गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

जिंदगी

अपने आपको तथा अपने बैग को संभालती वह प्रचंड वेग का कब एक हिस्सा बन गई और खुद को 8.12 के लोकल ट्रेन की महिला डिब्बे में खड़ा पाई , रोज की तरह वह आज भी नहीं समझ पाई। हर दिन की तरह आज भी उसकी सांसे तेज से सामान्य गति की ओर क्रमिक रूप से बढ़ रही थी और वह हररोज की तरह अपनी उस सीट की ओर बढ़ रही थी जो उसे अगले कुछ स्टेशनों के बाद मिलनेवाली थी। सीट के पास पहुँचकर उसने अपने बैग को सावधानीपूर्वक ऊपर पहले से पसरे बैगों के बीच स्थापित किया। पास की सीट पर बैठी महिलाओं ने अलसाई मुस्कराहट से उसके परिचित होने का प्रमाण दिया। उसने भी सामान्य होती सांसों के बीच अपनी फूलती मुस्कराहट के साथ उस ग्रुप का एक हिस्सा होने की परिचिताना रज़ामंदी दी। उसने स्वंय को सीट के सहारे टिका दिया और उसे लगा कि भोर से अब तक की उसकी थकान उतर गई है। आज सुबह से ही वह झुंझलाई हुई थी। उसकी लड़की सबेरे से ही टिफिन में सैंडविच ले जाने की जिद कर रही थी। समय ज्यादा लगने से उसका सुबह का क्रम गड़बड़ा गया था। "होते रहता है यह सब घर-गृहस्थी में" उसने मन ही मन सोचा मानो एक झटके में वह इस सोच से निकलना चाहती हो। अब उसकी सांसे सामान्य हो चुकी थी। भीड़ का एक रेला आया। उसने हैंडलपर अपनी पकड़ मजबूत कर खुद को लड़खड़ाने से बचाया।

उसने अपने पास की सीटवाली महिला को देखा। उसका पाठ खतम हो चुका था तथा वह अपनी आँखें बंद कर आरती बुदबुदा रही थी। अगले स्टेशन पर वह उतर जाएगी तथा बैठने के लिए चौथी सीट मिल जाएगी। बगल में महिलाएँ झगड़ रही थीं तथा इस शोर-शराबे से बेखबर कई महिलाएँ एक-दूसरे से दबी हुई सो रहीं थी। आखिरकार वह बैठ गई। उसके बगल की महिला रोज की तरह ट्रेन में अपने गीले बालों को सुखाकर उन्हें सँवार रही थी। उसने एक गहरा नि:श्वास लिया तथा खुद को ढीला छोड़कर काया को विश्रांति देने लगी। उसने देखा कि खिड़की के पास वाली सीट पर वह साँवली युवती रोज की तरह अपने चेहरे को मेकअप से सँवारने में लगी थी। इस सॉवली युवती की वह मन ही मन प्रशंसा करती थी। मेकअप के बाद उसके चेहरे पर न जाने कैसे एकाएक एक दीप्ती सी फैल जाती थी तथा उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी ऑखें उत्सुकतापूर्ण बोलती नजर आती थीं। न जाने वह पुरूष कौन है जिसके लिए यह श्रृंगारबदनी युवती ऑफिस जाते समय ट्रेन में स्वंय को सुगंधमय, रंगमय पुष्पगुच्छ बना लेती है। एक ईष्र्या की तरंग का उसने अनुभव किया। तेज भागती लोकल के इस डिब्बे में युवतियॉ, महिलाएॅ, घर-गृहस्थी, महँगाई, फैशन आदि की चर्चा करती रहती हैं किंतु यह अपने आप में डूबी रहती है। उसके सहयात्री उसकी आदत से परिचित हैं इसलिए उसे अपनी बातों में नहीं खींचते हैं।

उसकी सीट की एक महिला उठ गई तथा वह खिसक गई तथा चौथी सीट की जगह छोड़ दी। एक युवती बैठ गई किन्तु एक अधेड़ महिला ने अस्वस्थतावश चौथी सीट के लिए अनुरोध किया और उस लड़की ने सीट छोड़ दी। आस-पास के यात्रियों ने अपनी निगाहों और धूमिल स्मिति से उस लड़की के सीट त्याग की सराहना की। वह अधेड़ महिला ने बैठते ही एक दबावपूर्ण धक्का देते हुए चौथी सीट पर भी अच्छी जगह बनाने में सफल रही। उस अस्वस्थ महिला के कपड़ों से फिनायल गोलियों की गंध आ रही थी तथा केशों से उभरती नारियल तेल की अजीब सी महक ने उसको विचलित कर दिया। उसने देखा कि सॉवली युवती आईने में अपने मेकअप की जॉच कर रही है। उसकी निगाहें खिड़की पर टिक गई किंतु सामने खड़ी लड़की का दुपट्टा बाधक बन रहा था उसने अपनी गर्दन को बांयी ओर झुका दिया अब वह खिड़की से आराम से देख पा रही थी। उसकी निगाहें प्लेटफार्म के फ्रेंच कट दाढ़ी वाले गठीले पुरूष को तलाश रही थी जो अपने कंधे पर बैग लटकाए स्वागतपूर्ण दृष्टि से उस महिला डिब्बे की अगवानी करता है। वह सोचने लगी कि कितनी उमंगपूर्ण आतुरता है इनमें और वह रात की बात सोचने लगी जब उसने अपने पति से प्रणय पहल की कोशिश की तो उसने अनजान बनते हुए म्युचूअल फंड की चर्चा शुरू कर दी थी। आजकल प्राय: उसके पति अर्थ को लेकर चर्चाएँ करते हैं तथा भविष्य का गुणा-भाग करते रहते हैं। वह अपने आपको वित्तीय पक्षों में भटकाई गई पाती है जिसमें उसकी नारीसुलभ सदाएॅ और मधुमाससरीखी अदाएँ उसके पति की वित्तीय मेघ को भेदने में असफल रहती है। उसके बगल की महिला ने उससे उतरने को कहा और उसने देखा कि उसका स्टेशन आ गया है। आनन-फानन में अपना बैग उठा, साड़ी संभालती वह दरवाजे की तरफ बढ़ गई।
स्टेशन पर उतरते ही वह अपने कार्यालय की महिलाओं की तलाश करने लगी जिससे कि शेयर ऑटो रिक्शा द्वारा वह समय पर दफ्तर पहुँच जाए। उसे विश्वास था कि उसकी तरह तलाशती निगाहें और भी होंगी जो बस की लंबी कतार में लग कर लेट होने के जोखिम से बचना चाहती हैं। समय से मस्टर में सही करना भी एक सुखदायी क्षण होता है तथा अच्छे स्टाफ के गुणों में एक माना जाता है। सुबह के अभिवादन को निभाते हुए वह कार्यालय के टेबलों से गुजरने लगी। उसे अहसास हो रहा था कि एक-दो टेबलों से निगाहें भावमय हो उससे चिपकी हुई हैं। वह प्रत्यक्षत: स्वंय को इससे बेखबर दर्शाती थी किंतु भीतर वह विजयी भाव से ओतप्रोत रहती थी। इस समय उसे लगता था कि वह सॉवली लड़की को चुनौती दे रही है तथा वह चाहे तो फ्रेंचकट दाढ़ी जैसा पुरूष उसके लिए भी प्रतीक्षारत रह सकता है। चिपकी निगाहें भी तो प्रतीक्षा की अकुलाहट का अनुभव कराती रहती हैं। प्रसाधन के दर्पण में भरपूर निगाहों से खुद को निहारकर तथा खुद को पूरी तरह व्यवस्थित कर वह अपने टेबल में डूब गई।

कम्प्यूटर, पेपर, चर्चाओं आदि के कार्यालयीन भगदड़ में वह उस समय खुद को डूबी हुई पायी जब उसके सहकर्मियों ने भोजन का संकेत दे भोजन कक्ष की ओर चल दीं। यहाँ भी लोकल के डिब्बे की तरह चर्चाओं में घर-द्वार, पसंद-नापसंद आदि टिफिन की तरह बिखरा हुआ था। एक ने कहा कि यहॉ एक-दूसरे के टिफिन के संगत-रंगत और उन्मुक्त बातचीत का सुख और कहॉ मिल पाएगा। दूसरे ने चुटकी लेते हुए कहा कि रात की बनी सब्जी भी यहॉ कितना ताजापन लिए रहती है। इस हंसी-ठिठोली के बीच वह संशयमन से सोच रही थी कि उसकी बिटिया समय से यदि लौटी नहीं होगी तो परसों की तरह आज भी कहीं कामवाली दरवाजा बंद देख लौट न जाए। इस चिंता में उसे घर फोन करने की जरूरत महसूस हुई और वह अपना खाला टिफिन ले तत्परता से प्रसाधन में चली गई।

एक बार फिर वह कार्यालय के भगदड़ में घिर गई किंतु यह सुबह की अपेक्षा संतुलित था इसलिए कार्यालय के दरो-दीवार को देखने की फुरसत निकाल सकी। उसने अपना पास-बुक निकाला और दर्ज आंकड़ों को देखकर अपने पति के वित्तीय अरमानों की चादर को बुनने लगी। वह जानती थी कि उसके प्रणय मनुहार को या तो वित्तीय व्यवहार से ढँका जाएगा अथवा पति की पदोन्नति गाथा और उसकी रणनीति की उबाऊ बातों में डूबते हुए निद्रागोश में जाना होगा। भावनामयी निगाहोंवाले उसके टेबल पर आए और बातों, इशारों और प्रस्तावों की चाशनी, सहमते हुए उसके टेबल पर ढरका गए। वह मन ही मन हँस पड़ी तथा सोचने लगी कि कुछ पुरूष कितने भीरू प्रकार से प्रणय निवेदन करते हैं, रीढ़विहीन कापुरूष। उसके मन में घृणा का एक द्रुत संचार हुआ और वह इस भाव को पटककर अपने टेबल में रम गई।
"चल, बंद कर" की उसके सहेली की आवाज ने उसे घड़ी की ओर मोड़ा और ट्रेन मिस न हो जाए के भय ने उसे टेबल समेटने की प्रेरणा दी। स्टेशन पर भीड़ में ट्रेन पकड़ने की जद्दोजहद से पार पाकर वह सीट पर बैठ गई। सुबह के कुछ ही चेहरे शाम को रहते हैं, थके-मांदे घर की देहरी छूने की उतावली में व्यग्र मानो समय को पकड़े हुई हों। कुछ महिलाएँ सब्जियॉ काटने में व्यस्त थीं, उसने भी एक सब्जी खरीदकर अपने बैग में रख दिया। उसके जेहन में उसका घर पूरी तरह से छाया था। ट्रेन अपनी तेज गति से दौड़ रही थी और उतनी ही रफ्तार से वह रात्रि के अपने कार्यों के ताने-बाने बुन रही थी। सफलताओं के इस दौर में अपने खानदान में वह एक दौड़ने वाली सफल महिला के रूप में गिनी जाती थी। एक दिन निशा के आगोश में सिमटते जा रहा था, वह बहुत संतुष्ट अनुभव कर रही थी, नए दिवस की चुनौतियों से सामना करने का विजयी भाव लिए। अब वह घर पहुँचने वाली थी, अपने घर।

धीरेन्द्र सिंह