रयास की आवश्यकता होती है।

इस विषयक दूसरी कटु स्थिति यह है कि राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन से जुड़े अधिकांश लोग अब थके-थके से लगने लगे हैं। ऐसी स्थिति में एक प्रेरणापूर्ण ललकार उनमें नई उर्जा तथा जागृति का संचार कर सकती है। भूमंडलीकरण के दौर में जिस देश की माटी की भाषा को लिखित और मौखिक संप्रेषण में सर्वोच्च स्थान नहीं दिया जाएगा वह देश पिछड़ों की श्रेणी में माना जाएगा। आज हिंदी प्रौद्योगिकी में भी अपनी श्रेष्ठ क्षमता का परिचय दे चुकी है। विज्ञान, तकनीकी आदि विषयों को बखूबी अभिव्यक्त करने की शब्दावलियों सो सजी-संवरी हिंदी और कब तक अपने पद पर आसीन होने के लिए प्रतीक्षारत रहेगी ?

धीरेन्द्र सिंह.