बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

राजभाषा अधिकारियों की चुनौतीपूर्ण भूमिका

राजभाषा कार्यान्वन की गूँज ने 1980 के दशक से कार्यालयों में सजगता लाना आरम्भ की इसलिए मेरी दृष्टि से व्यापक तौर पर राजभाषा कार्यान्वयन का यह प्रथम दशक था। यह आरम्भिक चरण राजभाषा कार्यान्वयन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूर्ण करने का समय था। इस दशक में निम्नलिखित मदों में विशेष तौर पर कार्य हुआ -


1. द्विभाषिक/त्रिभाषिक नाम बोर्ड, द्विभाषिक रबड़ की मुहरें, धारा 3(3) के दस्तावेजों का अनुवाद आदि;
2. हिंदी टाइपिंग,आशुलिपि,हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान प्रदान करने का दायित्व पूर्ण करना था;
3. बैंकों/उपक्रमों/ सरकारी कार्यालयों  में राजभाषा कार्यान्वयन के लिए अनुकूल और प्रेरणापूर्ण राजभाषा कार्यान्वयन का माहौल निर्मित करना था;
4. गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग,नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों में सार्थक एवं प्रभावी उपस्थिति दर्ज कर कार्यालय की एक बेहतर छवि निर्मित करना था;
5. कर्मचारियों में राजभाषा कार्यान्वयन के प्रति सकारात्मक रूझान उत्पन्न करना था;
6. भारत सरकार की राजभाषा नीति - प्रेरणा, प्रोत्साहन और सद्भावना के अनुरूप राजभाषा कार्यान्वयन का अनुपालन करने के दिशानिर्देश के अनुरूप कार्यालयो,बैंकों,उपक्रमों को प्रगति दर्शाना था ;

विभिन्न कार्यालयों में सफलतापूर्वक उक्त कार्य पूर्ण हो चुके है तथा राजभाषा की कई उपलब्धियॉ उनको प्राप्त हो चुकी हैं किंतु प्रथम शताब्दी के समापन के अंतिम कुछ वर्षों में राजभाषा के सुर-ताल में कुछ बेसुरेपन का आभास होना आरम्भ हुआ जिसका प्रभाव विभिन्न कार्यालयों में द्वितीय शताब्दी में भी दिखलाई पड़ रहा है इसलिए यह आवश्यक प्रतीत हो रहा है कि द्वितीय शताब्दी के शुभारम्भ के अवसर पर राजभाषा अधिकारियों की भूमिका पर एक बार फिर गहन विचार किया जाए।
केन्द्रीय कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों ने राजभाषा कार्यान्यवन विषयक   अनेकों कीर्तिमान, सम्मान पाये और अपनी विशिष्ट पहचान प्राप्त की, अतएव 90 के दशक का आगमन पूरे जोश, उल्लास और एक अति नवीन दृष्टि से हुआ जिसके अंतर्गत देश के विभिन्न कार्यालय ही नहीं प्रभावित हुए बल्कि राष्ट्र का सम्पूर्ण कामकाजी परिवेश भी प्रभावित हुआ। परिणामस्वरूप जनमानस पर भी इसका अनुकूल प्रभाव हुआ तथा समय के अनुसार राजभाषा कार्यान्वयन और राजभाषा अधिकारियों की चुनौतीपूर्ण भूमिकाएँ भी समयानुसार परिवर्तित हुईं

कालान्तर में राजभाषाई परिवर्तन अत्यधिक व्यापक हो गया जिसके अंतर्गत आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों में परिवर्तन दिखना आम्भ हो गया है। राजभाषा अधिकारियों के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे भारत सरकार की राजभाषा नीति के दायरे में राजभाषा कार्यान्वयन को एक नई शैली प्रदान करें और स्वंय की उपयोगिता को नए परिवेश में सार्थक, सुफलदायक और सहज बनाएँ। यह कार्य स्वंय राजभाषा अधिकारियों को ही करना पड़ेगा क्योंकि विशेषज्ञता के क्षेत्र में समय संग बनती-मुड़ती राहों की नब्ज़ पर राजभाषा अधिकारी की विशेषज्ञतापूर्ण पकड़ है अतएव वे समयानुसार पहल, परिवर्तन और प्रगति दर्शा सकते हैं जिसमें हमेशा की तरह प्रबंधन का विवेकपूर्ण सहयोग मिलता रहेगा। अतएव राजभाषा अधिकारी की चुनौतीपूर्ण भूमिका में किसी प्रकार की नीतिगत एवं प्रशासनिक स्तर की कठिनाईयॉ नज़र नहीं आ रही हैं। इसके अतिरिक्त परिवर्तन का तेज और प्रगतिपूर्ण अंदाज़ यह स्पष्ट संकेत दे रहा है कि नई चुनौतियों का सामना करने के लिए राजभाषा अधिकारियों को अपनी भूमिका में भी आवश्यक परिवर्तन लाना होगा। यही समय की मांग है। द्वितीय शताब्दी में राजभाषा अधिकारियों की कुछ प्रमुख भूमिकाएँ होंगी :-

1. राजभाषा कार्यान्वयन के प्रति नई दृष्टि अपनाई जानी चाहिए ।


क्या है यह नई दृष्टि -

क. देश में बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद के बढ़ते-बदलते चलन और उसके अनुकूल निखरती-बदलती हिंदी भाषा ;
जिसके परिणामस्वरूप ग्राहकों से सामान्य पत्राचार व लेखन में वर्तमान चलन के अनुरूप राजभाषा में परिवर्तन की आवश्यकता है। इस दिशा में क्षेत्रीय आवश्यकता के अनुसार राजभाषा अधिकारियों को ग्राहकों को भेजे जानेवाले पत्रों में यथानुसार भाषागत परिवर्तन-परिवर्धन कर ग्राहकों के संग सशक्त और संगत सम्प्रेषण निर्मित करना होगा ताकि रिश्तों की बुनियाद और मजबूत हो।

ख. हिंदी सॉफ्टवेयर से चोली-दामन का संबंध निर्मित किया जाए। इससे सभी प्रकार के लिखित सम्प्रेषण आकर्षक, प्रभावी और तेज़ गति के होंगे जिससे राजभाषा कार्यान्वयन में और तेज़ी आएगी।

ग. अपने उत्पादों के बारे में पूर्ण जानकारी रखना जिससे कि राजभाषा को कार्यालयीन परिवेश के साथ बेहतर ढंग से जोड़ा जा सके। यह एक कड़वी सच्चाई है कि राजभाषा के एक विशाल शब्द भंडार के बावजूद भी राजभाषा, टेबल पर कार्य कर रहे स्टाफ के लेखनी की धड़कन नहीं बन सकी है। विभिन्न उत्पादों की जितनी ज्यादा जानकारी होगी, राजभाषा के विभिन्न साहित्य का प्रभाव उतना ही व्यापक होगा।

घ. समर्पित आत्मीयतापूर्ण राजभाषा कार्यान्वयन के बल पर ही राजभाषा की लोकप्रियता में सतत् वृद्धि की जा सकती है। राजभाषा अधिकारियों को कुशलतापूर्वक स्टाफ-सदस्यों को राजभाषा में अधिकाधिक कार्य करने के लिए तैयार करना है। इसके लिए सर्वप्रथम राजभाषा अधिकारियों को राजभाषा के प्रति प्रतिबद्ध और कटिबद्ध होना चाहिए।

ङ. नवीनता के संग राजभाषा कार्यान्वयन किया जाए। वर्तमान अति तेज़,अति नवीन और अति परिवर्तनीय है इसलिए 80 के दशक के अनुरूप यदि वर्तमान में भी राजभाषा कार्यान्वयन किया जाएगा तो ऐसा प्रतीत होगा जैसे नई साज-सज्जा वाले टेबल पर बासी भोजन प्रदान किया जा रहा है।

च. प्रदर्शन पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। अधिकांश कार्यालयों के राजभाषा कार्यान्वयन की संभवत: यह सबसे बड़ी कमज़ोरी है कि वह किए गए बेहतरीन कार्यों का समयानुसार कुशलतापूर्वक प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं।

छ. नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति में अपनी नेतृत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज़ करना। केवल औपचारिक उपस्थिति मात्र से इस बैठक में हम अपने बैंक की बेहतर छवि निर्मित नहीं कर सकते हैं बल्कि राजभाषा अधिकारी को चाहिए कि अपने उच्चाधिकारी से चर्चा कर, एक कार्यनीति बनाकर नराकास समिति में पूर्ण सक्रिय और सार्थक चर्चा करें तथा प्रत्येक पल को अपने बैंक के हित के लिए मोड़ने की सफल क्षमताओं का प्रदर्शन करें।

ज. गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग, क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के उप-निदेशक से लगातार संपर्क बनाए रखना तथा अपने महत्वपूर्ण राजभाषा के आयोजनों में उन्हें आमंत्रित करना जिससे कि कार्यालय की छवि में निखार आए और हमारे कार्यों को करीब से देखने का उन्हें अवसर प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त आवश्यकतानुसार तत्काल इनके यथोचित दिशानिर्देश भी प्राप्त हो सकते हैं।

झ. नेतृत्व की कुशलता में प्रभावशाली विकास लाना जिससे कि न केवल अपने कार्यालय के विभिन्न मंचों बल्कि अन्य आमंत्रित मंचों पर भी एक प्रभावशाली नेतृत्व करनेवाले की पहचान बने।

ञ. बेहतर आदर्श प्रस्तुत करना। राजभाषा अधिकारी को हिंदी के लेखन, संबोधन, आयोजन आदि में एक बेहतर नमूना अथवा आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए जिससे राजभाषा कार्यान्वयन को एक गति मिलेगी तथा राजभाषा अघिकारी अपने विषय का वस्तुत: विशेषज्ञ के रूप में स्वीकार किया जाएगा जो राजभाषा कार्यान्वयन के लिए अत्यधिक आवश्यक है।

ट. अपने उच्चाधिकारी तथा कर्मचारियों से समय-समय पर राजभाषा कार्यान्वयन की चर्चा कर उन्हें की राजभाषा नीति की नवीनतम जानकारियॉ प्रदान करना जिससे कार्यान्वयन में कहीं अटकना या रूकना न पड़े।

राजभाषा अधिकारियों / हिन्दी अधिकारियों को अब राजभाषा कार्यान्वयन के सबस चुनौतीपूर्ण समय से गुजरना है जिसमें एक तरफ प्रौद्योगिकी है जिससे रिश्ता बनाने के प्रयास में अभी भी बहुसंख्यक व्यस्त हैं, दूसरी और परिपक्व कर्मचारी हैं जिन्हें हिंदी में कार्य करने के लिए प्रेरित करना है और इसके अलावा राजभाषा अधिकारी पर कृत्रिम कार्यालयीन भाषा, कठिन हिन्दी आदि का परम्परागत आरोप भी लगते रहते हैं। यदि राजभाषा अधिकारी समय के संग खुद को मांजता हुआ अपनी चमक से प्रभावित नहीं कर पाएगा तो वह प्रभावशाली राजभाषा कार्यान्यवन कर पाएगा इसमें संदेह है।