शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

हिंदी प्रशिक्षण को मोहताज राजभाषा अधिकारी

भारत सरकार की राजभाषा नीति के अंतर्गत सभी केन्द्रीय कार्यालयों, उपक्रमों, बैंकों में राजभाषा विभाग की स्थापना की गई है तथा इस विभाग के कार्यों के लिए राजभाषा अधिकारी की नियुक्ति की गई है। विगत 25-30 वर्षों से राजभाषा कार्यान्वयन से जुड़े इन राजभाषा अधिकारियों को राजभाषा कार्यान्वयन विषयक सार्थक और व्यापक प्रशिक्षण प्रदान नहीं किया गया है। सार्थक प्रशिक्षण अर्थात वह प्रशिक्षण जिससे राजभाषा अधिकार को राजभाषा कार्यान्वयन के लिए आधुनिकतम जानकारियॉ तथा ज्ञान प्राप्त हो जाए। व्यापक प्रशिक्षण का मतलब वह व्यापकता प्राप्त हो जिसकी सहायता से सुगमतापूर्वक राजभाषा कार्यान्वयन किया जा सके। इस प्रकार सार्थक और व्यापक प्रशिक्षण द्वारा राजभाषा अधिकारी को आत्मबल प्राप्त हो, आत्मविश्वास प्राप्त हो, स्पष्ट लक्ष्य हों, लक्ष्य की प्राप्ति हेतु आवश्यक कौशल हो, समय-समय पर स्वाभाविक रूप से उठने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की क्षमता हो। इस तरह का प्रशिक्षण राजभाषा अधिकारियों को नहीं मिल पाता है परिणामस्वरूप अपेक्षित प्रभावशाली परिणाम नहीं मिल पाता है। राजभाषा कार्यान्वयन की यह एक प्रमुख समस्या है।

इस विषय पर चर्चा करते हुए प्रमुख प्रश्न यह है कि किन आधारों पर यह कहा जा सकता है कि राजभाषा अधिकारियों को राजभाषा का उचित प्रशिक्षण नहीं मिल रहा है ? इसके लिए बहुत गहराई में उतरने की आवश्यकता नहीं है बल्कि यहॉ वह कहावत चरितार्थ होती है कि-हॉथ कंगन को आरसी क्या। यदि राजभाषा अधिकारियों को उचित प्रशिक्षण प्राप्त होता तो राजभाषा कार्यान्वयन अपनी प्रगति की गवाही कागजी आंकड़ों के बजाए व्यवहार में निरंतर प्रगति करते राजभाषा के जीवंत साक्ष्य द्वारा स्पष्ट करती। आज किसी भी कार्यालय में जाने पर कुछ विभागों या टेबलों को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि उस कार्यालय में राजभाषा कार्यान्वयन अपेक्षित स्तर पर है। इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए दिए जानेवाले आंकड़ों के आधार पर राजभाषा दौड़ रही है और राजभाषा अधिकारी नेपथ्य में गुमशुदा सा प्रतीत हो रहा है। वर्तमान में राजभाषा अधिकारियों को यह ज्ञात ही नहीं है कि वह अपने कार्यों को कहॉ से और कैसे आरंभ करें। विभिन्न सरकारी कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्वयन अपने कठिनतम दौर से गुजर रही है। इस चुनौतीपूर्ण समय में राजभाषा अधिकारियों को एक सार्थक और व्यापक प्रशिक्षण की अत्यधिक आवश्यकता है।

मोहताज शब्द का प्रयोग करना आवश्यक था इसलिए यहॉ इस शब्द को वाक्य नें गूंथा गया है जबकि एक पक्ष यह भी कहनेवाला है कि राजभाषा अधिकारियों को तो प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। इस प्रकार के प्रदान किए जानेवाले प्रशिक्षण कितने उपयोगी होते हैं इसकी यदि समीक्षा की जाए तो दूघ का दूध पानी का पानी साफ नज़र आएगा। मोहताज केवल इसलिए ही नहीं कि इन्हें प्रशिक्षण नहीं मिलता है बल्कि मोहताज इसलिए भी हैं कि राजभाषा अधिकारियों के प्रशिक्षण की एक आदर्श रूप-रेखा तथा सक्षम संकाय की भी कमी है। इसके लिए सभी कार्यालयों को एक निर्धारित कार्यक्रम बनाकर अपने प्रशिक्षण कार्यक्रम में एक स्लॉट के रूप में इसे जोड़ना होगा, तब कहीं जाकर इस दिशा में एक परिणामदाई पहल होगी। राजभाषा अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए अभी तक किसी भी कार्यालय द्वारा एक ठोस रूप-रेखा नहीं बनाई गई है अतएव इस दिशा में पहल करने की आवश्यकता है। जब तक यह अभाव समाप्त नहीं होगा तब तक मोहताज शब्द एक पहल की आवश्यकता का संकेत देते रहेगा।

राजभाषा अधिकारियों को हिंदी का विशेषज्ञ माना जाता है तथा सामान्यतया यह सोचा जाता है कि जो विशेषज्ञ है उसको उसकी विशिष्टता के क्षेत्र में क्या प्रशिक्षण दिया जाए। यह सोच इस तथ्य को अनदेखा कर देती है कि हिंदी और राजभाषा हिंदी में कुछ फर्क भी है। राजभाषा कार्यान्वयन के लिए सरकारी नीतियों के अतिरिक्त राजभाषा अधिकारी को राजभाषा के क्षेत्र में अन्य विधाओं में भी पारंगत होना पड़ता है जिसमें है अनुवाद, सम्प्रेषण, अभिव्यक्ति, लेखन, भाषण कौशल, आयोजन, कर्मचारियों की मानसिकता के अनुरूप कार्यान्वयन की शैलियों में बदलाव आदि। इन सबका सीधा संबंध राजभाषा कार्यान्वयन से होना चाहिए। प्रशिक्षण सामग्री भी अत्यावश्यक है। यद्यपि राजभाषा अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण सामग्री तैयार करना एक शोध करने जैसा कार्य है फिर भी यह है तो बहुत ज़रूरी। यह सामग्री भी विभिन्न कार्यालय अपने प्रशिक्षण महाविद्यालय में तैयार करा सकते हैं। विशेषज्ञों को भी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है अन्यथा उनके कौशल में ठहराव आ जाने का भय रहता है।

कठिन नहीं है यह कार्य आवश्यकता बस निर्णय लेने की है। यहॉ प्रश्न उठता है कि कौन लेगा यह निर्णय ? यह निर्णय विभिन्न कार्यालयों के प्रधान कार्यालय / मुख्यालय के राजभाषा विभाग को लेना होगा। इस कार्यक्रम के विषय, समय-सारिणी, प्रशिक्षण सामग्री, संकाय आदि की व्यवस्था राजभाषा विभाग ही सहजतापूर्वक कर सकता है। राजभाषा अधिकारियों की सहायता राजभाषा अधिकारी ही कर सकता है। विभिन्न कार्यालय के शीर्ष प्रबंधन का राजभाषा कार्यान्वयन के लिए सहयोग, दिशानिर्देश आदि हमेशा से मिलते आ रहा है इसलिए यहॉ किसी प्रकार की कठिनाई नहीं है। राजभाषा अधिकारियों को प्रशिक्षण वर्तमान की आवश्यकता है किन्तु आरम्भ में चुनौतीपूर्ण है। इस दिशा में पहल राजभाषा कार्यान्वयन के एक नए सोपान की रचना करेगी जिसकी प्रतीक्षा वर्तमान भी कर रहा है।

धीरेन्द्र सिंह.