गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

भूमंडलीकरण के युग में हिंदी की भूमिका.

यूँ तो हमारी संस्कृति में "वसुधैव कुटुंबकम" वर्षों से रचा-बसा है पर जिस साज-सज्जा से वै·ाीकरण या भूमंडलीकरण ने खुद को प्रस्तुत किया है, उससे ही प्रभावित होकर भारतीय विज्ञापन मुखर हो बोल पड़ा-'कर लो दुनिया, मुट्ठी में'। कथा साहित्य, यात्रा वित्रांत, फिल्मों, विदेशी वस्तुओं से चलते-मचलते, विदेश कब देश जैसा लगने लगा पता ही नहीं चला। कल तक नौकरी के लिए की जानेवाली विदेश यात्रा कब शापिंग और भ्रमण के रूप में ज़िंदगी की आम चर्चा का विषय हो गई, यह विभिन्न देशों के जनमानस को भी ज्ञात नहीं। तकनीकी क्रांति ने तो वर्षों से लोकप्रिय गीत-'मेरे पिया गए रंगून, किया है वहॉ से टेलीफून, कि तेरी याद सताती है' को जनसामान्य के जीवन में विभिन्न राग-रागिनियों के साथ उतार दिया और इस प्रकार हर प्रकार की दूरियॉ नजदीकियों में परिवर्तित हो गई और साथ ही बदलने लगी अपनी-अपनी कहानी संग लोगों की जिंदगानी, पर क्या जिंदगानियों में परिवर्तन सचमुच में आ गया है अथवा परिवर्तन बाधित सा लगता है? नहीं, ऐसा कैसे संभव हो सकता है भला, कि एक तरफ हम भूमंडलीकरण के निनाद के नित-प्रतिदिन नए रंग-ओ-अंदाज़ से रू-ब-रू हो रहे हैं तथा दूसरी ओर विभिन्न बाधाओ की भी अनवरत चर्चाएॅ जारी हैं। शायद द्वंद्व ही विकास की सीढ़ी है और इसी दौर से भूमंडलीकरण का प्राथमिक चरण गुज़र रहा है।

विकासशील युग में समतल होती दुनिया में भौगोलिक सीमाएँ नि:संदेह टूट रही हैं किन्तु सांस्कृतिक मूल्यों के साथ अभिव्यक्ति में किसी प्रकार की टूट-फूट और समामेलन नहीं दिखलाई पड़ रहा है बल्कि सांस्कृतिक मूल्य और नीजि अभिव्यक्ति शैली ने विश्व में भाषा की अस्मिता को जिस प्रखर अंदाज़ में पिछले कुछ वर्षों से एक सामयिक व महत्वपूर्ण विषय बनाया है उससे वि·ा पटल पर भाषाएॅ एक नई दीप्ति और महत्व के संग अपनी उमंग, तरंग की लय में अपने अस्तित्व आरोहण का मृदंग बजा रही हैं। यह सब पूर्वनियोजित कार्यप्रणाली का परिणाम नहीं है और वैसे भी अखिल विश्व स्तर पर अपनी-अपनी भाषा की साधना, आराधना और विश्व विजय कामना की उर्जापूर्ण हलचलें गणेश जी को दूध पिलाने जैसी रहस्यमयी लोकचेतना नहीं हो सकती है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भूमंडलीकरण के परलीकरण में अपनी शरण में किन भावी आवरणों को छुपाए भाषाएॅ अपने-अपने तीर द्वारा अश्वमेध यज्ञ में निमग्न हैं। पिछले दो दशकों से भाषाई संघर्ष चल रहा है तथा जैसे-जैसे वैश्वीकरण अपने प्रभाव को बढ़ाते जा रहा है वैसे-वैसे भाषा का मसला अपनी गहराईयों का विश्लेषण करते हुए अपने निखार को और सँवार रहा है। हिंदी तो अपनी संघर्ष यात्रा अनवरत जारी रखे हुए है तथा इस संघर्ष के दौरान हिंदी की अनेकों छटाएँ बरबस अपनी ओर खींच लेने की कूवत पा बैठी है।

भूमंडलीकरण को, समतल दुनिया का नाम भी दिया गया है जिससे एक देश से दूसरे देश में आवागमन, संपर्क, व्यापार आदि सहज और सामान्य होता जाएगा। भूमंडलीकरण के समतल होने से देशों के बीच की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि दीवारें टूट रही हैं, हर प्रकार के वाद का विश्वस्तरीय मानकीकरण का एक तेज़ दौर चल रहा है, प्रतियोगिताओं और उपलब्धियों का दायरा अपनी सीमाओं को तोड़ते हुए पूरी धरती तक पसर रहा हैं जिसमें हर तरफ सरल, सहज, सर्वमान्य और सारगर्भित विभिन्न तत्वों व पक्षों की माँग हो रही है। इस प्रकार अति विस्तृत कार्यक्षेत्र मिल जाने से प्रत्येक राष्ट्र अपनी मौलिक सभ्यता, संस्कृति को लेकर उभर रहा है तथा इस सभ्यता और संस्कृति के साथ अपने राष्ट्र की भाषा को अभिव्यक्ति का माध्यम बना, अपनी एक मुकम्मल पहचान की फिराक़ में लगा है। वैश्वीकरण का यह दौर प्रत्येक राष्ट्र के शक्ति परीक्षण का है जिसमें अभिव्यक्तियाँ अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाएँगी तथा जिस राष्ट्र का सम्प्रेषण जितना प्रखर और परिस्थितिजन्य होगा वह बाजी उतनी ही सुगम तौर पर उस देश के हाँथ होगी। अतएव भूमंडलीकरण में भाषाओं की वर्चस्वता का अघोषित व अप्रत्यक्ष लड़ाई जारी है।

भूमंडलीकरण के इस आरम्भिक दौर में हिंदी ने स्वंय को राष्ट्र की बिंदी प्रमाणित करते हुए अपने डैने को हनुमान की तरह विशाल रूप देने में सफलतापूर्वक प्रयत्नशील है। हिंदी की जब भी बात हो तब उर्दू भाषा का जिक्ऱ न हो यह हो नहीं सकता, अतएव भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के नागरिकों आदि द्वारा हिंदी भाषा को निरन्तर व्यापक और सक्षम आधार दिया जा रहा है। हिंदी की सीमाएँ यहीं आकर ख़तम नहीं हो जाती हैं बल्कि इसके विकास में द्रविड़ीयन, तुर्की, फारसी, अरबी, पुर्तगाली और अंग्रेजी भाषाओं का उल्लेखनीय योगदान है। भारत देश की सभ्यता और संस्कृति को इसी प्रकार की भाषा संचेतना सहित आठ सौ वर्षों से कुशलतापूर्वक अभिव्यक्त किया जा रहा है। वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में डिजीटल मिडीया द्वारा हिंदी को अफ्रीका, मध्य-पूर्व, यूरोप और उत्तरी अमेरीका में एक चित्ताकर्षक ढंग से लगातार पहुँचाया जा रहा है। दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय कंपनियॉ दक्षिण एशिया के बाज़ार में पैठ लगाने हेतु हिंदी की उपयोगिता में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी करते जा रही हैं। इन सबके साथ कुशल मानव श्रम, विशेषज्ञों की ज़रूरतों आदि के लिए भी दक्षिण एशिया विश्व को अपनी ओर खींच रहा है। इसका तात्पर्य यह कतई नहीं है कि विश्व में अन्य भाषाएँ अलसाई सी हैं बल्कि विश्व में अपने परचम को लेकर हिंदी के साथ अग्रणी कतार में दौड़ लगानेवाली जर्मन, फ्रेंच, जापानी, स्पैनिश और चीनी जैसी प्रमुख भाषाएँ भी कदम से कदम मिलाकर एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में दौड़ रही हैं। एक ताज़ा भाषाई अनुमान के अनुसार विश्व में कुल छह हज़ार आठ सौ नौ भाषाएँ बोली जा रही हैं जिसमें से 90ऽ भाषाओं को बोलनेवालों की संख्या एक लाख से कम है। इन सभी भाषाओं में हिंदी को सीधे चुनौती देनेवाली भाषा चीन में बोली जानवाली मैंड्रीन भाषा है। ज्ञातव्य है कि जनसंख्या की दृष्टि से चीन और भारत को चुनौती दे पाना अन्य देशों के लिए कठिन कार्य है।

भूमंडलीकरण 21 वीं शताब्दी में वैश्विक गॉव बनते जा रहा है। एक अरब से भी अधिक नागरिकों के भारत देश ने, तेज गति से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था ने, वि·ा को अपनी ओर देखने के लिए विवश कर दिया है। हाल ही में जब यह तथ्य उभरा कि दुनिया की 3 हज़ार भाषाओं और बोलियों का अस्तित्व वर्ष 2050 तक समाप्त हो जाएगा, जिसे सुनकर विश्व की भाषाएँ चौंक उठीं तथा भारत देश में दबे शब्दों में एक सुगबुगाहट सी चली कि कहीं हिंदी भी तो इन तीन हज़ार भाषाओं में एक नहीं है। यह एक काल्पनिक भय मात्र है किंतु इससे एक संकेत यह भी मिलता है कि देश में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें हिंदी भाषा की समाप्ति की शंका भी है। जबकि अमेरीका के सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेन्सी की 2005 की सी.आई.ए. वर्ल्र्ड फैक्ट बुक के अनुसार धरती पर बोले जानेवाली भाषाओं में से हिंदी विश्व की सबसे प्रभावशाली चतुर्थ भाषा है। यहॉ पर मेरा प्रयास हिंदी भाषा के व्यक्तव्यों का प्रस्तुतीकरण नहीं है बल्कि कोशिश है हिंदी भाषा की इन दो विरोधी मानसिकता के विश्लेषण का, जिसमें एक ओर भारत देश के कुछ लोगों का भय है तो दूसरी ओर भूमंडलीय स्तर पर उस भय का निराकरण भी उपलब्ध है। यदि हम पहले भारत की इस मानसिकता का विश्लेषण करें तो नतीजा यही होगा कि बहुत कम लोग हैं जो हिंदी की वर्तमान गति और प्रगति की स्पंदनों का अद्यतन अनुभव कर रहे हों वरना अधिकांशत: लोगों की भाषागत धारणाएँ यत्र-तत्र, पठन-श्रवण के आधार पर वेताल कथा सरीखी हैं। हमारे देश में हिंदी निरंतर विभिन्न स्तरों पर स्वीकारी जा रही है इसके बावजूद भी यह धारणा मानस में घर कर गई है कि - लोग क्या कहेंगे। हमारा देश हिंदी की मानसिकता से अभी भी जूझ रहा है, जबकि विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार और लोकप्रियता का विश्लेषण परिणाम, हिंदी को एक उर्जापूर्ण भविष्य की ओर ले जा रहा है।

विश्व स्तर पर हिंदी के विस्तार में हिंदी साहित्य की उल्लेखनीय भूमिका है और अभी भी हिंदी साहित्य अपनी इस भूमिका को बखूबी निभा रहा है। समय के संग भूमिका के तरीके में बदलाव आते जा रहा है। हिंदी साहित्य अब तकनीकी से भी जुड़ रहा है तथा कंप्यूटर की विभिन्न विधाओं में हिंदी अपनी उपस्थिति को दर्ज़ कराते बढ़ रही है। हिंदी गद्य विधा में अभिव्यक्ति, गर्भनाल आदि जैसी वेब पत्रिकाएँ हैं तथा काव्य में अनुभुति आदि जैसी वेब पत्रिकाएँ हिंदी साहित्य के बेहतर छवि को निरंतर निखार रही हैं तथा ऐसी कई पत्रिकाओं को विदेशों से एक बड़ा पाठक वर्ग मिला है। जालघर पर अनेकों हिंदी पत्रिकाएँ और ब्लॉग हिंदी के महत्व को दर्शाते हुए प्रभावशाली ढंग से प्रचार-प्रसार में लगी हैं। भूमंडलीकरण के युग में सूचना और प्रौद्योगिकी के ताल-मेल के बिना हिंदी के विस्तार की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। अपनी तमाम कठिनाईयों के बावजूद भी हिंदी ने जिस तरह प्रौद्योगिकी जगत में अपना पैर जमाया है उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा मुक्त कंठ से जितनी ज्यादा की जाए उतना ही कम है। कौन लोग हैं जो हिंदी और प्रौद्योगिकी के संगम के लिए उल्लेखनीय भूमिकाएॅ निभा रहे हैं? नि:संदेह भूमंडल के विभिन्न देशों में बसे भारतीय और हिंदी प्रेमी, भारत सरकार तथा देश में मुट्ठी भर प्रौद्योगिकी से नाता रखनेवाले हिंदी प्रेमीजन। आज व्यक्ति का मोबाईल नंबर जितना जरूरी हो गया है उतना ही महत्वपूर्ण हो गया इंटरनेट का उसका आई.डी.। कंप्यूटर से जुड़े रहने से इंटरनेट की दुनिया में हिंदी के फैलते साम्राज्य की नवीनतम जानकारियॉ मिलती रहती हैं। प्रसिद्ध सर्च इंजन गूगल के प्रमुख एरिक श्मिट का मानना है कि अगले पांच से दस सालों में हिंदी इंटरनेट पर छा जाएगी और अंग्रेजी और चीनी के साथ हिंदी इंटरनेट की दुनिया की प्रमुख भाषा होगी।
इंटरनेट पर हिंदी के प्रयोग में सबसे बड़ी कठिनाई हिंदी फॉन्ट की है। हिंदी के फॉन्ट में एकरूपता के अथक प्रयासों से यूनिकोड की उपलब्धि ने हिंदी फॉन्ट को एकरूपता देने का प्रयास किया है किंतु अभी भी मंज़िल काफी दूर है। जालघर की कुछ प्रमुख पत्रिकाओं ने यूनिकोड को अपना लिया है किंतु विभिन्न बैंकों, कार्यालयों आदि में अभी भी इसे पूरी तरह अपनाया जाना बाकी है। हिंदी की विभिन्न सॉफ्टवेयर कंपनियों को भी चाहिए कि वे इस दिशा में कुछ कारगर कदम उठाएँ किंतु उन्हें व्यावसायिक खतरों का अंदेशा है अतएव एक सार्थक पहल नहीं हो पा रही है। इंटरनेट जगत में हिंदी लिखने के लिए रोमन लिपि का सहारा लिया जा रहा है किंतु इसका आशय यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि देवनागरी लिपि छूट रही है बल्कि याहू जेसे नेट प्रदान करनेवाली कंपनी देवनागरी लिपि को लेकर गंभीर नहीं हुई है जबकि गूगल द्वारा सराहनीय प्रयास हो रहे हैं। नेट पर देवनागरी लिपि की वर्चस्वता के पीछे व्यावसायिक दृष्टिकोण से भी कहीं अधिक रूकावट दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव है। क्या आप लोगों को नहीं लगता कि भाषा की तमाम खूबियों के बावजूद भी हिंदी दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी का शिकार है। मानव शरीर में रक्त की कमी से प्रचलित शब्द एनिमिक का उपयोग किया जाता है जबकि दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी से हिंदी एनिमिक हो गई है।
हिंदी की एक विचित्र स्थिति नज़र आ रही है जिसके तहत् कुछ लोग हिंदी के वर्तमान गति, प्रगति और नीति को सहज, सामान्य और सुबद्ध नामकरण से विभूषित कर रहे हैं तो कुछ लोग इसे अशुद्ध, अनर्गल और अभद्र विशेषणों से नवाज़ने में नहीं हिचक रहे हैं, इस प्रकार हिंदी चर्चा-परिचर्चा के अनेकों दौर से गुजर रही है तथा समय-समय पर अग्नि परीक्षाओं से गुजरते हुए अपनी कुंदनीय आभा सहित जनमानस के ह्मदय में वंदनीय भाषा बनती जा रही है। यह तो स्पष्ट है कि भूमंडल में हिंदी की एक बयार चल पड़ी है, कहीं तेज है, कहीं मंथर है तो कहीं उनींदी सी कसमसा रही है। यह प्रगति पथ यक़बयक़ कैसे उभर पड़ा कोई करिश्मा कहा जाए या कि अलादीनी ताक़त ? स्थूल तौर पर देखा जाए तो यह हमारे देश के बाज़ार का असर है जिसमें आर्थिक विकास, जनसंख्या आदि ने भूमंडल को अपनी ओर मोड़ लिया है। वरना किसने सोचा था कि अमेरिकन प्रशासन एक दिन बोल उठेगा कि 21वीं शताब्दी में राष्ट्रीय सुरक्षा और समृद्धि के लिए अमेरिकी नागरिकों को हिंदी सीखनी चाहिए। बात यहीं तक नहीं है बल्कि अमरीकी राष्ट्रपति बुश ने अपने अहम् राष्ट्रीय भाषण में कहा कि 'हम हॉथ पर हॉथ घर कर नहीं बैठ सकते। दुनिया की अर्थव्यवस्था में हम भारत और चीन जैसे नए प्रतियोगी देख रहे हैं।" हमें दुनिया बड़ी उत्सकुतापूर्ण नज़रों से देख रही है जिसका एक उदाहरण हमें मार्च, 2006 का आम बजट पेश करते हुए ब्रिातानी वित्त मंत्री के वक्तव्य में भी मिलता है जिसमें उन्होंने कहा है कि " भारत और चीन से मिलने वाली कड़ी प्रतिस्पर्धा का मतलब है कि हम हॉथ पर हॉथ धर कर नहीं बैठे रह सकते।" इसके अतिरिक्त बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा हिंदी को गले से लगाना तो सर्वविदित है तथा हमारे समाज के चर्चित तथा मनोरंजन हेतु जनित सास-बहू के झगड़े को भी शीत पेय की बहुराष्ट्रीय कंपनियॉ कोका कोला और पेप्सी के हिंदी विज्ञापन महासमर ने मात कर दिया है। वस्तुत: हिंदी अब केवल जनसामान्य की भाषा ही नहीं रह गई है बल्कि बाज़ार की एक मज़बूरी भी बन गई है। चैनलों पर रिमोटीय उड़ान भर कर देखिए तो हर ठहराव पर विज्ञापन हिंदी ही बोलते मिलेगा।

हिंदी चाहे विज्ञापन की भाषा के रूप में हो या किसी अन्य विधा में उसका प्रभाव किसी सीमा तक ही नहीं रहता बल्कि विभिन्न प्रचार-प्रसार माध्यमों से भूमंडल में विस्तृत हो जाता है। संसार के लगभग 120 देशों में भारतीय मूल के लोग रहते हैं। इनमें से बहुत बड़ी संख्या अपनी भाषा भूल चुकी है पर इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि वे हिंदी सीख नहीं रहे हैं। भूमंडलीय आकाश पर पैर पसारती हिंदी अपने कई रूप दिखला रही है तथा यह कहना कठिन है कि किस देश में हिंदी किस अंदाज़ में होगी ठीक वैसे ही जैसे बंबईया हिंदी, मद्रासी हिंदी, लखनवी हिंदी, हैदराबादी हिंदी आदि। ज्ञातव्य है कि प्राय: परिवर्तन प्रगति का परिचायक होता है। परिवर्तन और प्रगति के एक उदाहरणस्वरूप सिंगापुर का उदाहरण लेते हैं जहॉ की जनसंख्या में भारतीयों का प्रतिशत मात्र छह फीसदी है। 1990 में जब सिंगापुर में हिंदी सोसायटी की स्थापना हुई तो सिंगापुर सरकार ने हिंदी को दूसरी ऐसी भाषा घोषित कर दिया जिसे विद्यार्थी सबसे ज्यादा सीखना चाहते हैं। सिंगापुर की हिंदी ज़रूर हमारे देश में प्रयुक्त हिंदी से थोड़ी भिन्न होगी। ब्रिटेन में तो धड़ल्ले से 'हिंगलिश' चल पड़ी है। इतना ही नहीं उपन्यासकार और शिक्षक बलजिंदर महल ने हिंगलिश जैसी मज़ेदार भाषा के संसार को व्यापक बनाने के लिए इसकी एक गाइड, शब्दकोष के रूप पेश की है जिसका नाम है-"द क्वीन्स हिंगलिश हाऊ टू स्पीक पक्का।" अंग्रेजी अख़बार के स्तंभकार श्री जग सुरैया ने हिंगलिश पर अपने एक लेख में लिखा है – you are not believing on me? Just you go to Bilayat or amerika and finding out you will be.Peoples there are using many-many ajib words we desi Angreziwallas are bilkul not understanding, no matter how much koshish karo we do. शायद कुछ लोगों की भृकुटियॉ ऐसी भाषा सुनकर तन जाए और श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी या डॉ. रघुवीर की आत्मा भाषा शुद्धता की मुनादी फिर से शुरू कर दें पर सच तो यह है कि हिंदी बिगड़ नहीं रही है बल्कि भूमंडलीय स्तर पर अपने को विभिन्न रूपों में सजा-सँवार रही है। हॉ, यह कटु यथार्थ है कि हिंदी के वर्तमान मौलिक रूप को बनाए रखने का दायित्व हम सब पर है तथा इन भाषाई झोकों और अंधड़ों से गुजरते हुए हिंदी को हम जिस कलेवर में ढाल पाएँगे हिंदी का वही रूप होगा। वैसे इस हिंगलिश से बच पाना भी कठिन कार्य है।

यहॉ यह सोच भी प्रासंगिक है कि जब वैश्विक स्तर पर हिंदी प्रगति दर्शा रही है तो अब तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा क्यों नहीं बन पाई ? सर्वविदित है कि इस समय संसार की छह भाषाएँ - अंग्रेज़ी, फ्रेंच, स्पेनिश, जर्मन, चीनी तथा अरबी भाषाएँ संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएँ हैं, तो क्या कमी है हिंदी में ? इसका केवल यही उत्तर हो सकता है कि हमने अब तक निरंतर गंभीरता से इसपर कार्रवाई नहीं की है परंतु भूमंडलीकरण ने हिंदी को पहचाना है तथा हिंदी का भूमंडल पर गाना-बजाना, साहित्य का रंग-बिरंगा तराना आदि, इसे विश्व भाषाओं में एक सयाना का दर्ज़ा दिए जा रहा है अतएव संयुक्त राष्ट्र संघ तक पहुँचना कठिन नहीं रह गया है। वैसे अनेकों स्वंयसेवी संस्थाएँ भी इस दिशा में अपने-अपने ढंग से प्रयासरत हैं तथा हमें भी अपने-अपने स्तर पर प्रयासरत रहना चाहिए, आशावादी रहना चाहिए। चूँकि अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी अपनी छाप छोड़ रही है तथा आर्थिक रूप से हमारा देश सतत् समृद्ध और सक्षम होते जा रहा है इसलिए लोग अब भारत की ओर मुड़ रहे हैं। हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या 40 करोड़ के आसपास होने का अनुमान है। इसका एक प्रमुख कारण है रोजगार के अवसर में लगातार वृद्धि। हिंदी की लोकप्रियता में हिंदी फिल्मों या बॉलीवुड के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

भूमंडलीकरण के युग में हिंदी की भूमिका संपर्क, सम्प्रेषण और सानिध्य की है तथा जिसे हिंदी बखूबी निभा रही है, हॉ आप चाहें तो बॉलीवुड को अग्रणी स्थान दे सकते है आखिरकार हिंदी फिल्में केवल गीत-नृत्य-संवाद का रंगीन पिटारा ही लेकर भूमंडल में नहीं घूमती हैं बल्कि इसके साथ हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति भी पायल की रून-झुन की तरह विश्व से एक रागात्मकता स्थापित कर रही है। इस विषय पर यदि हम दूसरे पक्ष बैंक, कार्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय आदि की ओर भेदक दृष्टि से देखें तो मन अचानक पूछ उठेगा कहॉ है हिंदी, कहॉ है राजभाषा, कैसे उठती है भूमंडलीकरण में हिंदी दीप्ति की आशा ? यहॉ आकर हिंदी भाषा की मनभावनी विहंगीय उड़ान को एक मचान मिल जाता है तथा मेरे जैसा बोलनेवाला पल भर के लिए सोच में पड़ जाता है। सोच अनुत्तरित होने का नहीं, क्योंकि बौद्धिकता, यक्ष प्रश्नों का जवाब तो ढूँढ ही लेती है, बल्कि सोच उस दिशा की तलाश करती है जहॉ पर समाधान तो है पर उस समाधान का संज्ञान, दिशा को भी नहीं। हिंदी के प्रति एक आरोप हमेशा लगाया जाता है कि यह केवल भावनाओं और संवेदनाओं की भाषा है तथा विचारों की भाषा बनने में असफल रही है। इस आरोप को निराधार साबित करने का दायित्व हम सबका है। हिंदी विचारों की भाषा है इसका प्रचार-प्रसार नहीं हुआ है। संगोष्ठी, परिसंवाद आदि का आयोजन एक दायरे में सिमट कर रह जाता है जबकि आज के युग में प्रत्येक कार्य के लिए प्रचार-प्रसार आवश्यक हो गया है। राजभाषा के रूप में हिंदी की क्षमताओं को देखकर एक सुखद आश्चर्य का होना आवश्यक है किंतु वैचारिक हिंदी को लोकप्रिय बनाने के प्रयासों में वस्तुत: कमी है। वैचारिक हिंदी के विभिन्न रूपों के विकास, प्रचार-प्रसार के लिए किसी भी स्तर पर कोई कमी नहीं है, कमी है तो प्रतिबद्धता की। यदि साहसपूर्ण शब्दों में कहने की हिमाकत करूँ तो हिंदी से जुड़े अधिकांश लोग ही हिंदी के वैचारिक लोकप्रियता में बाधक हैं। यह तो हमारे देश की बात है परन्तु भूमंडल में इस दिशा में भी प्रयास जारी हैं, कहीं पर पत्रिकाओं के माध्यम से तो कहीं पर गोष्ठी आदि के द्वारा तथा इसका व्यापक प्रचार-प्रसार भी हो रहा है।

भारत देश की विभिन्न स्तर की प्रतिभाएँ नौकरी, व्यवसाय के कारण भूमंडल के कोने-कोने में अपने नीड़ का निर्माण कर रही हैं। जो भारतीय विदेशों में जा रहे हैं वे हिंदी को भी अपने साथ ले जा रहे हैं तथा जो काफी पहले से विदेशों में बस कर विदेशी हो गए हैं वे चमकते भारत में हिंदी सीखते हुए आ-जा रहे हैं तथा इस प्रकार भूमंडल में कल-कल, छल-छल हिंदी सरणी प्रवाहित हो रही है। धरती से 35,000 फीट से भी अधिक ऊँचाई पर हिंदी की कमी का अनुभव होने लगा है तथा विदेशी वायुसेवा कंपनियॉ, विशेषकर यूरोप की कंपनियॉ हिंदी को अपनी आवश्यकता बतला रही हैं।आस्ट्रियन एयरलाइन्स, स्विस एयरलाइन्स, एयर फ्रान्स और अलीटॉलिया ने कहा है कि भारतीय यात्रियों की लगातार हो रही वृद्धि को दृष्टिगत रखते हुए वे भारत की अपनी प्रत्येक उड़ान में कम से कम ऐसे दो क्रू को रखेंगे जो हिंदी बोलना जानते हों। भूमंडल पर हिंदी दौड़ रही है तथा वायुमंडल में उड़ रही है तथा राष्ट्रीय अस्मिता और अस्तित्व को पारदर्शी तौर पर वि·ा के समक्ष सफलतापूर्वक रख रही है। हिंदी अकेले नहीं है बल्कि उसके साथ अन्य भारतीय भाषाएँ भी हैं। भारत देश की उभरती आर्थिक शक्तियॉ हिंदी भाषा के द्वारा भी मुखरित हो रही है। हम सबके लिए भविष्य में और भी नई चुनौतियॉ हैं जिसके समाधान के लिए हमें अपनी जुगलबंदी को नया आयाम देना होगा। आईए, हम सब मिलकर अपनी हिंदी लय को और मधुरता दें और प्रखरता प्रदान करें।


धीरेन्द्र सिंह