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शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

पुरस्कारों से दबी राजभाषा

राजभाषा कार्यान्वयन प्रेरणा और प्रोत्साहन से किया जाता है, यह सर्वविदित है। इसी क्रम में श्रेष्ठ  राजभाषा कार्यान्वयन के विभिन्न महत्वपूर्ण पुरस्कारों को भी प्रदान किया जाता है। पुरस्कार जीतना हमेशा अच्छा होता है और प्रत्येक कार्यालय इसे पाने के लिए राजभाषा कार्यान्वयन में श्रेष्ठ कार्यनिष्पादन में व्यस्त रहता है। इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार प्राप्त करना प्रत्येक कार्यालय की चाहत होती है क्योंकि वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन की श्रेष्ठता प्रमाणित करने के लिए इससे बड़ा पुरस्कार कोई नहीं है। सब लोग जानते हैं कि प्रत्येक योजना अपने आप में विशिष्ट और विशेष लक्ष्यों के प्राप्ति के लिए एक प्रेरक होती है। इस प्रकार राजभाषा के कई पुरस्कार हैं जो अपनी विशिष्टता के लिए राजभाषा जगत में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। राजभाषा के इन पुरस्कारों को पाने के लिए होड सी लगी हुयी है। ऐसी प्रबल और स्वस्थ प्रतिद्वंदिता में कुछ ऐसी भी घटनाएँ हो जाती हैं जो राजभाषा कार्यान्वयन के इस प्रयास को प्रभावित करती हैं। 

किसी भी सरकारी कार्यालय के उच्च प्रशासक से राजभाषा विषयक चर्चा करने पर राजभाषा पुरस्कार चर्चा का एक प्रमुख विषय रहता है। इन चर्चाओं में यह भी टिप्पणी रहती है कि पुरस्कारों को "मैनेज" किया जाता है। यहाँ यह प्रश्न उभरता है कि उच्च प्रशासक किस आधार पर अपरोक्ष में इस प्रकार कि बातें कर जाते हैं? यहाँ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि सभी सरकारी कार्यालयों के प्रशासक अपरोक्ष में ऐसी ही बातें करते  हैं । कभी कहीं किसी उच्च प्रशासक से इस तरह कि बातें अनौपचारिक बातचीत के दौरान सुनने को मिलती है। यदि उनसे इस तरह कि बातों का आधार पूछा जाय तो प्रायः यही उत्तर मिलता है कि उनके कार्यालय के राजभाषा अधिकारी द्वारा यह बात बार-बार उनसे कही जाती है। यदि देखा जाय तो इस प्रकार कि बातें अक्सर ऐसे ही राजभाषा अधिकारी करते हैं जिन्हें अपने कार्यकाल में राजभाषा का एक भी पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ है।

क्या राजभाषा कार्यान्वयन वस्तुतः राजभाषा के विभिन्न पुरस्कारों से दबी है या कि चतुराईपूर्वक उसे पुरस्कारों से दबाने की असफल कोशिशें की जा रही हैं। राजभाषा कार्यान्वयन के विभिन्न चुनौतीपूर्ण कार्यों को करने की आवश्यक कौशल न रखनेवाले राजभाषा अधिकारी इस प्रकार के अतार्किक शोर मचाते हैं और अपनी राजभाषा कार्यान्वयन विषयक कमजोरी को छुपने का प्रयास करते हैं। राजभाषा के विभिन्न पुरस्कारों के निर्णय का आधार होता है। सरकारी कार्यालयों के राजभाषा का प्रत्येक सजग विभाग अन्य कार्यालयों की राजभाषा प्रगति की जानकारी रखता है। राजभाषा की विभिन्न बैठकों में कार्यालयों के राजभाषा विषयक प्रगति की चर्चा व समीक्षा की जाती है। सब कुछ स्पष्ट रहता है फिर भी उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को कल्पित कथा सुनाकर कुछ राजभाषा अधिकारी राजभाषा को बदनाम करने की भूमिका निभाते हैं। 

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि उच्च प्रशासनिक अधिकारी सामान्यतया राजभाषा विषयक सूचनाओं के लिए अपने कार्यालय के राकभाषा विभाग पर निर्भर रहते हैं। उच्च प्रशासनिक अधिकारी राजभाषा कार्यान्वयन की वास्तविकता से परिचित हों इसीलिए नगर राजभाषा कार्यन्वयन समिति की बैठकों में कार्यालय प्रमुख की सहभागिता पर बल दिया जाता है। अब समय आ गया है कि वृहद परिप्रेक्ष्य में राजभाषा को  संबन्धित राजभाषा विभाग से बाहर निकाल कर एक नयी व्यापकता दें जिससे राजभाषा कार्यालय के प्रत्येक स्तर तक अपने स्पष्ट रूप में रहे। राजभाषा कार्यन्वयन के लिए पुरस्कार अति आवश्यक है किन्तु राजभाषा पुरस्कारों को विचित्र अफवाहों के दल-दल से बचाना भी बहुत जरूरी है। 

रविवार, 17 अगस्त 2014

बैंकों में राजभाषा का क्रान्ति वर्ष 2013-14

भारत सरकार की राजभाषा नीति के कार्यान्वयन के लिए बैंकों द्वारा प्रयास में काफी तेजी आई है। इस तेज़ी का एक प्रमुख कारण यह भी है कि भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग द्वारा तथा वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन के प्रति पिछले एक वर्ष के दौरान जो तेज़ी, गति और दिशानिर्देशों संग अनुवर्ती कार्रवाई की जा रही है उससे बैंकों के राजभाषा विभाग में एक नयी गति तथा तत्परता आई है। कृपया इसका यह अर्थ मत निकालिएगा कि इससे पहले बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन धीमी गति में था वस्तुतः इससे पहले कुछ गिने-चुने बैंकों में ही राजभाषा गतिशील थी अन्यथा शेष बैंक धारा 3(3) के अनुपालन तक ही सिमटे हुये थे। पिछले एक वर्षों से अर्थात वर्ष 2013 से विभिन्न राजभाषा विभागों द्वारा जितनी अनुवर्ती कार्रवाई की गयी उतनी पहले नहीं दिखलाई देती थी अतएव राजभाषा के इतिहास में वर्ष 2013 से राजभाषा कार्यान्वयन के परंपरागत ढंग में नवीनता लायी गयी जिसे सभी बैंकों ने खुले दिल से स्वीकारा और उसका कार्यान्वयन भी किया। यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। 

अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसा क्या हो गया वर्ष 2013 में कि राजभाषा में एक नवीन परिवर्तन संग नयी गति आई। इस विषय पर बहुत अधिक चर्चा ना कर यह कहा जा सकता है कि भारत सरकार, राजभाषा विभाग के सचिव द्वारा बैंकों के प्रशासनिक कार्यालयों तथा शाखाओं का सघन और गहन  निरीक्षण का अभियान तथा इस अभियान के अंतर्गत तात्कालिक समीक्षा और दिशनिर्देशों ने राजभाषा कार्यान्वयन को अधिक स्पष्ट और सरल बना दिया। बैंकों की प्रत्येक बैठक में संबन्धित बैंकों के उच्चाधिकारियों तथा कार्यपालकों की उपस्थिती ने बैंकों  में राजभाषा के प्राथमिकता में वृद्धि की । यहाँ यह भी उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि वर्ष 2013 से पहले भारत सरकार, राजभाषा विभाग के सचिव को अधिकांशतः सरकारी आयोजनों में ही सुना जा सकता था। जबकि अब सचिव विभाग के निदेशक संग स्वयंउपस्थित होकर संवाद करती हैं।  सचिव द्वारा इस पहल ने राजभाषा को एक नयी गरिमा और बैंकिंग कार्य के एक अनिवार्यता का स्वरूप प्रदान किया जो किसी अति कुशल शिल्पकार की कलाकृति से कम नहीं है।

प्रायः यह अनुभव किया गया है कि यदि उच्च स्तर से किसी कार्य के प्रति तेज़ी दिखलाई पड़ती है तो स्वतः वह प्रवाह सम्पूर्ण कार्यालयीन व्यवस्था को प्रभावित करता है। भारत सरकार, राजभाषा विभाग द्वारा नए दृष्टिकोण से राजभाषा कार्यान्वयन से प्रभावित होकर वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग ने सघन अनुवर्ती कार्रवाई आरंभ की । सघन शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया कि जब तक किसी पत्र का संतोषप्रद उत्तर वित्तीय सेवाएँ विभाग को प्राप्त नहीं हो जाता है तब तक लगातार अनुस्मारकों की बौछार लगी रहती है। यहाँ पर यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि वर्ष वर्ष 2013 से पहले वित्तीय सेवाएँ विभाग द्वारा पत्रों और अनुस्मारकों के इतने कार्रवाई को अनुभव नहीं किया गया था। वित्तीय सेवाएँ विभाग ने आपसी संवाद-सार्थक दिशा अभियान द्वारा राजभाषा को बैंकिंग कामकाज का अभिन्न हिस्सा बनाने की योजना आरंभ की जो मूलतः राजभाषा विभाग द्वारा की गयी पहल का प्रभाव था।

भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के वार्षिक कार्यक्रम के आधार पर वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग के सचिव ने राजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए विशेषकर उन बैंकों को दिशानिर्देश दिया जिन बैंकों के कार्यालय या शाखाएँ विदेशों में स्थित हैं। तदनुसार कुछ बैंकों के शीर्ष कार्यपालक विदेशों में राजभाषा कार्यान्वयन के लिए विभिन्न आयोजन किए। एक बैंक के कार्यपालक निदेशक ने विदेश स्थित अपने कार्यालय और शाखा में भारत से बैनर तैयार कर स्वयं ले गए और वहाँ प्रदर्शित किए। इसके अतिरिक्त आपसी संवाद-सार्थक दिशा पर चर्चा भी की। आपसी संवाद-सार्थक दिशा का मॉडल -2 भी तैयार होकर कार्यान्वयन की दिशा में अग्रसर है। वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग की यह एक उल्लेखनीय पहल और दिशानिर्देश है जिसने बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन को गति प्रदान की ।    

भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग और वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग की जुगलबंदी ने राजभाषा अधिकारियों की चेतना को और प्रखर कर धारदार बनाया जिससे कई बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन में उल्लेखनीय प्रगति हुयी जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यहाँ यह सोचना पूर्ण सत्य नहीं होगा कि चूंकि भारत सरकार, राजभाषा विभाग अति सक्रिय होकर निरीक्षण आदि करने लगा तो राजभाषा अति गतिशील हो गया। यद्यपि इस सोच में बहुत अधिक सत्यता तो है किन्तु इससे भी प्रमुख सत्य यह है कि बैंक कर्मियों को एक ऐसी सशक्त और स्वाभाविक प्रेरणा मिली कि वे स्वतः प्रेरित होकर राजभाषा में कार्य करने लगे। श्रेष्ठ राजभाषा कार्यान्वयन वही है जिसमें कर्मचारी स्वतः प्रेरित होकर कार्य करने लगें। 

लगभग एक वर्ष से कम समय में राजभाषा इतनी सशक्त हो गयी कि अब सभी बैंक ए टी एम से पर्ची द्विभाषिक (हिन्दी और अँग्रेजी ) देना आरंभ कर रहे हैं। ग्राहकों को उनके खाते की विवरणियाँ, पास बूक में प्रविष्टियाँ, डिमांड ड्राफ्ट आदि हिन्दी में देने की तैयारी को पूर्ण करने के अंतिम चरण में बैंक है। अब विभिन्न बैंकों के राजभाषा विभाग अपने दायित्वों को पूर्ण करने में व्यस्त हैं तथा इससे राजभाषा की लोकप्रियता में वृद्धि हुई है। यह भी अति महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है कि अपने सभी निरीक्षणों में और आयोजनों में सचिव राजभाषा द्वारा स्थानीय भाषा के महत्व को स्पष्ट किया जाता है तथा यह आग्रह भी किया जाता है कि राजभाषा में यथासंभव स्थानीय शब्दों को सम्मिलित किया जाये। सचिव द्वारा स्थानीय भाषा के महत्व को सुनकर स्थानीय स्टाफ और ग्राहक खुश होते हैं और राजभाषा से जुड़ जाते हैं। सचिव केवल बैंक कर्मियों को ही संबोधित नहीं करतीं हैं बल्कि ग्राहकों, विद्यार्थियों,हिन्दी के प्राध्यापकों, पत्रकारों आदि से भी राजभाषा विषय पर चर्चा कर राजभाषा पर आम सोच का विश्लेषण करती हैं और यथावश्यक दिशानिर्देश देती हैं। 

राजभाषा की उक्त गतिविधियां जारी हैं और आगे कुछ नया और क्या होनेवाला है इसकी उत्सुकता भी है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग और वित्त मंत्रालय,वित्तीय सेवाएँ, राजभाषा विभाग के राजभाषा कार्यान्वयन की उक्त नयी शैली ने वर्ष 2012-13 को राजभाषा कार्यान्वयन का क्रान्ति वर्ष बना दिया है। प्रसंगवश उल्लिखित किया जा रहा है कि जब भी कोई नया कदम उठाया जाता है तो ऐसा भी होता है कि कुछ लोगों को असुविधा होती है क्योंकि ढर्रे पर चल रहे कार्य में कई घुमाव आ जाते हैं जिससे आरंभिक दौर में कुछ अनावश्यक हलचल होती है। इस क्रान्ति वर्ष में उपलब्धियों के अंबार विरुद्ध कुछ असुविधाओं के टीले भी उभरते और लुप्त हो जाते  हैं। राजभाषा कार्यान्वयन की यह नयी गति ऐसे टीलों को राजभाषाई जुगनू मानकर अनदेखा कर प्रगति मार्ग प्रशस्त करते जा रही है।   
  


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बुधवार, 5 जून 2013

ग क्षेत्र की गुहार

ज्ञातव्य है कि पूरे देश को तीन भाषिक क्षेत्र क, ख और ग में बांटा गया है। राजभाषा कार्यान्यवन की दृष्टि से ग क्षेत्र पर विशेष ध्यान देने की बात कही जाती है क्योंकि ग क्षेत्र की लिपि देवनागरी लिपि से काफी भिन्न है जिससे इस क्षेत्र में राजभाषा कामकाज में अन्य भाषिक क्षेत्रों की तुलना में कठिनाई अधिक होती है। क क्षेत्र हिन्दी भाषी क्षेत्र के रूप में जाना जाता है जबकि ख क्षेत्र के राज्यों की लिपि देवनागरी और देवनागरी लिपि सदृश्य होने के कारण हिन्दी भाषा के काफी करीब मानी  जाती है। इसके विपरीत ग क्षेत्र के राज्यों की लिपि देवनागरी लिपि से भिन्न होने के कारण राजभाषा से उतनी सहजता और सुगमता से अपना ताल-मेल नहीं बिठा पाती है। इसलिए ग क्षेत्र में राजभाषा कार्यान्यवन की कार्यनीतियाँ बिलकुल अलग और विशेष होती हैं। इस तथ्य पर विशेष ध्यान दिये बिना अधिकांश केंद्रीय कार्यालय, बैंक और उपक्रम ग क्षेत्र के लिए राजभाषा कार्यान्यवन के लिए विशेष योजना नहीं बनाते हैं फलस्वरूप परिणाम उत्साहवर्धक नहीं होते हैं।

      परिणामों में केवल राजभाषा के विभिन्न पुरस्कार ही नहीं सम्मिलित हैं बल्कि इसमें सम्प्रेषण भी सम्मिलित है। संपर्क, संवाद और संयोजन की एक सशक्त कड़ी सम्प्रेषण है और यदि सम्प्रेषण बाधित हो जाये तो क्या किया जा सकता है ? कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि जो संप्रेषित हो चुका है वह अपने श्रोता की भाषिक समझ के अनुसार अपना प्रभाव डाल चुका होता है। इसी भाव को यदि दूसरे शब्दों में अभिव्यक्त किया जाये तो उपमाओं और अलंकारों में अपनी बात कहनेवाला राजभाषा अधिकारी क और ख क्षेत्र में एक रोचक वक्ता के रूप में लोकप्रिय हो सकता है किन्तु ग क्षेत्र में ऐसे वक्ता को समझने के लिए कर्मचारियों को अधिक अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है। इतना ही नहीं बल्कि हिन्दी में सम्प्रेषण का  कहीं-कहीं अर्थ का अनर्थ भी निकल जाता है। अर्थ का अनर्थ निकलना एक स्वाभाविक घटना है न कि एक भाषिक दुर्घटना। शब्दों का भी अपना एक निजी स्पंदन होता है जिसमें देश, काल, स्थान की सांस्कृतिक, सामाजिक आदि अभिव्यक्ति निहित होती है।

      सम्प्रेषण और अभिव्यक्ति के बीच किसी भी भाषा के शब्द एक सेतु की भूमिका निभाते हैं। सेतु जितना सीधा, सपाट और सहज होगा गतिशीलता उतनी ही प्रखर और प्रयोजनमूलक होगी। ग क्षेत्र की भाषाएँ यद्यपि संस्कृत के शब्दों को भी अपने में समेटे हुये हैं किन्तु यदि उर्दू मिश्रित हिन्दी का प्रयोग किया जाता है तो कठिनाई उत्पन्न हो जाती है। ग क्षेत्र के कार्यालयों आदि में राजभाषा के खालिस रूप में जो भी सम्प्रेषण किया जाएगा उसका परिणाम अच्छा निकलेगा। हिन्दी को आकर्षक बनाने के लिए यदि उर्दू की शब्दावली का सहारा लिया गया, या उपमा और अलंकार से सजाने की कोशिश की गयी तो समझिए अस्पष्ट अर्थ की ओर बढ़ने का खतरा उठाया जा रहा है। ऐसे में कहा या लिखा कुछ जाएगा और समझा कुछ जाएगा। ग क्षेत्र में भाषा को लेकर भावों की उड़ान नहीं भरी जा सकती बल्कि कार्यालय के धरातल पर रहकर छोटे-छोटे सरल, सीधे वाक्यों में अभिव्यक्ति ही सफल होती है। ना तो कविता चल पाएगी, ना ही ग़ज़ल अपना प्रभाव छोड़ पाएगा यदि कुछ चल पाएगा तो हिन्दी फिल्मों का लोकप्रिय गीत चल सकेगा। बस ग क्षेत्र में भाषिक रूप से उड़ान की सामान्यतया यही सीमा है।

      ग क्षेत्र के कार्यालयों में स्थानांतरण करते समय सामान्यतया इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि ऐसे राजभाषा अधिकारियों को स्थानांतरित किया जाये जो ग क्षेत्र के किसी एक राज्य की भाषा या संस्कृति से बखूबी परिचित हों। ऐसे राजभाषा अधिकारी भी सफल रहते हैं जो अंग्रेजी भाषा की तरह राजभाषा में जो लिखते हैं वही बोलते हैं। ग क्षेत्र के कर्मियों में राजभाषा को सीखने की लगन है किन्तु सीखने की यह लालसा विशेषकर राजभाषा की शब्दावली पर निर्भर करती है। इस क्षेत्र के लोग जितनी सहजता से राजभाषा शब्दावली को सीख लेते हैं उतनी आसानी से हिन्दी बोलचाल के शब्दों को नहीं सीख पाते हैं। यह फर्क इसलिए है क्योंकि राजभाषा के शब्द अंग्रेजी में पहले से ही जबान पर रहते हैं उसका हिन्दी शब्द अपनाने में अधिक समय नहीं लगता। राजभाषा का शब्द अंग्रेजी शब्द का प्रतिरूप रहता है इसलिए पूर्णतया अपरिचित नहीं लगता है। छोटे सरल वाक्य और राजभाषा के शब्द इस क्षेत्र में राजभाषा की सरिता निर्मित करने की क्षमता रखते हैं। इस क्षेत्र में पदस्थ राजभाषा अधिकारी को अपने राजभाषा के सामान्य पत्राचार में लंबे-लंबे पत्रों को नहीं लिखना चाहिए। हिन्दी की तिमाही रिपोर्ट की समीक्षा या शाखा निरीक्षण की रिपोर्ट आदि स्वभावतः लंबे हो जाते हैं जिसे लिखते समय यथासंभव इन्हें स्पष्ट और छोटा रखना आवश्यक है। ग क्षेत्र में प्रायः हिन्दी में लिखे लंबे पत्र अपने उद्देश्य में पूर्णतया सफल नहीं हो पाते हैं।


      ग क्षेत्र की यही गुहार है कि वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्यों की तरह विभिन्न केंद्रीय कार्यालय, बैंक और उपक्रम अपने स्तर पर भी ग क्षेत्र के लिए विशेष योजना बनाएँ जिसमें राजभाषा अधिकारी की पदस्थापना, हिन्दी कार्यशाला प्रशिक्षण की समय सारिणी, कार्यशाला सामग्री, हिन्दी माह, पखवाड़ा, सप्ताह का आयोजन, क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न प्रोत्साहन योजनाएँ, नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति की क्षेत्र विशेष की लोकप्रिय राजकीय भाषा को दृष्टिगत रखते हुये विशेष योजनाएँ आदि सम्मिलित हैं। राजभाषा कार्यान्यवन में उल्लेखनीय प्रगति और उपलब्धि के लिए एक विशेष सोच को लागू करना समय की मांग है। व्यवहार में इसमें आरंभिक कठिनाई हो सकती है किन्तु एक बार गति मिल जाने से इसमें निरंतर सहजता और सरलता आती जाएगी। आवश्यकता है बस एक सार्थक पहल की।       

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सोमवार, 29 अप्रैल 2013

क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन – एक सत्य-एक स्वप्न



    प्रत्येक सरकारी कार्यालय, बैंक और उपक्रम को वर्ष में एक बार क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है। यह सम्मेलन राजभाषा का एक अति महत्वपूर्ण सम्मेलन के रूप में अपनी छवि बनाए हुये है। इस आयोजन को यदि राजभाषा का कुम्भ कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगाक्षेत्र विशेष में कार्यरत नगर राजभाषा कार्यान्यवन समितियां तथा उस समिति के सदस्य कार्यालय वर्ष भर आपसी तालमेल से नगर में राजभाषा कार्यान्यवन के विकास में प्रयासशील रहते हैं। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के वार्षिक कार्यक्रम और अनुदेशों के अनुपालन की पुष्टि क्षेत्रीय कार्यान्यवन कार्यालय को प्रेषित करते रहते हैं। इन सब प्रक्रियाओं के प्रतिफल में श्रेष्ठ राजभाषा कार्यान्यवन करनेवाले कार्यालयों, बैंकों और उपक्रमों को पुरस्कृत किया जाता है। पुरस्कार के अतिरिक्त राजभाषा की नवीनतम उपलब्धियों और सूचनाओं की जानकारी भी मिलती है।

    क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन को राजभाषा का कुम्भ कहने का आशय यही है कि यहाँ राजभाषा विभाग के सचिव से लेकर विभिन्न कार्यालयों में कार्यरत राजभाषा अधिकारियों से मिलने का अवसर मिलता है, उन्हें सुनने का और अपने विचारों और सुझावों को प्रस्तुत करने का प्रचुर मौका मिलता है। इस प्रकार राजभाषा के विभिन्न भावों को अभिव्यक्ति मिलती है। राजभाषा का संपूर्णता में चिंतन और मनन होता है। प्रौद्योगिकी में राजभाषा के नए कदमों की  जानकारी मिलती है। यह सम्मेलन राजभाषा की एक साफ-सुथरी दृष्टि प्रदान करता है जिससे राजभाषा के असुलझे प्रश्नों को समाधान मिल जाता है। अन्य राजभाषा अधिकारियों से चर्चा कर राजभाषा की विभिन्न गति और प्रगति की जानकारी मिलती है। पंजीकरण के समय विभिन्न कार्यालयों की पत्रिकाओं से भी परिचय होता है जिसके माध्यम से कार्यालय कर्मियों में लेखन के क्षेत्र में हो रही उन्नति की झलक भी मिलती है।

    लेकिन क्या इतने से ही राजभाषा सम्मेलन को पूर्णता प्राप्त हो जाती है? वस्तुतः इतने से ही राजभाषा कार्यान्यवन का व्यापकता और गहनता से आकलन कर यथोचित दिशानिर्देश दिया जाता है। उक्त परिच्छेद में उल्लिखित सत्यता के अतिरिक्त सम्मेलन की हलचलों में ऐसे अनेक कथ्य उभरते रहते हैं जो सम्मेलन की कार्यसूची के अनुसार नहीं होते हैं किन्तु राजभाषा के कामकाज की प्रणाली की कई दिशाओं की ओर एक अस्पष्ट ईशारा मात्र होते हैं। यह कथ्य सम्मेलन में सम्मिलित राजभाषा अधिकारियों या राजभाषा से जुड़े कर्मियों की अभिव्यक्ति होती  हैं। राजभाषा के विभिन्न पक्षों के कथ्य सार्थक या निरर्थक होते हैं इसपर एक व्यापक बहस हो सकती है किन्तु यहाँ इस कहावत का उल्लेख करना आवश्यक है कि बिना आग धुआँ नहीं निकलता है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि ऐसे कथ्य किसी खास सम्मेलन में कहे जाते हों बल्कि लगभग सभी राजभाषा सम्मेलनों में कहे जाते हैं। ऐसे ही कुछ कथ्य निम्नलिखित हैं :-

1.   पंजीकरण के समय बैग प्रदान करना:- सम्मेलन के आरंभ में प्रतिभागियों द्वारा पंजीकरण के समय प्रत्येक सम्मेलन में एक बैग प्रदान किया जाता है। यह बैग किसी कार्यालय द्वारा प्रायोजित होता है। किसी सम्मेलन में इस प्रकार दिये जानेवाले बैग पर प्रायोजक कार्यालय का नाम नहीं होता है तो कहीं नाम के साथ बैग प्रदान किए जाते हैं।
कथ्य : बैग प्रदान करनेवाला कार्यालय पुरस्कार विजेता होता है। कभी भी ऐसा नहीं हुआ है कि बैग प्रदान करनेवाला कार्यालय पुरस्कार विजेता ना रहा हो। ऐसा क्यों होता है? पुरस्कार और बैग का क्या आपसी संबंध है? यह कथ्य प्रत्येक सम्मेलन में उभरता है और और पंजीकरण स्थल के परिवेश में घूमकर लुप्त हो जाता है।

2.  पुरस्कार के अंकों की जानकारी ना देना : - पुरस्कारों की घोषणा कर दी जाती है किन्तु मूल्यांकन के अंकों को बतलाया नहीं जाता है। राजभाषा कार्यान्यवन प्रेरणा और प्रोत्साहन पर आधारित है इसलिए यदि मूल्यांकन के अंकों की जानकारी क्षेत्राधीन सभी कार्यालयों को प्रदान कर दी जाय तो राजभाषा कार्यान्यवन में एक विशेष सकारात्मक ऊर्जा का संचरण होगा।
कथ्य: मंच पर जब पुरस्कार प्रदान किया जाता है तो सभागार में यह बुदबुदाहट मुखरित होती है कि पुरस्कार मैनेज किया गया है। इस प्रकार के कथ्य सभी सम्मेलनों में सुनाई पड़ते हैं। किसी भी सम्मेलन के सभगार में इस प्रकार के कथ्यों के विरोध में आज तक कोई आवाज नहीं उभरी। क्या सम्मेलन दर सम्मेलन इस प्रकार के कथ्य राजभाषा कार्यान्यवन के लिए स्वास्थ्यवर्धक और परिणामदाई हो सकते हैं?

3.  राजभाषा अधिकारी से अन्य कार्य लिया जाना :- प्रत्येक सम्मेलन में खुला सत्र होता है जिसमें सहभागी राजभाषा विषयक अपने विचार, सुझाव आदि को प्रस्तुत करते हैं। इस खुले सत्र में उठाए जानेवाले सवाल भी लगभग पारंपरिक होते हैं जिसमें से बैंककर्मी सहभागी यह सवाल उठाते हैं कि बैंकों में राजभाषा अधिकारी को राजभाषा के कार्यों के अतिरिक्त बैंक के अन्य कार्य क्यों दिये जाते हैं? मंच इस प्रश्न को आवश्यक कार्रवाई हेतु नोट कर लेता है। एक आश्वासन भी दिया जाता है। प्रश्नकर्ता संतुष्ट भाव से इस विषयक संभावित अनुकूल परिवर्तन की प्रतीक्षा करने लगता है।
कथ्य: सभागार में यह आवाज भी उभरती है कि बैंक कि आंतरिक व्यवस्था को इस मंच पर प्रस्तुत करने का प्रयोजन क्या है? अपनी आवश्यकतानुसार बैंक अधिकारी की सेवाएँ लेता है अतएव इस प्रणाली में राजभाषा विभाग की क्या भूमिका हो सकती है? कुछ प्रतिक्रियाएँ ऐसी भी गूँजती है कि राजभाषा अधिकारी की प्रतिभा और क्षमता पर यह निर्भर करता है। यदि राजभाषा अधिकारी राजभाषा कार्यान्यवन में पूर्णतया व्यस्त है तो वह अन्य कार्य के लिए समय ही नहीं दे पाएगा। इस विषयक समय-समय पर पत्र भी जारी किया जाता है। राजभाषा अधिकारी द्वारा सम्मेलनों में यह प्रश्न क्यों उठाया जाता है, यह अस्पष्ट है।

4.  वेतनमान में असंगतियाँ: केंद्रीय कार्यालय के सहभागी वेतनमान की असंगतियों को दूर करने का मुद्दा उठाते हैं जिसपर मंच से उत्तर दिया जाता है कि इस दिशा में निरंतर सुधार हो रहा है।
कथ्य: सभागार में यह आवाज उठती है कि यह सम्मेलन वेतनमान की विसंगतियों के लिए नहीं है बल्कि राजभाषा कार्यान्यवन विषयक चर्चाओं के लिए है। इस तरह के प्रश्न ना केवल अप्रासंगिक होते हैं बल्कि समय चुरानेवाले भी हैं।

5.   राजभाषा से जुड़े सभी समस्याओं के समाधान की तलाश: सम्मलेन में सहभागी अधिकांश राजभाषा अधिकारी और कर्मी यह सोचकर आते हैं कि राजभाषा विषयक सभी समस्याओं का तत्काल हल सम्मेलन में मिल जाएगा। राजभाषा विषयक कुछ ऊंची अपेक्षाएं जो यथार्थ के आवरण में लिपटी मूर्त रूप पाने के लिए उत्कंठित रहती हैं वह सम्मलेन में सशक्त रूप से मुखरित होने के लिए इतनी लालायित हो जाती हैं कि प्रायः अनियंत्रित अभिव्यक्ति का रूप ले लेती हैं। मंच प्रायः सांकेतिक दिशानिर्देश देता है जबकि सहभागी मंच से इतने स्पष्ट दिशानिर्देश की अपेक्षा रखते हैं कि उससे तत्काल परिणामदायी परिवर्तन हो जाये।
कथ्य: राजभाषा अधिकारियों और राजभाषा से जुड़े कर्मियों के लिए यह सम्मेलन एक वार्षिक राजभाषा उत्सव है जिसमें वे ना केवल अपने क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर कार्यरत राजभाषा अधिकारियों से मिलते हैं बल्कि राजभाषा विभाग के सचिव, संयुक्त सचिव आदि राजभाषा के वरिष्ठ अधिकारियों से मिलता हैं उन्हें सुनते हैं। क्षेत्रीय कार्यान्यवन कार्यालय से क्षेत्र विशेष की ज्वलंत समस्याओं को प्राप्त कर उनका समाधान किया जाये तो सम्मेलन और प्रभावशाली हो जाएगा।

6.  सम्मेलन में लिए गए निर्णयों का कार्यान्यवन: सम्मेलन में यह भी प्रसंग चर्चा में रहता है कि लिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों का कार्यान्यवन कहाँ होता है। लगभग प्रत्येक वर्ष यह सम्मेलन बहुत कुछ राजभाषा कार्यान्यवन के लिए दे जाता है जिसको सुनकर सम्मेलन स्थल तालियों की गड़गड़ाहट से काफी समय तक गूँजता रहता है किन्तु सम्मेलन के कई दिनों तक कार्यान्यवन की प्रतीक्षा कमतर होते-होते लुप्त हो जाती है और कुछ महीनों में नया सम्मेलन आ जाता है। यह भी चर्चा होती है कि हर वर्ष होनेवाले इस सम्मेलन का एक-दूसरे सम्मेलन से कोई नाता नहीं रहता है यद्यपि प्रत्येक सम्मेलन कि कार्यसूची एक समान होती है।
कथ्य: संबन्धित क्षेत्रीय कार्यालय यदि सम्मेलन का कार्यवृत्त तैयार कर अपने क्षेत्र के कार्यालयों को प्रेषित कर दे और आगामी सम्मेलन में कार्यवृत्त के महत्वपूर्ण निर्णयों की कृत कार्रवाई की सूचना प्रदान कर दे तो सम्मेलन और अधिक प्रभावशाली हो जाएगा।

7.  कार्यालय अध्यक्ष की उपस्थिती का लाभ उठाया जाये: सम्मेलन में कार्यालय अध्यक्ष आते हैं और चले जाते हैं। पुरस्कार विजेता कार्यालय अध्यक्ष पुरस्कार ग्रहण कर बैठ जाते हैं। ऐसी स्थिति में यह भी विचार आता है कि सिर्फ बैठने के लिए सम्मेलन में क्यों जया जाये। राजभाषा विभाग का जो भी अनुदेश, दिशानिर्देश होगा उसका पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित कर लिया जाएगा। शायद यह भी एक कारण हो सकता है कि पुरस्कार विजेता कार्यालय अध्यक्ष के अतिरिक्त अन्य कार्यालयों से कार्यालय अध्यक्ष अपेक्षाकृत कम आते हैं।
कथ्य: सम्मेलन का कुछ समय कार्यालय अध्यक्ष के लिए निर्धारित किया जाये और पुरस्कार विजेता कार्यालयों के कार्यालय अध्यक्ष से राजभाषा कार्यान्यवन पर बोलने का अनुरोध किया जाये। अन्य कार्यालय के अध्यक्षों को भी बोलने के लिए आमंत्रित किया जाये। राजभाषा कार्यान्यवन के लिए यह प्रक्रिया विशेष लाभदायक साबित होगी।

यहाँ ना तो कोई सुझाव देने की कोशिश की जा रही है और ना ही किसी पक्ष को उत्तरदायी बनाकर सवालों की बौछार की जा रही है। बस एक प्रयास किया जा रहा है सम्मेलनों में प्रतिवर्ष बुदबुदाहट में उठे प्रश्नों को पिरोकर प्रस्तुत करने और एक समाधान के द्वारा उस दिशा में नए कर्म करने या नए निर्णय लेने का, आखिर जब बात राजभाषा कार्यान्यवन की उठती है तो नयी संभावनाओं को तलाशने के लिए मन स्वतः सक्रिय हो उठता है। यह राजभाषाई मन के नूतन दिशा गमन लिए चाहत की अकुलाहट भरी प्रस्तुति मात्र है।                       



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