रविवार, 29 मार्च 2009

राजभाषा तथा हिंदी साहित्यकार.

एक युग वह भी था जब हिंदी कार्यालयों की देहरी तक भी अपना प्रभाव निर्मित नहीं कर सकी थी। एक सामान्य धारणा थी कि हिंदी बातचीत और गानों-बजानों की भाषा है। यह मान्यता भी निर्मित हो चुकी थी कि हिंदी में कारोबारी अभिव्यक्तियाँ संभव नहीं है । भारतीय संविधान की व्यवस्था के अन्तर्गत राजभाषा नीति के कार्यान्वयन के लिए सरकारी कोशिशें शुरू हुई तथा हिन्दी की एक नई विधा - राजभाषा का प्रादुर्भाव हुआ। अधिकांशत: हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी अथवा हिंदी माध्यम से शिक्षा प्राप्त हिंदीसेवी राजभाषा अधिकारी के पद पर राजभाषा कार्यान्वयन के दायित्वों का निर्वाह करना आरम्भ किया। कार्यालयीन परिवेश की विभिन्न अभिव्यक्तियों के लिए हिंदी में शब्द उपलब्ध नहीं थे जिसका कारण स्पष्ट था कि पहले हिंदी कभी भी सरकारी कामकाज की भाषा नहीं थी। राजभाषा के नए-नए शब्दों पर काफी टिप्पणियाँ आनी शुरू हुई और राजभाषा पर यह आरोप लगाया गया कि यह दुरूह शब्दावलियों से भरी हुई है। ऱाजभाषा को विभिन्न विशेषणों से संबोधित करते हुए राजभाषा अधिकारियों पर अंगुलियां उठने लगी। भाषागत यह एक विकट स्थिति थी।

कार्यालय के विभिन्न विषयों के लिए निर्धारित अलग-अलग शब्दावलियों के बीच में आम बोलचाल की हिन्दी शब्दावली ठगी सी खड़ी होकर अपरिचित शब्दों को देखती रही। प्रयोगकर्ता इन शब्दों को देखकर विचित्र भाव-भंगिमाएं बनाते थे। परिणामस्वरूप अधिकांश समय यह नए शब्द प्रयोगकर्ता की देहरी तक ही पहुँच कर आगे नहीं बढ़ पाते थे और आज भी लगभग यही स्थिति है। भाषाशास्त्र के अनुसार यदि शब्दों का प्रयोग न किया जाए तो शब्द लुप्त हो जाते हैं। तो क्या राजभाषा के अनेकों शब्द प्रयोग की कसौटी पर कसे बिना ही लुप्त हो जाएंगे ? यह आशंका अब ऊभरने लगी है जबकि राजभाषा अधिकारियों की राय में इस प्रकार की सोच समय से काफी पहले की सोच कही जाएगी। राजभाषा अधिकारियों का तो कहना है कि राजभाषा की पारिभाषिक, तकनीकी आदि शब्दावलियों का खुलकर प्रयोग हो रहा है। एक हद तक यह सच भी है क्योंकि इन शब्दावलियों के प्रयोगकर्ता राजभाषा अधिकारी ही हैं। इन शब्दावलियों का अधिकांश प्रयोग अनुवाद में किया जाता है जिसे कर्मचारियों का छोटा प्रतिशत समझ पाता है। राजभाषा कार्यान्वयन की इसे एक उपलब्धि माना जाता है तथा कहा जाता है कि इन शब्दावलियों को कर्मी समझ रहे हैं अतएव इन शब्दावलियों को स्वीकार किया जा रहा है। सकार और नकार के द्वंद्व में राजभाषा ऐसे प्रगति कर रही है जैसे तूफानी दरिया में एक कश्ती। राजभाषा अधिकारी चप्पू चलाता मल्लाह की भूमिका निभाते जा रहा है।

उक्त के आधार पर क्या यह कहा जा सकता है कि राजभाषा अनुवाद की भाषा बन रही है ? इस पर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं हैं। एक वर्ग का कहना है कि राजभाषा शब्दावली एक बेल की तरह अंग्रेज़ी के सहारे विकास कर रही है जबकि दूसरे वर्ग की राय है कि हिंदी में मौलिक रूप से राजभाषा में लेख आदि लिखे जा रहे हैं अतएव राजभाषा अपने अलग व्यक्तित्व को लेकर विकास कर रही है। यदि राजभाषा में इतना कार्य हो रहा है तो क्या यह शब्दावली सामान्य व्यक्ति तक पहुँच पा रही है ? यह एक स्वाभाविक प्रश्न है क्योंकि राजभाषा कार्यान्वयन सरकारी कार्यालयों, बैंकों आदि में हो रहा है जिससे अधिक संख्या में आम आदमी जुड़ा हुआ है अतएव प्रजातंत्र में जनसामान्य की भाषा का प्रयोग कितने हद तक सफल है इसकी भी समीक्षा की जानी चाहिए। एक स्वतंत्र समीक्षा जो विभिन्न आवधिक रिपोर्टों से अलग हो। इससे राजभाषा कार्यान्वयन की एक स्पष्ट तस्वीर ऊभरेगी तथा राजभाषा कार्यान्वयन से जुड़े कर्मियों को प्रोत्साहन तथा दिशानिर्देश भी प्राप्त होगा। फिलहाल यह मान लेना चाहिए कि विभिन्न कार्यालयों द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं आदि के माध्यम से राजभाषा का स्वतंत्र विकास हो रहा है। यदि राजभाषा का सर्वांगीण विकास हो रहा है तो इस लेख का आशय क्या है? इस लेख का एक आशय राजभाषा के सरलीकरण का भी है। विभिन्न मंचों से समय-समय पर राजभाषा में सरल शब्दावली के प्रयोग की चर्चा होती रहती है। इस दिशा में हिंदी के साहित्यकार काफी सहायक साबित हो सकते हैं। अपनी रचनाओं में राजभाषा का प्रयोग कर राजभाषा शब्दावली को और लोकप्रिय बना सकते हैं।

हिंदी के साहित्यकार अपनी रचनाओं में जब कभी भी सरकारी कार्यालयों के पात्रों का सृजन करते हैं तो अक्सर वह पात्र अंग्रेज़ी मिश्रित भाषा बोलता है जबकि रचनाकार यदि राजभाषा की कुछ शब्दावलियों का प्रयोग करें तो पाठक राजभाषा की शब्दावली को सहजता से स्वीकार कर सकता है। यह मात्र एक संकेत है। राजभाषा की शब्दावली को आसान करना तर्कपूर्ण नहीं है क्योंकि सरलीकरण के प्रयास से अर्थ का अनर्थ होने की संभावना रहती है। केन्द्रीय सरकार के विभिन्न कार्यालयों, उपक्रमों तथा राष्ट्रीयकृत बैंकों द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन के सघन प्रयास किया जा रहा है यदि हिंदी साहित्यकार भी इस प्रयास में योगदान करें तो राजभाषा की शब्दावली अपनी दुरूहता तथा अस्वाभाविकता के दायरे से सफलतापूर्वक बाहर निकल सकती है।

धीरेन्द्र सिंह.