गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

सलाहकार

सलाहकार शब्द पहले उत्पन्न हुआ अथवा सलाहकार का पहले अवतरण हुआ यह एक पहेली बना हुआ है। पहले मुर्गी या अंडा का समाधानकारक हल मिल जाता है पर वह पल नहीं मिल पा रहा है जब वायुमंडल पहली बार सलाहकार के अस्तित्व से रूबरू हुआ। ज्योतिषाचार्य से लेकर विज्ञानाचार्य, प्रवचनाचार्य से लेकर स्वांगाचार्य, भाषणाचार्य से लेकर साहित्याचार्य, कार्यालयाचार्य से लेकर नारदाचार्य तक इस सर्वव्यापी, सर्वग्राही और सर्वविवादित व्यक्तित्व की गहराई तक नहीं पहुँच पाए हैं। विभिन्न विधाओं के विद्वानों की यह आम राय है कि भ्रष्टाचार तथा सलाहकार के डी.एन.ए. काफी मिलते-जुलते हैं अतएव जैसे ही भ्रष्टाचार की गहराई का पता छालेगा वैसे ही सलाहकार की भी पूरी जानकारी मिलने की संभावना बढ़ जाएगी। इसमें शीघ्र सफलता मिल सके इसलिए विभिन्न निजी चैनलों के रात्रि दस बजे के बाद धमकने वाले कई खूँखाराचार्यों से भी सहायता करने की पहल की जा रही है।

सलाहकार के दो प्रवर्ग हैं - पहला असली तथा दूसरा नकली। प्रगतिशील भारत 21वीं शताब्दी में यदि विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति कर रहा है। बाजार में तरह-तरह के उत्पादों के यदि असली उत्पाद है तो हूबहू दिखनेवाला नकली उत्पाद भी है। इसी तरह यदि आवश्यकतानुसार वास्तविक सलाहकार समितियाँ हैं तो उनकी तर्ज पर असंगठित सलाहकार भी अनेकों हैं जो अपनी प्रतिभाओं के बल पर अपनी सलाहकार क्षमता का प्रदर्शन करने से बाज नहीं आते हैं। इन असंगठित सलाहकारों की विलक्षण प्रतिभाएँ ही मेरी लेखनी की प्रेरणा हैं। मेरे इस संपूर्ण लेखन में उपयोग किया गया शब्द 'सलाहकार' इन्हीं महानुभावों के व्यक्तित्व और कृतित्व को नवाजिश करने की एक दुस्साहसपूर्ण कोशिश मात्र है।

हवा और खुश्बू की मानिंद इनका व्यक्तित्व अदृश्य सा रहता है या यूँ कहा जा सकता है कि सामान्यतया लुप्त रहता है। अपनी सुविधाओं पर केंद्रित रहनेवाला यह एक लक्ष्यपूर्ण व्यक्तित्व रहता है जिसके आवरणपूर्ण चेहरे पर प्रथम दृष्टया लोमड़ी समान नम्रता जलती-बुझती रहती है। यह हर जगह पाया जाता है चाहे कार्यालय हो या खानदान इनकी उपस्थिति की कमी कहीं नहीं अखरती है। जिस प्रकार रात्रि बेला में झिंगुर गुंजन अनवरत अपनी रागिनी पर निशा को थिरकाने में प्रयासरत रहता है, जिस अंदाज़ में तिमिर बेला में जूगनू अपनी दीप्ति से अमावसीय परिवेश को रोशनमय करने पर आमादा रहता है उसी तरह सलाहकार भी अपने परिवेशगत सत्ता के इर्द-गिर्द मंडराते हुए सत्ताधारी के करीब पहुँचने के लिए अपनी 'विलक्षण प्रतिभा' की छटाएँ बिखरने के लिए हर अवसर पर 'बकुल ध्यानं' लगाए प्रयासरत रहता है। चूँकि इस व्यक्तित्व का बुनियादी ढाँचा 'मुरादाबादी लोटे' की तरह रहता है इसलिए इनकी उलूल-जुलूल हरकतों पर प्राय: सत्ताधारी से मिलने वाली झिड़कियाँ उन्हें हमेशा रसीली लगती हैं मानों यशोदा ने कान्हा को झिड़क दिया हो। इस प्रकार का व्यक्तित्व भावनाओं के सर्द-गर्म से परे अलमस्त स्वमोहित रहते हुए तथा निर्विकल्प, निर्विकार भाव का परिहासपूर्ण प्रदर्शन करते हुए, सलाहकार धुन में रमे हुए, स्वप्रेरित हो, बेहिचक, बेबुनियाद और बेलाग सलाह सत्ताधारी को देते रहता है। ऐसा कर वह स्वंय को धन्य पाता है।

'सलाहकार' प्राय: वही लोग होते हैं जो अपने दायित्वों को निभाने की योग्यता नहीं रखते हैं तथा योग्य व्यक्ति की उपलब्धियों से जलते हैं। यह एक निचले दर्जे का बौद्धिक गुरिल्ला युद्ध है जो प्राय: सत्ताधारी की आड़ में लड़ा जाता है इसलिए यह निरोधक दस्ते के दायरे में नहीं आता है। सलाहकार नकारात्मक उर्जा से भरा होता है इसलिए उसे दूसरों की बुराईयों में विशेष रूचि रहती है जिसे वह सत्ताधारी को नमक-मिर्च लगाकर सुनाता है तथा अपना उल्लू सीधा करता है। ना-ना, कृपया ऐसा मत सोचिए कि इस प्रवर्ग के लोग मंदबुद्धि के होते हैं बल्कि यह लोग सफलता और लोकप्रियता के शार्ट-कट रास्ते की खोज में रहते हैं तथा योग्य व्यक्ति को अयोग्य साबित करने में अपनी पूरी प्रतिभा का उपयोग करते रहते हैं। इनके कार्य करने का ढंग चारणों और भांटों जैसा रहता है इसलिए यह लोग सत्ताधारी को आरंभ में प्राय: आकर्षित करने में सफल हो जाते हैं। एक 'लाइव केस' प्रस्तुत कर रहा हूँ। आखिरकार किस्मत ने साथ दिया और रामदीन सरपंच बन गए। बस फिर क्या था लोकल सलाहकारों में सरपंच को प्रभावित करने की प्रतियोगिता आरंभ हो गई। चूँकि रामदीन के लिए सरपंच पद का पहला अनुभव था इसलिए वे सलाहकारों के चारणी भाषा की चाशनी में जलेबी की तरह डूबने लगे। उनके एक शुभचिंतक ने कहा कि रामदीन गलत लोगों में फंस गए आप, तो उनका उत्तर था कि सलाहकारों की मीठी बातें उन्हें लुभाती हैं। उनका कहना था कि विचार में यदि मिठास हो तब कहीं जुबां के मीठे शब्द फूटते हैं। शुभचिंतक खामोश लौट पड़ा। गाँवों के विभिन्न विकास फंड पर सलाहकारों की गिद्ध दृष्टि थी। रामदीन की शाम सलाहकारों की चाटुकारिता भरी बातों में बीतती थी तथा सोते समय रामदीन को शाम की बातें लोरी की तरह लगती थीं। रामदीन का स्वभाव बदले लगा और यह स्पष्ट होने लगा कि सलाहकार उनके निर्णयों को पूरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं। रामदीन खुद को बादशाह अकबर समझने लगे तथा सलाहकारों को नवरत्न मानने लगे। इस अभिव्यक्ति को और स्पष्टता से देखने के लिए फिल्म राजा बाबू के नायक की जगह कुछ हद तक रामदीन को रखा जा सकता है। रामदीन के कुल सलाहकारों की संख्या 4-5 थी तथा सबको वे एक नवरत्न कहते थे लेकिन बीरबल किसी को नहीं कहते थे। बीरबल बनने तथा अधिक राशि डकारने के चक्कर में सलाहकारों के बीच बीरबल के पदनाम पाने की होड़ में एक से बढ़कर एक गलत पहल और रामदीन को सुखकर सलाहें प्रस्तुत की जाती रहीं। इन सलाहकारों में रायबहादुर बनने की होड़ मची हुई थी। रामदीन द्वारा चतुराई में उपयोग किए जानेवाले नवरत्न शब्द को बखूबी भुनाने के लिए सलाहकार रामदीन को शाहंशाह अकबर के रौब-दाब का आडंबरपूर्ण अहसास दिलाते रहे। अचानक एक दिन पुलिस रामदीन को सरकारी धन के दुरूपयोग में गिरफ्तार कर थाने ले गई। उस दिन सलाहकारों ने 'आपरेशन उल्लू बनाया' की सफलता का जश्न मनाया।

मैंने अपने एक अनुभवी मित्र से पूछा कि रामदीन जैसे समझदार व्यक्ति सलाहकारों के चंगुल में फंस कैसे जाते हैं ? उनका बहुत सहज उत्तर था कि प्रशंसा सबको अच्छी लगती है तथा इसी भावनात्मक कमजोरी का लाभ सलाहकार उठाते हैं। सलाहकार प्रजाति के फलने-फूलने में कुछ सत्ताधारियों की भी भूमिका है। वैसे भी यदि देखा जाए तो व्यक्ति वही सफल माना जाता है जो हमेशा व्यक्तियों से घिरा रहे। सत्ताधारियों को यह भी मालूम है कि सलाहकारों के इस प्रवर्ग से यथासंभव बचना हितकारी है किंतु जबसे इन सलाहकारों ने चाटुकारिता के शब्द और चारणों की शैली को अपनाया है तब से अच्छे-अच्छे सत्ताधारी इनसे बचने की असफल कोशिश में रहते हैं। मैं भी अपने आप पर हतप्रभ था कि आखिर मुझे क्या सूझी कि मैं इतने संवेदनशील और खतरनाक विषय से जूझ पड़ा। खैर, मित्रो ऐसी ही दीवानगी तो रचना को जन्म देती है। इसी उधेड़बुन में चलते-चलते एक ऐसे सख्श से टकरा गया जो इन सलाहकारों का मुक्तभोगी है तथा इस प्रवर्ग को जड़ से समाप्त करने की परशुराम की मुद्रा में रहता है किंतु कब, कहॉ, कैसे में उलझ शाब्दिक गोलाबारी कर शान्त हो जाता है। मैंने सलाहकार का तराना उसके सामने शरारतवश छेड़ दिया बस क्या था हमेशा की तरह शाब्दिक गोलाबारी शुरू हो गयी। अंत में उसने कहा कि इस प्रकार के सलाहकार सफेदपोश के रूप में हर जगह मिल सकते हैं जो किसी 'भाई' से कम नहीं है और उसने मुझे सलाह दी कि इस प्रवर्ग से बच कर रहूँ क्योंकि बाजार में आजकल यह चर्चा जोरों पर है कि कार्यालय तक में कार्यरत इस तरह के लोगों के कार्यक्षेत्र का विस्तार हुआ है और अब ये लोग 'सुपारी' तक लेने लगे हैं। इतना सुनने के बाद इंसान तो क्या लेखनी तक बिदक जाती है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ और आप तो जानते ही हैं कि लेखन क्रमबद्धता का तार एक बार छूटा कि रचना वहीं थम जाती है, अड़ियल भैंस की तरह।