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सोमवार, 24 सितंबर 2012

राजभाषावादी या यथार्थवादी


व्यक्तियों का समूह जब एक निर्धारित लक्ष्य या कार्य के लिए अनवरत वर्षों से प्रतिबद्धतापूर्वक कार्यरत रहते हैं तो कालांतर में वह कार्यप्रणाली वाद के रूप में भी पहचानी जाती है। तीन दशक से भी अधिक समय से सरकारी कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों में (आगे इन सबको सरकारी कार्यालय कहा जाएगा) राजभाषा जिस उत्साह, ऊर्जा और उन्नयन से सक्रिय है उस आधार पर राजभाषावाद का अस्तित्व निरंतर मुखरित हो रहा है। राजभाषा अब केवल भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के द्वारा इन कार्यालयों के स्टाफ द्वारा नहीं पहचानी जाती है बल्कि राजभाषा कार्यालय के आबो-हवा में रच-बस गयी है अतएव कार्यालयीन कार्यप्रणाली का एक अभिन्न अंग के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। प्रतिष्ठित हो चुकी राजभाषा अपनी विशेष पहचान निर्मित करने के लिए प्रयासरत है। केवल हिन्दी में मुद्रित पत्र आदि के रूप में, द्विभाषिक मानक पत्रों के रूप में, हिन्दी, द्विभाषिक या त्रिभाषिक शुभकामना पर्ची आदि के रूप में कार्यालय के प्रत्येक टेबल पर राजभाषा विराजमान है। भाषागत परिवर्तन का यह दौर यद्यपि धीमी गति को दर्शा रहा है किन्तु एक विश्वसनीय आधार भी निर्मित कर रहा है।

सरकारी कार्यालयों में निर्मित हो रहे राजभाषा के आधार का प्रमुख सर्जक उस कार्यालय में पदस्थ राजभाषा अधिकारी है। अथक प्रयासों से अंग्रेजी में दैनिक लिखित कार्यों के परिवेश में एक लेज़र बीम की तरह राजभाषा को दीप्तिमान बनाए रखना विशेष प्रतिभा, कौशल और धैर्य का कार्य है जिसे राजभाषा अधिकारी तन्मयतापूर्वक विभिन्न झंझावातों के बीच किए जा रहा है। यहाँ यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि विभिन्न सरकारी कार्यालयों में कार्यरत स्टाफ की भूमिका राजभाषा अधिकारी से कमतर है। राजभाषा के दृष्टिकोण से राजभाषा अधिकारी और स्टाफ में प्रमुख अंतर यह है कि राजभाषा अधिकारी निरंतर विभिन्न कार्यालयीन प्रक्रियाओं के अंतर्गत राजभाषा कार्यान्यवन को गुंजित करते रहता है, मनभावन बनाते रहता है इसलिए वह राजभाषावादी बन जाता है। राजभाषावादी और कुछ नहीं है बल्कि राजभाषा की प्रतिबद्धता है। यहाँ यह स्पष्ट होता है कि राजभाषा अधिकारी को राजभाषावादी होना आवश्यक है। सरकारी कार्यालयों विशेषकर राष्ट्रीयकृत बैंकों में निर्मित हो रही वर्तमान राजभाषा की परिस्थितियों के अंतर्गत राजभाषावादी स्वतः उत्पन्न शब्द है।

राजभाषावाद की व्युत्पत्ति यथार्थवाद से हुई है। यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि राजभाषावाद और यथार्थवाद पूर्णतया सरकारी कार्यालयों के परिवेश से जुड़ा शब्द है। राजभाषावाद से यथार्थवाद जब अलग हो जाता तो है तब यथार्थवाद अपने प्रचलित अर्थों को स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त करता है किन्तु राजभाषावाद से जुडते ही यथार्थवाद पारिभाषिक और ग्रहीत शब्द बन जाता है। वर्तमान में राजभाषा कार्यान्यवन राजभाषावाद और यथार्थवाद के द्वंद्व से गुजर रहा है। कल तक राजभाषावादी दिखनेवाले राजभाषा अधिकारियों में से विशेषकर नए राजभाषा अधिकारी परिस्थितियों को यथार्थ की कसौटी पर कस कर राजभाषावाद से स्थूल रूप से नाता तोड़ रहे हैं। राजभाषावाद अपने मौलिक स्वरूप में राजभाषा कार्यान्यवन की प्रतिबद्धता को क्षेत्र विशेष के आधार पर प्रचारित, प्रसारित और परिमार्जित करता है। जनवाद या जनतंत्रवाद की धारा पर अवलंबित राजभाषावाद कार्यालय की प्रक्रियाओं में ऐसी संलिप्त हो जाती है कि उसका अपना राजभाषा के नाम से कोई स्वतंत्र इयत्ता नहीं होती है परिणामस्वरूप कार्यालय के किसी भी प्रक्रिया में (हिन्दी दिवस को छोडकर) राजभाषा के उपस्थिती की अनिवार्यता सुनिश्चित नहीं की जाती है। कुछ स्टाफ सदस्यों को यह स्थिति अप्रिय लगती है। ऐसे लोगों का मत है कि कार्यालय के अन्य मदों की तरह राजभाषा को वरीयता दी जाय। महज औपचारिकता निर्वहन के लिए राजभाषा की टंकार ध्वनित ना की जाय। यह कार्यान्यवन की एक आक्रामक स्थिति है जो नकारात्मक परिणामों की जनक भी हो सकती है। राजभाषा कार्यान्यवन का सरित प्रवाह और कार्यालय के विभिन्न कार्यों में समामेलन से ही राजभाषा अपनी बुनियाद सुगठित कर सकती है।

राजभाषावादी केवल राजभाषा कार्यान्यवन की धुन में रहता है और जहां भी उसे अवसर मिलता है वहाँ राजभाषा को स्थापित करने का प्रयास करता है। राजभाषा को स्थापित करने की प्रक्रिया में राजभाषावादी को रचनात्मकता का सुख मिलता है इसलिए कुछ स्टाफ की यदि तटस्थ या नकारात्मक भूमिका हो तो राजभाषावादी के कार्यनिष्पादन पर प्रभाव नहीं पड़ता है। राजभाषावादी राजभाषा कार्यान्यवन में मौलिकता का हिमायती होता है, परिणामों को उपलब्धियों में परिवर्तित करने का नायक होता है, प्रेरणा, प्रोत्साहन और पुरस्कारों के आधार पर अपनी प्रतिबद्धता का वाहक होता है। सामान्यतया सभी राजभाषा अधिकारियों को राजभाषावादी होना चाहिए। राजभाषावाद का प्रमुख उद्गम केंद्र कार्यालयों के राजभाषा विभाग हैं जहां से राजभाषावाद का फैलाव होता है। एक सुखद स्थिति यह है कि यदि भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग द्वारा प्रतिवर्ष जारी राजभाषा के वार्षिक कार्यक्रम और कार्यालयीन आवश्यकता के अनुरूप राजभाषावाद रचनात्मक और सर्जनात्मक उद्देश्य के लिए पनपती है तो प्रबंधन भी उसे सहयोग प्रदान करता है। यहाँ यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि सरकारी कार्यालयों में राजभाषा विभाग, राजभाषा अधिकारी तो मिल जाएंगे किन्तु अत्यधिक अल्प संख्या में राजभाषावादी मिल पाएंगे क्योंकि अधिकांश राजभाषा अधिकारी राजभाषा कार्यान्यवन से निकली यथार्थवाद के पगडंडी के राही हैं।

यथार्थवादी राजभाषा के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध नहीं होता है। यह राजभाषा के बजाय स्वयं की प्रगति में विश्वास रखानेवाला होता है। यद्यपि यथार्थवादी राजभाषा अधिकारी ही होता है किन्तु राजभाषा कार्यान्यवन उसका उद्देश्य नहीं बल्कि एक माध्यम होता है। यथार्थवादी कार्यालय में विशेषकर अपने वरिष्ठों के अनुदेशों का अनुपालन करने के लिए प्रतिबद्ध रहता है। यदि यथार्थवादी को कहा जाय कि राजभाषा का कार्य रोक कर कार्यालय के आँय कार्य में सहयोग दें तो यथार्थवादी तत्काल राजभाषा का कार्य रोक कर कार्यालय के आँय कार्य में सहयोग प्रदान करने लगेगा। यथार्थवादी यह नहीं कहेगा कि राजभाषा का कार्य पूर्ण कर यथासंभव सहयोग प्रदान कर दूंगा क्योंकि उसका लक्ष्य सबको खुश कर अपने पदोन्नति को सुनिश्चित करना होता है। पदोन्नति, मनचाहे स्थान पर स्थानांतरण आदि प्रत्येक कर्मी की अभिलाषा होती है किन्तु राजभाषा को सीढ़ी बनाकर स्वयं न्की प्रगति करने का प्रयास राजभाषा कार्यान्यवन के लिए बाधक और घातक है। वर्तमान में नियुक्त हो रहे अधिकांश राजभाषा अधिकारी यथार्थवादी हैं और जैसे ही अवसर मिलता है राजभाषा को छोडकर यथार्थवाद की पगडंडी पकड़ लेते हैं, एक नयी राह पर चलने के लिए, एक नए और ऊंचे ओहदे को पाने के लिए। राजभाषा कार्यान्यवन की प्रगति इससे प्रभावित हो रही है। राजभाषावादी सही हैं या यथार्थवादी दूरदर्शी हैं यह एक विवाद का विषय हो सकता है किन्तु राजभाषा कार्यान्यवन की गतिशीलता का क्या?      
    






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सोमवार, 28 मई 2012

राजभाषा में भ्रष्टाचार – एक संभावना, एक विश्लेषण



राजभाषा कार्यान्यवन तेज़ गति से प्रगति दर्शा रही है। व्वर्तमान में देश में चारों तरफ विभिन्न भ्रष्टाचार की गूंज है ऐसे में एक सोच यह भी उत्पन्न होती है कि क्या राजभाषा में भी भ्रष्टाचार हो सकता है? इस दिशा में एक आकलन करने का प्रयास किया जा रहा है जो निम्नलिखित है :-
1.      राजभाषा (हिन्दी) की तिमाही रिपोर्ट :  राजभाषा कार्यान्यवन के प्रगति की प्रतीक राजभाषा की तिमाही प्रगति रिपोर्ट है जिसके अनुसार अधिकांश कार्यालय लक्ष्य से कहीं अधिक राजभाषा की प्रगति दर्शा रहे हैं किन्तु कार्यालयों के निरीक्षण से जो तथ्य स्पष्ट होता है वह दर्शाता है कि हिन्दी की तिमाही प्रगति रिपोर्ट में दर्शाये गए आंकड़ों और कार्यालयों के विभिन्न टेबलों पर पाये जानेवाले राजभाषा के कार्यों के बीच काफी फासला है। यह फासला किसी एक या दो तिमाही रिपोर्टों का नहीं है बल्कि कथनी और करनी का यह फर्क वर्षों से चलते आ रहा है। दूसरे शब्दों में वर्षों से राजभाषा की तिमाही रिपोर्ट में आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर दर्शाया जा रहा है जिससे कार्यालयों को राजभाषा के विभिन्न पुरस्कार प्राप्त करने में सुविधा हो सके। इस पर किसी प्रकार की रोक लगाने की कोशिश नहीं की गयी है, परिणामस्वरूप कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्यवन का प्रयास करने के बजाए तिमाही रिपोर्ट में अधिक रिपोर्टिंग करने तक ही राजभाषा सिमटती जा रही है। क्या यह प्रक्रिया भ्रष्टाचार के दायरे में नहीं मानी जाएगी?
2.      राजभाषा (हिन्दी) कार्यशाला का आयोजन : प्रत्येक केंद्रीय सरकार के कार्यालय, बैंक और उपक्रम राजभाषा कार्यशाला का आयोजन करते आ रहे हैं। वर्तमान में कार्यशाला की अवधि मात्र एक दिन की रह गयी है अन्यथा एक सप्ताह से तीन दिवसीय फिर दो दिवसीय की यात्रा करते हुये अब यह कार्यशाला एक दिवस तक सिमट गयी है। यूनिकोड विषय को छोडकर कार्यशाला के सभी विषय बीस वर्ष पुराने हैं। यहाँ यह गौर करनेवाली बात है कि मात्र विषय ही पुराने नहीं है बल्कि कार्यशाला सामग्री भी पुरानी है। पुरानी कार्यशाला सामग्री के अतरिक्त अधिकांश राजभाषा अधिकारियों के चर्चा आदि में भी बासीपन को सहजता से पाया जा सकता है। राजभाषा कार्यशाला की ना तो सामग्री में नवीनता है और ना ही राजभाषा अधिकारियों का प्रशिक्षक के रूप में नयी सोच की धार है। ऐसी स्थिति में राजभाषा को नए रूप, नए अंदाज़ और नए प्रभाव के रूप में कैसे और कौन प्रस्तुत करेगा? क्या यहाँ पर दायित्व बोध में लापरवाही प्रतीत नहीं होती है? यदि इसे भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या कहा जाये?
3.      राजभाषा कार्यान्यवन समिति की बैठक : किसी भी कार्यालय में राजभाषा की धड़कन उस कार्यालय के राजभाषा कार्यान्यवन समिति में होती है। इस समिति की बैठक तीन महीने में एक बार आयोजित की जाती है। इस बैठक की कार्यसूची भी अब लगभग एक परंपरा का निर्वाह करते प्रतीत होती है लगभग एक जैसी कार्यसूची का वर्षों से उपयोग करनेवाले कार्यालयों को ढूँढने के लिए विशेष श्रम की आवश्यकता नहीं है। इस समिति की बैठक भी प्रायः अपनी पूरी गंभीरता से नहीं होती है जिसकी जानकारी बैठक के कार्यसूची से मिलती है। समिति की बैठक का आयोजन अनिवारी है इसलिए अनिवार्यता के कारण तो यह बैठक नहीं होती है? यदि राजभाषा के प्रति समर्पित भाव से बैठक आयोजित नहीं की जाती है तो उसका परिणाम भी मंद होता है। इस तरह के मंद परिणामोंवाले कार्यवृत्त वर्षों से लिखे जा रहे हैं। अत्यधिक महत्वपूर्ण समिति के प्रभाव को कम कर कार्य करना राजभाषा का भ्रष्टाचार माना जाना चाहिए।
विश्लेषण :  राजभाषा का प्रचार-प्रसार तीव्र गति से हो रहा है किन्तु प्रभावशाली ढंग से नहीं हो रहा है। कार्यालयों को चाहिए वे अपने राजभाषा विभाग को समीक्षात्मक और तुलनात्मक दृष्टि से देखें। राजभाषा का उच्चतम पुरस्कार यदि नहीं प्राप्त हो रहा है तो उसकी गहन और व्यापक समीक्षा की जाय। यदि विभिन्न कार्यालयों के राजभाषा विभाग की निगरानी कार्यालय के अन्य विभागों द्वारा की जाएगी तो यह विभाग अपना सर्वोत्तम दे पाएगा अन्यथा उक्त अनियमितताएँ पनपती रहेंगी, अपनी जड़ें जमाती रहेंगी जिससे राजभाषा के भ्रष्टाचार को एक सशक्त आधार मिलता रहेगा। 


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शनिवार, 26 मई 2012

समिति द्वारा पत्रिका का प्रकाशन



राजभाषा कार्यान्यवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पत्रिका प्रकाशन भी है। प्रत्येक कार्यालय अपने-अपने स्तर पर पत्रिका प्रकाशित करती हैं। राजभाषा कार्यान्यवन समिति भी पत्रिका प्रकाशित करती है जिसमें समिति के सदस्य-सचिव पर पत्रिका के संपादन का दायित्व रहता है और समिति के कुछ चयनित सदस्य पत्रिका के संपादन मंडल के सदस्य होते हैं। पत्रिका के लेख,कविता आदि के चयन के अतिरिक्त पत्रिका का कलेवर, समय से प्रकाशन आदि अनेकों कार्य होते हैं जिसके लिए सम्पादन मण्डल को कई बार बैठक आयोजित कर निर्णय लेना पड़ता है। इन सारी प्रक्रियाओं के दौरान कई ऐसी स्थितियाँ  निर्मित होती हैं जो यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि राजभाषा कार्यान्यवन जगत में यह सब कब तक जारी रहेगा। ऐसी ही कुछ स्थितियों का वर्णन किया जा रहा है :-
1.   सम्पादन मण्डल का गठन : पत्रिका के सम्पादन मण्डल का गठन करना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। मिति के सदस्य-सचिव का यह प्रयास रहता है कि सम्पादन मण्डल में ऐसे सदस्य आयें जिनमें साहित्य की समझ और रचना प्रतिभा हो। इस सोच के बावजूद भी चयन में  निम्नलिखित बिन्दुओं की प्रमुख भूमिका होती है :
   बड़े कार्यालयों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति ।
ख   क्रमानुसार प्रत्येक बैंक को अवसर देने की नीति।
ग   दबंग अधिकारियों से न निपट पाने पर उन्हें अवसर देने की विवशता ।
घ   चापलूसी के आधार पर सम्पादन मण्डल में सदस्यता के अभिलाषी । इन्हें नदेखा करना
    अत्यंत कठिन कार्य है।
च   वरिष्ठता के आधार पर अयोग्य राजभाषा अधिकारी को सम्मिलित करने की विवशता।

इस प्रकार प्रायः नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति द्वारा प्रकाशित पत्रिका के सम्पादन मण्डल को सभी सदस्य योग्य, उत्साही और साहित्य में रुचि लेनेवाले नहीं मिल पाते हैं।

2 रचना चयन प्रक्रिया :  रचनाओं के चयन में भी कहीं रचना स्वीकारने की अनिवार्यता तो कहीं रचना को सम्मिलित करने की विवशता पत्रिका को अपने बेहतर रूप में प्रकाशित करने में बाधक साबित होती हैं। समिति के सदस्य-सचिव अथवा सम्पादन मण्डल के एक या कुछ सदस्य चाह कर भी उक्त स्थितियों में परिवर्तन नहीं ला सकते हैं। सामान्यतया लगभग सभी सदस्यों को और विशेषकर सक्रिय सदस्यों को पत्रिका में यथोचित स्थान देना ही पड़ता है इसलिए रचना की गुणवत्ता से अक्सर समझौता करना ही पड़ता है। यद्यपि पत्रिका में रचना से कहीं अधिक फोटो प्रकाशन का दबाव रहता है। फोटो प्रकाशन में भी प्रत्येक सदस्य कार्यालय का निर्धारित कोटा होता है जिसमें नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रमों आदि को ही सम्मिलित किया जाता है। रचना चयन में आनेवाली कुछ प्रमुख कठिनाईयाँ निम्नलिखित हैं :

रचनाओं का ना मिल पाना: समिति की सदस्य संख्या चाहे 30 हो या 60 रचनाओं की समस्या हमेशा रहती है। ऐसी बात नहीं है कि कार्यालयों में लिखनेवाले कम हैं किन्तु अधिकांश इसलिए हिन्दी में नहीं लिखते हैं कि उन्हें वर्तनी विषयक समस्याएँ और भ्रांतियाँ रहती हैं और अर्थ का अनर्थ की आशंका से हिन्दी में नहीं लिख पाते हैं। प्रत्येक कार्यालय में सीमित संख्या में हिन्दी में लिखनेवाले होते हैं जिनकी पहचान लेखक के रूप में बखूबी स्थापित हो चुकी होती है जबकि यह और बात है कि इनके द्वारा लिखी गयी रचनाएँ स्तरीय हों यह आवश्यक नहीं है। रचनाओं के प्रेषण में समिति के अधिकांश राजभाषा अधिकारी अधिक सक्रिय होते हैं और उनकी कोशिश रहती है कि उनकी रचना को प्रमुखता प्रदान करते हुये प्रकाशित किया जाये। कई अनुस्मारक और प्रयास के बाद सीमित संख्या में रचनाएँ आती हैं जिन्हें प्रकाशित करने के सिवा कोई विकल्प नहीं रहता है।

न रचना का कलेवर बदलता है ना रचनाकार : अधिकांश राजभाषा कार्यान्यवन समिति की पत्रिकाओं की यदि समीक्षा की जाय तो यह तथ्य उभरता है कि प्रत्येक समिति में रचनाकारों का एक समूह होता है जो अपनी-अपनी शैली में एक जैसी ही रचनाएँ लिखता है जिसके कथ्य, शब्द चयन, वाक्य विन्यास आदि एक समान होते हैं जिससे इन पत्रिकाओं पर नज़र रखनेवाले सदस्य को शीघ्र ही पत्रिका की रचनाओं से उकताहट होने लगती है। पत्रिका के संपादक के रूप में  समिति का सदस्य-सचिव आखिर करे भी तो क्या करे, आखिर उसे सबको साथ लेकर जो चलना है।


3 सम्पादन : पत्रिका के सम्पादन के समय सम्पादन मण्डल की कई बार बैठक आयोजित की जाती है जिसमें प्रमुख होता है प्रेस से आई पत्रिका की पाण्डुलिपि की वर्तनी में सुधार करना, फोटो के क्रम को ठीक करना। शायद ही कभी होता हो कि रचनाओं का सम्पादन किया जाता हो अन्यथा जैसी रचना आती है वैसी ही प्रकाशित हो जाती है। रचनाओं में आवश्यक सुधार भी नहीं किए जाते, अधिकांश सम्पादन मण्डल केवल नाम के लिए होते हैं। जिस समिति का सम्पादन मण्डल अपना कार्य निष्ठापूर्वक करता है उस समिति की पत्रिका अपना अलग प्रभाव दर्शाती है लेकिन ऐसी पत्रिका गिनी-चुनी हैं। सम्पादन के दौरान प्रत्येक सदस्य कार्यालय पत्रिका में अपनी वर्चस्वता चाहता है किन्तु बाज़ी सम्पादन मण्डल के सदस्य कार्यालयों के पास होती है। यदि संपादक मण्डल के किसी सदस्य के मन में वर्चस्वता का विचार आए तो उसे पूर्ण करने में उसके पास अवसर होता है और यदि वह प्रेस में जाकर किसी पृष्ठ के साथ छेड़-छाड़ करता है तो या तो वह सफल हो जाता है अथवा उसकी चाल सम्पादक मण्डल के समझ में आती है। इस तरह की चतुराई के प्रयास से अधिकांश पत्रिकाएँ अपने स्तर को छू नहीं सकी हैं।

4 प्रकाशन और वितरण : पत्रिका का प्रकाशन और वितरण राजभाषा कार्यान्यवन के संयोजक बैंक द्वारा किया जाता है। पत्रिका का प्रकाशन एक सराहनीय कार्य है जिससे राजभाषा कार्यान्यवन को नयी गति और ऊर्जा मिलती है।

नगर राजभाषा कार्यान्यवन द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं की यदि समीक्षा की जाये और इन पत्रिकाओं का तुलनात्मक अध्ययन कर प्रकाशित किया जाय तो राजभाषा कार्यान्यवन के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय कार्य होगा।
  


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शुक्रवार, 4 मई 2012

राजभाषा के राही



भारत के संविधान की राजभाषा नीति के अनुसार सरकारी कार्यालयों, उपक्रमों, राष्ट्रीयकृत बैंकों में कार्यरत सभी स्टाफ राजभाषा के राही हैं. भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के वार्षिक कार्यक्रम के विभिन्न लक्ष्य ही राजभाषा की राहें हैं. इस प्रकार राह भी निर्धारित है और राही भी इसके बावजूद ना तो राहों की धूल उड़ती हुयी दिखलाई पड़ती है और ना ही कथित राहियों की राह पर अनवरत सक्रिय उपस्थिति का ही एहसास होता है. ऐसी स्थिति में राह पर किसी तरह का सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता है किन्तु राही अवश्य प्रश्नों से घिरा हुआ है। राह पर राहियों का लगातार सक्रियतापूर्वक ना दिखना क्या दर्शाता है? क्या सचमुच इन राहों पर राही नहीं हैं? क्या राहियों को कोई कठिनाई है? इस प्रकार के अनेकों प्रश्न मन में उभरते हैं और अपने उत्तर तलाशते हैं। आखिर यह राह भी तो सामान्य  राह नहीं है बल्कि संविधान द्वारा निर्मित एक ऐसी अद्भुत राह है जो चिंतन, सम्प्रेषण आदि में पूर्णतया स्व की भावना, विचार और कर्म को निर्मित करती है। राह भी प्रशस्त और प्रयोजनमूलक है। राहगीरों की चहल-पहल ना दिखलाई देना सतत एक समाधानकारक विश्लेषण के लिए प्रेरित करते रहता है। इस विश्लेषण में सर्वप्रमुख है राही।

कौन हैं यह राही ? क्या राजभाषा कामकाज से सीधे जुड़े अधिकारी-कर्मचारी? या कि राजभाषा के कार्यों को संपादित करने के लिए विभिन्न कार्यालयों के चयनित स्टाफ ? सत्य यह है कि इन कार्यालयों (केंद्रीय सरकार के कार्यालय, उपक्रम एवं राष्ट्रीयकृत बैंक) के वरिष्ठतम अधिकारी से लेकर कनिष्ठतम कर्मचारी सभी राजभाषा के राही हैं। यदि इन कार्यालयों के कनिष्ठतम कर्मचारी से बात की जाय तो उनका उत्तर होता है कि जब वरिष्ठतम ही कुछ देर इस राह पर चहलकदमी कर दूसरी राह पर चलने लगते हैं तब कनिष्ठ क्या करे ? कनिष्ठ तो प्रायः वरिष्ठ का ही अनुकरण करते हैं। यदि वरिष्ठ से यही प्रश्न किया जाये तो उत्तर होगा कि अक्सर यह पाया गया है कि कनिष्ठों को इस राह के अपने दायित्व का बोध नहीं है और यदि यह बोध है भी तो अनजाना बन जाते हैं। शायद उनकी यह सोच होती हो कि इन राहों पर चलना ना तो अनिवार्य है, ना ही अनुपालन ना करने पर दंड का प्रावधान है, ना ही इस बारे में अपेक्षित गंभीरता है परिणामस्वरूप राजभाषा की राह एक ऐसी ऐच्छिक राह है जिसपर मन किया तो चल पड़े मन नहीं तो नहीं गए।

ऐसा नहीं कि राजभाषा की राह पर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं है यदि देखा जाये तो हर महत्वपूर्ण मोड़ पर नियंत्रण है जहां यह देखने को भी मिल जाता है कि किसी मोड़ के नियंत्रण पर अपेक्षित गंभीरता है तो किसी मोड़ पर गंभीरता का अभाव है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के क्षेत्रीय कार्यालय राह पर नियंत्रण, निदेश और निगरानी का दायित्व निभा रहा है इसके अतिरिक्त विभिन्न
मंत्रालयों में शीर्ष राजभाषा कार्यालय भी इस दिशा में कार्यरत हैं और विभिन्न कार्यालयों के शीर्ष अधिकारी भी इस दायित्व को निभा रहे हैं। इस व्यवस्था के आधार पर यह कहा जा सकता है कि राजभाषा की राह अलग-थलग बेगानी सी पड़ी है। यह निर्विवाद सत्य है कि राजभाषा की राह पर किसी

प्रकार की असुविधा नहीं है। इस राह के प्रत्येक मोड़ पर किसी ना किसी रूप में दिशानिर्देशक उपलब्ध हैं। राजभाषा में यदि किसी कार्यालय में अपेक्षित उपलब्धि नहीं होती है तो ज़िम्मेदारी राह पर नहीं डाली जा सकती है। यदि किसी कार्यालय का स्टाफ राजभाषा की राह पर दोषारोपण करने का प्रयास करता है तो यही कहा जा सकता है कि नाच ना जाने आँगन टेड़ा

यदि राह पर कोई कठिनाई नहीं है तो स्वाभाविक तौर पर यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्याएँ राही के इर्द-गिर्द ही हैं। समस्याएँ होने की वजह राहियों के विभिन्न प्रकार की श्रेणियाँ हैं जिनमें से कुछ को नीचे दर्शाया जा रहा है :-
1 पदोन्नति प्रधान
2 सुविधानुसार स्थानांतरण प्रधान
3 अज्ञानता प्रधान
4 लोकप्रियता प्रधान
5 गुटबाजी प्रधान
6 कर्मठता प्रधान

1 पदोन्नति प्रधान राही : इस श्रेणी के राजभाषा अधिकारी का एकमात्र लक्ष्य होता है सेवा में पदोन्नति प्राप्त करना। इस श्रेणी के लोगों को उनके उच्चाधिकारी जो कहते हैं उसे स्वीकार कर तदनुसार कार्य करते हैं। राजभाषा नीति के नियम की अनदेखी कर भी इस श्रेणी के लोग अपने उच्चाधिकारी के अनुरूप कार्य करते हैं। ऐसे लोग उच्चाधिकारी को राजभाषा कार्यान्यवन की सलाह नहीं देते हैं बल्कि उच्चाधिकारी के आज्ञाकारी स्टाफ बनकर उनकी नज़रों में अपनी छवि को एक कर्मनिष्ठ अधिकारी के रूप में निर्मित करना चाहते हैं। ऐसे बहुत कम उच्चाधिकारी हैं जो इस खूबसूरत और प्रीतिजनक आवरण की भेदक दृष्टि रखते हों। स्वयं की प्रशंसा प्रायः सभी को अच्छी लगती है क्योंकि यह एक सामान्य मानवीय गुण है। इस श्रेणी के राजभाषा अधिकारी अपने लक्ष्य में अवश्य सफल होते है। इनके लिए राजभाषा कि राह से अधिक व्यक्तिगत उपलब्धि प्रधान होती है। व्यक्तिगत प्रगति के लिए राजभाषा के साथ समझौता करना इनकी आदत होती है।  

2 सुविधानुसार स्थानांतरण प्रधान राही : यह एक सौम्य, शांत, अपने ही दायरे में सिमट कर रहनेवाली  श्रेणी है। इस श्रेणी के राजभाषा अधिकारी अपना कार्य समय, सुविधा और साधन के अनुरूप करते है। सबसे हिल-मिलकर रहना इनकी प्रमुख विशेषता है। इनकी चाहत सिर्फ स्थानांतरण तक ही सीमित रहती है। अक्सर इनके दबे-सहमे व्यवहार से प्रसन्न होकर प्रबंधन इन्हें मनचाही जगह पर स्थानतरित कर देता  है। राजभाषा कि राह इनके लिए गौण होती है और पारिवारिक सुख परम प्रधान होता है।  

3 अज्ञानता प्रधान राही : इस श्रेणी के राजभाषा अधिकारी को राजभाषा कार्यान्यवन का प्रचुर ज्ञान नहीं रहता है इसलिए ऐसे अधिकारी एक ही स्थान पर काफी समय तक पड़े रहते हैं। ना तो इनकी चर्चा होती है और ना ही इनसे कोई अपेक्षा की जाती है। सामान्य तौर पर राजभाषा के कार्यों को निपटाते रहते हैं जिसमें ना तो आकर्षण होता है और ना ही कोई नयी बात होती है। इस श्रेणी के राजभाषा अधिकारी राजभाषा कि राह से बेमन से चलते हैं जैसे कोई इन्हें चलने के लिए विवश कर रहा हो।


4 लोकप्रियता प्रधान राही : लोकप्रियता की अभिलाषा में डूबे राजभाषा अधिकारी अपने टेबल पर कम और इधर-उधर अधिक पाये जाते हैं। यहीं की खबर वहाँ करना, व्यक्तिगत समस्याओं में विशेष रुचि लेकर सहायता करना आदि प्रकार के कार्य इस श्रेणी के राजभाषा अधिकारी करते हैं। यदि यह टेबल पर होते हैं तो अधिकांश समय फोन से जुड़े रहते हैं। इस लोकप्रियता में राजभाषा गौण रहती है और ऐसे लोग राजभाषा कि राह के बारे में गंभीर नहीं होते हैं।

5 गुटबाजी प्रधान राही : मुक्त होकर आलोचना करना और समूह बनाकर एक दबाव की नीति बनाए रखने के खयाल से कुछ राजभाषा अधिकारी गुट बना लेते हैं। यह गुट राजभाषा अधिकारियों का होता है और राजभाषा अधिकारी के खिलाफ कार्य करता है जैसी अफवाहें फैलाना, किसी को योगी बताते हुये उसे एक नयी पहचान देने का प्रयास करना आदि। इनका कोई विशेष उद्देश्य नहीं रहता बल्कि ऐसे राजभाषा अधिकारी अपनी अयोग्यता को छुपाने के लिए योग्य राजभाषा अधिकारी की छवि धूमिल करने का भरसक प्रयास करते हैं। राजभाषा की राह पर चहलकदमी करते दिखानेवाले कदम इस श्रेणी के राजभाषा अधिकारियों के होते हैं।  

6 कर्मठता प्रधान राही : इस श्रेणी के लोगों की दुनिया राजभाषा और हिन्दी जगत में खोयी रहती है तथा राजभाषा कार्यान्यवन में नित नए कार्य करने की इनकी कोशिश जारी रहती है। यद्यपि इस श्रेणी के
 लोगों की संख्या काफी कम होती है लेकिन कोई कार्यालय या संस्था ऐसे राजभाषा अधिकारियों के कार्यनिष्पादन के सहयोग से राजभाषा की गति को बनाए रखने में सफल होती है। लोग अपनी धुन में रहते हैं और सदा राजभाषा के राही रहते हैं। राजभाषा की राह की वर्तमान दीप्ति के जनक इस श्रेणी के राजभाषा अधिकारी हैं।

वर्तमान में राजभाषा की राह अर्थात राजभाषा नीति और वार्षिक कार्यक्रम के अनुरूप राजभाषा के राही अर्थात सामान्यतया विभिन्न कार्यालयों के कर्मचारी और विशेषकर राजभाषा अधिकारियों की स्थितियों को प्रस्तुत करने के इस प्रयास के पीछे यह उद्देश्य है कि यथासंभव अनुकूल परिवर्तन लाकर राजभाषा की राह को और आलोकित किया जा सके जिसपर उपलब्धियों कि पताका लिए राहियों का अनंत काफिला चलता रहे। राही के रूप में राजभाषा अधिकारियों का चयन इसलिए किया गया है कि यह तस्वीर स्पष्ट हो सके कि यदि राजभाषा के सैनिकों कि यह स्थिति है तो कार्यालयों के सामान्य स्टाफ के बारे में सहज ही कल्पना की जा सकती है।   
                     


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