सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

होली,कृष्ण और मानव संसाधन.

होली एक पर्व है, होली एक उल्लास है, होली एक सांस्कृतिक धरोहर है, होली बहुरंगी फुहारों का मौसम है, होली-होली-होली न जाने कितने भावों को प्रदर्शित करने की क्षमता रखती है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि होली एक सांस्कृतिक उल्लासपूर्ण पर्व है जिसमें कृष्ण और गोपिकाएँ प्रमुख हैं। समय में अनेकों बदलाव आए किंतु होली की लोकप्रियता अपने पायदान पर बरकरार है। कृष्ण और गोपिकाओं की होली को समय ने कई परिवर्तनों से सँवारने का प्रयास किया है जिसके परिणामस्वरूप होली न केवल विविध रंगों में नज़र आती है बल्कि अनेकों अभिनव अंदाज़ में भी दिखलाई पड़ती है। यूँ तो होली रंगों का पर्व है। होली मौसम के बदलते खूबसूरत अंदाज़ का एक तराना है तथा परिचितों-अपरिचितों को रंग देने का एक सर्वमान्य बहाना है। होली त्योहार के आते ही मौसम का मिज़ाज बहकने लगता है जिसके प्रभाव को उस समय की बौरायी हवाओं मं अनुभव किया जा सकता है। हर गली, हर मुहल्ले के लोग होली के दिन रंग खेलने की योजनाएँ अपने व्यक्तिगत निवेश की तरह गंभीरतापूर्वक नियोजित करने लगते हैं। होली के अवसर पर हर उम्र के लोग रंगदेने और रंगजाने की हसरतें लिए रहते हैं और होली के दिन हर पुरूष कृष्ण और हर नारी गोपिका की भूमिका को बखूबी निभाने का प्रयास करते हैं। अनिवासी भारतीयों के संग विदेशों तक पहुँच कर होली अपनी विशेष छाप छोड़ चुकी है।

होली और कृष्ण के विस्तृत आयामों की समीक्षा करने पर मानव संसाधन की एक नायाब अनुभूति होती है। होली का असर विभिन्न कार्यालयों में भी रहता है, जी नहीं, मैं कार्यालय कर्मियों की होली की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि मेरा ईशारा कार्यालय के मानव संसाधन विभाग की ओर है। मानव संसाधन विभाग एक ओर व्यक्ति के बौद्धिक प्रगति के दायित्व को संभालता है तो दूसरी तरफ वह कर्मियों के भावनात्मक लहरों पर भी अपनी दृष्टि लगाए रहता है। प्रत्येक संस्था में नया जोश, नई शैली और नया अंदाज़ उत्पन्न करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है। लगभग फागुन के महीने से ही प्रत्येक कार्यालय का मानव संसाधन विभाग विभागीय पदोन्नति तथा स्थानान्तरण का कार्य आरम्भ कर देता है और अधिकांश कर्मचारी संशय में रहते हैं, न जाने कौन सी पुड़िया उनके हिस्से में आ जाए। होली में जैसे पिचकारी के या मुट्ठी के रंग का अंदाजा नहीं रहता है उसी तरह मानव संसाधन विभाग की पदोन्नति या स्थानांतरण की पूर्व जानकारी नहीं रहती है। यदि इस पर गहन दृष्टि डाली जाए तो यह संकेत मिलता है कि कार्यालयों में प्रबंधन का एक अंग-मानव संसाधन विकास विभाग कृष्ण की भूमिका निभा रहा है अथवा इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि कर्मचारियों ने मानव संसाधन के इस रूप को स्वीकार कना आरम्भ कर दिया है। कृष्णलीला की भॉति मानव संसाधन विकास विभाग की लीला भी कर्मचारियों में अत्यधिक लोकप्रिय है तथा इसकी हर गतिविधियों में कर्मचारियों की आस्था और लगन है।

मानव संसाधन का कोई रूप नहीं है, न तो इसका बाल्यकाल होता है और न ही युवाकाल बल्कि यह हमेशा अपनी धुन में खोया रहनेवाला रूपहीन, गंधहीन और स्पर्शहीन एक जीवंत संवेदना है जो कर्मचारियों की सांसों की लय पर कान्हा की बांसुरी की नए सुर और ताल को सजाते रहता है। कृष्णकाल में अपनी किसी भी समस्या के समाधान के लिए गोप-गोपियॉ कृष्ण को पुकारते हुए दौड़ पड़ते थे, वर्तमान के कार्यालयीन परिवेश में मानव संसाधन कृष्ण के चुनौतीपूर्ण कार्य को निभा रहा है। होली का मौसम आते ही जहॉ देश के गली-कूचों में रंगों की बारात सजने लगती है वहीं कार्यालयों में भी मानव संसाधन की और से रंगों की बौछारें शुरू हो जाती हैं, किसी को स्थानांतरण के रंगों से भिगोया जाता है, किसी के माथे पर पदोन्नति का गुलाल लगता है, किसी को लक्ष्य प्राप्ति की ठंढई मिलती है तो कोई शुभ्र धवल बेदाग वस्त्रों को पहने अगली होली की प्रतीक्षा करने लगता है। हॉ, कर्मचारियों में यह मलाल रह जाता है कि मानव संसाधन कहीं मिलता तो जम कर उसके साथ होली खेलते।

श्याम हो कि राधा हो या कि मानव संसाधन हो, मौसम जब होली का होता हो तो रंग अपना स्थान ले लेता है। होली के मौसम में किसने किस रंग में स्वंय को रंगा पाया यह रंग से कहीं अधिक भावनाओं से जुड़ा है। भावनाएँ जब होली से जुड़ती हैं तो कृष्ण की अनुभूति स्वत: उत्पन्न हो जाती है और इस भावनात्मक प्रवाह में यदि मानव संसाधन अपने महत्व को सहज दर्शाता है तो इससे ऊपजी शब्द रूपी अभिव्यक्ति कुछ और नहीं बल्कि होरी होती है। मानव संसाधन विकास विभाग कृष्ण जैसा व्यक्तित्व लेकर मनमोहक, खुशियों से पूर्ण रंगों की फुहार से सब कर्मियों को गुदगुदाहट भरी शीतलता देता रहे।

धीरेन्द्र सिंह.