लेख (सर्वाधिकार सुरक्षित) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लेख (सर्वाधिकार सुरक्षित) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 29 जनवरी 2012

नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति बनाम पुरस्कार आबंटन समिति


नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति, हिन्दी के संक्षेपाक्षर नराकास की तुलना में अंग्रेजी के संक्षेपाक्षर टोंलिक के रूप में अधिक जानी जाती है। इस समिति की देख-रेख भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग, क्षेत्रीय कार्यान्यवन कार्यालय द्वारा की जाती है जिसके प्रभारी उप-निदेशक (कार्यान्यवन) होते हैं  । विभिन्न नगरों में चयनित एक कार्यालय को इस समिति के संयोजन का कार्यभार दिया जाता है जो वर्ष में दो बार इस समिति की बैठक आयोजित करता है। सदस्य कार्यालयों की तिमाही रिपोर्ट की समीक्षा और आवश्यक सुझाव (प्रमुखतया उप-निदेशक (कार्यान्यवन) द्वारा) के अपने प्रमुख कार्य के साथ-साथ यह समिति सम्पूर्ण वर्ष अपने सदस्य कार्यालयों के सहयोग से राजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन करती रहती है। विजेताओं को पुरस्कार भी देती है। समिति हिन्दी कार्यशाला और प्रशिक्षण का भी आयोजन करती है। इस प्रकार राजभाषा कार्यान्यवन में नगर राजभाषा कार्यान्यवन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

नराकास यहीं तक सीमित नहीं रहती है बल्कि सदस्य कार्यालयों से प्राप्त हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट के आधार पर प्रत्येक वर्ष कार्यालयों को पुरस्कृत भी करती है। नराकास द्वारा पुरस्कार प्रदान करना राजभाषा कार्यान्यवन का एक अभिन्न हिस्सा है। अधिकांश सदस्य कार्यालय नगर राजभाषा समिति को प्रमुखतया पुरस्कार समिति के रूप मैं पहचानते हैं। हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट को तैयार करते समय अधिकांश सदस्य कार्यालय के राजभाषा अधिकारी इस बात पर विशेष ध्यान देते हैं कि रिपोर्ट प्रथम पुरस्कार से लेकर प्रोत्साहन पुरस्कार तक उपलब्ध किसी एक पुरस्कार को अवश्य प्राप्त करे । पुरस्कार लालसा की यह ललक जाने-अनजाने में हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट के आंकड़ो में भी अनावश्यक छेड़-छाड़ कर जाती है जिससे रिपोर्ट आंकड़ों में यथार्थ से भिन्न नजर आती है।

नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति के प्रमुखतया भारत सरकार, गृह मंत्रालय, क्षेत्रीय कार्यान्यवन कार्यालय, राजभाषा विभाग के उप-निदेशक (कार्यान्यवन) और समिति के पदेन सदस्य-सचिव समिति की गतिविधियों से पूर्णतया और संपूर्णता से जुड़े होते हैं। समिति के पदेन अध्यक्ष और समिति के सदस्य विभिन्न कार्यपालक प्रमुखतया नीति आदि से संबन्धित मामलों से जुड़े होते हैं। सदस्य कार्यालयों के राजभाषा अधिकारी उप-निदेशक (कार्यान्यवन) और पदेन सदस्य-सचिव से संपर्क में रहते हैं और अनवरत राजभाषा की एक बेहतर छवि निर्मित करने के प्रयास में रहते हैं। आखिर मामला एक अदद पुरस्कार का है जिसकी प्रतीक्षा सभी सदस्यों को होती है। नराकास का पुरस्कार राजभाषा के पुरस्कारों का वह पायदान है जिसे प्राप्त कर कार्यालय सफलतापूर्वक अपनी विशेष पहचान बनाने में कामयाब होता है। यह कामयाबी आगे अन्य पुरस्कारों और सम्मान को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सघन प्रयासों से उपलब्धियों का गगन छूने का प्रथम द्वार नराकास का पुरस्कार है।

हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट के बल पर गतिमान राजभाषा पुरस्कार की होड में सभी राजभाषा अधिकारी होते हैं यह सच नहीं है। नराकास में भी प्रमुखतया दो प्रकार के सदस्य कार्यालय होते हैं। प्रथम कार्यालय वह कार्यालय है जो हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट भरते समय आंकड़ों की सत्यता की पूरी जांच करता है फिर रिपोर्ट में आंकड़े दर्ज़ करता है। इस प्रकार के कार्यालय पुरस्कार को एक अंधी दौड़ मानते हैं जिसमें हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट की गरिमा प्रभावित होती है। ऐसे कार्यालय राजभाषा कार्यान्यवन को राजभाषा के पुरस्कारों से जोड़कर नहीं देखते हैं बल्कि उसकी प्रगति कार्यालय के प्रत्येक टेबल और फ़ाइल में देखना ज्यादा पसंद करते हैं। इसके अतिरिक्त इन्हें यह अच्छा भी नहीं लगता कि राजभाषा निरीक्षण के दौरान निरीक्षण अधिकारी आंकड़ों के सत्यता की पुष्टि मांगे और पुष्टि से संबन्धित कागजात ना हो। राजभाषा का सही और उचित ढंग से कार्यान्यवन इस प्रकार के कार्यालय ही करते हैं, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

दूसरे प्रकार के सदस्य कार्यालय जीत को ही पहचान मानते हैं। ऐसे कार्यालयों में कार्यरत राजभाषा अधिकारी स्वयं को और अपने कार्यालय को हमेशा सुर्खियों में रखना पसंद करते हैं। दूसरे सदस्य कार्यालय उनसे आगे ना निकल जाएँ इसकी इन्हें हमेशा चिंता रहती है परिणामस्वरूप हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट के आंकड़े  दूब के समान बढ़ते रहते हैं। राजभाषा के कामकाज को प्रोत्साहित करने के लिए आरंभ किया गया पुरस्कार अब एक नशा बनता जा रहा है जो राजभाषा के लिए एक प्रतिकूल स्थिति है। पुरस्कार प्राप्ति के लिए आंकड़ों की सत्यता को कसौटी पर ना परखा जाना राजभाषा की भावी नीतियों में बाधक साबित होंगी। यद्यपि वार्षिक कार्यक्रम 2011-2012 में राजभाषा के विभिन्न लक्ष्यों को एक निर्धारित प्रतिशत ना देकर एक रेंज दिया गया है किन्तु पुरस्कार का निर्धारण करते हुये इन तथ्यों का पूर्ण अनुपालन बहुत कम किया जाता है। इस दिशा में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे नगर राजभाषा कार्यान्यवन को मात्र पुरस्कार आबंटन समिति के रूप में पहचान निर्मित होने की प्रक्रिया को रोका जा सके।

क्षेत्रीय कार्यान्यवन कार्यालय यद्यपि निरीक्षण आदि के माध्यम से हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट में दर्शाये गए आंकड़ों की सत्यता की जांच करते रहता है फिर भी दर्शाये गए आंकड़ों को कभी किसी क्षेत्रीय कार्यालय ने चुनौती दी हो ऐसी स्थिति की जानकारी नहीं है। इससे हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट में मनचाहे आंकड़ों को भरने की सुविधा मिलती है। एक ही नगर में कुछ कार्यालय लक्ष्य से नीचे होते हैं जबकि कुछ लक्ष्य से काफी आगे होते हैं। समिति की बैठकों में इस विषमता पर व्यापक चर्चा कर उचित दिशानिर्देश देना चाहिए। यह कह कर मामले को रफा-दफा केर देना कि तिमाही रेप्र्त पर हस्ताक्षर प्राधिकारी का है अतएव जिन आंकड़ों को संबन्धित कार्यालय का प्राधिकारी एवं राजभाषा कार्यान्यवन समिति का अध्यक्ष हस्ताक्षर केर पुष्टि करता है उन आंकड़ों कि सत्यता कि जांच करना उचित प्रतीत नहीं होता है, ऐसी सोच को बदलने कि आवश्यकता है। नराकास को और प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता है।  

   

  

Subscribe to राजभाषा/Rajbhasha

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

सरल हिन्दी – एक एफर्ट

गवरमेंट ऑफिसों में आफिसियल लंगवेज़ के लिए जो एफर्ट किए जा रहे हैं वह एक्सपेक्टेड रिज़ल्ट नहीं दे रहे हैं। मिनिस्टरी ऑफ होम अफेयर्स, राजभाषा विभाग की सचिव महोदया ने भी अपने लेटर में यह बखूबी बतलाया है कि सरल हिन्दी अब प्रयोग की जानी चाहिए। सरकारी आफ़िसों में लंबे समय से हिन्दी के डिफिकल्ट शब्दों को लेकर चर्चा चल रही थी किन्तु इसका कोई आसान रास्ता नहीं मिल रहा था। विभिन्न मंत्रालयों ने अपने-अपने ग्लासरी भी तैयार कर लिए हैं और उनके हिन्दी डॉक्युमेंट्स में हिन्दी के डिफिकल्ट शब्दों का भी खूब प्रयोग किया गया है। इन हिन्दी डॉक्युमेंट्स को पूरा पढ़ पाना ईज़ी नहीं है। इनको पढ़ते समय एक फ्लो भी नहीं रहता है और प्रनाउन्स करना मतलब लोहे के चने चबाने जैसा है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग दिनांक 26 सितंबर, 2011 के पत्र संख्या 1/14011/02/2011-रा.भा.( नीति -1) में सरकारी कामकाज में सरल और सहज हिन्दी के प्रयोग के लिए  नीति-निर्देश एक्चुअली आफिसियल लैंगवेज़ इंप्लीमेंटेसन का एक हिस्टोरिकल निर्णय है। इस नीति निर्देश के कंपलायन्स के लिए सभी सरकारी आफ़िसों में गोष्ठियाँ, सेमिनार, वर्कशॉप वगैरह शुरू करना चाहिए।
सरकारी कामकाज की भाषा के इस नए अंदाज़ को एक्सैप्ट करने में कुछ सवाल ज़रूर खड़े होंगे जैसे;  लेकिन क्या सरल हिन्दी के इस नीति-निर्देश को सरलतापूर्वक इम्प्लीमेंट किया जा सकता है? पिछले 30 वर्षों से राजभाषा के जिन शब्दों का विन्यास हुआ है और जो राजभाषा के रूप में मान्य होने लगे हैं उन्हें छोड़कर रोमन शब्दों का उपयोग करना आसान कार्य है ? राजभाषा अधिनियम 351 तो खुद अन्य भारतीय भाषाओं की हिमायती है और यह नीति-निर्देश है इस अधिनियम का एक विस्तृत और सरलीकृत रूप नज़र आता है। प्रौद्योगिकी भाषा और शब्दों की तथाकथित दुर्गम प्रतीत होनेवाले रास्तों को सहज और सरल बना दिया है। टाइप करने के नए और बेहतर विकल्प, समान्य अनुवाद की उपलब्ध सुविधाएं, उच्चारण के लिए आडियो प्रशिक्षण की उपलब्धताएँ विश्व की अनेकों उन्नत भाषाओं को सिखला रही हैं, हिन्दी भी उनमें से एक भाषा है। हिन्दी अपने संग संस्कृत, उर्दू को प्रमुखतया लेकर चल रही है जिसमें अन्य भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के शब्द भी प्रयोग हो रहे हैं। हिन्दी भाषा की आधुनिक शैली में देवनागरी में अंग्रेजी मिश्रित शब्दों का स्वतंत्र प्रयोग का नीति-निर्देश कोई नयी बात नहीं है। ग भाषिक क्षेत्रों में यह प्रयोग पिछले कई वर्षों से लागू करने के प्रयास विभिन्न कार्यालयों के राजभाषा विभाग द्वारा किया जा रहा है। जिस स्वतंत्रतापूर्वक इस शैली के प्रयोग की उम्मीद की जा रही थी उसमें उतनी सफलता अभी भी नहीं मिली है।

हिन्दी भाषा की यह आधुनिक शैली किसके लिए है। क्या क क्षेत्र के लिए है? क क्षेत्र को इसको एक्सैप्ट करने में प्रोब्लेम हो सकती है। ख भी शायद इसे आसानी से अपना न पाये। रही ग क्षेत्र की बात तो यदि ग क्षेत्र देवनागरी लिपि में लिखना या टाइप करना शुरू कर दे तो यह राजभाषा का एक ग्रेट आचीवमेंट होगा। शायद हिन्दी भाषा की आधुनिक शैली को राजभाषा की आधुनिक शैली नाम दिया जाये तो प्रभाव और ज्यादा होगा। विशेषकर ग क्षेत्र में देवनागरी में लिखने का हेजिटेसन है। क और ख क्षेत्र की भाषाएँ हिन्दी के शब्दों को अपनाने के लिए विशेष प्रयास नहीं करती हैं। हिन्दी शब्द उनकी भाषा में घुल जाता है इसलिए इन क्षेत्रों में इस आधुनिक शैली का प्रयोग व्यापकतापूर्वक हो पाएगा इसमें संदेश है। शायद फिलहाल क और ख क्षेत्र को इसको अपनाने में कठिनाई हो। हाँ ग क्षेत्र यदि इस आधुनिक राजभाषा के बल पर देवनागरी की डगर पर निकाल पड़े तो यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि होगी।
मैंने यह भी पाया कि कुछ लोग इस पत्र का विरोध भी कर रहे हैं। मैंने भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर इन तथाकथित विरोधियों के तरफ बढ़ाने का प्रयास किया परंतु सफल नहीं हो सका। क्या लिखा है नया इस पत्र में कि उसका विरोध किया जाये। कहाँ पर राजभाषा के लिए यह प्रॉबलम खड़ी कर रही है। कहीं तो नहीं, कुछ भी तो नहीं बस पुरानी बातों को अत्यधिक स्पष्ट और सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान में यह सरल हिन्दी का नीति निर्देश शायद कुछ लोगों के गले नहीं उतरे परंतु कालांतर में यह विरोध स्वतः संतुष्ट हो शांत हो जाएगा, ऐसी मेरी धारणा है। यह पत्र अक्चूयली एक फ़्यूचरिस्टिक विज़न का कमाल है। आफ़िस में अब एक जनरेसन रिटायर हो रहा है और न्यू जनरेसन की एंट्री हो रही है। क्या नया लुक मिल रहा है आफ़िसों को भई वाह ! हर तरफ यंग फ़ेस और यंग माइंड बिलकुल फ्रेश स्टाफ । यह स्टाफ फ़ेसबुक और ट्विटर के सहारे चलनेवाला है जहां अपनी बात शॉर्ट कट में और आसान वर्ड्स के साथ कहनी होती है। जब यह यंग स्टाफ ड्राफ्टिंग करने बैठेगा तो भाषा की शुद्धता के झमेले में नहीं उलझना चाहेगा बल्कि कम्प्युटर से अपने कम्यूनिकेशन को स्पीड देगा और एक्सपेक्टेड रिज़ल्ट लाकर बिज़नस को आगे बढ़ाएगा। ऐसे सिचुएशन में यह नयी नीति इफेक्टिव होगी।
यूं भी देखा जाये तो राजभाषा अब तक अपना कोई एक मुकम्मल तस्वीर नहीं बना पायी है। तमाम कोशिशें जाया होती जा रही हैं लेकिन जिस बुलंदी भरे हौसले को लेकर राजभाषा चल रही है उसको टेबलों  पर, कागजों में तब्दील होते हुये कहाँ देख पा रहे हैं। अगर कहीं कुछ कामयाबी का परचम दिख भी जाता है तो फौरीया यह महसूस होने लगता है कि हो ना हो इसमें जुड़े आफ़िस के राजभाषा विभाग की मदद हो। राजभाषा किस तरह की होनी चाहिए, कैसे लिखी जानी चाहिए, इसका मिजाज कैसा होना चाहिए इसकी मिसाल तो कहीं मिलती नहीं है अलबत्ता शोर बहुत है जहां पर राजभाषा की डफलियाँ बज रहीं हैं और दूसरी ओर सन्नाटा है जहां आफ़िस का राजभाषा विभाग तिमाही रिपोर्ट भेजकर आराम फरमा रहा है। ऐसे वक़्त में सचिव महोदया द्वारा साफ-साफ लफ्जों में सरल हिन्दी की ओर चलने का जो ईशारा किया गया है शायद यही राजभाषा का असली चेहरा हो। बहरहाल इस पर और भी बातें होनी चाहिए ताकि जिसे जो कहना हो बोलकर तसल्ली कर ले यूं भी जुबानें कब कहाँ किसी के पकड़ में आई हैं जो आवाम चाहेगी वैसी ही राजभाषा, हिंदी के तख्त पर बैठेगी। सचिव महोदया का यह नीतिपरक पत्र वक़्त के नब्ज़ की पकड़ है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा को एक नयी दिशा देने में प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका है और प्रौद्योगिकी एक आम पढे-लिखे की जुबान है तब ऐसे में देश से विदेश तक यदि राजभाषा को यात्रा करनी है तो भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त विदेशी भाषाओं को अपनाना ही पड़ेगा। हमें भाषाओं के बदलते रूप-रंग, चाल-चलन को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए वरना भाषा हमें छोड़ आगे निकाल जाएगी और यह हालात ना हो जाये कि बियाबान में हम खुद को कहीं अकेले ना पाएँ।               
     

Subscribe to राजभाषा/Rajbhasha

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

आस्ट्रेलिया की हिंदी में वेबसाइट- राष्ट्रभाषा का पक्ष, प्रयोजन और पहचान

आस्ट्रेलिया ने भारतीय विद्यार्थियों के अभिभावकों की विशेष सुविधा के लिए हिंदी में वेबसाइट का निर्माण कर हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय विकास को एक नयी ऊँचाई प्रदान किया है. यह केवल एक समाचार मात्र नहीं है बल्कि यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि भी है. ‘स्टडी मेलबर्न विक्टोरिया आस्ट्रेलिया’ नाम से यह वेबसाइट सरल हिंदी में वह सभी आवश्यक जानकारियाँ प्रदान कर रही हैं जिसकी आवश्यकता वहां अध्ययन करने जानेवाले प्रत्येक विद्यार्थी को हो सकती है. वेबसाइट में दिए गए लिंक्स अंग्रेजी में हैं किन्तु हाइपर लिंक को हिंदी में अनूदित कर लिखा गया है. यह वेबसाइट अपने आप में एक विशिष्ट वेबसाइट है जिसमें अंग्रेजी का उपयोग ना के बराबर किया गया है.

यहं एक सहज प्रश्न उठना आवश्यक है कि आखिर आस्ट्रेलिया को हिंदी में वेबसाइट बनाने कि क्या जरुरत आ पड़ी. अंग्रेजी में वेबसाइट बनाने से भी तो काम चल सकता था. वर्ष 2010 में 46,000 विद्यार्थियों ने अध्ययन के लिए अपना नामांकन कराया था. इस पोर्टल पर कुछ प्रतिक्रियाएं द टाइम्स ऑफ इंडिया से प्राप्त हुआ जो हिंदी के प्रति मानसिकता का परिचायक है : -

1. भारत में कितने लोग हिंदी पढ़ते और लिखते हैं, यह निरर्थक है ...
2. आस्ट्रेलिया के प्रथम श्रेणी के विश्वविद्यालय तीसरी दुनिया के देश के साथ यह गठबंधन क्यों चाहते हैं ? भारत को अब जाग जाना चाहिए ...यह कड़वा सत्य है कि आप सस्ते श्रमिकों का स्त्रोत हो.
3 . नयी सरकार द्वारा ब्रांड प्रबंधन की एक अच्छी पहल.  
4. अधिकाँश भारतीय अंग्रेजी नहीं बोलते हैं जबकि 1.2 अरब जनसंख्या में से 350 मिलियन अंग्रेजी बोलनेवाले हैं.
5. इसकी कोई आवश्यकता नहीं.
6. यह एक जनसंपर्क प्रयास है. आस्ट्रेलिया में अध्ययन की योजना बनानेवाले विद्यार्थी को एक हिंदी वेबसाइट की क्यों आवश्यकता होगी.
7. विशेषतया हिंदी- 99% भारतीय बॉलीवुड फिल्में देखते हैं लेकिन जब राष्ट्रभाषा की बात आती है तब वह अपने राज्यभाषा को महत्व देते हैं. क्यों भारत की अपनी कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं है?
8. विदेश में अध्ययनरत विद्यार्थी अपने अभिभावक को कुछ भी कहेंगे. अभिभावक हिंदी वेबसाइट पढकर स्वंय लागत आदि की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. सरकार का यह सराहनीय कदम है.
9. आस्ट्रेलिया सरकार से यह पूछना चाहिए कि वह हिंदी और भारतीय को ही क्यों लक्ष्य बना रही है  मंदारिन और चीनी को क्यों नहीं?
उक्त सूचना और उसपर प्राप्त प्रतिक्रियाएं अन्य बातों के साथ-साथ यह अवश्य दर्शाती हैं कि भाषा के प्रति एक नयी सोच की आवश्यकता है. इस विषय पर अब कुछ लिखने के लिए शेष ही नहीं रह गया है क्योंकि उक्त प्रतिक्रियाएं राष्ट्रभाषा का पक्ष, प्रयोजन और पहचान को बखूबी बयान कर रही हैं. विश्वमंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए भाषा की भी एक अहम भूमिका होती है. आज आस्ट्रेलिया ने हिंदी पोर्टल का आरम्भ किया है कल कोई दूसरा देश होगा, फिर तीसरा...और इस तरह हिंदी पोर्टल में वृद्धि होगी तब भी यदि ऐसी ही प्रतिक्रियाएं मिलती रहीं तो वह एक कठिन परिस्थिति होगी.     


Subscribe to राजभाषा/Rajbhasha

रविवार, 3 अप्रैल 2011

वार्षिक कार्यक्रम 2011-12, नयी नज़र-नयी डगर

राजभाषा से जुड़े प्रत्येक के मन में अप्रैल के प्रथम माह में राजभाषा विभाग के वार्षिक कार्यक्रम को जानने की उत्सुकता होती है इसलिए राजभाषा विभाग के पोर्टल पर जाना अनिवार्य हो जाता है. इसी क्रम में मैं जब राजभाषा विभाग के पोर्टल पर गया तो उसका नया रूप और अंदाज़ देखकर तो मैं कुछ देर तक मोहित, ठगा सा अपनी आँखें गडाये रहा और जी भर कर पोर्टल के नए रूप की प्रसंशा की. सब कुछ बेहद स्पष्ट और साफ़-सुथरा था इसलिए अत्यधिक सरल लग रहा था जिसे बाद में मैंने वाकई बेहद आसान पाया. इस नए पोर्टल की टीम को प्रत्येक व्यक्ति मेरी तरह ही धन्यवाद देगा और भूरि-भूरि प्रसंशा करेगा.


वार्षिक कार्यक्रम 2011-2012 पर क्लिक करते ही प्रथम वाक्य ने मेरा ध्यानाकर्षण किया – “संघ का राजकीय कार्य हिंदी में करने के लिए वार्षिक कार्यक्रम”. इस वाक्य ने पहली बार अपनी उपस्थिति को प्रखर रूप में दर्शाया है अन्यथा कई पाठक इस वाक्य से जुड ही नहीं पाते थे. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के प्रांतीय बोलियों पर विचार आरम्भ में ही राजभाषा निति के उद्देश्य को बखूबी दर्शाते हुए मिला जो प्रेरणापूर्ण और दिशानिर्देशक है. विभाग का दूरभाष और ई-मेल इतनी सहजता से उपलब्ध है कि अब विभाग से संपर्क करनेवालों कि संख्या में काफी वृद्धि होगी.


सचिव वीणा उपाध्याय जी के प्रस्तावना को चाहे कितनी ही गंभीरता से क्यों न पढ़ा जाए पढ़नेवाला बगैर दूसरी बार पढ़े प्रस्तावना को पूरी तरह समझ ही नहीं सकता है. बड़े फॉण्ट में प्रस्तावना प्रथम दृष्टि से ही अपने बड़े इरादे का परिचय दे देता है. प्रस्तावना के 1.1 का यह वाक्य राजभाषा कार्यान्वयन की दृष्टि से राजभाषा विभाग के नयी नज़र की ओर स्पष्ट इशारा करता है – “...केन्द्र सरकार के कार्यालयों / उपक्रमों /बैंकों में से प्रथम 20 सर्वोत्तम कार्य – निष्पादकों के वार्षिक औसत और उनके लिए निर्धारित किये गए महत्वाकंक्षी लक्ष्यों के बीच भारी अंतर है.” एक नयी चुनौती तथा राजभाषा कार्यान्वयन के लिए पारदर्शिता का सन्देश देता प्रस्तावना कठिन श्रम और पारदर्शी कार्यनिष्पादन रिपोर्टिंग का दिशानिर्देश दे रहा है जिससे राजभाषा जगत में एक नयी कार्यान्वयन चेतना का संचार हो रहा है. प्रस्तावना के मद संख्या 2 में सचिव महोदया ने “तर्कसंगतता” और “धरातलीय यथार्थ” के दो प्रमुख आधार पर वार्षिक कार्यक्रम 2011-2012 का जो दिशानिर्देश दिया है वह राजभाषा जगत की वर्षों की मांग थी बस आवश्यकता थी एक सक्षम स्तर से उसके पुकार की जिसे पूरा किया गया है. अनेकों नए दिशानिर्देशों में यह कुछ दिशानिर्देश अत्याधुनिक तेवर के लगे इसलिए उल्लेख करना पड़ा.


राजभाषा निति से सम्बंधित महत्वपूर्ण निर्देश के अंतर्गत राजभाषा अधिनियम. 1963, राजभाषा नियम, 1976 राजभाषा संकल्प और राष्ट्रपति जी के आदेश को एक नज़र में पढ़ा जा सकता है जिससे वार्षिक कार्यक्रम को तथा राजभाषा कार्यान्वयन को सहजता से समझा जा सकता है. यह राजभाषा से इतर लोगों के लिए एक विशेष सुविधा है. यूनिकोड पर विस्तृत जानकारी से काफी लाभ मिलेगा और राजभाषा कार्यान्यवन में काफी सुविधा होगी अन्यथा कंप्यूटर में हिंदी नहीं दिखती है की शिकायत से राजभाषा में कंप्यूटर पर कार्य करने में लोगों को असुविधा होती थी और यूनिकोड की पूरी जानकारी भी नहीं रहती थी. प्रस्तावना अत्यधिक जानकारीपूर्ण और प्रभावशाली है.


वार्षिक कार्यक्रम में एक क्रन्तिकारी कदम है पत्राचार के लक्ष्यों में एक व्यापकता प्रदान करने की. इससे हिंदी की तिमाही रिपोर्ट में एक व्यापक परिवर्तन आएगा तथा राजभाषा के विभिन्न पुरस्कारों के लिए आंकड़ों की तेज रफ़्तार नियंत्रित होगी. क क्षेत्र में 75-100 प्रतिशत ख क्षेत्र में 75-90 प्रतिशत का लक्ष्य गंगा के विशाल पाटों की तरह विस्तृत है जिसमें राजभाषा कार्यान्वयन की नैया सही गति-दिशा और नियंत्रण में चल सकेगी. आंकड़ों की तूफानी गति को नियंत्रित करने का यह नायाब तरीका राजभाषा कार्यान्वयन के लिए एक विशेष उपहार जैसा है.


लगभग 14 वर्ष पूर्व राजभाषा विभाग के तत्कालीन उप-सचिव श्री देवस्वरूप जी की अध्यक्षता में तथा गाज़ियाबाद क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालय के तत्कालीन उप-निदेशक श्री वेदप्रकाश गौड़ जी के सहयोग से “राजभाषा कार्यान्वयन-एक नयी नज़र-एक नयी डगर” पर मैंने विभिन्न कार्यालयों की सहभागिता से संगोष्ठी आयोजित किया था जिसका उद्देश्य इस वार्षिक कार्यक्रम से पूरा होता नज़र आ रहा है. इस महान कार्य से जुड़े सभी विद्वानों के श्रम, लगन और समर्पण का मैं अभिवादन करता हूँ.     





Subscribe to राजभाषा/Rajbhasha