सोमवार, 9 मार्च 2009

अलसाया मौसम

मौसम के अलसाया होने से अनेकों प्रभाव होते हैं तथा एक खामोश उदासी लिपटी रहती है। मौसम के मिज़ाज को दो लोग बखूबी पढ़ते रहते हैं या यूँ कहें कि मौसम से दो लोग बहुत जल्दी प्रभावित होते हैं एक तो मौसम विभाग तथा दूसरे कवि। मौसम में जो उतार-चढ़ाव आते रहता है उनमें इन दोनों की उल्लेखनीय भूमिका होती है। प्राय: लोग कहते हैं कि जब मौसम विभाग बारिश की चेतावनी देता है उस दिन धूप खिली हुई रहती है तथा जब दिन के खुले मौसम की घोषणा होती है तब बदरिया अटरिया पर आकर बूँद नर्तन कर नेह संदेसा देते रहती है। बात यहीं तक रूक जाती तब भी मौसम के लिए ठीक था, उसमें अलसायेपन की उतनी तासीर नहीं आती जितनी कवियों के मौसम संबंधी कविताओं में झलकती है। सुबह की खिली धूप को नायिका के भोर की निगाहों की चमक बतलाना इन कवियों की ही आदत है। दुपहरिया कवियों के लिए तेज धूप की चिलचिलाती गर्मी नहीं रहती है बल्कि वह नायिका के यौवन का तेज होता है। शाम उनके लिए नायिका की झुकी पलकें लगती है तो रात्रि नायिका के खुले केश नज़र आती है। इसके बावजूद भी यह कहना कि मौसम अलसाया है, कितना यथार्थपरक है इसको सहज समझा जा सकता है।
सिंह

मौसम ! जो केवल जलवायु के स्पंदनों को दर्शाने तक सीमित नहीं रह गया बल्कि मौसम ज़िंदगी के हर गलियारे में पहुँच गया है जैसे गाड़ी मौसम में है, ऑफिस का मौसम गड़बड़ है आदि। बात यदि ऑफिस के मौसम का करें तो थोड़ी दिलचस्पी बढ़ेगी क्योंकि हम सब किसी न किसी कार्यालय से संबद्ध है। कार्यालय के मौसमी मिज़ाज को अंदाजनेवाले तथा कार्यालयीन लय पर गुनगुनानेवाले प्रत्येक कार्यालय में अच्छी संख्या में मिल जाएंगे किन्तु इनमें यदि सर्वश्रेष्ठ की तलाश की जाए तो खोज राजभाषा अधिकारी पर जाकर समाप्त होती है। एक सम्पूर्ण खोज, एक मुकम्मल मुकाम। राजभाषा अधिकारी उर्फ हिंदी अधिकारी उर्फ हरफनमौला वगैरह-वगैरह कई नाम हैं। नहीं-नहीं यह सिर्फ नाम नहीं है बल्कि एक संभावना है, एक मंज़िल है, जंगल में गुजरती एक राह है, हसरतों का कारवॉ है, उपलब्धियों की छॉह है। यह चाहे तो कार्यालय में उत्सवमय वातावरण बना दे, यह चाहे तो कार्यालय में निरीक्षणमय वातावरण बना दे अर्थात यह जब चाहे तब कार्यालय के मौसम को प्रभावित करने के मौसम की रचना रच सकता है। कार्यालय के अधीनस्थ से लेकर उच्चतम अधिकारी तक अपनी व्यापकता रखनेवाला कार्यालय के गिने-चुने लोगों में से एक है। राजभाषा अधिकारी कार्यालय में पॉकेट साइज पॉवर हाऊस है। अजी नहीं, यह अतिशयोक्ति क़तई नहीं है।

कार्यालयीन इतिहास में 1970 और 80 का दशक राजभाषा अधिकारियों का स्वर्णिम युग था। इन दो दशकों में राजभाषा को एक व्यापक आयाम मिला, राजभाषा के पुष्पन तथा पल्लवन के लिए उपजाऊ ज़मीन मिली, लोकप्रियता के शीर्ष पर राजभाषा आसीन हुई और राजभाषा अधिकारी एक नायक के रूप में अपनी छवि निर्मित करने में कामयाब रहा। यह राजभाषा का एक खुशनुमा मौसम था। राजभाषा अधिकारी के अथक प्रयासों का अनमोल परिणाम मिल रहा था तथा कार्यालय में राजभाषा मन्दाकिनी की तरह अपनी तासीर में कर्मियों को सराबोर कर अपनी क्षमताओं और संभावनाओं से बखूबी परिचित करा रहा था। राजभाषा अधिकारी की अपने कार्यों के प्रति लगन, उत्साह और उल्लास से कार्यालय का मौसम प्रभावित होते रहता था तथा राजभाषा अधिकारी अपने समर्पित कार्य प्रतिबद्धता के बल पर सबका चहेता बन गया था। जी नहीं, अनजाने में नहीं बल्कि जानबूझकर यहाँ 'था' शब्द का प्रयोग किया जा रहा है क्योंकि अब वह मौसम ढूँढे बमुश्किल मिल रहा है। ऐसा क्यों हुआ के कारण अनेक हैं जिसके केन्द्रबिन्दु में राजभाषा अधिकारी है परन्तु सत्यता यही है कि कार्यालयों में अब राजभाषा का पुराना खुशनुमा मौसम नहीं रह गया है।

मौसम कभी भी अचानक अपना रंग नहीं बदलता, समर्पण कभी भी अपना ढंग नहीं बदलता तथा विशेषज्ञ कभी भी अपना तरंग नहीं बदलता तो फिर यह राजभाषा का खुशनुमा मौसम कैसे बदल गया मतलब ऐसा बदल गया कि वर्षों से वापस आया ही नही। शरबती वाक्य रचनाओं से श्रोताओं की दृष्टि में प्रशंसात्मक भाव उत्पन्न करनेवाला राजभाषा अधिकारी 70 और 80 के दशक के मौसम को निर्मित करने में कामयाब नहीं हो पा रहा है, यह सर्वविदिति गोपनीय तथ्य है। राजभाषा नीति और राजभाषा कार्यान्वयन का कुशलतापूर्वक ताना-बाना बुननेवाला राजभाषा अधिकारी आज वह प्रदर्शन क्यों नहीं कर पा रहा है ? एक बार फिर वही उत्तर कि, यह सर्वविदित तथ्य है। चिर-परिचित कहावत है कि शोहरत और कामयाबी के नशे से खुद को बचाकर निकाल ले जाना संयत, सुलझे तथा समन्वयशील व्यक्तित्व का कार्य है। यदि इस कहावत की कसौटी पर राजभाषा अधिकारियों को कसा जाए त अधिकांश राजभाषा अधिकारी अपने खरेपन को साबित करने में काफी कठिनाईयों का अनुभव करेंगे। बदलते समय के साथ राजभाषा अधिकारियों ने भी अपनी कार्यशैली में निखार लाने का प्रयास किया। चूँकि प्रत्येक परिवर्तन के लिए किसी न किसी आधार की आवश्यकता होती है अतएव राजभाषा ने आधार की जब तलाश शुरू की तोकार्यालय से बेहतर आधार कोई न मिला और परिवर्तन के दौर में कब कार्यालय और राजभाषा रसमय हो गए पता ही नहीं चला। इसका परिणाम यह हुआ कि नए रस के पाग में पकते हुए राजभाषा अधिकारी आहिस्ते-आहिस्ते राजभाषा के केन्द्र बिन्दु से खिसकते गए तथा अपने-अपने कार्यालय के दूसरे कार्यों को सीने से लगा बैठे। यह सिलसला अब भी जारी है और राजभाषा अपने ही के हॉथों की बनी लाचारी है।

मौसम अचानक नहीं बदलता है। तो क्या राजभाषा अधिकारी अचानक बदल गए हैं ? यदि नहीं तो कार्यालयों में राजभाषाई मौसम अलसाया सा क्यों नज़र आ रहा है ? ऐसा क्यों हल्का-हल्का महसूस होने लगा है कि राजभाषा हाशिए पर जा रही है। क्यों हो रही है ऐसी अनुभूति ? कौन हो सकता है जिम्मेदार ? किन कारणों से 70 और 80 के दशक के राजभाषा गुंजन के सुर-लय-ताल भूली-बिसरी सी कहानी लग रही है ? यदि देखा जाए तो इस तरह प्रश्नों का एक विशाल ज़खीरा खड़ा हो जाएगा जो भूल-भुलैया की तरह उलझाते रहेगा किंतु संतोषप्रद जवाब नहीं दे पाएगा। तो फिर इस तरह के प्रश्नों को उठाना बंद कर दिया जाना चाहिए ? नहीं, हर्गिज नहीं, बल्कि इस तरह के प्रश्नों की जड़ तक पहुँचना चाहिए। इस तरह की उलझनों को दूर करने की कोशिश की जानी चाहिए। कौन है इन प्रश्नों के जड़ में ? व्यक्ति या परिस्थितियाँ ? नि:संदेह इसके जड़ में व्यक्ति है और वह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि राजभाषा अधिकारी हैं।

विश्व के बदलते मौसमों के बीच राजभाषा कार्यान्वयन के मौसम के नब्ज पर से राजभाषा अधिकारियों की पकड़ या तो छूट गई है अथवा पकड़ ढीली होती जा रही है। संविधान से निकलती राजभाषा कार्यान्वयन की अनुगूँज प्रेरणा और प्रोत्साहन के आधार पर राजभाषा अधिकारियों को निरंतर प्रयास और प्रगति का स्पष्ट संकेत देते जा रही है किन्तु राजभाषा के सिपाही अलसाए हुए से लगने लगे हैं। इन प्रतिबद्ध सिपाहियों की क्षमताएॅ कभी भी प्रश्न चिन्ह के दायरे में नहीं आई किन्तु सिपाही जरूर आए। राजभाषा अधिकारी आज कुछ थके-थके, कुछ परेशान-हैरान से लगने लगे हैं। अपनी राजभाषा की प्रतिबद्धताओं से विचलित नज़र आ रहे हैं। कहावत है कि जब जागो तभी सवेरा, इसलिए क्षमतावान, प्रतिभावान तथा हरफनमौला राजभाषा अधिकारियों उर्फ हिंदी अधिकारियों को राजभाषा के परिप्रेक्ष्य मेंस्वंय के गहन समीक्षा की आवश्यकता है। राजभाषा के इस अलसाए मौसम में भी राजभाषा की वसंत ऋतु समर्पित राजभाषा अधिकारियों की वही पुरानी क्षमताओं में स्वंय को रंगने की राह देख रही है। वक्त का तकाज़ा भी यही है और निर्णय - सिर्फ और सिर्फ राजभाषा अधिकारी उर्फ हिंदी अधिकारी पर ही निर्भर है।

धीरेन्द्र