मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

महिला दिवस और राजभाषा

मेरे मन में भी महिला दिवस और राजभाषा विचार कौंधा था तब मैं भी आपकी ही तरह आश्चर्यचकित हुआ था। आख़िरकार इस महिला दिवस पर मैं क्या लिखूँ यह सवाल तो मेरे सामने खड़ा ही था। ना जाने क्यों यह विषय मुझे नया, आकर्षक और चुनौतीपूर्ण लगा। अब आप यह मत कहिएगा कि महिला शब्द ही चुनौतीपूर्ण है इसलिए मैंने कौन सी नई बात कह दी। बात जब कहनी होती है तो एक अंदाज़ में कह दी जाती है। आख़िर अंदाज़ ही तो है जो भावों और विचारों के हिचकोलों से बात की रक्षा करता है, उसकी गरिमा को बनाए रखता है। वरना आज की दुनिया में गरिमा बनाए रखने की बात तो दूर गरिमा शब्द से परिचित होना ही मुश्किल है। गरिमा का किसी व्यक्ति विशेष या महज़ एक नाम से जुड़ जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। वैसे महिला का राजभाषा से जुड़ जाने का खतरा भी खतरा कम नहीं है। कहॉ सीधी, सरल, निर्मल मना महिला और कहॉ पहाड़ी नदी की तरह अनजानी डगर पर भी अपनी गति को बनाए रखनेवाली राजभाषा। कहीं ताल-मेल नहीं दिखता है। पर आधुनिक महिला तो विषम परिस्थितियों से दो-दो हॉथ करने में कहॉ पीछे हैं तो मैंने भी सोचा कि क्यों न महिलाओं से राजभाषा के बारे में थोड़ी चर्चा कर उनके मिज़ाज का ज़ायजा लिया जाए।


अपनी मंज़िल पर लिफ्ट की प्रतीक्षा में खड़ी एक महिला से मैं जा टकराया। मुसकराहट के आदान-प्रदान के बाद मैंने कुछ औपचारिक बातों के बाद अपना सवाल पूछ ही बैठा-मैडम आप केन्द्र की राजभाषा के बारे में क्या जानती हैं ? उन्होंने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने नासमझी भरा सवाल कर दिया हो। पल भर में ही यह प्रमाणित भी हो गया कि अपने बारे में उस समय की मेरी सोच सही थी। उन्होंने कहा कि राजभाषा के बारे में तो बच्चा-बच्चा जानता है। श्री राज ठाकरे की पार्टी द्वारा मराठी भाषा का मुंबई में हर जगह प्रयोग ही राजभाषा है। मैं हतप्रभ रह गया और घबराहट से घिर गया। राजभाषा में राजनीति कैसी ? यह सोचते हुए मैं अपने भावों पर नियंत्रण ना रख सका और अगला प्रश्न पूछ दिया कि राजभाषा और राजनीति से क्या लेना-देना ? उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि राजनीति और राजभाषा एक ही सिक्के के दो महत्वपूर्ण पक्ष है। एक-दूसरे के बिना दोनों अधूरे हैं। मैं आगे कुछ बोल पाता उससे पहले लिफ्ट तल मंज़िल पर रूकी और वो चली गईं। मैंने केन्द्र की राजभाषा के बारे में पूछा और वे राज्य के दायरे में लाकर मेरे प्रश्न को छोड़ गईँ। राजभाषा को किसी व्यक्ति और किसी पार्टी से क्यों जोड़ गईं ? मैं सोचता ही रह गया। अब किसी महिला से प्रश्न पूछने की स्थिति में नहीं था अतएव कल पर छोड़ अपनी सोच में डूबा मैं चलता गया।


सुबह घर से ही तय करके निकला था किसी ऐसी महिला से प्रश्न करूँगा जिसे बहुत जल्दी ना हो और जो मुझे थोड़ा समय दे सके। विश्वविद्यालय की कैंटीन में जब मैं चाय पीने गया था तो कैंटीन के कोने में एक महिला चाय पीते दिखी और मैं बेधड़क जाकर औपचारिकताऍ निभाते हुए बैठ गया। बिना कोई अन्य वार्ता किए मैं पूछ बैठा कि – मैडम केन्द्र की राजभाषा से आप क्या समझती हैं ? प्रश्न समाप्त होते ही उन्होंने तपाक से उत्तर दिया – इंग्लिश। आश्चर्य से मैंने पूछा-वह कैसे ? उनका उत्तर था कि प्रत्येक सरकारी कार्यक्रमों में अंग्रेज़ी में बातचीत, वित्तीय मंच पर अंग्रेज़ी, विदेशों में जाकर अंग्रेज़ी का ही प्रयोग, हिंदी की रोटी खानेवाले बॉलीवुड के कार्यक्रमों में निमंत्रण से लेकर समापन तक अंग्रेज़ी ही अंग्रेजी। चारों तरफ अंग्रेजी ही दिखती है इसलिए जनता अंग्रेजी को ही राजभाषा कहती है। मैं लाजवाब हो गया। अबकी बार महिला नहीं उठी, मैं ही उठ कर चल दिया।


मेरे मन की न तो जिज्ञासा शांत हुई और न उत्सुकता। मैं तो अपने ढंग से महिला दिवस मनाने पर आमादा जो था। एक गम्भीर सी दिखनेवाली महिला से मैंने जब यही प्रश्न पूछा तो उत्तर तपाक से मिला – टाईम पास। अच्छे से अच्छे चिंतन-मनन वाला मस्तिष्क भी इस उत्तर से लड़खड़ा जाएगा यही सोचकर मैं भी हतप्रभ रह गया। मैडम आपने तो अजीब सा उत्तर दे दिया, मैं तो इसका ओर-छोर ही नहीं पकड़ पा रहा, कृपया कुछ स्पष्ट कीजिए। उन्होंने कहा कि राजभाषा कार्यालयों से जुड़ी है, कार्यालयों में राजभाषा विभाग पर राजभाषा कार्यान्वयन की जिम्मेदारी है, राजभाषा विभाग में राजभाषा अधिकारी रहते हैं और राजभाषा अधिकारी टाइम पास करते हैं इसलिए राजभाषा टाइम पास है। मैंने कहा मैडम यह तो विचार कम और आरोप अधिक लग रहा है। उन्होंने ने कहा कि आप के मन में यदि ऐसे विचार उत्पन्न हो रहे हैं तो पहले आप किसी कार्यालय के राजभाषा विभाग की गतिविधियों को गौर से देखिए फिर इस विषय पर मुझसे चर्चा कीजिए। राजभाषा के इस नए अंदाज को समझते हुए मैंने यह तय कर लिया कि अब बस मना लिया मैंने महिला दिवस को, इससे अधिक की क्षमता मुझमें नहीं रह गई थी। महिला दिवस और राजभाषा यह संगम एक ऐसे भँवर की और ले गया जिसमें मंथन की कभी न रूकने वाली प्रक्रिया थी और परिणाम की संभावना नज़र नहीं आ रही थी।


धीरेन्द्र सिंह.