सत्य का तथ्य जब व्यक्ति की चेतना में आलोड़न लेने लगता है तब जिज्ञासा की स्वाभाविक उत्पत्ति होती है। जिज्ञासा का मूल उद्देश्य समाधान होता है। समाधान व्यक्ति स्वयं से भी प्राप्त करता है और गुरु से भी प्राप्त करता हूं। भौतिक जिज्ञासा का समाधान कमोबेश व्यक्ति कर लेता है पर आंतरिक जिज्ञासाएं बिना गुरु के समाधान प्राप्त कर लें यह संभव नहीं है। मनोभाव में यह जिज्ञासा बलवती हुई कि मैं भी अपने गुरु के बारे में अपने भाव व्यक्त करूँ। गुरु जब गूढतापुर्वक अपने शिष्य के अंतर्मन में उतर जाते हैं तब गुरु के अतिरिक्त भी आदरणीय उद्बोधन उभर आते हैं। मेरे गुरुजी प्रोफेसर रामचन्द्र पांडे जी हैं जो वर्तमान में वाराणासी में रहते हैं पर हैं मेरे गांव के अतएव इनके पिता स्वर्गीय बलदेव बाबा से भी बाल्यावस्था से परिचित हूँ। मेरी दादी गुरुजी के पिताजी से विभिन्न समाधान के लिए जब भी जाती थीं प्रायः मुझे साथ लेकर जाया करती थीं। प्रकांड विद्वान और सिद्ध पुरुष से भला किसे मिलना पसंद नहीं। इस प्रकार गुरुजी का घर हमारा गुरु घराना है।
आधुनिकता की तीव्र गति के जीवन में गुरु का पद व्यावसायिक होते जा रहा है। इस व्यावसायिक समय में योग्य गुरु का मिल पाना भी भाग्यजनित परिणाम है। क्या मेरे गुरुजी मुझे मेरे भाग्य से मिले हैं ? गुरु घराना है पीढियां जुड़ी हुई हैं फिर भाग्य कैसा ? यही से आरम्भ होता है चेतना का मार्ग और जिज्ञासा की गलियां जिसके आधार पर यह स्पष्ट होता है कि गुरुजी के संग मेरे संपर्क की गहनता भाग्यजनित है। मेरे वर्तमान अस्तित्व और व्यक्तित्व के रचयिता मेरे गुरु प्रोफेसर रामचंद्र पांडेय जी हैं तथा यह लिखते हुए मुझे गर्व की अनुभूति हो रही है।
युवावस्था में गुरुजी ने बड़ी बारीकी से मेरी कुंडली बनाई थी..............................गुरुजी के ही देखरेख में पूरा कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
गुरु अपने शिष्य की सुप्त प्रतिभाओं को यथोचित पोषण देकर पुष्पित और पल्लवित करते हैं तदुपरांत उचित दिशा को बतलाते हुए दिशानिर्देश भी देते हैं। जिनके जीवन में गुरु नहीं होते हैं उनका जीवन कबीर की इन पंक्तियों में उलझा रहता है:-
" चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय,
दो पाटन के बीच में, बाकी बचा न कोय।"
व्यक्ति के जीवन में "दो पाटन के बीच" वाली स्थितियां निर्मित होती हैं जिनसे कुशलतापूर्वक निकल पाने की क्षमता गुरु ज्ञान से ही संभव हो पाता है। मेरे जीवन में कुछ पल ऐसे भी आए जब सारे रास्ते बंद थे। असमंजस में किंकर्तव्यविमूढ़ गुरु जी के शरण में गया और उस राष्ट्रीय स्तर की चुनौती का प्रभावशाली समाधान प्राप्त हो गया। गुरुजी गांव घर के हैं इसलिए जब भी समय मिलता था गुरुजी के पास ही बैठा रहता था और विभिन्न विषयों पर हमारी चर्चाएं होती रहती थीं। सानिध्य की प्रगाढ़ता में कभी-कभी चाचा-भतीजा के रूप में भी संवाद हो जाता है।