सोमवार, 26 मार्च 2012

एक राजभाषा अधिकारी से मुलाक़ात

पटना में आयोजित क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन से लौट रहा था। पटना एयरपोर्ट पर समय से पहले पहुँच गया था इसलिए चेक इन काउंटर पर जाने से रोक दिया गया इसलिए खुद को करीब पड़े सोफ़े को सौंप कर परिवेश में भटकने लगा। इस दौरान सम्मेलन के कुछ अविस्मरणीय पल रह-रह कर कौंध रहे थे और परिचय में मिले नए चेहरे स्मृति में अपनी मुकम्मल जगह बनाने के लिए प्रयासरत थे। इन सबके बीच निगाह घड़ी की ओर भी दौड़ पड़ती थी कि कब समय हो और चेक इन कर तसल्ली पाएँ। इस क्रम के दौरान सोफ़े पर एक व्यक्ति को खुद को फिट करते हुये और मुझे संबोधित करते हुये पाया। मुझे ध्यान आया कि यह महाशय एक प्रमुख राष्ट्रीयकृत बैंक के प्रतिनिधि थे, राजभाषा अधिकारी थे। उन्होने कहा कि कब से दूर से वह मुझे अभिवादन कर रहे हैं किन्तु मेरी दृष्टि उन्हें पकड़ नहीं पायी। बातचीत के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि हम दोनों की फ्लाइट एक है जो समय से छूटेगी । यह सूचना मिलते ही हम दोनों चेक इन काउंटर पर गए। मित्र राजभाषा अधिकारी ने मेरा टिकट भी मुझसे ले लिया और सीट अगल-बगल की ले ली जिससे हमारी बातों का सिलसिला अटूट रहा।
वायु में यात्रा करते हुये जब मैं यत्र-तत्र-अन्यत्र की बातों को खूब समेट लिया तब प्रतीत हुआ कि अब  विषयांतर आवश्यक है लिहाजा मैंने भी अपनी तान छेड़ने को सोची। मैंने कहा मित्र आपको राजभाषा का पुरस्कार किस वर्ष में मिला है? मेरे इस सवाल को सुनकर उनके चेहरे पर ऐसी विद्युतीय मुस्कान दौड़ी कि मैं हतप्रभ रह गया और सोचने लगा कि राजभाषा के पुरस्कार के प्रश्न पर इस तरह गूढ मुस्कराने वाली बात क्या है? मैं प्रश्नवाचक दृष्टि से उन्हें देखने लगा। मेरे मित्र ने मुझसे कहा कि इन राजभाषा पुरस्कारों से होता क्या है। बस पल भर की खुशी होती है, चंद दिनों के चर्चे होते हैं और बात वहीं की वहीं रह जाती है। मैंने कहा बात वहीं की वहीं नहीं रहती बल्कि उसके चर्चे दूर-दूर तक होते हैं, किताबों और अभिलेख में पुरस्कार दर्ज़ हो जाता है, संस्था और संबन्धित राजभाषा अधिकारी की चर्चा होती है, छवि बनती है। उन्होने कहा कि इससे क्या होता है? क्या वेतनवृद्धि होती है? क्या पदोन्नति होती है? नहीं ना, तो क्यों इसके पीछे पड़ें और अधिक श्रम और भाग-दौड़ करें। यह बोलकर मुझे ऐसे देखने लगे जैसे मैं अत्यधिक अपरिपक्व और राजभाषा कि दुनिया से अर्धपरिचित व्यक्ति हूँ। मुझे व्यक्तित्व बेहद रोचक लगा।
यह विचार मुझे अत्यधिक कुरूप और दुखदाई लगा। एक वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी राजभाषा के पुरस्कारों को इतने हल्के अंदाज़ में ले रहा है जबकि इसी राजभाषा ने व्यक्ति को एक पहचान दी है। छुब्ध होकर मैं खिड़की से बाहर बादलों में खो गया। बादलों के बनाते-बिगड़ते दृश्य और सूर्य किरणों से निर्मित छटाओं और विभिन्न रंगप्रभाव ने मुझमें एक नयी ताज़गी और ऊर्जा का संचार कर दिया। मुझे लगा कि महाशय अपनी बात प्रश्न पर ही नहीं समाप्त करेंगे बल्कि उसके आगे भी कुछ बोलेंगे परंतु वह खामोश बैठे थे मानों मेरी प्रतिक्रिया कि प्रतीक्षा में हों। खामोशी को तोड़ते हुये मैंने कहा कि क्या आपको पुरस्कारों में विश्वास नहीं है? उन्होने कहा कि उन्हें इसका एहसास नहीं है। अपनी गर्दन के संग अपने कंधे को मोड़ते हुये वह पूरी प्रज्ञा के साथ मेरी ओर मुखातिब हो बोले आपको सौ बात की एक बात कहूँ। मैं उनके इस रहस्यपूर्ण वाक्य से मेरी उत्सुकता और बढ़ी और मैंने कहा बोलिए। उन्होने कहा कि यदि प्रगति और पदोन्नति बिना विशेष प्रयास और श्रम को चाहते हैं तो उत्तर राजभाषा के पुरस्कारों में नहीं है बल्कि इसका पूर्ण समाधान आपके तत्काल उच्चाधिकारी के पास है। पदोन्नति पुरस्कारों से नहीं होती बल्कि आपके तत्काल उच्चाधिकारी द्वारा आपको दिये गए अंकों पर होती है, इसलिए आपके तत्काल अधिकारी जो कहें बस उतना ही कीजिये और कैरियर का मज़ा लीजिये। उन्होने कहा कि वह राजभाषा के अतिरिक्त कार्यालय का अन्य कार्य भी करते हैं जो तत्काल उच्चाधिकारी द्वारा सौंपा जाता है। तत्काल उच्चाधिकारी कि प्रसन्नता किसी पुरस्कार से कम नहीं, यदि वह खुश हैं तो कोई गम नहीं। एक लक्ष्य और एक ध्यान, कैरियर के प्रश्नों का मिले समाधान। मेरी शिराओं में विद्युत दौड़ गयी। मेरे कान अब सुनने में अक्षम हो गए थे जबकि महाशय अनवरत बोले जा रहे थे। जहाज में हलचल होने लगी जहाज लैंड कर चुका था।
एयरपोर्ट पर पहुँचकर उन्होने गर्मजोशी से हांथ मिलाया और बाहर निकल गए चूंकि मुझे अगली फ्लाईट पकड़नी थी इसलिए मैं एयरपोर्ट पर ही रुक गया। अगली यात्रा आरंभ करने में काफी समय था, मैं मित्र राजभाषा अधिकारी की बातों में लिपटा एक कुर्सी पर बैठ गया और मन ही मन विश्लेषण आरंभ कर दिया। प्रेरणा और प्रोत्साहन के आधार पर चलनेवाले राजभाषा कार्यान्यवन को गति, दिशा और प्रगति प्रदान करने के लिए सामान्यतया राजभाषा अधिकारी की नियुक्ति होती है और यदि राजभाषा अधिकारी ही उदासीन हो जाये तो क्या होगा? क्या पुरस्कार केवल राजभाषा कार्यान्यवन के लिए है अथवा अन्य विभागों और कार्यों में भी है? पदोन्नति और प्रगति की चाह में यदि राजभाषा को हाशिये पर रखने की कोशिश स्वयं राजभाषा अधिकारी सोचेगा तो राजभाषा को गतिशील कौन बनाएगा? राजभाषा अधिकारी एक विशेषज्ञ अधिकारी होता है और यदि विशेषज्ञता में प्रतिबद्धता नहीं होती है तब ऐसी विशेषज्ञता की सार्थकता क्या है? राजभाषा को अपेक्षित गति प्राप्त न हो पाने के पीछे कहीं ऐसी सोचवाले राजभाषा अधिकारियों की तो भूमिका नहीं है? कितने राजभाषा अधिकारी हैं जो ऐसी सोच रखते हैं? क्या कभी राजभाषा अधिकारियों की सोच, संयोजन और संकल्पना की समीक्षा होती है? क्या राजभाषा का यह एक चिंतनीय और विचारणीय प्रश्न नहीं है? आखिर कौन सोचेगा ऐसे प्रश्नों पर? आखिर कौन करेगा स्थायी समाधान ऐसी सोच का?