सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

राजभाषा कार्यान्यवन – विस्तार की तलाश में


खिंची प्रत्यंचा पर धनुष की टंकार हमेशा अर्जुन ही उत्पन्न नहीं कर सकते बल्कि अनेकों एकलव्य में भी क्षमता है लेकिन ना जाने क्यों राजभाषा हमेशा अर्जुन को ही महत्व देती है एकलव्य अधिकांश मामलों में छूट जाते हैं। यह वाक्य पढ़ते ही मस्तिष्क में तत्काल यह प्रश्न उठ जाता है कि राजभाषा से अर्जुन और एकलव्य का कैसा नाता? राजभाषा के परिप्रेक्ष्य में अर्जुन अर्थात किसी ना किसी रूप में प्रशासन का प्रिय व्यक्ति जिसे सत्ता हमेशा अग्रणी रखती है। एकलव्य से तात्पर्य यह है कि राजभाषा के ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्ति जो मनोयोग से राजभाषा कार्यान्यवन करते हैं और उसमें मौलिकता का पुट डालते हुये राजभाषा कार्यान्यवन को हमेशा आकर्षक और तरोताजा बनाए रखते हैं। आधुनिक समय में अर्जुन प्रशासन के अनुदेशों के अनुरूप कार्य करता है जबकि एकलव्य प्रशासन के अनुदेशों को और बेहतर बनाने के लिए यदा-कदा अपनी राय प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत करता है। सामान्य शब्द में आधुनिक युग में राजभाषा के अर्जुन प्रायः वही बात करते हैं, अक्सर वही कार्य करते हैं जो प्रशासन कहता है जबकि राजभाषा के एकलव्य प्रशासन के निर्णयों, अनुदेशों में आवश्यकतानुसार अपनी राय-बात भी बेहिचक रखते हैं।

यदि केंद्रीय कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों के राजभाषा कार्यान्यवन का विश्लेषण किया जाय तो यह तथ्य उभरता है कि कार्यालय विशेष राजभाषा कार्यान्यवन की अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखा खींच चुके हैं और वर्षों से उस रेखा के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं। राजभाषा की सदा कार्यालयों के सभी कर्मचारियों तक भी पूरी तरह नहीं पहुँच पायी है। उदाहरण के तौर पर राजभाषा की तिमाही रिपोर्ट की मद संख्या एक में राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 3(3) का उल्लेख है जिसके तहत कौन-कौन से कागजात आते हैं उसका भी वर्णन है किन्तु इसके बावजूद भी रिपोर्ट को भरते समय कुछ प्रतिशत कार्यालय गलतियाँ करते हैं। इस प्रकार राजभाषा रिपोर्ट की कई और मदें हैं जिसकी रिपोर्टिंग पूर्णतया सही नहीं की जा रही है। इनमें सुधार लाने के लिए कर्मचारियों को प्रदान किए जानेवाले दिशानिर्देश, प्रक्रिया में आवश्यक परिवर्तन लाना समय की मांग है। यह परिवर्तन तिमाही रिपोर्ट की समीक्षा के अतिरिक्त राजभाषा कार्यशाला, राजभाषा निरीक्षण के दौरान भी किया जाय तो बेहतर परिणाम मिलने की संभावनाएँ प्रबल रहती हैं।

राजभाषा कार्यान्यवन में नयेपन के नाम पर यूनिकोड है जिसकी सीमाएं केवल कम्पुटर में यूनिकोड की उपलब्धता तक सीमित हैं। यूनिकोड प्रौद्योगिकी का एक शस्त्र है जिसका उपयोग राजभाषा की विभिन्न छटाओं को प्रभावशाली ढंग से कर्मचारियों तक पहुंचाना है। कर्मचारी ही क्यों स्वयं राजभाषा अधिकारियों को भी प्रौद्योगिकी के अपने ज्ञान को एक नयी पहचान और नया आसमान देने का प्रयास करना चाहिए। इसके अलावा कर्मचारियों के प्रौद्योगिकी ज्ञान को यूनिकोड के माध्यम से राजभाषा में ढालने का सघन प्रयास तो राजभाषा अधिकारियों की सेवा का एक अंग है। अब तो राजभाषा की प्रत्येक प्रस्तुति में प्रौद्योगिकी का उपयोग किए जाने का वक़्त है। कागज और चार्ट से पावर प्वाइंट कहीं अधिक आकर्षक, स्पष्ट और प्रभावशाली है। इस यूनिकोड को भी सभी सरकारी कार्यालयों ने पूरी तरह लागू नहीं किया है और कहीं तो यूनिकोड का प्रवेश ही नहीं हो पाया है। एक कार्यालय का तो कहना है कि उनके द्वारा अपनाए जा रहे सॉफ्टवेयर की कर्मियों को आदत पद चुकी है इसलिए वह कार्यालय पुराने ढर्रे पर चल रहा है। यह भी सुनने को मिलता है कि नया सॉफ्टवेयर नहीं खरीदा जा सकता इसलिए यूनिकोड लागू नहीं किया जा सकता है। यूनोकोड को एक सॉफ्टवेयर समझने की भूल राजभाषा कार्यान्यवन के लिए घातक है।

एक नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति में विभिन्न सदस्य कार्यालयों की रिपोर्टों को मदवार अंक प्रदान किया जा रहा था। समिति के एक सदस्य ने कहा कि सभी कार्यालयों ने हिन्दी सप्ताह, पखवाड़ा, माह मनाया इसलिए सभी रिपोर्टों की इस मद में सबको एकसमान अंक दिया जाये, आश्चर्य कि समिति ने इसे मान लिया। समिति के सदस्यों में से किसी भी सदस्य ने आपत्ति नहीं की, इस प्रकार अधिक श्रम कर नयी सोच और नए कलेवर सहित कार्यक्रम करनेवाला और परंपरागत पत्र लेखन, निबंध लेखन, सुलेख प्रतियोगिता करनेवाला एक ही तराजू में तौले गए। एक नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति की बैठक में हासी कवि सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय उप=समिति में लिया गया। हास्य कवियों को बाहर से बुलाने का भी निर्णय लिया गया। दूसरे दिन यह कह कर कि हास्य कवि कविता की जगह चुट्कुले सुनाते हैं लिए गए निर्णय को रद्द कर दिया गया और कहा गया कि ऐसे कई निर्णय बदले जाते हैं। ऐसी सोच वालों को यह समझा पाना मुश्किल है कि राजभाषा कार्यान्यवन को गतिशील बनाने के लिए ऐसे आयोजन सहायक होते हैं और राजभाषा में यदि साहित्य का छौंक लगाने का प्रयास किया जाएगा तो प्रतिकूल परिणाम की संभावना पनपने का भय रहता है। यह आयोजन स्थानीय कवियों तक सिमट गया जिसके वही श्रोता थे जो कवि के रूप में शामिल हुये थे। नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति में समूह के रूप में रहकर भी एक नयी उड़ान, एक नया प्रयोग ना कर पाना एक विचित्र स्थिति ही कही जाएगी।

विभिन्न सरकारी कार्यालयों का राजभाषा विभाग भी अपनी शिष्टता, शालीनता के संग अपने स्थान पर सुदूर दिये की लौ की तरह टिमटिमाता रहता है। जिन कार्यालयों में राजभाषा विभाग जम गया है वहाँ सुदूर दिये की लौ नहीं मिलती बल्कि राजभाषा के प्रकाश पुंज की मशाल आलोकित रहती है। यह प्रकाश पुंज राजभाषा कार्यान्यवन के प्रभावशाली विस्तार से ही उपलब्ध होता है। ऐसे कई कार्यालय हैं जिन्हें राजभाषा के शीर्ष पुरस्कार लगभग प्रत्येक वर्ष प्राप्त होता है और ऐसे भी कार्यालय हैं जिन्हें पिछले दस वर्षों में एक भी राजभाषा पुरस्कार नहीं मिल सका है। पुरस्कार विजेता कार्यालय भी कार्यरत है और पुरस्कार ना जीत पानेवाला कार्यालय भी कार्य किए जा रहा है। राजभाषा कार्यान्यवन की संवेदनशीलता को समझ पाने और समझा पाने की बात है। खुद में सिमट कर अपनी कार्यालयीन उपलब्धियों की सलवटों को देख कर ल्हुश होना और जो मिल न सका उसमें पक्षपात आदि का दोष देना और कुछ नहीं एक कमजोरी की निशानी है। राजभाषा कार्यान्यवन को एक विस्तार चाहिए, एक ऐसा विस्तार जिस विस्तार में विभिन्न कार्यालय अपनी अन्य उपलब्धियों को दर्शाते हैं। राजभाषा कार्यान्यवन को एक आसमान चाइए, एक ऐसा आसमान जिसमें कार्यालय के अन्य विभाग अपना आकाशदीप जगमगाते हैं।

राजभाषा कार्यान्यवन में अर्जुन और एकलव्य की दूरियाँ घटाने का सार्थक प्रयास होना चाहिए। उन्मुक्त और पूर्वाग्रह रहित भाव से मिल-जुलकर राजभाषा कार्यान्यवन को गतिशील रखना चाहिए। नए प्रयोग करने चाहिए। कल्पनाओं की डोर में कार्यान्यवन का आकाशदीप उड़ना चाहिए। कर्मचारियों राजभाषा नीति और वार्षिक कार्यक्रम एक राग और धुन के रूप में प्रस्तुत की जानी चाहिए। इस प्रकार राजभाषा कार्यान्यवन की प्रगति होनी चाहिए जो कि ना तो कठिन है और ना ही काल्पनिक सोच है बस एक कार्य करते रहना चाहिए। वह कार्य है कि कभी अर्जुन को एकलव्य बना देना चाहिए और कभी एकलव्य को अर्जुन के रूप में कार्य करने का अवसर देना चाहिए।   



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सोमवार, 24 सितंबर 2012

राजभाषावादी या यथार्थवादी


व्यक्तियों का समूह जब एक निर्धारित लक्ष्य या कार्य के लिए अनवरत वर्षों से प्रतिबद्धतापूर्वक कार्यरत रहते हैं तो कालांतर में वह कार्यप्रणाली वाद के रूप में भी पहचानी जाती है। तीन दशक से भी अधिक समय से सरकारी कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों में (आगे इन सबको सरकारी कार्यालय कहा जाएगा) राजभाषा जिस उत्साह, ऊर्जा और उन्नयन से सक्रिय है उस आधार पर राजभाषावाद का अस्तित्व निरंतर मुखरित हो रहा है। राजभाषा अब केवल भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के द्वारा इन कार्यालयों के स्टाफ द्वारा नहीं पहचानी जाती है बल्कि राजभाषा कार्यालय के आबो-हवा में रच-बस गयी है अतएव कार्यालयीन कार्यप्रणाली का एक अभिन्न अंग के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। प्रतिष्ठित हो चुकी राजभाषा अपनी विशेष पहचान निर्मित करने के लिए प्रयासरत है। केवल हिन्दी में मुद्रित पत्र आदि के रूप में, द्विभाषिक मानक पत्रों के रूप में, हिन्दी, द्विभाषिक या त्रिभाषिक शुभकामना पर्ची आदि के रूप में कार्यालय के प्रत्येक टेबल पर राजभाषा विराजमान है। भाषागत परिवर्तन का यह दौर यद्यपि धीमी गति को दर्शा रहा है किन्तु एक विश्वसनीय आधार भी निर्मित कर रहा है।

सरकारी कार्यालयों में निर्मित हो रहे राजभाषा के आधार का प्रमुख सर्जक उस कार्यालय में पदस्थ राजभाषा अधिकारी है। अथक प्रयासों से अंग्रेजी में दैनिक लिखित कार्यों के परिवेश में एक लेज़र बीम की तरह राजभाषा को दीप्तिमान बनाए रखना विशेष प्रतिभा, कौशल और धैर्य का कार्य है जिसे राजभाषा अधिकारी तन्मयतापूर्वक विभिन्न झंझावातों के बीच किए जा रहा है। यहाँ यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि विभिन्न सरकारी कार्यालयों में कार्यरत स्टाफ की भूमिका राजभाषा अधिकारी से कमतर है। राजभाषा के दृष्टिकोण से राजभाषा अधिकारी और स्टाफ में प्रमुख अंतर यह है कि राजभाषा अधिकारी निरंतर विभिन्न कार्यालयीन प्रक्रियाओं के अंतर्गत राजभाषा कार्यान्यवन को गुंजित करते रहता है, मनभावन बनाते रहता है इसलिए वह राजभाषावादी बन जाता है। राजभाषावादी और कुछ नहीं है बल्कि राजभाषा की प्रतिबद्धता है। यहाँ यह स्पष्ट होता है कि राजभाषा अधिकारी को राजभाषावादी होना आवश्यक है। सरकारी कार्यालयों विशेषकर राष्ट्रीयकृत बैंकों में निर्मित हो रही वर्तमान राजभाषा की परिस्थितियों के अंतर्गत राजभाषावादी स्वतः उत्पन्न शब्द है।

राजभाषावाद की व्युत्पत्ति यथार्थवाद से हुई है। यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि राजभाषावाद और यथार्थवाद पूर्णतया सरकारी कार्यालयों के परिवेश से जुड़ा शब्द है। राजभाषावाद से यथार्थवाद जब अलग हो जाता तो है तब यथार्थवाद अपने प्रचलित अर्थों को स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त करता है किन्तु राजभाषावाद से जुडते ही यथार्थवाद पारिभाषिक और ग्रहीत शब्द बन जाता है। वर्तमान में राजभाषा कार्यान्यवन राजभाषावाद और यथार्थवाद के द्वंद्व से गुजर रहा है। कल तक राजभाषावादी दिखनेवाले राजभाषा अधिकारियों में से विशेषकर नए राजभाषा अधिकारी परिस्थितियों को यथार्थ की कसौटी पर कस कर राजभाषावाद से स्थूल रूप से नाता तोड़ रहे हैं। राजभाषावाद अपने मौलिक स्वरूप में राजभाषा कार्यान्यवन की प्रतिबद्धता को क्षेत्र विशेष के आधार पर प्रचारित, प्रसारित और परिमार्जित करता है। जनवाद या जनतंत्रवाद की धारा पर अवलंबित राजभाषावाद कार्यालय की प्रक्रियाओं में ऐसी संलिप्त हो जाती है कि उसका अपना राजभाषा के नाम से कोई स्वतंत्र इयत्ता नहीं होती है परिणामस्वरूप कार्यालय के किसी भी प्रक्रिया में (हिन्दी दिवस को छोडकर) राजभाषा के उपस्थिती की अनिवार्यता सुनिश्चित नहीं की जाती है। कुछ स्टाफ सदस्यों को यह स्थिति अप्रिय लगती है। ऐसे लोगों का मत है कि कार्यालय के अन्य मदों की तरह राजभाषा को वरीयता दी जाय। महज औपचारिकता निर्वहन के लिए राजभाषा की टंकार ध्वनित ना की जाय। यह कार्यान्यवन की एक आक्रामक स्थिति है जो नकारात्मक परिणामों की जनक भी हो सकती है। राजभाषा कार्यान्यवन का सरित प्रवाह और कार्यालय के विभिन्न कार्यों में समामेलन से ही राजभाषा अपनी बुनियाद सुगठित कर सकती है।

राजभाषावादी केवल राजभाषा कार्यान्यवन की धुन में रहता है और जहां भी उसे अवसर मिलता है वहाँ राजभाषा को स्थापित करने का प्रयास करता है। राजभाषा को स्थापित करने की प्रक्रिया में राजभाषावादी को रचनात्मकता का सुख मिलता है इसलिए कुछ स्टाफ की यदि तटस्थ या नकारात्मक भूमिका हो तो राजभाषावादी के कार्यनिष्पादन पर प्रभाव नहीं पड़ता है। राजभाषावादी राजभाषा कार्यान्यवन में मौलिकता का हिमायती होता है, परिणामों को उपलब्धियों में परिवर्तित करने का नायक होता है, प्रेरणा, प्रोत्साहन और पुरस्कारों के आधार पर अपनी प्रतिबद्धता का वाहक होता है। सामान्यतया सभी राजभाषा अधिकारियों को राजभाषावादी होना चाहिए। राजभाषावाद का प्रमुख उद्गम केंद्र कार्यालयों के राजभाषा विभाग हैं जहां से राजभाषावाद का फैलाव होता है। एक सुखद स्थिति यह है कि यदि भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग द्वारा प्रतिवर्ष जारी राजभाषा के वार्षिक कार्यक्रम और कार्यालयीन आवश्यकता के अनुरूप राजभाषावाद रचनात्मक और सर्जनात्मक उद्देश्य के लिए पनपती है तो प्रबंधन भी उसे सहयोग प्रदान करता है। यहाँ यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि सरकारी कार्यालयों में राजभाषा विभाग, राजभाषा अधिकारी तो मिल जाएंगे किन्तु अत्यधिक अल्प संख्या में राजभाषावादी मिल पाएंगे क्योंकि अधिकांश राजभाषा अधिकारी राजभाषा कार्यान्यवन से निकली यथार्थवाद के पगडंडी के राही हैं।

यथार्थवादी राजभाषा के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध नहीं होता है। यह राजभाषा के बजाय स्वयं की प्रगति में विश्वास रखानेवाला होता है। यद्यपि यथार्थवादी राजभाषा अधिकारी ही होता है किन्तु राजभाषा कार्यान्यवन उसका उद्देश्य नहीं बल्कि एक माध्यम होता है। यथार्थवादी कार्यालय में विशेषकर अपने वरिष्ठों के अनुदेशों का अनुपालन करने के लिए प्रतिबद्ध रहता है। यदि यथार्थवादी को कहा जाय कि राजभाषा का कार्य रोक कर कार्यालय के आँय कार्य में सहयोग दें तो यथार्थवादी तत्काल राजभाषा का कार्य रोक कर कार्यालय के आँय कार्य में सहयोग प्रदान करने लगेगा। यथार्थवादी यह नहीं कहेगा कि राजभाषा का कार्य पूर्ण कर यथासंभव सहयोग प्रदान कर दूंगा क्योंकि उसका लक्ष्य सबको खुश कर अपने पदोन्नति को सुनिश्चित करना होता है। पदोन्नति, मनचाहे स्थान पर स्थानांतरण आदि प्रत्येक कर्मी की अभिलाषा होती है किन्तु राजभाषा को सीढ़ी बनाकर स्वयं न्की प्रगति करने का प्रयास राजभाषा कार्यान्यवन के लिए बाधक और घातक है। वर्तमान में नियुक्त हो रहे अधिकांश राजभाषा अधिकारी यथार्थवादी हैं और जैसे ही अवसर मिलता है राजभाषा को छोडकर यथार्थवाद की पगडंडी पकड़ लेते हैं, एक नयी राह पर चलने के लिए, एक नए और ऊंचे ओहदे को पाने के लिए। राजभाषा कार्यान्यवन की प्रगति इससे प्रभावित हो रही है। राजभाषावादी सही हैं या यथार्थवादी दूरदर्शी हैं यह एक विवाद का विषय हो सकता है किन्तु राजभाषा कार्यान्यवन की गतिशीलता का क्या?      
    






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गुरुवार, 23 अगस्त 2012

राजभाषा की प्रासंगिकता – एक यथार्थ या एक छद्म


राजभाषा की प्रासंगिकता पर अक्सर प्रश्न उठाए जाते हैं। प्रश्न यूं ही नहीं उठते हैं, कहीं ना कहीं कोई आधार होता है। यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राजभाषा की प्रासंगिकता पर उठाए गए प्रश्न का धरातल कितना स्वाभाविक या अस्वाभाविक है, कितना आधारपूर्ण या आधारहीन है। प्रश्न उठते रहते हैं जिनमें से अधिकांश अनुत्तरित रहते हैं। अनुत्तरित प्रश्नों का संतुलित जवाब भी रहता है किन्तु उन्हें विस्तृत रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता है। अब यहाँ एक और प्रश्न उभरता है कि राजभाषा की प्रासंगिकता पर कौन उत्तर दे सकता है अथवा किसके जवाब को समाधानकारक माना जाता है या माना जाना चाहिए। प्रसंगवश इस प्रश्न को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि ऐसे सवाल पूछनेवाले कौन हैं। इस प्रकार यदि इस विषय को सामान्य दृष्टि से देखा जाये तो उठनेवाले या उठाए जानेवाले प्रश्न सीमित हैं किन्तु प्रश्नों की परिधि वर्तुलाकार हो जाती है जिससे इस विषयक प्रश्न अंतहीन नज़र आते हैं। प्रश्न चूंकि मूल रूप से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं इसलिए स्वाभाविक तौर पर वर्तुलाकार आकृति प्राप्त कर लेते हैं। कभी-कभी यह प्रश्न राजभाषा के चक्रव्यूह समान लगते हैं।

विशेषकर सरकारी कार्यालयों में यह प्रायः अनुभव किया जाता है कि हिन्दी और राजभाषा एक दूसरे के समक्ष प्रतिद्वंदी बन कर खड़े नज़र आते हैं। विधि और तकनीकी शब्दावली अभी भी अपनी अपेक्षित लोकप्रियता हासिल नहीं कर सकी हैं। राजभाषा के विभिन्न मंचों से राजभाषा को सरल करने और उसे आसान बनाने की बातें की जाती हैं। यदि राजभाषा को आसान बनाने का प्रयास किया जाता है तो उसमें निर्बाध गति से अँग्रेजी के शब्द आते रहते हैं और ऐसे वाक्यों को पढ़कर प्रतीत होता है कि प्रयुक्त शब्द देवनागरी रूपी राजभाषा के हैं या देवनागरी लिपि में रोमन मिश्रित शब्द हैं। इससे संबन्धित एक प्रश्न और उभरता है कि क्या रोमन मिश्रित इन वाक्यों को ग्रामीण और अर्ध शहरी परिवेश स्वीकार कर पाएगा। सरकारी कार्यालयों के विशेषकर महानगरों के प्रशासनिक कर्मचारी रोमन शब्दावली मिश्रित देवनागरी में लिखित राजभाषा को प्रासंगिक मानते हैं। महानगर बनाम अर्धशहरी और ग्रामीण के मध्य राजभाषा की प्रासंगिकता उलझी दिखलाई दे रही है।

भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के कंधे पर राजभाषा कार्यान्यवन का पूरा दारोमदार है। यद्यपि राजभाषा नीति, वार्षिक कार्यक्रम आदि द्वारा राजभाषा कार्यान्यवन को विस्तृत और स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है किन्तु इसके बावजूद भी विभिन्न सरकारी कार्यालय स्वयं को राजभाषा कार्यान्यवन के लिए पूरी तरह से सुसज्जित नहीं कर सके हैं जबकि इन कार्यालयों के शीर्ष प्रबंधन द्वारा सुविधाएं और कार्यान्यवन की स्वतन्त्रता प्राप्त है। गिने-चुने कार्यालय हो सकते हैं जो राजभाषा कार्यान्यवन गति, गरिमा और गहनधर्मिता को निर्मित करने में सफल रहे हों किन्तु जब तक इसका विस्तार नहीं होगा राजभाषा की प्रासंगिकता प्रश्नों के घेरे में रहेगी। शायद ही कोई ऐसी सरकारी संस्था हो जिसका अपना राजभाषा मैनुअल हो। राजभाषा का मैनुअल ना होने से राजभाषा कार्यान्यवन की दशा और दिशा निर्धारित नहीं रहती है जिससे संस्था के कार्यालय मात्र वार्षिक कार्यक्रम के आधार पर गतिशील रहते हैं।

हिन्दी की तिमाही प्रगति रिपोर्ट जो राजभाषा कार्यान्यवन का एक सशक्त और सुलभ अभिलेख है उसकी गरिमा को भी लगातार ठेस पहुंचाई जा रही है। यह भ्रामक धारणा आम सरकारी कर्मियों से सुनने को मिलती रहती है कि राजभाषा कार्यान्यवन का मतलब हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट है। बस तीन महीने में एक बार हिन्दी कि रिपोर्ट भेज दी जाय तो राजभाषा कार्यान्यवन हो गया। इस बेतुकी बात के लिए विभिन्न कार्यालयों में कार्यरत राजभाषा अधिकारी भी जिम्मेदार हैं। इस धारणा को बदलने में यह लोग नाकामयाब रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप विशेषकर बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के अधिकांश राजभाषा अधिकारियों को राजभाषा के अतिरिक्त अन्य कार्यालयीन कार्य भी सौपें गए हैं जिन्हें राजभाषा अधिकारी निष्ठापूर्वक निभा रहे हैं जिससे राजभाषा के प्रति उनकी निष्ठा धूमिल होती जा रही है और राजभाषा की प्रासंगिकता ठगी सी खड़ी है।

आम जनता तक राजभाषा पहुँच नहीं पायी है। राजभाषा कार्यान्यवन में प्रगति हुयी है और हो रही है फिर भी प्रगति की जो गति और दिशा होनी चाहिए वह राजभाषा को अब तक प्राप्त नहीं है। सभी सरकारी कार्यालयों के राजभाषा विभाग औसतन 30 वर्षों से सक्रिय है किन्तु इनकी उपस्थिती केवल अनुवाद तक सीमित है। देश के सामान्य नागरिकों तक पहुँचने की कोशिश नहीं की गयी है। हिन्दी माह, पखवाड़ा, सप्ताह का प्रति वर्ष आयोजन होता है जो कर्मियों तक सिमट कर रह जाता है। ऐसे आयोजन बहुत कम होते हैं जिनमें आम जनता के विभिन्न पक्षों को शामिल किया जाता हो। राजभाषा ना तो ठीक से आम जनता तक पहुंची है, ना तो महाविद्यालयों में अपनी सार्थक उपस्थिती का एहसास दिलाने में सफल रही है। मीडिया में राजभाषा अधिकारियों और राजभाषा कार्यान्यवन के आधारहीन कथ्यों की प्रस्तुति कर हिन्दी के समक्ष राजभाषा को गौण बनाने का सिलसिला अनवरत जारी है। राजभाषा की प्रासंगिकता को प्रभावित करने में इसका भी बड़ा योगदान है।

ब्लॉगिंग की दुनिया में हिन्दी ब्लॉगर दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रहे हैं। अभिव्यक्ति की जितनी स्वतन्त्रता ब्लॉगिंग में है उतनी कहीं नहीं है। पिछले कुछ वर्षों से सितंबर माह आते ही हिन्दी ब्लॉगर राजभाषा को लेकर अपनी-अपनी चिंताएँ अपनी-अपनी भाषा और शैली में प्रस्तुत करना आरंभ कर देते हैं और अब तक के अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सभी ब्लॉगर राजभाषा की स्थिति को दयनीय बतलाकर खेद प्रकट करते हैं, कड़वे शब्दों का प्रयोग करते हैं और राजभाषा के अंधकारपूर्ण भविष्य का रोना रोते हैं। ऐसे में राजभाषा के यथार्थ को प्रस्तुत कर इन ब्लॉगरों की बातों का जवाब देने के लिए वर्तमान में राजभाषा के 3-4 ब्लॉगरों को ढूंढ पाना भी कठिन चुनौती है। विशेषकर राजभाषा अधिकारियों को ब्लॉगिंग से जुड़कर यथार्थ को प्रस्तुत करना चाहिए।

किसी भी विषय के ना तो केवल पूर्ण श्याम पक्ष होते हैं और ना ही सम्पूर्ण धवल पक्ष होते हैं बल्कि श्याम-धवल पक्षों का सम्मिश्रण होता है। यह संभव है कि किसी विषय में श्याम पक्ष अधिक हों तो किसी में धवल पक्ष ज्यादा हो। राजभाषा कार्यान्यवन में नगर राजभाषा कार्यान्यवन समितियों का योगदान और भूमिका उल्लेखनीय है। यदि इन नाराकास की वेब साइट भी निर्मित हो जाये एक दूसरे की उपलब्धियों और गतिविधियों से आसानी से परिचित हुआ जा सकता है तथा राजभाषा की प्रासंगिकता और मुखरित हो सकती है। क्षेत्रीय कार्यान्यवन कार्यालयों के बल पर ही अब तक राजभाषा की प्रासंगिकता अपनी मुकम्मल पहचान बनाए हुये है परंतु इस कार्यालय से आवश्यकता से अधिक अपेक्षाएँ की जा रही हैं। राजभाषा की गंगा भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग से चल कर नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति तक पहुँच कर अत्यधिक मंथर हो गयी है। अब और कैसा विलंब ? राजभाषा अधिकारियों को भागीरथ की भूमिका निभाते हुये राजभाषा की गंगा को विभिन्न सरकारी कार्यालयों से आम जनता तक पहुंचाना है।

वर्तमान में राजभाषा की प्रासंगिकता केवल प्रयास, प्रबलता और अनूठे प्रतिमानों की मांग करती प्रतीत हो रही है। यह संभावना भी अब दिखने लगी है कि राजभाषा कि प्रासंगिकता – एक यथार्थ और छद्म के द्वंद में कहीं एक बज़्म के रूप में ना नज़र आने लगे ।



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सोमवार, 28 मई 2012

राजभाषा में भ्रष्टाचार – एक संभावना, एक विश्लेषण



राजभाषा कार्यान्यवन तेज़ गति से प्रगति दर्शा रही है। व्वर्तमान में देश में चारों तरफ विभिन्न भ्रष्टाचार की गूंज है ऐसे में एक सोच यह भी उत्पन्न होती है कि क्या राजभाषा में भी भ्रष्टाचार हो सकता है? इस दिशा में एक आकलन करने का प्रयास किया जा रहा है जो निम्नलिखित है :-
1.      राजभाषा (हिन्दी) की तिमाही रिपोर्ट :  राजभाषा कार्यान्यवन के प्रगति की प्रतीक राजभाषा की तिमाही प्रगति रिपोर्ट है जिसके अनुसार अधिकांश कार्यालय लक्ष्य से कहीं अधिक राजभाषा की प्रगति दर्शा रहे हैं किन्तु कार्यालयों के निरीक्षण से जो तथ्य स्पष्ट होता है वह दर्शाता है कि हिन्दी की तिमाही प्रगति रिपोर्ट में दर्शाये गए आंकड़ों और कार्यालयों के विभिन्न टेबलों पर पाये जानेवाले राजभाषा के कार्यों के बीच काफी फासला है। यह फासला किसी एक या दो तिमाही रिपोर्टों का नहीं है बल्कि कथनी और करनी का यह फर्क वर्षों से चलते आ रहा है। दूसरे शब्दों में वर्षों से राजभाषा की तिमाही रिपोर्ट में आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर दर्शाया जा रहा है जिससे कार्यालयों को राजभाषा के विभिन्न पुरस्कार प्राप्त करने में सुविधा हो सके। इस पर किसी प्रकार की रोक लगाने की कोशिश नहीं की गयी है, परिणामस्वरूप कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्यवन का प्रयास करने के बजाए तिमाही रिपोर्ट में अधिक रिपोर्टिंग करने तक ही राजभाषा सिमटती जा रही है। क्या यह प्रक्रिया भ्रष्टाचार के दायरे में नहीं मानी जाएगी?
2.      राजभाषा (हिन्दी) कार्यशाला का आयोजन : प्रत्येक केंद्रीय सरकार के कार्यालय, बैंक और उपक्रम राजभाषा कार्यशाला का आयोजन करते आ रहे हैं। वर्तमान में कार्यशाला की अवधि मात्र एक दिन की रह गयी है अन्यथा एक सप्ताह से तीन दिवसीय फिर दो दिवसीय की यात्रा करते हुये अब यह कार्यशाला एक दिवस तक सिमट गयी है। यूनिकोड विषय को छोडकर कार्यशाला के सभी विषय बीस वर्ष पुराने हैं। यहाँ यह गौर करनेवाली बात है कि मात्र विषय ही पुराने नहीं है बल्कि कार्यशाला सामग्री भी पुरानी है। पुरानी कार्यशाला सामग्री के अतरिक्त अधिकांश राजभाषा अधिकारियों के चर्चा आदि में भी बासीपन को सहजता से पाया जा सकता है। राजभाषा कार्यशाला की ना तो सामग्री में नवीनता है और ना ही राजभाषा अधिकारियों का प्रशिक्षक के रूप में नयी सोच की धार है। ऐसी स्थिति में राजभाषा को नए रूप, नए अंदाज़ और नए प्रभाव के रूप में कैसे और कौन प्रस्तुत करेगा? क्या यहाँ पर दायित्व बोध में लापरवाही प्रतीत नहीं होती है? यदि इसे भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या कहा जाये?
3.      राजभाषा कार्यान्यवन समिति की बैठक : किसी भी कार्यालय में राजभाषा की धड़कन उस कार्यालय के राजभाषा कार्यान्यवन समिति में होती है। इस समिति की बैठक तीन महीने में एक बार आयोजित की जाती है। इस बैठक की कार्यसूची भी अब लगभग एक परंपरा का निर्वाह करते प्रतीत होती है लगभग एक जैसी कार्यसूची का वर्षों से उपयोग करनेवाले कार्यालयों को ढूँढने के लिए विशेष श्रम की आवश्यकता नहीं है। इस समिति की बैठक भी प्रायः अपनी पूरी गंभीरता से नहीं होती है जिसकी जानकारी बैठक के कार्यसूची से मिलती है। समिति की बैठक का आयोजन अनिवारी है इसलिए अनिवार्यता के कारण तो यह बैठक नहीं होती है? यदि राजभाषा के प्रति समर्पित भाव से बैठक आयोजित नहीं की जाती है तो उसका परिणाम भी मंद होता है। इस तरह के मंद परिणामोंवाले कार्यवृत्त वर्षों से लिखे जा रहे हैं। अत्यधिक महत्वपूर्ण समिति के प्रभाव को कम कर कार्य करना राजभाषा का भ्रष्टाचार माना जाना चाहिए।
विश्लेषण :  राजभाषा का प्रचार-प्रसार तीव्र गति से हो रहा है किन्तु प्रभावशाली ढंग से नहीं हो रहा है। कार्यालयों को चाहिए वे अपने राजभाषा विभाग को समीक्षात्मक और तुलनात्मक दृष्टि से देखें। राजभाषा का उच्चतम पुरस्कार यदि नहीं प्राप्त हो रहा है तो उसकी गहन और व्यापक समीक्षा की जाय। यदि विभिन्न कार्यालयों के राजभाषा विभाग की निगरानी कार्यालय के अन्य विभागों द्वारा की जाएगी तो यह विभाग अपना सर्वोत्तम दे पाएगा अन्यथा उक्त अनियमितताएँ पनपती रहेंगी, अपनी जड़ें जमाती रहेंगी जिससे राजभाषा के भ्रष्टाचार को एक सशक्त आधार मिलता रहेगा। 


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