रविवार, 4 दिसंबर 2011

राजभाषा का वाणप्रस्थान

राजभाषा को जो देते हैं सम्मान उन्हें यह सुनकर आश्चर्य नहीं होगा कि राजभाषा वाणप्रस्थान की ओर बढ़ रही है। जिस राजभाषा को संसद से लेकर सड़क तक अपने प्रभाव और उपयोगिता को विस्तृत  करना था अब वही राजभाषा वाणप्रस्थान से जोड़ी जाने लगी है। ऐसे कैसे हो सकता है? कहीं लेखक अपनी खीज तो नहीं उतार रहा है? अब तो ब्लॉग का खुला मंच है जब चाहो तब लिख डालो सार्थक, निरर्थक की तो पाठक सोचेंगे, लेखक को क्या, जो जी में आया लिख डाला। कृपया इस तरह की भावना रखते हुये इसे ना पढ़ें। यह ब्लॉग कभी भी किसी विवाद को उत्पन्न करने की कोशिश नहीं करता है, बल्कि हमेशा राजभाषा के यथार्थ को सँजोने, प्रस्तुत करने का प्रयास करता है।
आप चाहे राजभाषा से सीधे जुड़े हुये हों अथवा राजभाषा से दूर हों, एक सवाल खुद से पूछिये कि क्या आप अपने दैनिक कार्यों में राजभाषा का उपयोग करते हैं? यदि आप राजभाषा से सीधे जुड़े हों ( राजभाषा अधिकारी, अनुवादक आदि) तो क्या आप अपना सम्पूर्ण कार्य राजभाषा में करते हैं? अधिकतम उत्तर होगा नहीं। व्यक्तिगत स्तर से उठकर थोड़ा आगे चलें तो प्रश्न उभरता है कि क्या आपके कार्यालय और आपके विभाग में (राजभाषा विभाग को छोडकर) राजभाषा में कार्य होता है? इसका भी उत्तर होगा नहीं। यदि किसी ने कहा कि हाँ कार्य खूब होता है तो वह व्यक्ति उन उपायों का जिक्र करता है जिनको अपनाकर अधिकांश विभाग और कार्यालय राजभाषा के लक्ष्यों को प्राप्त करते हैं। जिसे दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है पिछले 25 वर्षों से इसी तरह से राजभाषा के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा रहा है। इनमें कुछ नाम हैं, हिन्दी में मुद्रित अग्रेषण पत्र जिसे अंग्रेजी में लिखे पत्रों पर लगा दिया जाता है, वर्षों से तैयार रबर को मोहरें, भित्ति पर प्रदर्शित विभिन्न बोर्ड आदि, बस हो गयी राजभाषा।
प्रत्येक कार्यालय राजभाषा कार्यान्यवन की औपचारिकता निभा रहा है। कार्यालयों में गठित राजभाषा विभाग दिग्भ्रमित है क्योंकि उसे तिमाही रिपोर्ट के प्रेषण, राजभाषा कार्यान्यवन समिति की बैठक, अनुवाद, निरीक्षण के सिवा कुछ और सूझ नहीं रहा है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग का वार्षिक कार्यक्रम विभिन्न लक्ष्यों का निर्धारण तो कर देता है पर उसके प्राप्ति के उपायों की चर्चा नहीं करता है जिससे विभिन्न कार्यालयों के राजभाषा विभाग को अपनी अगली राह चयनित करने में असुविधा होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि कार्यालयों में राजभाषा का सबल नेतृत्व का अभाव है यद्यपि राजभाषा के बड़े पदों का यत्र-तत्र मिल जाना अब नयी बात नहीं रह गयी है। राजभाषा के प्रगति की गूंज तो सुनाई देती है परंतु कार्यालयों के कामकाज में राजभाषा का एकमय हो जाने की स्थिति 10 वर्ष पहले जैसी ही है। गाहे-बगाहे राजभाषा के प्रगति की दुदुंभी बज उठती है परंतु यह ऐसा ही लगता है जैसे एक स्थान पर बैठा व्यक्ति बोले जा रहा हो भागो, दौड़ो, भागो, दौड़ो जबकि यथार्थ में कोई धावक या धाविका नहीं है। ऐसी भी स्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं जब इस भागो, दौड़ो पर यकीन कर लिया जाता है।
क्या यह एक नकारात्मक सोच है? क्या यह पूर्वाग्रह का प्रभाव है? क्या यह यथार्थ की धरातल से कटा एक काल्पनिक लोक विचरण है? वस्तुतः ऐसा नहीं है। तीन दशक से राजभाषा निरख रही है कि उसके साथ अपेक्षित न्याय नहीं किया जा रहा है। कार्यान्यवन स्तर पर राजभाषा को बहलाया जाता है, भटकाया जाता है। राजभाषा को आवरणों में लपेट दिया जाता है, मुखौटे को रंग दिया जाता है जिससे राजभाषा व्यथित हो चुकी है। राजभाषा की वेदनाओं को कार्यान्यवन स्तर पर ना देखा जा रहा है, ना सोचा जा रहा और ना समझा जा रहा है बल्कि इसे पुरस्कारों की सीमाओं में बांध दिया गया है। राजभाषा व्यथित होकर वाणप्रस्थान कर रही है। किसी को भी इस बात की चिंता नहीं है। कोई रोकने की कोशिश भी नहीं कर रहा है। सरकार को यह रिपोर्टिंग की जा रही है कि राजभाषा कार्यान्यवन में ठोस कार्य हो रहा है और निरंतर प्रगति हो रही है। राजभाषा को सबसे अधिक पीड़ा इसी बात की है कि सरकार को भी किस तरह यथार्थ से दूर रखने की कोशिश की जा रही है। क्या करे राजभाषा ऐसी स्थिति में? कहाँ जाये, किसे अपना दुखड़ा सुनाये इसलिए राजभाषा ने तय कर लिया कि वाणप्रस्थान ही एक सही कदम होगा जहां कम से कम आत्मचिंतन और आत्ममनन के लिए समय तो मिल पाएगा, हो सकता है कोई नयी राह निकल जाये, और तो सोच नहीं रहे अब राजभाषा को ही खुद के कार्यान्यवन के बारे मैं सोचना पड़ेगा इसलिए वह वाणप्रस्थान की ओर चल पड़ी है।

              


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