गुरुवार, 29 जनवरी 2026

स्वयं में डुबोती पुस्तक

प्रायः पुस्तकें बोलती कम हैं और अपने पन्नों में घुमाती अधिक हैं इसीलिए किसी भी नई पुस्तक के गहन अवलोकन के बाद ही उसको पढ़ने की स्वाभाविक रुचि उत्पन्न होती है। यह भी प्रचलित वाक्य है कि प्रत्येक क्षेत्र में अपवाद होते हैं। मेरे वाराणासी प्रवास में मुझे प्रो. रामचंद्र पांडेय जी से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। इस अवसर पर मुझे प्राप्त हुई पुस्तक " प्राच्यविद्यापरिशीलन" जिसके पन्ने पलटते ही लगा कि एक विशिष्ट पुस्तक प्राप्त हुई है। इस पुस्तक के प्रथम 75 पृष्ठ संस्कृत में है तथा पृष्ठ संख्या 76 से 215 हिंदी में हैं जिनमें वेदों आदि के संस्कृत के श्लोक आदि लेख के समर्थन में दर्शाए गए हैं और पृष्ठ संख्या 216 से पृष्ठ संख्या 246 तक अंग्रेजी भाषा में लिखे लेख है तथा यह सब प्रो. रामचंद्र पांडेय के व्याख्यान और निबंध हैं।

इस पुस्तक के आरंभ के 75 पृष्ठ को समझ पाना मेरे लिए संभव नहीं था, भला संस्कृत को पढ़ पाना वर्तमान के अधिकांश शिक्षितों के लिए कहां संभव यद्यपि मेरे चेन्नई के एक मित्र धाराप्रवाह संस्कृत बोलते हैं और उनके अनुसार संस्कृत में वार्तालाप करनेवाले चेन्नई में अच्छी संख्या में हैं और उनकी संस्कृत में पूरी डूबी बैठकें भी होती रहती हैं। मुझे "प्राच्यविद्यापरिशीलन" के संस्कृत पृष्ठों को पलटते चेन्नई के मित्र की याद आई। इस पुस्तक के हिंदी पृष्ठों पर जाते ही प्रतीत हुआ कि प्राचीन विद्या अथाह है जिसमें मैं उतरते जा रहा हूँ और कहीं ओर-छोर दिखलाई नहीं पड़ रहा है। शायद इस पुस्तक के पाठक की भी यही मनोदशा होती होगी।

प्रो. रामचंद्र पांडेय के व्याख्यानों एवं निबंध का संकलन है "प्राच्यविद्यापरिशीलन" जिसकी संकलंकर्ती एवं सम्पादिका डॉ. मीनाक्षी मिश्रा हैं। इस पुस्तक की भूमिका में डर. मीनाक्षी मिश्रा लिखती हैं - " प्रसंगात यहां उल्लेख कर देना आवश्यक समझती हूँ कि इस संस्था के माध्यम से प्रवासी भारतीयों के लिए विशेष कर नवयुवकों के लिए प्रो. रामचंद्र पांडेय जी ने भारतीय विद्याओं से संबंधित वेदविज्ञान तथा संस्कृति से संबंधित अनेक सूचनाएं डिसप्ले बोर्ड पर लिखवाकर अमेरिका में न्यूयार्क स्थित दिव्यधाम मंदिर में अवलोकनार्थ लगवाया। इसी के साथ उक्त सूचनाओं को दिव्यधाम नामक लघु पुस्तिका में भी प्रकाशित कर सर्वजन सुलभ कर दिया। इसी प्रकार ट्रिनिडाड से ज्योतिष विद्या के अध्ययन के लिए आये अपने दो छात्रों के आग्रह पर ट्रिनिडाड और टुबैगो के अक्षांश पर भारतीय पंचांगों की तरह सम्पूर्ण पंचांग का निर्माण कर वहां के प्रवासी भारतीयों के धार्मिक कृत्यों के संपादन का मार्ग प्रशस्त किया।"

कुल।15 से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन कर प्रो. रामचंद्र पांडेय ने देश-विदेश के भारतीयों के लिए धार्मिक कर्मकांड और ज्योतिष विद्या पर न केवल प्रचुर जानकारियां प्रदान किये हैं बल्कि इन जानकारियों की गहनता का भी उल्लेख सीमित शब्दावली में किये हैं। आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियां और संभावित वैज्ञानिक शोध हलचलों का उल्लेख भारतीय प्राच्य विद्या में उपलब्ध है इन सबका प्रमाण भी पुस्तक को विशिष्ट और उल्लेखनीय बना देता है। इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया है। पुस्तक के प्रकाशक नैसर्गिक शोध संस्था, 38, मन्सनगर, वाराणसी हैं तथा मुद्रक रत्ना ऑफसेट लिमिटेड, कमच्छा, वाराणसी है। 

इस पुस्तक के संस्कृत और अंग्रेजी अनुक्रमणिका का यहां उल्लेख न करते हुए हिंदी अनुक्रमणिका का उल्लेख किया जा रहा है जो हैं - ज्योतिष की वेदांगता, काल की अवधारणा, वैदिक वांग्मय में विज्ञान के विविधपक्ष, पंचासिद्धान्तिका:एक सर्वेक्षण, ज्योतिष और भौगोलिक परिदृश्य-पौराणिक दृष्टि, वैदिक संस्कृति में गौ एवं गव्यों का महत्व, आर्यभट्ट, प्राच्यविद्या और पर्यावरण, ग्रहों का भूमंडल पर प्रभाव, संस्कृतवांगमय में कृषि विज्ञान, ज्योतिषशास्त्र में व्याधि-निरूपण, आधुनिक जीवन की समस्याओं के समाधान में योगचिकित्सा और ज्योतिष का योगदान, ज्योतिष में निहित योगशास्त्र, वास्तुशास्त्र का वैदिक एवं पौराणिक स्वरूप, स्वयं: कारण और निवारण, ज्योतिषशास्त्र की जीवन में उपयोगिता, शिक्षा में ज्योतिषशास्त्र की उपयोगिता।

सामान्यतया अछूते विषयों की एक अनूठी पुस्तक है जो न केवल प्राच्य विद्या की जानकारियां देती हैं अपितु यह पुस्तक सोचने और चिंतन करने की प्रेरणा भी देती है। समाज में धर्म और ज्योतिष विषय पर व्याप्त अनेक भ्रम को कुशलतापूर्वक स्पष्ट करती यह पुस्तक न केवल पठनीय है बल्कि संग्रहणीय भी है। जिज्ञासु यदि प्रो. रामचंद्र पांडेय जी से संपर्क करना चाहें तो नैसर्गिक शोध संस्था, 38, मानस नगर, दुर्गाकुंड, वाराणसी - 221005 से संपर्क कर सकते हैं।

धीरेन्द्र सिंह

30.01.2026


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