शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

राजभाषा विभाग की हिंदी पत्रिकाएं

प्रत्येक सरकारी कार्यालय, बैंक, उपक्रम में सामान्यतया दो पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं जिसमें से एक गृह पत्रिका होती है तथा दूसरी राजभाषा विभाग की पत्रिका होती है। गृह पत्रिका द्विभाषिक होती है जबकि राजभाषा विभाग की पत्रिका केवल हिंदी में होती है। यदि राजभाषा विभाग की पत्रिका और गृह पत्रिका दोनों का अवलोकन किया जाए तो यह ज्ञात होता है कि सामग्री की दृष्टि से दोनों में समानता है और गृह पत्रिका केवल अंग्रेजी सामग्रियों के कारण राजभाषा विभाग की पत्रिका से भिन्न हैं अन्यथा दोनों पत्रिकाओं में बात एक ही है। ऐसी स्थिति में दोनों पत्रिकाओं की सामग्री में फर्क कर पाना मुश्किल होता है परिणामस्वरूप पाठक स्टाफ में एक उलझन की स्थिति निर्मित होती है। यहां यह कह देना आवश्यक है कि कुछ राजभाषा विभाग की पत्रिकाएं अपनी विशेष पहचान बनाए हुए हैं जिनकी संख्या काफी कम है। एक ही प्रकार की सामग्री सहित एक ही कार्यालय से दो पत्रिकाओं के प्रकाशन के औचित्य पर विचार कर आवश्यक परिवर्तन करने के बारे में सोचा क्यों नहीं गया यह एक आश्चर्यचकित करनेवाली स्थिति है।

यदि राजभाषा विभाग की पत्रिका पर गौर किया जाए तो यह प्रतीत होता है कि अधिकांश पत्रिकाएं – "छाप दिया जाए, प्रकाशित कर दिया" जाए शैली में कार्यरत हैं। सर्वविदित है कि राजभाषा विभाग की पत्रिकाओं का एकमात्र उद्देश्य राजभाषा कार्यान्वयन के विविध पक्षों में गतिशीलता लानी है। अपने-अपने क्षेत्रों से प्रकाशित यह पत्रिकाएं अपने क्षेत्र के कर्मियों के लिए कितनी सामग्री, संदर्भ साहित्य आदि प्रस्तुत करती हैं यदि इसका विश्लेषण किया जाए तो उत्साहजनक स्थिति नहीं होगी। इस पत्रिका में प्राय: हिंदी के किसी प्रतिष्ठित साहित्यकार की रचना होती है और स्टाफ-सदस्यों की कहानी, कविता, व्यंग्य, पाककला, चुटकुले, हिंदी के विभिन्न प्रतियोगिताओं के पुरस्कार विजेताओं की सूची, विभिन्न आयोजनों के फोटो आदि के अतिरिक्त संदेश एवं संपादकीय होता है। पत्रिका का यह कलेवर अपने मूल उद्देश्य से हटकर कहीं व्यावसायिक पत्रिकाओं का अनुसरण करते हुए प्रतीत होता है। क्या यह कलेवर पत्रिका को राजभाषा कार्यान्वयन के लिए प्रेरक या मार्गदर्शक की भूमिका में प्रस्तुत करने में सहायक होगा यह एक विचारणीय मुद्दा है।

राजभाषा विभाग की पत्रिका को अपने आप में अति विशिष्ट और अपने क्षेत्र की कर्मियों की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। भारत सरकार की राजभाषा नीति को क्रमश: और निरन्तर प्रकाशित करते रहना चाहिए। प्रौद्योगिकी के माध्यम से भारतीय भाषाई सामंजस्यता के विभिन्न रूपों को सोदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। क्षेत्र विशेष की भाषाओं सहित उसका हिंदी पाठ से इतर राज्यों से आए स्टाफ को सहज ही भाषा परिचय हो सकेगा। स्टाफ सदस्यों को हिंदी में मौलिक लेखन के लिए प्रोत्साहन के साथ-साथ प्रत्येक अंक में नए स्टाफ के योगदान का समावेश सुनिश्चित करना चाहिए। इस प्रकार अनेकों ऐसे माध्यम हैं जिसके द्वारा पत्रिका स्टाफ तक और स्टाफ पत्रिका तक पूर्णतया पहुंच सकते हैं। सामन्यतया यह पाया गया है कि पत्रिका पूर्णतया स्टाफ केन्द्रित नहीं रहती है बल्कि उसका झुकाव साहित्य की तरफ अधिक होता है। प्रसंगवश यहॉ भारतीय रिज़र्व बैंक की पत्रिका बैंकिंग चिंतन-अनुचिंतन का उल्लेख करने से रूक पाना कठिन है क्योंकि यह पत्रिका अपने आप में एक आदर्श रूप है। राजभाषा विभाग द्वारा प्रकाशित पत्रिका में बैंकिंग साहित्य के अलावा इतर साहित्य का समावेश विशेष अवसरों पर अधिकतम दो पन्नों का किया जाए तो पत्रिका का उद्देश्य बरकरार रहता है। ज्ञातव्य है कि इस प्रकार की पत्रिकाएं आंतरिक परिचालन के लिए होती हैं इसलिए इनका लक्ष्य भी आंतरिक परिवेश के अनुरूप होना चाहिए।

संपादन किसी भी पत्रिका का मेरूदंड होता है। यद्यपि यह भी एक कटु सत्य है कि संपादक की भूमिका निभानेवाले राजभाषा अधिकारियों में से अत्यधिक अल्प लोगों को संपादन का सामान्य ज्ञान और रूझान होता है इसलिए इन पत्रिकाओं का अवलोकन करते समय एक अलग नज़रिया की आवश्यकता होती है। अधिकांशत: राजभाषा अधिकारियों की पृष्टभूमि साहित्य की होती है इसलिए उनके लिए हिंदी साहित्य और कार्यालयीन साहित्य में अन्तर कर पाना कठिन हो जाता है और इसीलिए पत्रिका में इन दोनों साहित्य का न तो बेहतरीन तालमेल दिखलाई पड़ता है और ना ही पत्रिका अपनी विशेष छवि ही बना पाती है। यहॉ पर संपादक पर प्रश्न चिह्न लग जाता है। संपादक ही सामग्री को संपादक मंडल के समक्ष रखता है इसलिए सामग्री का प्रथम चयन संपादक ही करते हैं। संपादक ही पत्रिका को रूप और दिशा देता है इसलिए पत्रिका की सफलता का दारोमदार प्रमुखतया पत्रिका के संपादक पर ही होता है। कार्यालयीन पत्रिका के प्रकाशन के लिए संस्था विशेष की जानकारी तथा राजभाषा नीतियों के ज्ञान के साथ-साथ इस विषयक अनोखी परिकल्पनाएं अत्यावश्यक है। राजभाषा कार्यान्यन का स्वप्न देखनेवाला ही राजभाषा विभाग से स्तरीय पत्रिका का प्रकाशन कर सकता है।

वर्तमान में निकलनेवाली राजभाषा विभाग की पत्रिकाओं के संपादकों का प्रत्येक छमाही में बैठक आवश्यक है जहॉं पर पत्रिका के माध्यम से राजभाषा कार्यान्वयन के लिए नए कदमों पर चर्चा हो तथा तदनुसार कार्यान्वयन हो। एक पत्रिका प्रकाशन आवश्यक है इसलिए पत्रिका प्रकाशित की जानी चाहिए जैसी सोच से इन पत्रिकाओं की गुणवत्ता में सुधार नहीं होगा। संपादक मंडल में संस्था विशेष के उच्चाधिकारी रहते हैं जो समय-समय पर मार्गदर्शन देते रहते हैं किंतु सामग्री एकत्र करना आदि संपादक मंडल का नहीं बल्कि संपादक, सह-सम्पादक आदि का कार्य है। प्रत्येक कार्यालय राजभाषा विभाग की पत्रिका के लिए लगातार सहयोग प्रदान करते रहता है तथा पत्रिका को राजभाषा कार्यान्वयन में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए ऊँचाई प्रदान करना संपादक और कार्यालय विशेष के राजभाषा विभाग का कार्य है।


Subscribe to राजभाषा/Rajbhasha

रविवार, 28 नवंबर 2010

व्यापकता की तलाश में राजभाषा कार्यान्वयन

हमारे देश में राजभाषा का दौर राजभाषा नीति के तहत अस्सी के आरम्भिक दशक से आरम्भ हुआ तथा तब से अब तक राजभाषा कार्यान्वयन में कोई व्यापक परिवर्तन नहीं हुआ है। यदि मैं कहूं कि यात्रिक, प्रौद्योगिकी, फांन्ट को छोड़कर कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। राजभाषा कार्यान्वयन में प्रगति अवश्य होती रही है जिसकी गति अधिकांशत: धीमी ही रही है। मैंने अस्सी के दशक के आरम्भ का उल्लेख इसलिए किया क्योंकि राजभाषा का गति का अनुभव केन्द्रीय कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों के कर्मियों को इसी समय से होना आरम्भ हुआ। तीन दशक बीत जाने के बाद भी राजभाषा कार्यान्वयन में अभी तक अस्सी के दशक की ही छाप है। कुछ निम्नलिखित उदाहरणों से इस कथन की सच्चाई को तलाशने का प्रयास किया जाएगा।

राजभाषा नीति : किसी भी केन्द्रीय कार्यालय, बैंक, उपक्रम के स्टाफ से यदि राजभाषा नीति की चर्चा की जाए तो वह बोल उठेगा – भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग, जिसमें राजभाषा शब्द इस वाक्य के शेष दो शब्दों से गौण माना जाता है। कर्मचारियों के मन में राजभाषा को स्थापित करने की कोशिश की जाती है जिसमें भारत सरकार का उल्लेख अत्यधिक प्रभावशाली होता है तथा गृह मंत्रालय इसको और अधिक स्वीकार्य योग्य बनाता है। यहॉ धमकी की और ईशारा बिलकुल नहीं है बल्कि कार्यान्वयन को गति देने के लिए यह करना अस्सी के दशक से लेकर नब्बे की दशक तक आवश्यक था अन्यथा कार्यान्वयन उतनी सहजता से नहीं दो पाता जितनी सहजता से तब हुआ। देखा जाए तो अब भी भारत सरकार, गृह मंत्रालय का नाम राजभाषा से जोड़े बिना कार्यान्वयन को गति नहीं मिल पाती है। राजभाषा को स्वतंत्र करने की कोशिश में और गति लाने की आवश्यकता है। होना यह चाहिए कि राजभाषा का नाम लेते ही भारत सरकार, गृह मंत्रालय का नाम स्वत: ही याद आ जाए। इसी प्रकार राजभाषा के नियमों का उल्लेख कर कर्मचारियों राजभाषा में कामकाज के लिए सचेत किया जाता है। राजभाषा को अब नियमों, अधिनियमों से आगे निकलकर कर्मचारियों की आदत में शुमार होना चाहिए।

हिंदी कार्यशाला : हिंदी कार्यशाला में अब से बीस वर्ष पूर्व जिस संदर्भ सामग्री की सहायता ली जाती थी वह अब भी जारी है। इसमें प्रौद्योगिकी विषय से कुछ नवीनता आई है अन्यथा वही राग, वही बात। राजभाषा प्रशिक्षण के लिए राजभाषा या हिंदी कार्यशालाओं का खूब आयोजन होता है इसलिए एक कर्मचारी को कई बार इस कार्यशाला में सहभागी के रूप में सम्मिलित होना पड़ता है तथा सम्मिलित कर्मचारी जब अनुभव करता है कि वही पुराना पाठ्यक्रम, वही चर्चा के विषय तब उसे राजभाषा कार्यशाला से जुड़ पाना कठिन लगने लगता है, ऊबन का अनुभव होने लगता है परिणामस्वरूप वह कार्यशाला में केवल शारीरिक रूप में उपस्थित हो पाता है। इस प्रकार कार्यशाला काग़जों पर कुछ आंकड़ों के साथ पड़ी रह जाती है तथा इसका मूल धेय पराजित हो जाता है। यह सिलसिला अब भी जारी है।

राजभाषा निरीक्षण : प्राय: राजभाषा अधिकारी राजभाषा कार्यान्वयन के निरीक्षण के लिए अपने अधीनस्थ कार्यालयों में जाते हैं और निरीक्षम करते समय केवल फाईलों से जुड़े रहते हैं तथा उन फाईलों के निरीक्षण के बाद स्टाफ से सामूहिक चर्चा कर तत्काल आवश्यक दिशानिर्देश नहीं देते जिससे सम्प्रेषण नहीं हो पाता है। यह सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है।

उपरोक्त कुछ उदाहरण है जो यह दर्शाते हैं कि राजभाषा कार्यान्वयन में नएपन की आवश्यकता है। यह नयापन कहीं और से नहीं लाना है बल्कि नवीनता संस्था विशेष की कार्यशैली में ही छुपी रहती है, बस उससे राजभाषा को जोड़ने के कुशल प्रयास की आवश्यकता है। कुशलता का उल्लेख इसलिए किया जा रहा है कि प्राय: इस प्रकार के जुड़ाव से राजभाषा गौण हो जाती है तथा संस्था विशेष का अन्य समसामयिक मुद्दा उसपर हावी हो जाता है। यदि कारोबार के किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयास किया जा रहा हो तो राजभाषा को कारोबार विकास का एक लोकप्रिय माध्यम बनाकर प्रस्तुत किया जाता है तथा कुछ दिनों बाद सिर्फ कारोबार का लक्ष्य रह जाता है तथा राजभाषा गौण हो जाती है। ऐसी स्थिति में राजभाषा को बनाए रखना एक कौशल है।

राजभाषा को व्यापकता प्रदान करने के लिए कार्यान्वयन की शैली में संस्था के दायरे के अन्तर्गत अभिनव परिवर्तन लाना चाहिए। राजभाषा को केवल राजभाषा नीति और भारत सरकार, गृह मंत्रालय के अतिरिक्त कर्मचारियों से भी जोड़ कर देखना चाहिए। एक ऐसा वातावरण निर्मित करना चाहिए जिससे राजभाषा कार्यान्वयन की नई धड़कनों का अनुभव समस्त कर्मचारियों को होता रहे। प्रत्येक कार्यालय में समय-समय पर नए संदर्भ साहित्य तैयार होते रहते हैं, नई शैली तथा नए कार्यप्रणाली से कर्मचारी परिचित होते रहते हैं आदि-आदि किन्तु इस परिप्रेक्ष्य में यदि राजभाषा को देखें तो उसमें नवीनता बहुत मुश्किल से मिलती है। यह भी एक कारण है जिससे राजभाषा कार्यान्वयन प्रभावित होती है। यदि राजभाषा नीति के अंतर्गत राजभाषा कार्यान्वयन के व्यपकता का चिंतन होगा तो अनेकों नायाब तरीकों से परिचय होगा जिससे राजभाषा कार्यान्वयन में नई ताजगी झलकने लगेगी।




Subscribe to राजभाषा/Rajbhasha









गुरुवार, 25 नवंबर 2010

राजभाषा एक ज़रिया या नज़रिया

राजभाषा में आकर्षण नहीं है बल्कि एक वैचारिक घर्षण है जिसके कारण इससे सक्रिय रूप में जुड़नेवालों की संख्या सीमित है। सरकारी कार्यालयों के कर्मियों को अंग्रेज़ी में काम करने की आदत तथा उस आदत में परिवर्तन कर राजभाषा में कार्य करने के लिए प्रेरित करना चुनौतीपूर्ण और कौशलपूर्ण कार्य है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ राजभाषा अधिकारी स्वंय को राजभाषा कार्यान्वयन से निकालकर अपनी संस्था के अन्य कार्यों को करने लगे हैं तथा पूछने पर कहते हैं कि – "मैं कनवर्ट हो गया"। राजभाषा कार्यान्वयन का कल का सिपाही आज स्वंय को राजभाषा से जुड़ा हुआ नहीं बतलाता है, यह स्थिति लगभग प्रत्येक केन्द्रीय कार्यालय विशेषकर बैंकों, वित्तीय संस्थाओं आदि में देखने को मिलती रहती है। इस प्रकार के अधिकारी राजभाषा छोड़ते ही अपने कार्य में अंग्रेज़ी का शुमार करने लगते हैं तब यह सोचना पड़ता है कि क्या राजभाषा विशेषज्ञ राजभाषा अधिकारी के पास भी इतना कमज़ोर आधार लिए रह सकती है ? क्या इस प्रकार के विशेषज्ञ राजभाषा अधिकारी संस्था विशेष में एक अधिकारी के रूप में प्रवेश करने के लिए राजभाषा का उपयोग करते हैं ? जिस विशेषज्ञ राजभाषा अधिकारी को कार्यान्वयन का एक सशक्त ज़रिया बनना चाहिए वह राजभाषा को ही ज़रिया बना रहा है, यह भी एक उल्लेखनीय स्थिति है।

विशेषज्ञ अधिकारी की बात यहीं तक रहती तो ठीक रहता किंतु पिछले एक वर्ष अर्थात वित्तीय वर्ष 2009-10 से राजभाषा अधिकारियों में विशेषकर पिछले 2-3 वर्षों में नियुक्त राजभाषा अधिकारियों में एक नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरी में जाने का चलन हो गया है। कनिष्ठ प्रबंधन से मध्य प्रबंधन तथा आगे के पदों को पाने की तीव्र लालसा दिखलाई पड़ रही है। स्थितियॉ भी कुछ ऐसी निर्मित हो गई हैं कि एक लम्बे अर्से के बाद राजभाषा के रिक्त पदों के विज्ञापन निकल रहे हैं। इस स्थिति में भी कोई बुराई नहीं है। अच्छे अवसर को भला कोई कैसे छोड़ेगा। कठिनाई तब निर्मित होती है जब राजभाषा अधिकारी यह सोचकर कार्य करता है कि उसे शीघ्र ही यह संस्था छोड़ देनी है तथा नई संस्था से जुड़ना है तथा इस वैचारिक घटनाचक्र में राजभाषा ठहरी हुई प्रतीत होती है। न तो कोई नई पहल होती है और न ही कार्यान्वयन की कोई नई योजना बनती है। ऐसे राजभाषा अधिकारियों का अधिकांश समय इंटरनेट पर नई रिक्तियों की तलाश आदि में अधिक व्यय होता है। संस्ता को इनसे जो लाभ मिलना चाहिए वह पूरी तरह नहीं मिल पाता है। यहॉ ज़रिया को देखने का नज़रिया इतना भिन्न है कि कार्यान्वयन गौण हो जाता है।

इस समय राजभाषा अधिकारियों का एक तीसरा पक्ष भी है जिसमें अधिकांश वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी 3-4 वर्षों में सेवानिवृत्त होनेवाले हैं तथा इनकी सोच है कि बहुत कर चुके राजभाषा कार्यान्वयन अब सेवांत पश्चात की दुनिया की व्यवस्था की जाए जिसमें उनका अधिकांश समय व्यस्त रहता है। अब ऐसी स्थिति में राजभाषा कहॉ दिखेगी परिणामस्वरूप जो ज़रूरी लगा सो कर दिया शेष के लिए देखी जाएगी रवैया कार्य करने लगता है। यह स्थिति सबसे खतरनाक है। चूंकि इस श्रेणी में प्राय: वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी रहते हैं इसलिए यदि यह शिथिल हो गए तो इनके साथ कार्य करनेवाले राजभाषा अधिकारियों के कार्यनिष्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार राजभाषा कार्यान्वयन की गति धीमी, बेढब हो जाती है और अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते हैं।

आप कहेंगे कि मैं कौन सी नई बात कह रहा हूं यह तो किसी भी कार्यालय में पाई जानेवाली एक सामान्य स्थिती है। सही सोच है किन्तु वहॉ अन्य लोग भी रहते हैं जो स्थिति को संभाल लेते हैं किन्तु राजभाषा के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। यदि राजभाषा अधिकारी शिथिल होता है तो कहीं न कहीं राजभाषा कार्यान्वयन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। राजभाषा अधिकारी तथा राजभाषा कार्यान्वयन के बीच एक अत्यधिक संवेदनशील सम्बन्ध है। एक से दूसरा बहुत जल्दी प्रभावित होता है। इसलिए यह तीसरा पक्ष भी अपनी पुरजोर दखल रखता है।

उक्त तथ्यों तथा कथ्यों में ज़रिया की झलक तो खूब मिल रही है किन्तु राजभाषा कार्यान्वयन का नज़रिया कहीं दबा हुआ प्रतीत हो रहा है। यह स्थिति राजभाषा कार्यान्वयन जगत की ऊभरती हुई एक नई स्थिति है जिसका प्रभाव राजभाषा कार्यान्वयन पर पड़ रहा है किन्तु इस स्थिति को रोकने का कहीं कोई उपाय होते नहीं दिख रहा है। राजभाषा जगत में नई रिक्तियों की भरमार है तथा इस अनोखे अवसर का हर कोई लाभ उठाना चाह रही है तथा राजभाषा कार्यान्वयन की गति धीमी पड़ती जा रही है। नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति आदि जैसे सक्षम मंच इस दिशा की और नहीं देख रहे हैं। यदि शीघ्र ही राजभाषा कार्यान्वयन की इस स्थिति में सुधार लाने की कोशिश नहीं की जाएगी तो राजभाषा कार्यान्वयन काफी प्रभावित हो सकता है। ज़रिया और नज़रिया में एक दूरी आवश्यक है। राजभाषा कार्यान्वयन का नज़रिया और प्रभावशाली और परिणामदायी हो इस दिशा में विशेषज्ञ राजभाषा अधिकारियों को गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए, यही समय की मांग है।

Subscribe to राजभाषा/Rajbhasha

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

राजभाषा का राष्ट्रीय नेतृत्व - वर्तमान की आवश्यकता

राजभाषा, की प्रगति के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक गैर सरकारी सशक्त नेतृत्व की आवश्यकता है। देश के सभी केन्द्रीय कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों में राजभाषा के बारे में आवश्यक जानकारियॉ हैं किंतु इसके बावजूद भी वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्यों के अनुरूप राजभाषा गतिशील प्रतीत नहीं हो रही है। आखिर क्या कारण हैं इस धीमी गति के ?  इस विषय में एक सोच यह भी दर्शाती है कि राष्ट्रीय स्तर पर राजभाषा का कोई एक सशक्त नेतृत्व नहीं है जिससे राजभाषा की प्रखर गरिमा से लोग परिचित नहीं हो पा रहे हैं। कार्यालयों में अब भी यही सामान्य धारणा है कि चूंकि सरकार चाह रही है इसलिए राजभाषा कार्यान्वयन की दिशा में कार्रवाई हो रही है। आज तक कोई भी सरकारी कार्यालय इस तथ्य को प्रतिपादित नहीं कर सका है कि राजभाषा इस देश की एक अनिवार्यता है। राजभाषा के प्रचार-प्रसार में किए जा रहे प्रयासों में से असंख्य संगोष्ठियों, बैठकों, सेमिनारों, आयोजनों आदि के बाद भी यदि राजभाषा के महत्व को नहीं बतलाया जा सका है तो यह स्थित यह संकेत देती है कि राजभाषा के प्रचार-प्रसार में भव्यता के संग एक चमक-दमक उत्पन्न की जाए जिससे सहज ही लोग आकर्षित हो सकें। आधुनिक युग में सहज, सामान्य शैली में किया गया कार्य लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता है इसके लिए इसका विज्ञापन किया जाना आवश्यक है। यहॉ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कौन करेगा विज्ञापन ? सरकार को जिस तरह जितना करना चाहिए वह कर रही है इसलिए अब आवश्यक है कि सरकारी प्रयासों से हटकर राजभाषा के विकास के लिए सोचा जाए।

सर्वप्रथम प्रश्न यह उभरता है कि कौन सोचे इस तरह ? निश्चित ही राजभाषा अधिकारी अथवा राजभाषा से जुड़े लोग ही राजभाषा के बारे में गहराई और विस्तारपूर्वक सोच सकते हैं और तदनुसार कार्रवाई कर सकते हैं। यदि यह सत्य है तो राजभाषा अधिकारियों अथवा राजभाषा से जुड़े लोगों की समीक्षा करनी पड़ेगी जिससे इनमें आवश्यक सुधार किया जा सके या ज़रूरी पक्षों का समावेश किया जा सके। इस विश्लेषण के लिए हमें महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग में झांकना होगा तथा देखना होगा कि स्नातकोत्तर स्तर पर राजभाषा किस रूप में है। लगभग 27 वर्ष पहले मुंबई विश्वविद्यालय में प्रयोजनमूलक हिंदी का आरम्भ किया गया जिसे एक विषय के रूप में  पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया। उस समय केवल राजभाषा नीति की ही चर्चा की जाती थी। विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए डॉ.विनोद गोदरे की प्रयोजनमूलक हिंदी पुस्तक विद्यार्थियों को सहज ही आकर्षित कर लेती थी। अभी हाल ही में एक प्राध्यापक से जब मैंने इस विषय पर चर्चा की तो ज्ञात हुआ कि अभी भी राजभाषा की स्थिति असंतोषप्रद है। क्या यह आवश्यक नहीं है कि प्रयोजनमूलक हिंदी या कामकाजी हिंदी पर कक्षा में चर्चा करने के लिए संबंधित प्राध्यापकों से राजभाषा के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पक्षों पर समय-समय पर अद्यतन जानकारियॉ दी जाती रहें। इस कार्य के लिए राजभाषा से सक्रिय रूप से जुड़े लोगों का सहयोग लिया जा सकता है। इस विषय पर चर्चा करने का मुख्य उद्देश्य यह है कि बाज़ार से प्रचुर संख्या में नए राजभाषा अधिकारी नहीं मिल पा रहे हैं।

राष्ट्रीय स्तर के गैर सरकारी नेतृत्व एक ऊँची उड़ान कही जा सकती है किन्तु आधारहीन उड़ान के रूप में इसे नहीं देखा जा सकता है। प्रश्न यह भी उठता है कि यहॉ गैर सरकारी से क्या अभिप्राय है ?  क्या सरकारी कार्यालय में कार्यरत व्यक्ति नेतृत्व का पात्र नहीं है ? यूं भी सर्वविदित है कि नेतृत्व प्राप्त करनेवाले नेतृत्व प्राप्त कर ही लेते हैं। गैर सरकारी से अभिप्राय है सरकार पर पूर्णतया आश्रित हुए बगैर। जिस तरह बैंकों, उपक्रमों की नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियॉ कार्यरत रहती हैं उसी तरह वृहद आयोजनों द्वारा कुछ राष्ट्रीय स्तर के राजभाषा के व्यक्तित्व प्राप्त होंगे जिससे राजभाषा में  एक नएपन का अनुभव होगा। यहॉ यह आशय नहीं है कि वर्तमान में प्रखर नेतृत्व नहीं है, यदि देखा जाए तो प्रत्येक मंत्रालय में कुछ लोग तो अवश्य हैं किंतु जब तक राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय कार्यालय, बैंक, उपक्रम एक मंच पर एकत्र होकर सम्मलित रूप से राजभाषा कार्यान्वयन की चर्चा नहीं करेंगे तब तक राजभाषा कार्यान्वयन की विशालता से लोग पूर्णतया परिचित नहीं हो पाएंगे। यह कार्य न तो कठिन है और ना ही असुविधापूर्ण है। राजभाषा के अनेकों मंच हैं जहॉ इस मुद्दे को उठाया जा सकता है तथा यथार्थ में परिणित किया जा सकता है। बस आवश्यकता है इस तरह की सोच पर एक सार्थक सोच और चर्चा की।

यहॉ मंतव्य ना तो राजनीति प्रेरित है और ना ही किसी व्यक्तिगत लाभोन्मुखी है बल्कि यह वर्तमान राजभाषा की दशा और दिशा से ऊभरी परिस्थितियों का संकेत है, पुकार है, गुहार है। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कार्यालय स्तर तक राजभाषा की बागबानी की आवश्यकता है अन्यथा समय की मॉग के अनुरूप न तो राजभाषा अधिकारी मिल पाएंगे और न ही राजभाषा कार्यान्वयन कुलांचे भर पाएगी। समय यदि सावधान होने का संकेत दे तो सावधान हो जाना है युक्तिसंगत है। राजभाषा यदि राष्ट्र की कामकाज की भाषा है तो राष्ट्रीय स्तर के राजभाषा व्यक्तित्व की तलाश राजभाषा से जुड़े लोगों का कर्तव्य है। 
  

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

राजभाषा और हिदी का द्वंद

राजभाषा और हिंदी में फर्क कर पाना केन्द्रीय कार्यालय में कार्यरत कर्मियों के लिए भी संभव नहीं है तब ऐसी स्थिति में विभिन्न कार्यालयों में जानेवाले नागरिकों से राजभाषा में अधिकाधिक कार्य करने की अपेक्षा स्वत: बौनी प्रतीत होने लगती है। हाल ही में एक संगोष्ठी में सम्मिलित होने का अवसर मिला जिसमें केन्द्रीय कार्योलयों, बैंकों, आदि के प्रतिनिधि सहभागी थे। संगोष्ठी राजभाषा कार्यान्वयन के एक पक्ष पर थी। भव्य आरम्भिक औपचारिकताओं के बाद संगोष्ठी के पहले वक्ता ने बोलचाल की हिंदी पर बोलना आरम्भ किया जो मेरे लिए आश्चर्यजनक था फिर भी स्वंय को सांत्वना देते हुए अगले वक्ता की प्रतीक्षा करने लगा इस उम्मीद के संग कि शायद अगला वक्ता हिंदी के बजाए राजभाषा हिंदी पर बोले किंतु मेरी प्रतीक्षा वक्ता दर वक्ता बढ़ती चली गई।  सभी वक्ता बोलचाल की हिंदी,विभिन्न चैनलों की हिंदी, बॉलीवुड की हिंदी, तमिलनाडु की हिंदी आदि पर बोले जा रहे थे और तालियॉ भी बटोरे जा रहे थे। कृपया इस संगोष्ठी को सामान्य संगोष्ठी मत समझिएगा काफी दिग्गज पदनाम मंच को सुशोभित कर रहे थे। हद तो तब हो गई जब राजभाषा अधिकारी भी आकर राजभाषा विषय पर बोलचाल की हिंदी की विशेषता, लोकप्रियता, विस्तार आदि के बारे में बोल गए और मेरे समक्ष एक ज्वलंत प्रश्न छोड़ गए कि बोलचाल की हिंदी और कार्यालयों में लिखित राजभाषा हिंदी के अंतर को इन वक्ताओं ने क्यों नहीं समझा ?

किसे दोषी ठहराया जाए, किस स्तर पर हुई चूक की ओर इंगित किया जाए आदि अनेकों प्रश्न मुझे झकझोरने लगे। आखिर में संगोष्ठी के विषय़ तथा वक्ताओं की प्रस्तुति पर अपने विचार आमंत्रित करने के लिए मुझे भी बुलाया गया फिर क्या था विचारों का बादल फट पड़ा और मेरी सोच काफी तीखे अंदाज़ में संगोष्ठी में पसर गई। दो-तीन लोग मेरे बाद भी बोलने वाले थे इसलिए मैं उत्सुक था अपने विचारों पर तत्काल प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए। वह घड़ी भी आ गई तथा मेरे बाद के वक्ता ने कहा कि राजभाषा कार्यान्वयन के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है तथा जोश और उत्साह में राजभाषा कार्यन्वयन तत्काल प्रभाव नहीं दे पाता है आदि-आदि। मैं यह सुनकर हतप्रभ रह गया और कितने वर्ष, और कितना धैर्य ? राजभाषा की संगोष्ठी में इस तरह के विचार यदि प्रस्तुत किए जाएंगे तो क्या इससे राजभाषा कार्यान्वयन की गति प्रभावित नहीं होगी ? क्या इससे राजभाषा से जुड़े कर्मियों का उत्साह प्रभावित नहीं होगा  ? क्यों नहीं उस मंच से यह स्पष्ट किया गया कि बोलचाल की हिंदी, चैनलों की हिंदी, बॉलीवुड की हिंदी से कार्यालयों में लिखी जानेवाली हिंदी में फर्क होता है। सरकारी कामकाज की शब्दावली ना तो बोलचाल की शब्दावली से समरसता स्थापित कर सकती है और ना ही बोलचाल के शब्दों को राजभाषा में बेधड़क पिरोया जा सकता है। राजभाषा कार्यान्वयन की यह कितनी सामान्य बात है जिससे अभी भी सरकारी कार्यालयों के अधिकांश स्टाफ अनजान हैं। इन कार्यालयों के राजभाषा विभाग को इस दिशा में सार्थक प्रयास कर बोलचाल की हिंदी और कार्यालयों में लिखित हिंदी के अंतर को स्पष्ट करना होगा वरना हिंदी और राजभाषा का यह द्वंद राजभाषा कार्यान्वयन को काफी क्षत्ति पहुंचा सकता है।

यदि आपको भी कभी इस तरह की संगोष्ठी में उपस्थित होने का अवसर मिले और राजभाषा की पटरी पर बोलचाल हिंदी की गाड़ी दौड़ाई जाए तो कृपया हस्तक्षेप का लाल संकेत देकर उसे रोकिएगा। केवल रोकिएगा ही नहीं बल्कि राजभाषा की पटरी पर कामकाजी हिंदी की गाड़ी को चला भी दीजिएगा। राजभाषा कार्यान्वयन में यह आपका अद्वितीय योगदान होगा। राजभाषा कार्यान्वयन में जब तक आपका खुलकर सहयोग नहीं होगा तब तक इस तरह की गंभीर त्रुटियॉ जारी रहेंगी।


Subscribe to राजभाषा/Rajbhasha

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

हिंदी दिवस 2010 के कुछ ब्लॉग-कुछ विचार

दिवस, 14 सितंबर के आते ही मेरी उत्सुकता यह जानने के लिए प्रबल हो जाती है अबकी क्या लिखा जाएगा हिंदी दिवस पर। सामान्यतया एक खीझभरी अभिव्यक्ति का ही प्रदर्शन होता है जिससे यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि इस खीझ का कारण क्या है? आखिर क्यों इसका प्रमुख लक्ष्य हिंदी अधिकारी या राजभाषा अधिकारी रहता है? एक दायित्व का निर्वहन करना क्या अपराध है? क्या बोलते हैं यह राजभाषा अधिकारी जिससे कि कुछ लोग इनके खिलाफ बहुत तीखा बोल जाते हैं? मैंने तो किसी भी राजभाषा अधिकारी को कुछ प्रतिकूल बोलते हुए नहीं सुना फिर क्यों प्रतिवर्ष राजभाषा और ऱाजभाषा अधिकारियों को कुछ लोगों द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर लक्ष्य बनाया जाता है? मन के इसी उहापोह ने मुझे ब्लॉगिंग जगत के लेखों को एकत्रित करने की प्रेरणा दी अतएव जितना उपलब्ध हो सका उतनों को मैंने सहेज कर रख लिया और अब समय मिला तो अपने संशय के समाधान का प्रयास कर रहा हूँ। कई ब्लागों को पढ़ने के बाद पता चला कि राजभाषा कार्यान्वयन के यथार्थ को कई ब्लॉग अति संतुलित तथा सकारात्मक सोच से ओतप्रोत लगे जिनका पहले उल्लेख किया जा रहा है।
राजभाषा हिंदी-अनुवाद एवं तकनीकी समावेश की सार्थकता लेख में भारत सरकार,गृह मंत्रालय,राजभाषा विभाग के संयुक्त सचिव श्री दिलीप कुमार पांडेय ने सरकारी कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्वयन के एक प्रमुख पक्ष का बखूबी वर्णन किया है:- "राजभाषा विभाग का लक्ष्य है कि सरकारी कामकाज में मूल टिप्पण और प्रारूपण के लिए हिंदी का ही प्रयोग हो। यही संविधान की मूल भावना के अनुरूप भी होगा। आज भी सरकारी कार्यालयों में राजभाषा हिंदी का कार्य अनुवाद के सहारे चल रहा है। प्राय: अनुवाद भाषा को कठिन बनाता है। इसका कारण दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ की कमी यी अनुवादक को हर विषय क्षेत्र की गहन जानकारी नहीं होना है। वैसे भी किसी को हर क्षेत्र की पूरी जानकारी होना भी संभव नहीं है।" यह राजभाषा के एक ऐसे तथ्य को उद्घाटित करता है जिसकी जानकारी प्राय: राजभाषा जगत से जुड़े लोगों में ही होती है। हिंदी दिवस के एक और तथ्य को श्री विनोद पाराशर ने अपने लेख हिंदी दिवस: कुछ जरूरी सवाल (?) में प्रस्तुत किया है :- " किसी-किसी कार्यालय में तो 'हिंदी दिवस' उस कार्यालय की 'हिंदी' वाली फाईल में ही मन जाता है. साथ वाले कर्मचारी तक को भी पता नहीं लग पाता कि आज "हिंदी दिवस" है." यह एक कटु सत्य कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति छोटे कार्यालयों में हो सकती है। श्री प्रदीप श्रीवास्तव का लेख "आज नहीं तो कल विश्व क्षितिज पर चमकेगा "हिंदी का सूर्य" सकारात्मक सोच की सशक्त अभिव्यक्ति है।
उक्त ब्लॉगों के अतिरिक्त कुछ ब्लॉग ऐसे भी मिले जिनमें राजभाषा को लेकर तीखी टिप्पणी दिखलाई दी। एक आक्रोश के संग इन ब्लॉगों में सीधे-सीधे आरोप भी थे। श्री संजय द्विवेदी के लेख "हिंदी दिवस पर विशेष: विलाप मत कीजिए,संकल्प लीजिए" में लिखा है :- "वह अब सिर्फ संपर्क भाषा नहीं है,इन सबसे बढ़कर वह आज बाजार की भाषा है,लेकिन हर 14 सितंबर को हिंदी दिवस के अवसर पर होने वाले आयोजनों की भाषा पर गौर करें तो यूं लगेगा जैसे हिंदी रसातल को जा रही है। यह शोक और विलाप का वातावरण दरअसल उन लोगों ने पैदा किया है,जो हिंदी की खाते तो हैं,पर उसकी शक्ति को नहीं पहचानते। इसीलिए राष्ट्रभाषा के उत्थान और विकास के लिए संकल्प लेने का दिन 'सामूहिक विलाप' का पर्व बन गया है। कर्म और जीवन में मीलों की दूरी रखने वाला यह विलापवादी वर्ग हिंदी की दयनीयता के ढोल तो खूब पीटता है, लेकिन अल्प समय में हुई हिंदी की प्रगति के शिखर उसे नहीं दिखते।" अपने लेख के अंतिम परिच्छेद में श्री द्विवेदी लिखते हैं :- " अंग्रेजी सालों से शासकवर्ग तथा 'प्रभुवर्गों' की भाषा रही है। उसे एक दिन उसके सिंहासन से नहीं हटाया जा सकता। हिन्दी का इस क्षेत्र में हस्तक्षेप सर्वथा नया है, इसलिए उसे एक लंबी और सुदीर्घ तैयारी के साथ विश्वभाषा के सिंहासन पर प्रतिष्ठित होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए, इसीलिए हिन्दी दिवस को विलाप, चिंताओं का दिन बनाने के बजाए हमें संकल्प का दिन बनाना होगा। यही संकल्प सही अर्थों में हिंदी को उसकी जगह दिलाएगा।"
श्री संजय द्विवेदी को हिंदी दिवस के आयोजन को देखकर ऐसा लगता है कि हिंदी रसातल की और जा रही है। यहॉ श्री संजय द्विवेदी के नाम का उल्लेख कर राजभाषा के प्रति अपनी सोच रखनेवाले एक वर्ग को दर्शाया जा रहा है,कृपया इसे व्यक्तिगत आक्षेप न माना जाए। हिंदी दिवस के आयोजन राजभाषा में कामकाज करने के लिए प्रोत्साहन तथा प्रेरणा से पूर्ण होते हैं और हिंदी दिवस के आयोजन का मूल उद्देश्य भी यही है। रसातल की और का संकेत स्पष्ट नहीं हो पाया है। जिस योजना का मूल उद्देश्य प्रेरणा और प्रोत्साहन हो वहॉ पर शोक और विलाप के वातावरण के निर्मित होने की संभावना ही नहीं रहती है। विलाप का वातावरण दरअसल उन लोगों ने पैदा किया है जो हिन्दी की खाते हैं वाक्य से इस सोच ने हिंदी अधिकारियों,अनुवादकों आदि की और ईशारा किया है। यथार्थ यह है कि यदि किसी सरकारी कार्यालय में जाकर इन तथाकथित विलापवादियों के लक्ष्य,चुनौतियों और उपलब्धियों का आकलन किया जाए तो स्पष्ट होगा कि ना तो यहॉ विलाप है और ना ही कोई हताशा है बल्कि एक सतत,सार्थक प्रयास है राजभाषा कार्यान्वयन का। यहॉ इस तथ्य की तलाश है कि राजभाषा से जुड़े व्यक्ति को इतना थका, हारा क्यों दर्शाया जा रहा है? यह लेख इसे स्पष्ट नहीं कर पा रहा है बल्कि विलापवादी वर्ग के संबोधन से एक भाव प्रकट कर रहा है जो संभवत: पूर्वाग्रहित प्रतीत होता है अन्यथा राजभाषा से जुड़े लोग हमेशा सकारात्मक उर्जा से ओत-प्रोत होते हैं। राजभाषा से जुड़े लोग किन परिस्थितियों में और क्यों दयनीय होते हैं इसे लेख में स्पष्ट नहीं किया गया है। विलाप, दयनीय जैसे विशेषण आश्चर्य उत्पन्न करते हैं और परन्तु राजभाषा के परिवेश में कहीं दूर-दूर तक भी नज़र नहीं आ रहे हैं,ना जाने कैसे इस लेख ने इस पक्ष का इतना गहन और विशद अनुभव कर लिया। संकल्प को पूर्ण करने में किए जा रहे प्रयासों में यदि कहीं कोई आक्रामकता यदि विलाप के रूप में नज़र गया हो तो दीगर बात है अन्यथा राजभाषा कार्यान्वयन एक संकल्प है और संकल्पी ना तो चिंता करता है और ना ही विलाप करता है बल्कि वह अपने लक्ष्य प्राप्ति में मशगूल रहता है।
श्री फ़िरदौस खान ने अपने लेख हिन्दी दिवस की रस्म अदायगी में लिखा है कि :- " यह बात अलग है कि हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेजी में भाषण देकर हिंदी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।" यदि हिंदी दिवस के कार्यक्रमों की वृहद समीक्षा की जाए तो यह स्पष्ट होगा कि यह कार्यक्रम एक रस्म अदायगी नहीं है बल्कि राजभाषा कार्यान्वयन का वह महत्वपूर्ण हिस्सा है जिससे कर्मचारियों को प्रेरणा और प्रोत्साहन प्राप्त होता है। हिन्दी दिवस कार्यालयों का एक अभिन्न एवं महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है जिसे नकार पाना या अनदेखा करना असम्भव है। अंग्रेजी में ऐसे लोग ही भाषण देते हैं जो सहजतापूर्वक धाराप्रवाह हिंदी में नहीं बोल पाते है।
श्री प्रमोद ताम्बट के व्यंग्य "एक पखवाड़ा मुकर्रर है हिंदी की मातमपुर्सी के लिए" में विशेषकर हिन्दी फिल्मों में प्रयुक्त भाषा का उल्लेख है किन्तु व्यंग्य के अंतिम परिच्छेद में लिखा गया है कि:- "साल का एक पखवाड़ा मकर्रर है,बीच बाज़ार में इसे घायल पडा देखकर मातमपुर्सी करने के लिए। जिसे मर्जी हो मातमपुर्सी करे या फिर चाहे तो नजरें बचा कर निकल जाए। "हिंदी पखवाड़ा में मातमपुर्सी भारत देश के किस कार्यालय में मनाया जाता है, यह शोध का विषय हो सकता है। विभिन्न प्रतियोगिताओं,पुरस्कारों, सम्मान आदि के उत्सवपूर्ण परिवेश में यह मातमपुर्सी का मंचन किसी परीकथा जैसा प्रतीत होता है।
श्री विजय कुमार का आलेख "अब हिंदी बांटने का षडयंत्र" के आरंभिक परिच्छेद में लिखा गया है कि :- " सितम्बर हिन्दी के वार्षिक श्राद्ध का महीना है। हर संस्था और संस्थान इस महीने में हिन्दी दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा मनाते हैं और इसके लिए मिले बजट को खा पी डालते हैं। इस मौसम में कवियों, लेखकों व साहित्यकारों को मंच मिलते हैं और कुछ लिफाफे भी। इसलिए सब इस दिन की प्रतीक्षा करते हैं और अपने हिस्से का कर्मकांड पूरा कर फिर साल भर के लिए सो जाते हैं।" 14 सितम्बर को हिंदी दिवस आयोजित किया जाता है तथा यह दिन राजभाषा हिंदी की प्रगति के प्रदर्शन का होता है,राजभाषा कार्यान्वयन की उपलब्धियों का गीत गाने का होता है, उत्सव का होता है, इस आलेख में हिन्दी के किस रूप का मातमपुर्सी का उल्लेख किया गया है यह अस्पष्ट है। हिन्दी दिवस, सप्ताह अथवा पखवाड़े की कई जगह रिपोर्टिंग होती है, इससे कई कर्मचारियों के पुरस्कार जुड़े होते हैं अतएव बजट को खा पी डालने की सोच काल्पनिक प्रतीत होती है। कवियों,लेखकों व साहित्यकारों को सितम्बर के सिवा कहीं,कभी कोई मंच नहीं मिलता और यह सब इस दिन की प्रतीक्षा करते हैं जैसी अभिव्यक्ति हिंदी के साहित्यकारों को अपमानित करने का प्रयास है। यदि कोई कोर्यालय हिंदी साहित्यकारों को आमंत्रित करता है तो उसका उद्देश्य साहित्यिक हिन्दी से कार्यालय को परिचित कराना होता है, हिन्दी के विभिन्न रसों को प्रदर्शन करना होता है तथा कामकाज की भाषा, को यथासंभव सरल बनाने की पहल होती है।
उक्त ब्लॉग में उल्लिखित कुछ प्रश्नों की तह तक जाने के प्रयास में विचारों और अनुभवों ने कहीं भी यथार्थ का अनुभव नहीं किया। राजभाषा हिंदी के लिए उक्त ब्लॉगों के लेखकों के प्रति आभार के संग प्रसंगवश पुनरावर्तन किया जा रहा है कि किसी भी आलेख की आलोचना का यह प्रयास यह कदापि नहीं है बल्कि राजभाषा के एक सोच,एक विचार से सामंजस्य बिठाने की एक कोशिश थी। कुछ ब्लॉग के साथ सहज सामंजस्य स्थापित हो गया किंतु कुछ के साथ दूरी बनी रही। किसी व्यापक विषय के साथ प्राय: ऐसा होते रहता है। यदि हिंदी के नाम पर राजभाषा कार्यान्वयन को बिना किसी आधार पर यूं ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जाती रहेगी और राजभाषा से जुड़े लोगों को किसी अभियुक्त की तरह देखा जाएगा तो यह एक प्रतिकूल स्थिति के निर्माण में सहायक होगा। विगत कई वर्षों से हिंदी दिवस पर निराधार टिप्पणियों की भरमार होती है किन्तु इसमें क्रमश: कमी हो रही है। राजभाषा कार्यान्वयन की चुनौतियों को अब अधिकांश लोग समझने लगे हैं। उम्मीद है कि शीघ्र ही राजभाषा कार्यान्वयन के क्षेत्र से सभी जागरूक लोग अवगत हो जाएंगे। मेरा यह ब्लॉग इसी प्रयास में सक्रिय है।


Subscribe to राजभाषा

बुधवार, 25 अगस्त 2010

देवनागरी लिपि विरूद्ध रोमन लिपि हिन्दी

हिंदी की लगातार बढ़ती लोकप्रियता ने तथा इंटरनेट तथा एसएमएस के बढ़ते जाल ने हिंदी की देवनागरी लिपि को चुनौती देना आरम्भ कर दिया है। यह चुनौती है रोमन लिपि में हिंदी लिखने की प्रक्रिया की शुरूआत। प्राय: इंटरनेट और मोबाइल द्वारा रोमन लिपि में हिंदी लिखने का चलन दिखलाई पड़ने लगा है। लिखित हिंदी की यह समस्या यद्यपि अभी अपने आरम्भिक चरण में है किन्तु चिंताजनक बात यह है कि रोमन लिपि का उपयोग हिंदी लिखने की शैली युवा पीढ़ी में तेज़ी के साथ प्रसारित हो रही है। यदि इस दिशा में सामाजिक, व्यापारिक तथा प्रौद्यौगिकी स्तर पर पहल नहीं की गई तो यह संभावना प्रतीत हो रही है कि भविष्य में देवनागरी लिपि के संग रोमन लिपि की हिंदी अपनी जड़ें जमाना शुरू कर दे। आखिरकार भाषा की जीवंतता उसकी उपयोगिता पर भी निर्भर करती है।

सामाजिक स्तर पर पहल के लिए देवनागरी लिपि के प्रयोग, प्रचार तथा प्रसार के लिए समाज के प्रत्येक स्तर पर जागरूकता लाई जाए। प्रसंगवश उल्लेख कर रहा हूं कि हिंदी के एक प्राध्यापक रोज सुबह 7 बजे के लगभग मुझे सूक्तियॉ एसएमएस करते हैं जो केवल अंग्रेजी में होती हैं। मैंने अब तक किसी भी रूप में अपनी आपत्ति नहीं दर्शाई है क्योंकि वह मूलत: अंग्रेजी में होती है परन्तु मेरे मन में यह विचार ज़रूर आता है कि प्राध्यापक कभी हिंदी में सूक्तियॉ क्यों नहीं प्रेषित करते हैं। यह लिखते समय यह विचार ऊभरा है कि यदि मैं उन्हें 2-4 सूक्तियॉ देवनागरी लिपि में प्रेषित कर दूँ तो शायद इससे लाभ हो। इस तरह के लेख लिखने और सोचने से तो अच्छा है हिंदी में एसएमएस कर देना। यद्यपि इस प्रकार की पहल से एक साथ व्यापक परिवर्तन नहीं नज़र आता है किन्तु परिवर्तन होता ज़रूर है। रोमन लिपि में हिंदी का लेखन प्रमुखतया एसएमएस तथा ई-मेल पर ही दिखलाई पड़ती है। य़दि इस क्षेत्र में देवनागरी लिपि का उपयोग सतत बढ़ाया जाए तो उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त होंगे।

व्यापारिक स्तर पर देवनागरी लिपि का प्रयोग एसएमएस तथा ई-मेल में लगातार बढ़ रहा है। भले ही इस वृद्धि का प्रमुख कारण व्यापारिक लाभ हो किन्तु यह उल्लेखनीय है कि व्यापारिक स्तर पर देवनागरी लिपि का प्रयोग यह प्रमाणित करता है कि अपनी बात को देवनागरी लिपि का प्रयोग कर व्यापकता से पहुंचाया जा सकता है। व्यापारिक प्रतिष्ठानों का बोर्ड अंग्रेजी में लगाना एक आवश्यकता है, एक फैशन है अथवा एक आदत है यह एक विवाद का विषय हो सकता है किन्तु अंग्रेजी में बोर्ड लगता जरूर है। जिस स्थान पर अंग्रेजी का संबंध नहीं है उसके बोर्ड भी जब अंग्रेजी में दिखते हैं तब आश्चर्यय होता है जैसे कि कबाड़ी की दुकान, जहॉ पर अंग्रेजी में न कुछ लिखा जाता है और न ही अंग्रेजी बोलनेवाले ही वहॉ रहते हैं। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि अंग्रेजी में बोर्ड प्रदर्शन आवश्यकता से कहीं अधिक चलन से प्रभावित है। चलन में परिवर्तन किया जा सकता है जबकि आवश्यकता बनी रहती है।

प्रौद्योगिकी के बारे में ना तो कुछ कहा जा सकता है और ना ही उसकी गति को पकड़ी जा सकती है। पल-पल में परिवर्तन होते रहता है। इस प्रौद्योगिकी की दुनिया में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं भी अपना स्थान बनाए हुए हैं और उनमें भी निरन्तर प्रगति हो रही है किन्तु ब्लैकबेरी द्वारा अपने मोबाइल में हिंदी की सुविधा न दिया जाना कभी-कभी प्रतिकूल परिस्तितियॉ निर्मित कर देती हैं। यद्यपि देवनागरी लिपि का प्रयोग कर अपने कार्य करनेवाले अधिकांश लोग सीमित रूप में ही प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हैं इसलिए फिलहाल देवनागरी लिपि में प्रौद्योगिकी का भरपूर सहयोग है।

उक्त कथ्यों तथा तथ्यों के बावजूद भूमंडलीकरण के दौर में एक भाषा दूसरी भाषा पर आक्रमण कर रही है तथा विकास की तेज गति भाषाओं के रूप-रंग में परिवर्तन भी कर रही है। भाषा वैज्ञानिकों की राय है कि इस परिवर्तन से बचा नहीं जा सकता है यद्यपि इसके व्यापक प्रतिकूल प्रभाव से बचा जा सकता है। देवनागरी लिपि के बजाए रोमन लिपि में हिंदी को लिखा जाना एक व्यापक परिवर्तन की ही आहट है। हिंदी के लिए रोमन लिपि कहीं आवश्यकता भी प्रतीत होती है जैसे पाकिस्तान के किसी व्यक्ति से बातें करना। उस स्थिति में व्यक्ति क्या करे जब एक को देवनागरी लिपि न आती हो और दूसरे को उर्दू के शब्दों का ज्ञान ना हो। हिंदी फिल्मों का व्यापक प्रचार-प्रसार बोलचाल की हिन्दी को विश्व के कई देशों में प्रचारित-प्रसारित कर रही है किन्तु इसके साथ देवनागरी लिपि का प्रचार-प्रसार नहीं हो रहा है परिणामस्वरूप सहज राह रोमन लिपि में हिंदी ही मिलती है। प्रौद्योगिकी के युग में राष्ट्र की सीमाएं नहीं रह गई है सूचनाओं आदि की सम्प्रेषण तेज गति से हो रहा है और सम्पूर्ण विश्व की भाषाओं में परिवर्तन दिखलाई पड़ रहा है। इसके बावजूद भी देवनागरी लिपि के संग हिंदी से जुड़े सभी लोगों को यह चाहिए कि यह सुनिश्चित किया जाए कि देवनागरी लिपि का ही प्रयोग हो। इससे देवनागरी लिपि का प्रचार-प्रसार होगा। यह इसलिए कहा जा रहा है कि अधिकांश स्थितियॉ तो आदत से जुड़ी होती है। यह भी एक अजीब स्थिति है कि इस ब्लॉग का नाम राजभाषा देवनागरी और रोमन लिपि दोनों में है, ऐसा क्यों? यहॉ पर तो देवनागरी लिपि से भी काम चल सकता था। इसका उत्तर है कि पहले इस ब्लॉग का नाम केवल देवनागरी लिपि में था किन्तु राजभाषा से जुड़ी द्विभाषिकता की आदत ने मुझे राजभाषा रोमन लिखने के लिए विवश किया, वरना मुझे यह नाम अधूरा प्रतीत हो रहा था।




Subscribe to राजभाषा

शनिवार, 21 अगस्त 2010

राजभाषा,यूनिकोड तथा इनस्क्रिप्ट - शक्ति भी, शौर्य भी

वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हैं. पिछले दो दशक के बाद अब राजभाषा अपनी उड़ान के लिए तैयार है. यहाँ पर एक प्रश्न उभरता है कि जब राजभाषा उड़ान के लिए तैयार है तब उड़ क्यों नहीं रही है और यह कैसी बात कि जब देखिये तब कहा जाता है कि राजभाषा इसके लिए तैयार है राजभाषा उसके लिए तैयार है, आखिर कब तक यह तैयारियां चलती रहेंगी ? यह प्रश्न राजभाषा से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के मन में उभरता है पर जवाब आधा-अधूरा ही मिलता है और उसी से मन मारकर संतोष कर लेने पड़ता है.  राजभाषा की विभिन्न समस्याओं का हल किसी कि ओर उंगली उठा कर कभी नहीं मिल सकता इसके लिए चाहिए कार्यवाई जिसकी काफी कमी है.यह कमियां प्रत्येक कार्यालय कि अपनी-अपनी परिस्थिति विशेष से निर्मित होती है जिसका समाधान प्रत्येक कार्यालय ढूंढ सकता है विशेषकर कार्यालय का शीर्ष प्रबन्धन. वर्तमान में राजभाषा कि सबसे बड़ी समस्या क्या है यदि इसका आकलन किया जाए तो ज्ञात होगा कि जिस रफ़्तार के साथ कार्यालय के सभी विभागों द्वारा राजभाषा में कार्य होना चाहिए वोह नहीं हो रहा है जिसका प्रमुख कारण है प्रौद्योगिकी कि कठिनाईयां. क्या हैं यह कठिनाईयां तो इसका सरल उत्तर यह है कि किसी भी कार्यालय के कर्मचारी को देवनागरी लिपि में टाइप करने में असुविधा होती है . यह असुविधा की  बोर्ड से लेकर हिंदी फॉण्ट तक की है जबकि इसका समाधान काफी पहले किया जा चुका है फिर भी कर्मचारी इससे पूरी तरह से परिचित  नहीं हैं परिणामस्वरूप राजभाषा अपनी गति नहीं पकड़ पा रही है. दोषी कौन है ? यह प्रश्न राजभाषा कार्यान्वयन में ना किया जाये तो बेहतर है क्योंकि यहाँ दोष परिचय का है, अभ्यास का है, प्रोत्साहन का है यदि यह सब दोष निकल जायेगा तो समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी.


एक समय था जब टाइप करने के लिए टंकक के पास पेपर जाता था परन्तु अब लगभग सभी टेबल पर कंप्यूटर कि सुविधा है और यह अपेक्षा कि जाती है कि हर टेबल खुद अपना टाइप कर ले और टाइप कि निर्भरता कम करे. इसकी वजह कंप्यूटर मात्र ही नहीं है बल्कि ई -मेल मेल के चलन ने कर्मचारियों को की-बोर्ड कि ओर जाने को मजबूर कर दिया है. यह भी एक प्रमुख कारण है टाइप के लिए कार्यालय के प्रत्येक टेबल को आत्मनिर्भर होने के लिए जिससे कर्मचारी सम्प्रेषण की आधुनिक सुविधाओं का लाभ उठा कर अपना और कार्यालय के कामकाज को एक नयी ऊँचाई दे. कल तक टाइप केवल टंकक का कार्य मन जाता था परन्तु आज टंकण  प्रत्येक टेबल का अभिन्न हिस्सा बन चूका है चाहे वोह अल्प मात्रा में ही क्यों ना हो पर सभी टेबल पर विद्यमान है. इतनी अधिक आवश्यकता होने के बावजूद भी राजभाषा की गति में तेज़ी क्यों नहीं आ रही है यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है. इसके पीछे की सच्चाई है हिंदी के अनेकों फॉण्ट तथा उनका दूसरे कंप्यूटर पर सही ढंग से खुलना. भारत में जीतनी भाषाएँ हैं उससे भी ज्यादा हिंदी के फॉण्ट हैं तथा सब अपने-अपने प्लेटफ़ॉर्म पर ही खुलते हैं मानों सबकी अपनी-अपनी सल्तनत हो अपना-अपना सूबा हो . ऐसी हालत में यदि एक कंप्यूटर से लिखा गया मेल यदि दूसरे कंप्यूटर पर नहीं पढ़ा जा सकता हो और शब्द की जगह पर डब्बा दीखता हो तो कौन कर्मचारी राजभाषा में कार्य करने की जहमत उठाएगा पल भर में वोह अपना कार्य अंग्रेजी में कर देगा आखिर अंग्रेजी में कार्य करने का वर्षों से अभ्यस्त जो है. हिंदी में फॉण्ट समस्या का अंत यूनिकोड आने के बाद ही पूरी तरह से समाप्त हो गयी अब बेधड़क यूनिकोड में काम होता है और किसी भी कंप्यूटर पर इसे पढ़ा जा सकता है . फॉण्ट की इस सफलता के बावजूद भी इसमें एक पेंच है. वह पेंच यह है की जब भी किसी कंप्यूटर में विंडोस लोड किया जाता है तो अक्सर लैंग्वेज भाग को लोड नहीं किया जाता जिससे कंप्यूटर में यूनिकोड की सुविधा का उपयोग करने में कठिनाई होती है इसके लिए प्रत्येक कंप्यूटर पर यह सुनिश्चित  किया जाना चाहिए की यूनिकोड सक्रिय है या नहीं. एक बार कंप्यूटर में यूनिकोड सक्रिय हो जाने पर यह सुविधा बनी जब रहती है. यूनिकोड को विश्व स्तर पर मान्यता है.


फॉण्ट के संग एक और समस्या है जिससे कर्मचारियों में काल्पनिक उलझन उत्पन्न होती है कि यदि यूनिकोड  को अपनाएं तो क्या की-बोर्ड भी बदलना होगा. यह सोच महज काल्पनिक नहीं कही जा सकती क्योंकि जिस तरह यूनिकोड को विश्वस्तरीय मान्यता मिली है वैसे ही इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड को भी विश्वस्तरीय मान्यता मिली है अतएव जब यूनिकोड कि बात होती है तब इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड कि भी चर्चा होती है उअर दूसरे की-बोर्ड के अभ्यस्त कर्मचारी की-बोर्ड परिवर्तन मात्र से परेशान हो जाते हैं जिससे वह यूनिकोड में कार्य करने से बचते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि यूनिकोड अपनायेंगे तो इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड भी अपनाना होगा. यूनिकोड और इनस्क्रिप्ट को एक एक दूसरे का अभिन्न अंग मान लेना सही सूचना के अभाव का परिणाम है सत्य तो यह है कि यूनिकोड का उपयोग किसी भी की-बोर्ड से किया जा सकता है परन्तु यदि इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड का उपयोग किया जाए तो टाइप के अलावा अन्य कार्यों जैसे ब्लॉग लिखना आदि में इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड ही कारगर है. भविष्य के राजभाषा कार्यान्वयन के लिए इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड को ही  अपनाना चाहिए. कार्यालय में इन बातों को यदि और अधिक विस्तार से तथा कुछ उदहारण देकर समझाया जाये तो बेहद प्रभावशाली परिणाम होता है. प्रत्येक कार्यालय इस प्रकार कि सूचना, प्रशिक्षण के लिए पूरी तरह से सक्षम है और इस सम्बंधित अद्यतन सूचनाओं से परिपूर्ण है आवश्यकता है तो सिर्फ इसके प्रचार-प्रसार-सहयोग की. कई लोगों ने कहा है की इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड सीखना आसान है और उन्होंने स्वयं को पुराने की-बोर्ड से हटा कर इनस्क्रिप्ट से जोड़ लिया . यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ बल्कि उन्हें इसकी उपयोगिता और अनिवार्यता को बतलाना पड़ा सोदाहरण. यह कार्य प्रत्येक राजभाषा विभाग बखूबी कर सकता है.


भविष्य के राजभाषा कर्न्यावन में यूनिकोड और इनस्क्रिप्ट की ही आवश्यकता रह जाएगी. राजभाषा कार्यान्वयन से जुड़े लोगों की यह चतुराई होगी की वह भविष्य की भाषाई चुनौतियों से सामना करने के लिए यूनिकोड और इनस्क्रिप्ट की पूरी तरह से अपने-अपने कार्यालय  में लागू करने की कोशिश करें. यूनिकोड और इनस्क्रिप्ट का सफलतापूर्वक कार्यान्वन राजभाषा कार्यान्वन की शक्ति भी है और शौर्य भी.
 


गुरुवार, 19 अगस्त 2010

हिंदी दिवस 14 सितम्बर के नाम


14 सितम्बर,1949 में निर्मित राजभाषा का एक रूप ने सम्पूर्ण राष्ट्र को अपनी ओर बखूबी आकर्षित किया। यह नया रूप अपनी चकाचौंध से विशेष तौर पर सरकारी कर्मचारियों को और समान्यतया आम जनता को आकर्षित करता रहा। हिंदी तेरे रूप तो अनेक हैं पर वर्तमान में  सबसे चर्चित रूप है तेरा राजभाषा का रूप। आज तेरा जन्मदिन है और मेरी धड़कनें तुझे वैसे ही बधाई दे रही हैं जैसे एक पुत्र अपनी माँ को बधाई देता है, आर्शीवाद लेता है। आज बहुत खुश होगी तू तो, हो भी क्यों नहीं, साहित्य, मीडिया, फिल्म, मंच से लेकर राजभाषा तक तेरा ही तो साम्राज्य है। अब तो प्रौद्योगिकी से भी तेरा गहरा रिश्ता हो गया है। आज केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे संसार में तेरे राजभाषा रूप का जन्मदिवस  मनाया जायेगा, मैं भी मानाऊँगा खूब धूम-धाम से। तूने कितनों को मान दिया है, सम्मान दिया है, रोजी दी है, रोटी दी है, एक माँ की तरह तुझसे जो भी जुड़ा तूने बड़े जतन से उसे सहेजा है,संवारा है। मैं भी तो उनमें से एक हूँ। पत्रकारिता, अध्यापन, मंच से लेकर कार्यालय तक तेरे हर रूप को जिया हूँ, सच तुझसे बहुत सीखा हूँ। मेरी हार्दिक बधाई और नमन।

जानती है तू, कि कुछ लोग तेरे जन्मदिवस को लेकर नाराज़ भी होते हैं। ना-ना वो तुझे दुत्कारते नहीं हैं बल्कि वे सब तुझसे बेहद गहरा प्यार करते हैं शायद मुझसे भी ज्यादा क्योंकि वो तुझे ज़रा सा भी कमज़ोर नहीं देख सकते। तेरे राजभाषा के रूप ने ही ऐसी हलचल मचा दी है कि न चाहते हुए भी तुझे चाहने पर लोग मजबूर हो जाते हैं।

आज सैकड़ों विचार तुझ पर चिंतन मनन करेंगे और राजभाषा और राजभाषा अधिकारियों पर अपना दुःख बयां करेंगे। मुझे भी नहीं मालूम कि यह लोग कार्यालय में होनेवाले कार्यक्रमों में तुझे देख सकते हैं अथवा नहीं, यदि देख सकते तो यथार्थ से उनका परिचय भी हो जाता। कितनी चतुराई और श्रम से तुझे राजभाषा के रूप के प्रतिष्ठित करने में कार्यालय के लोग लगे हैं। चतुराई शब्द से लोग कहीं दूसरा अर्थ न लगा लें इसलिए मैं यहॉ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि राजभाषा कार्यान्वयन में कर्मचारी  के भावों,विचारों को दृष्टिगत रखकर राजभाषा में कार्य करने के लिए प्रेरित,प्रोत्साहित करना पड़ता है जिसको मैंने चतुराई शब्द के रूप में प्रस्तुत किया है। तू भी तो बड़ी सीधी है, देश की आज़ादी से पहले कभी सरकारी कामकाज की भाषा बनी ही नहीं और देख न अंग्रेजी कितनी सशक्त हो गयी है सरकारी कामकाज में। तू तो अपनी शुद्धता के दायरे में बंधी रही या बाँधी गयी उधर अंग्रेजी दूसरी भाषाओँ से लपक-लपक कर शब्द लेकर खुद को बड़ा ज्ञानी बना बैठी। बता तू, पहले से सोचती तो आज सरकारी कामकाज मैं तेरी भी बुलंदी रहती और फिर इतने अति संवेदनशील और तेरे राजभाषा के रूप को पूरी तरह से न समझ पानेवाले  दुखी लोग हिंदी दिवस पर अपने दुःख आक्रामकता के संग प्रकट नहीं करते।

तू तो जानती ही है कि प्रत्येक कार्यालय में राजभाषा विभाग होता है और उस विभाग में हिंदी या राजभाषा अधिकारी होता है। राजभाषा या हिंदी विभाग को कार्यालय के सारे विभागों के परिपत्र आदि का अनुवाद करना होता है। तू तो समझ सकती है न कि सरकारी कामकाज की भाषा ना रहने से तेरे पास कार्यालयीन कार्यों की शब्दावली पहले काफी कम थी। राजभाषा विभाग अकेले कैसे सारे विभागों के विषयों पर पकड़ बनाये रख सकता है? विभिन्न विषयों की शब्दावलियों के सहज रूप को ढाले रह सकता है? इसलिए विषय को पूरी तरह समझे बिना भी हिंदी अनुवाद कर देता है जिससे अस्वाभाविक शब्द आ जाते हैं और तू कठिन लगने लगती है। यद्यपि अब स्थितियां बदल रही हैं और कार्यालयीन कामकाज में मूल रूप से तेरा भी प्रयोग होने लगा है पर अब भी कुछ कर्मचारियों को अंग्रेजी बड़े सम्मान की भाषा लगती है, लगने दे! भूमंडलीकरण ही एक दिन सिखला देगी प्रत्येक देश के अपनी भाषा के महत्व को, और हम सब राजभाषा वाले भी तो हैं इस प्रयास में। तुझे तो मालूम है न कि राजभाषा विभाग को कार्यान्वयन भी करना पड़ता है और अनुवाद भी, प्रशिक्षण भी और तुझे सरल बनाने के लिए भी कर्मी राजभाषा विभाग से ही अपेक्षा रखते हैं। ना जाने कब, कैसे और क्यों कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्वयन की सारी जिम्मेदारी केवल राजभाषा विभाग पर ही डाल दी गयी है बाकी विभाग तुझसे बचे रहते है या बचने की कोशिश करते हैं लेकिन कब तक?

आज अपने जन्मदिन पर बता ना क्यों करते हैं ऐसा व्यवहार अन्य विभाग? पर तू ना घबड़ा सब ठीक हो रहा है और ठीक हो जायेगा। अब कार्यालय में तेरे राजभाषा रूप को सब जानने-पहचानने और अपनाने लगे हैं और तुझे आसान करने का दौर शुरू हो गया है। लगभग 5 वर्षों में तेरा राजभाषा रूप अति लोकप्रिय हो जायेगा तथा कर्मचारी तेरे अभ्यस्त हो जाएंगे तब तक शिकवे-शिकायत को सुनती जा। देख मैंने यह वाक्य जो लिखा है ना उसपर कई प्रतिक्रियाएं उठेंगी, शायद लोग समझें की मैं ज्योतिष की बात कहाँ ले आया। पर तुझसे तो मेरी धडकनें जुड़ी हैं और धड़कनों को तर्क की कसौटी पर कैसे कसा जा सकता है? इसलिए अपनी इस बात को मैं अभी प्रमाणित नहीं कर सकता। ठीक कहा न मैंने, मुझे तो विश्वास है। कार्यालयों में जिस तेजी से तुझे स्वप्रेरित होकर अपनाया जा रहा है उससे निकट भविष्य में यह वर्तमान तेरे एक नए और सरल रूप को जन्म देगा। हिंदी दिवस का आयोजन वर्तमान कामकाजी हिंदी की आवश्यकता है और भविष्य का संकेत भी। आती रह ऐसे ही वर्ष दर वर्ष और राजभाषा के रथ को प्रगति पथ पर लिए जा निरंतर। मेरे जैसे लाखों लोग समर्पित भावना से तेरे साथ हैं। हिंदी दिवस राजभाषा का एक नया मंगलमय आरम्भ ले कर आये, आज मैं तुझसे यही आशीष चाह रहा हूँ। मेरा प्रणाम स्वीकार कर।








मंगलवार, 17 अगस्त 2010

हिंदी दिवस- अनजानी सी, अनचीन्ही सी

हिंदी दिवस, 2010 की दस्तक आने लगी है तथा एक बार फिर राजभाषा अधिकारी के रूप में मैं अनेकों सार्थक, अनर्थक, सुघड़ और अनगढ़ टिप्पणियों से रू--रू होने के लिए तैयार होने लगा हूँ। केवल मैं ही नहीं बल्कि राजभाषा से जुड़े सभी लोग इसके लिए तैयार हैं। वर्षों से हिंदी दिवस विशेषकर राजभाषा अधिकारियों के लिए प्रश्नों की बारिश लेकर आती है। इन प्रश्नों की बारिश में हिंदी भाषा से जुड़े सभी लोग भींगते हैं परन्तु केंद्र में रहता है राजभाषा अधिकारी। रहना भी चाहिए अन्यथा वर्ष भर ना तो राजभाषा अधिकारी की चर्चा होती है और ना ही राजभाषा की। मैं चर्चा का उल्लेख लोकप्रियता को दृष्टिगत रखकर नहीं कर रहा हूँ मेरा आशय तो राजभाषा और राजभाषा अधिकारी से लोगों का परिचय का है। हिंदी दिवस पर लिखे तमाम लेख, कविताओं आदि में या तो हिंदी की क्षमताओं, विशिष्टताओं की गाथा रहती है अथवा राजभाषा और अधिकारी पर प्रतिकूल टिप्पणियॉ रहती हैं। हिंदी दिवस का यह सिलसिला अनवरत चलते आ रहा है, किसी भी प्रकार का फेर-बदल नहीं हुआ है जिससे प्रमाणित होता है कि राजभाषा और राजभाषा अधिकारी अभी भी लोगों के लिए अनजाने और अनचीन्हें हैं।

हिंदी दिवस को यह माना जाना कि यह एक सरकारी आयोजन है जो हिंदी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के बजाए उसकी लोकप्रियता को कम करने में अधिक कारगर रही है, एक भ्रामक मानसिक स्थिति का द्योतक है, अपरिचय का द्योतक है। इस प्रकार की सोच रखनेवाले यदि अस्सी के दशक के कार्यालयों में राजभाषा की स्थिति से वर्तमान में कार्यालयों के राजभाषा कार्यान्वयन की तुलना करें तो उन्हें अति व्यापक परिवर्तन नज़र आएगा। यदि हिंदी दिवस का समर्थन राजभाषा को न प्राप्त होता तो वर्तमान की राजभाषा तक पहुंच पाना असम्भव होता। अंग्रेजी के कार्यालयीन साहित्य को राजभाषा में परिवर्तित करते समय साहित्यिक हिंदी का अत्यधिक कम भूमिका होती है और बोलचाल की हिंदी के उपयोग की तो संभावना ही नहीं ऊभरती है तब ऐसी स्थिति में कौन सी शब्दावली दी जाए का भाव लिए प्रश्न उभरता है। इस प्रकार की स्थिति में आडमान, दृष्टिबंधक, पावती आदि जैसे शब्द निकलते हैं। सभी भारतीय भाषाओं को तलाशना पड़ता है अंग्रेजी शब्दों के भावों को बखूबी दर्शाते हुए हिंदी के या भारतीय भाषाओं के सटीक अर्थी शब्दों के लिए। कामकाजी भाषा की इस आरम्भिक क्रिया को अनगढ़, अप्राकृतिक, दुरूह, उबाऊ आदि नाम देकर नकारने की कोशिश करना आसान है परन्तु अंग्रेजी के उस पाठ का सटीक अर्थ अभिव्यक्त करते हुए शब्द देना कठिन है। इसलिए हिंदी दिवस पर जब राजभाषा की आधारहीन आलोचना होती है तो राजभाषा चुप रहती है। वह निरंतर अपने विकास की प्रक्रिया में संलग्न रहती है।

हिंदी दिवस पर सरकारी कार्यालयों में कई आयोजन होते हैं जो समय और धन की बर्बादी करते हैं जैसे अनेकों वाक्य संजाल में घूम रहे हैं जैसे अश्वमेध का घोड़ा दौड़ रहा हो यह चुनौती देते हुए कि पकड़ सकते हो पकड़ कर दिखाओ वरना मान लो कि सत्य यही है। अंग्रेजी के कामकाजी साम्राज्य में राजभाषा का महल खड़ा करना उतना ही कठिन हाँ जितना सागर की तूफानी लहरों के बीच नौका के मस्तूल को बनाए रखना। वर्षों से कार्यालय की आबोहवा में घुली अंग्रेजी को हिंदी दिवस धूप की तरह राजभाषा को प्रसारित कर राजभाषा को स्थापित करती है। जिन कर्मचारियों को आदतन अंग्रेजी में काम करने की आदत पड़ चुकी है उन्हीं कर्मचारियों को हिंदी दिवस की विभिन्न प्रतियोगिताओं,आयोजनों आदि में सम्मिलित कर लेने पर राजभाषा के प्रति उनकी झुकाव बढ़ता है,कार्य की गति बढ़ती है,राजभाषा कार्यान्वयन के प्रभाव की समीक्षा होती है। वर्षों से हिंदी दिवस अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभा रही है और स्वंय को अति उपयोगी साबित कर रही है। लोग हिंदी दिवस पर प्रतिकूल टिप्पणियॉ देते रहे हैं परन्तु हिंदी दिवस वर्ष दर वर्ष राजभाषा की उपलब्धियों के नए मुकाम हासिल करती रही है।

हिंदी दिवस का अभिन्न हिस्सा राजभाषा अधिकारी तो इतना अपरिचित है जितना कि दूसरे ग्रह का प्राणी एलियन। अंग्रेजी के कार्यालयीन साहित्य से लेकर अंग्रेजी मानसिकता से जूझता राजभाषा अधिकारी कभी राजभाषा के सरल शब्दों की तलाश में रहता है तो कभी अनुवाद की जटिलता को कम करने में प्रयासरत रहता है। कभी वह हिंदी की कसौटी पर कसा जाता है तो कभी लक्ष्य के अनुसार परिणाम न दे पाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। हिंदी कार्यशालाओं के आयोजन तथा प्रशिक्षण का दायित्व निर्वहन करते हुए कभी वह प्रशिक्षक की भूमिका निभाता है तो कभी कार्यालयीन आयोजनों के मंच पर संचालन की चुनौतीपूर्ण कार्य को सम्पादित करता है। कार्यालय की पत्रिका के सम्पादन से लेकर प्रौद्योगिकी में हिंदी की उपयोगिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राजभाषा अधिकारी की होती है। अधीनस्थ कार्यालयों में राजभाषा निरीक्षण से लेकर राजभाषा की विभिन्न बैठकों में राजभाषा अधिकारी अपनी संस्था की राजभाषा उपलब्धियों की कुशलतापूर्वक प्रस्तुति करता है। इस तरह के और भी कई राजभाषा के कार्य हैं जो राजभाषा अधिकारी करता है जिसकी जानकारी अन्य लोगों को नहीं होती परिणामस्वरूप इनके विरूद्ध आधारहीन टिप्पणियॉ कर विशिष्ट विशेषणों से इन्हें नवाज़ा जाता है। राजभाषा अधिकारी अपने विभिन्न लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु जूझता रहता है इसलिए अपनी बातें कहने के लिए समय नहीं निकाल पाता जिससे प्रतिकूल टिप्पणी करनेवाले इस भ्रम में रहते हैं कि वह जो बोल रहे हैं वह सच है।

हिंदी दिवस के बल पर तथा राजभाषा अधिकारियों की पहल से राजभाषा की प्रगति तेज़ गति से हो रही है। हिंदी दिवस पर किसी भी प्रकार की प्रतिकूल टिप्पणी राजभाषा से न जुड़े लोगों की सोच को प्रभावित करते हैं जबकि राजभाषा से जुड़े लोग ऐसी टिप्पणियों से यही अर्थ लगाते हैं कि अभी भी राजभाषा अनजानी सी, अनचीन्ही सी है जिसके लिए और अथक सार्थक प्रयास करने हैं, हिंदी दिवस की व्यापकता और प्रभाव में और वृद्धि करनी है। यह सच है कि हिंदी दिवस पर की गई सभी प्रतिकूल टिप्पणियॉ राजभाषा से जुड़े लोगों को और प्रभावी राजभाषा कार्यान्वयन के लिए ही प्रेरित करती हैं किन्तु राजभाषा, को यह दुःख अब भी है कि इतने वर्षों के बाद हिंदी दिवस अब भी अनजानी सी, अनचीन्ही सी है, आखिर क्यों ?



मंगलवार, 10 अगस्त 2010

हिंदी विरूद्ध क्षेत्रीय भाषाएं


भारतीय भाषाओं की एक विचित्र स्थिति देखने को मिल रही है, हिंदी के विरूद्ध क्षेत्रीय भाषाएं खड़ी हो रही हैं। इस तथ्य को विभिन्न कार्यालयों के निमंत्रण की भाषा को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। राजभाषा नीति के मुताबिक इस प्रकार के निमंत्रण पत्र आदि त्रिभाषा में जारी होने चाहिए जिसका क्रम क्रमश: क्षेत्रीय भाषा, हिंदी तथा अंग्रेजी होना चाहिए। प्राय: त्रिभाषा रूप की अनदेखी कर केवल क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता है। इस पर न तो व्यापक चर्चा होती है और ना ही इस त्रुटि को सुधारने का कोई सार्थक प्रयास किया जाता है। यहॉ यह भी प्रश्न ऊभरता है कि राजभाषा निरीक्षण के विभिन्न चरण भी इस पर कोई कारगर कदम नहीं उठा रहे हैं। कभी स्थान की कमी, कभी अतिशीघ्रता की वजह से तो कभी अनजाने में निमंत्रण आदि में हिंदी का प्रयोग नहीं हो पाता है। कुछ समय तक यही चलता रहा तो इन निमंत्रण पत्रों में विशेषकर ग क्षेत्रों में हिंदी की उपयोगिता ना के बराबर होने लगेगी तथा भविष्य में इन निमंत्रण आदि को दिखलाकर यह भी कहा जा सकता है कि हिंदी का उपयोग तो पहले से नहीं हो रहा है अतएव बिना हिंदी के भी काम चल सकता है। ऐसा प्रश्न होगा तो क्या होगा जवाब ?

जवाब की जब कभी भी आवश्यकता होती है तब एक ही उत्तर तैयार रहता है और वह उत्तर है त्रिभाषा फार्मूला का पूरी तरह से अनुपालन। यह भी एक कटु सत्य है कि तथा क्षेत्रों में त्रिभाषा फार्मूला पर बल नहीं दिया जाता है बल्कि इसका अनुपालन ना कर पाने के विभिन्न कारणों का उल्लेख अवश्य किया जाता है। यद्यपि प्रशासनिक कार्यालयों में राजभाषा विभाग कार्यरत है तथापि विशेषकर निमंत्रण कार्डों पर भाषागत मुद्रण को व्यवस्थित नहीं किया जा रहा है। कुछ वर्ष पहले तक भारतीय भाषाओं ने अपने विकास की प्रक्रिया तेज कर दी थी जिसमें राजकीय कार्यों में अंग्रेजी के समकक्ष होने की कोशिश थी वह प्रक्रिया अब भी जारी है परन्तु इसमें हिन्दी को अनदेखा करने की झलक दिखलाई पड़ने लगी है जो समग्र रूप से भारतीय भाषाओं के लिए हितकारी नहीं है। यदि भारतीय भाषाएं एक-दूसरी भाषाओं का सार्वजनिक रूप से सम्मान नहीं करेंगी तो राष्ट्रीय स्तर पर और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय भाषाओं को अपनी पहचान बनाए रखने में कठिनाई होगी। वैश्विक भूमंडलीकरण के दौर में भाषाओं का अपना एक विशेष महत्व है जिसे प्रत्येक राष्ट्र समझ रहा है।

भारतीय भाषाओं की इस स्थिति पर मार्च 2010 में भाषा शोध तथा प्रकाशन केन्द्र द्वारा आयोजित दो दिवसीय भारत भाषा संगम के उद्घाटन अवसर पर भारतीय भाषा केंद्रीय संस्थान के संस्थापक निदेशक तथा प्रतिष्ठित भाषाविद् श्री डी पी पट्टनायक ने कहा कि सभी भारतीय भाषाओं को खतरा है। उन्होंने कहा कि अब यह स्थिति निर्मित हो गई है कि अंग्रेजी शीर्ष पर है जबकि 35 भारतीय भाषाएं तलहटी पर हैं। भारतीय भाषाओं, बोलियों पर बोलते हुए प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्री शिव विश्वनाथन ने कहा कि " यह मृत भाषाओं का संगम नहीं है। हम यहॉ भाषाओं का उत्सव मनाने के लिए एकत्र हुए हैं।" उन्होंने कहा कि आधुनिक प्रजातंत्र अंग्रेजी पर निर्मित नहीं हो सकती है, वास्तविक प्रजातंत्र को बहुभाषी होना ही पड़ेगा। इस संगम में 320 भाषाओं के प्रतिनिधित्व उपस्थित थे। इस भाषा संगम में अंग्रेजी एक तरफ थी तथा भारतीय भाषाएं दूसरी और थीं। यहॉ हिन्दी पर ना तो कोई विशेष चर्चा हुई और ना ही इसे राजभाषा के रूप में विशेष दर्जा देकर जॉचा-परखा गया। यह संगम तो भाषाओं के अस्तित्व को लेकर चिंतित था। यही चिंता मुझे राजभाषा कार्यान्वयन में मिल रह् कुछ संकेतों को लेकर है। भविष्य में राजभाषा हिंदी के रूप को दृष्टिगत रखते हुए वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन को गति और दिशा देनी होगी अन्यथा राजभाषा के साथ अन्याय होगा।

भाषा से विमुखता के कई कारण होते हैं किंतु यदि योजनाबद्ध तरीके से प्रयास किए जाएं तो भाषा की लोकप्रियता और उपयोगिता को प्राप्त किया जा सकता है अथवा उसे बरकरार रखा जा सकता है। विकास की गति ने भारतीय भाषाओं में एक नई सोच ला दी है जिससे वह अपनी विकास योजनाओं पर कार्यरत हैं साथ ही उनमें अपने अस्तित्व को लेकर भय भी है। इतिहासकार श्री ओ सी हॉंडा का कहना है कि भाषा मरती है अथवा जीवित रहती है महत्वपूर्ण नहीं है। भाषा का जन्म तथा मृत्यु तो सामाजिक प्रक्रिया है। भाषा से सामान्य व्यक्ति लाभान्वित होता है अथवा नहीं यह महत्वपूर्ण है। यह सोच कहीं न कहीं भाषा को बाजारवाद से जोड़ती है और यही व्यवहारिक सोच वर्तमान में भाषा की कसौटी बनी हुई है। यद्यपि भारतीय भाषाओं को बोलनेवालों की संख्या लिखनेवालों की संख्या से अधिक है। भारतीय भाषाओं का यह ऊभरता अंतरद्वंद्व एक मानसिक भय का प्रतीक है। राजभाषा से न तो भारतीय भाषाओं की प्रतिद्वद्विता की जानी चाहिए और ना ही राजभाषा को किसी रूप में बाधक मानना चाहिए। राजभाषा का प्रयास सभी भारतीय भाषाओं से यथासंभव तालमेल बनाकर चलना है। राजभाषा तो इस दिशा में पहले से ही अग्रसर है। अनेकों कठिनाईयों के बावजूद हिंदी राजभाषा के रूप में विकसित होकर क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़ रही है। राजभाषा के इस तालमेल के बावजूद भी राजभाषा को मुद्रण में अनदेखा करना राजभाषा विभागों, राजभाषा अधिकारियों और कर्मियों के लिए चुनौती है।





रफ़्तार www.hamarivani.com

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

राजभाषा का वर्तमान

भारत के संविधान से लेकर भारत के आम नागरिक की राजकाज की भाषा के रूप में राजभाषा हिंदी ने जितना निखार प्राप्त किया है वह सहज ही लोगों को आकर्षित कर देता है। सभी सरकारी कार्यालयों के स्थाई प्रकार के कागज़ात, प्रलेख, मैनुअल आदि बिना चुके हिंदी और अंग्रेजी में ही मिलेंगे। इतना ही नहीं बल्कि विभिन्न बैठकों में हिंदी मिलती है, वार्षिक आम सभा में हिंदी मिलती है और यहॉ तक कि बोर्ड रूम भी हिंदी की पहुंच से बाहर नहीं है। राजभाषा का यह सशक्त और सक्षम रूप राजभाषा को एक सशक्त आधार देता,है और यह प्रमाणित करता है कि किसी भी उन्नत भाषा के समकक्ष राजभाषा को स्वीकारा जा सकता है। स्वीकारा जा सकता है शब्द लिखने की विवशता है क्योंकि तमाम गुणों के बावजूद भी राजभाषा को स्वीकारा जा रहा है अभी तक पूर्णतया स्वीकारा नहीं गया है। पूर्ण स्वीकृति उस समय होगी जब कार्यालयों में अधिकांश मूल कार्य राजभाषा में ही किया जाएगा। इसके बावजूद भी राजभाषा की प्रगति निरंतर जारी है तथा इसमें विभिन्न स्तरों पर विकास की प्रक्रिया जारी है।

वर्तमान में कार्यालयों के प्रत्येक टेबल पर राजभाषा के न केवल कागजात मिलेंगे बल्कि हिंदी के कुछ हद तक जानकार भी मिलेंगे। अब राजभाषा को लेकर कर्मचारियों में विरोध नहीं होता है बल्कि राजभाषा को सीखने की ललक दिखलाई पड़ती है जो राजभाषा के बढ़ते कदमों का एक सशक्त प्रतीक है। आज यदि पीछे मुड़कर देखें तो स्पष्ट ज्ञात होता है कि राजभाषा ने अपने विकास की एक कीर्तिपूर्ण ऐतिहासिक यात्रा पूरी की है। एक वह भी समय था जब कार्यालयों में हिंदी के कागजात मुश्किल से दिखलाई पड़ते थे तथा यह माना जाता था कि कामकाज की भाषा के रूप में राजभाषा सफल नहीं हो पाएगी तथा एक सरकारी अभियान के रूप में यूं ही चलती रहेगी। वर्तमान में राजभाषा नित नए शब्दों से सजती जा रही है तथा कामकाज में इसका प्रयोग लगातार बढ़ते जा रहा है। यह कहना कि राजभाषा की प्रगति सौ दिन चले अढ़ाई कोस है तो यही कहा जा सकता है कि इस प्रकार की सोच रखनेवाले राजभाषा कार्यान्वयन की चुनौतियों तथा कठिनाईयों से पूरी तरह से परिचित नहीं हैं।

कार्यालय की एक पीढ़ी जिसकी शुरूआत 70 के दशक में हुई थी अब वह सेवानिवृत्ति के दायरे में है। यही वह पीढ़ी है जिसे यह बतलाया गया था कि अंग्रेजी के बिना जीवन की प्रगति कठिन है तथा इसके बिना नौकरी की सोच मात्र शेखचिल्ली का ख्वाब ही रह जाएगा। अस्सी की दशक में आई पीढ़ी को ज्ञात हो गया था कि हिंदी को अनदेखा करना कठिन है इसलिए इस पीढ़ी ने राजभाषा से खुद को जोड़ लिया तथा उसके बाद राजभाषा की कठिनाईयॉ बहुत कम हो गई। हिंदी भी कार्यालयों के काम में उपयोग में लाई जाती है यह अब सर्वसामान्य का स्वीकार्य तथ्य है। इसका तात्पर्य यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि वर्तमान में राजभाषा समस्यामुक्त है। विकास की गति के संग चलने के लिए प्रत्येक भाषा को लगातार संवरते और निखरते रहना पड़ता है, राजभाषा भी इससे अछूती नहीं है। सत्तर और अस्सी के दशक की चुनौतियॉ लगभग समाप्त हो गई हैं किंतु नई चुनौतियॉ निरन्तर ऊभर रही हैं। द्वन्द्व और चुनौतियॉ विकास प्रक्रिया का एक स्वाभाविक अंग हैं और राजभाषा भी स्वंय के विकास संग इस दौर से गुजर रही है।

वर्तमान की राजभाषा प्रौद्योगिकी की कसौटी पर कसी जा रही है। नित नए सॉफ्टवेयरों के बावजूद भी प्रयोक्ता को प्रौद्योगिकी उन्मुख बनाना प्रत्येक कार्यालय का लक्ष्य है। देवनागरी की की बोर्ड से लेकर ट्रांसलिटरेशन तक के विस्तार में कहीं न कहीं कर्मचारी के पसन्दनुसार फिट करना आसान कार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त विभिन्न कार्यालयों के कामकाज भी प्रौद्योगिकी के दायरे में है जिसमें हिंदी की सुविधा जोड़ना और उसमें कार्य करने के लिए प्रशिक्षित करना एक प्रमुख लक्ष्य है। प्रौद्योगिकी से वर्तमान नई पीढ़ी जुड़ी हुई है जबकि पुरानी पीढ़ी विशेषकर सत्तर और कुछ हद तक अस्सी के दशक की पीढ़ी स्वंय को प्रौद्योगिकी के अनुकूल ढालने में काफी कठिनाईयों का अनुभव कर रही है जिसमें परिवर्तन करना राजभाषा कार्यान्वयन की एक प्रमुख चुनौती है। यहॉ इस तथ्य का उल्लेख करना भी प्रासंगिक है कि एक समय माऊस ठीक से न पकड़ सकनेवाला कर्मचारी अब बेहिचक अपना काम उसी माऊस से सहजतापूर्वक और सरलतापूर्वक कर लेता है। यह कर्मचारी सत्तर के दशक का ही है। प्रौद्योगिकी से जुड़ने की प्रक्रिया में काफी हैरानी वाली बातें हुई जिसमें सर्वप्रमुख यह है कि जितनी तेजी से प्रौद्योगिकी को कर्मचारियों ने अपनाया वह कल्पना से परे है। राजभाषा इन्हीं झंझावातों में सफलतापूर्वक कार्यनिष्पादन दर्शा रही है।

राजभाषा में सुलभ कार्यालयीन साहित्य भी राजभाषा के उपयोग में अनवरत वृद्धि कर रहा है। कार्यालय के किसी भी विभाग के किसी भी विषय पर राजभाषा में साहित्य है जिससे कर्मचारी आसानी से तथा विश्वासपूर्वक राजभाषा में कार्य कर रहे हैं। इस कार्य को और सरल बनाने में संबंधित कार्यालयों की वेबसाइटों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। इन वेबसाइटों पर कार्यालयीन साहित्य भी हिंदी में उपलब्ध है सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर। आंतरिक कामकाज हो अथवा जनता के साथ सम्पर्क हो हर जगह राजभाषा का उपयोग हो रहा है। विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अधिकांशत: हिंदी का प्रयोग कर राजभाषा के महत्व को प्रतिपादित किया जा रहा है। अब विभिन्न कार्यालयों के उच्चाधिकारी भी जिस उत्साह और प्रेरणा से राजभाषा कार्यान्वयन में संलग्न हैं वह वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन के लिए उर्जा का कार्य कर रहा है। इस तरह प्रगति की अनेकों गाथाएं हैं किंतु मेरा उद्देश्य तो मात्र यह दर्शाना था कि वर्तमान में राजभाषा अत्यधिक सकारात्मक दौर से गुजर रही है और नित ने आब के साथ अपनी सार्थकता प्रमाणित कर रही है। राजभाषा अपने स्वर्णिम काल की और बढ़ रही है।

Subscribe to राजभाषा

रविवार, 1 अगस्त 2010

राजभाषा अनुराग का मिथक

हिंदी जब से सरकारी कामकाज की भाषा के लिए राजभाषा के रूप में सजने-संवरने लगी है तब से राजभाषा अनुरागियों की सतत वृद्धि हो रही है और राजभाषा कार्यान्वयन भी प्रगति दर्शा रही है। इस अनुराग को बहुत करीब से और बहुत वर्षों से देखते- निरखते मुझे राजभाषा अनुरागियों में विशेष आकर्षण दिखलाई देने लगा जिससे इसकी टोह लेने की एक समर्पित भावना मुझमें पनपने लगी। अकसर यह पाया जाता है कि राजभाषा जब किसी कर्मचारी के टेबल पर रबती है तो उसकी स्थिति अधिकांश टेबलों पर शरणार्थी की रहती है। सरकारी कर्मचारी के टेबल पर चूंकि अंग्रेजी का काम अधिक होता है और उसमॆ कार्य करने के अभ्यस्त होते हैं इसलिए हिंदी का जब भी कोई कागज कर्मचारियों के टेबल पर पहुंचता है तब उसकी स्थिति शरणार्थियों जैसी ही होती है। इसमें ना तो कर्मचारी को दोष है और ना उस हिंदी के कागज का यदि दोष है तो रोमन लिपि में लिखने के अभ्यस्त हॉथो को देवनागरी लिपि में लिखने की ज़हमत उठाने की। इस काल्पनिक ज़हमत को उठाने से मुक्ति मिलना संभव नहीं होता इसलिए उसपर कोई तीखी प्रतिक्रिया भी संभव नहीं होती। इन बंधनों की विवशता में एकाएक अनुराग उत्पन्न हो जाता है जिसमें भावनाओं से अधिक विवशताओं का बोलबाला रहता है।

विवशता मिश्रित यह अनुराग राजभाषा को गति प्रदान कर रहा है। यदि विवशता (जो काल्पनिक होती है) ना होती तो ? तो कर्मचारी बिना समय गंवाए बोल उठता कि हिंदी में काम करने नहीं आता है कृपया हिंदी विभाग में यह कागज भेजें। यदि राजभाषा विभाग भी नहीं होता तो ? तो सरकारी कार्यालयों में राजभाषा का कार्यान्वयन नहीं हो पाता। क्या यह सच है ? या फिर यह सच है कि गृह मंत्रालय के अंतर्गत राजभाषा विभाग है इसलिए कार्यालयों को लक्ष्य के अनुसार राजभाषा में अपना कार्यनिष्पादन दर्शाना पड़ता है। हॉ, यही सच है कि यदि गृह मंत्रालय के अंतर्गत राजभाषा विभाग ना होता तो राजभाषा का वर्तमान निखरा रूप अपने अस्तित्व में नहीं आता। इससे यह प्रमाणित होता है कि जैसे गंगा को गंगोत्री से जोड़कर ही गंगा के उद्गम तक पहुंचा जा सकता है वैसे ही राजभाषा को गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग से जोड़कर ही राजभाषा अनुराग को समझा जा सकता है। यह भी कहा जा सकता है कि राजभाषा कार्यान्वयन की धूरी गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग है किन्तु क्या भारतीय संविधान राजभाषा कार्यान्वयन के इसी रूप की और इंगित करता है ? इस प्रश्न का सटीक जवाब विभिन्न कार्यालयों के पास है जिसपर ना तो अधिकांश कार्यालयों के विभाग चिंतन करना चाहते हैं और ना चर्चा। ध्येय यही है कि राजभाषा का अनुराग ऐसा ही बना रहे।

राजभाषा के अनुराग को ऐसे ही बनाए रखने में विभिन्न कार्यालयों के राजभाषा विभागों के एक उद्देश्य की पूर्ति अवश्य होती है कि राजभाषा दिनोंदिन कर्मचारियों के बीच अपनी लोकप्रियता में वृद्धि कर रही है। इस लोकप्रियता के आकर्षक चादर तले उपयोगिता को खूबसूरती से छिपाया जाता है। कौन छिपाता है इसे यह प्रश्न उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना महत्वपूर्ण है इस अनुरागी प्रवृत्ति का विश्लेषण। किसी भी कार्यालय में आप जाईए दीवारों से लेकर कम्प्यूटरों तक में हिंदी के विभिन्न घोष वाक्यों आदि से राजभाषा के अनुराग का जोरदार प्रदर्शन किया जाता है। कार्यालय द्वारा हिंदी में किए गए कार्यों की इस तरह तलाश की जाती है जैसे भूसे के ढेर में सूई ढूंढी जा रही हो। यह प्रवृत्ति जहॉ एक तरफ हिंदी के अनुराग को प्रदर्शित करती है वहीं दूसरी और यह भी दर्शाती है कि संसदीय समिति आदि द्वारा यदि निरीक्षण ना किया जाता तो शायद राजभाषा के कार्यनिष्पादनों का ना तो समुचित रिकॉर्ड रखने की कोशिश की जाती और ना ही उसे सहेजने का प्रयास किया जाता। क्या इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि राजभाषा अनुराग में कहीं कोई दबाव कार्य करता है ? यदि ऐसा कहीं है तो वह राजभाषा नीति के विपरीत है तथा इस अनुरागी प्रवृत्ति की विभिन्न स्तरों पर निवारक उपाय किए जाने चाहिए।

राजभाषा की कोई बैठक हो अथवा राजभाषा पर बोलने पर जब कोई अवसर मिले तब कई प्रेरणापूर्ण बातें होती हैं, कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं और उर्जापूर्ण संचार तथा स्प्न के साथ राजाभाषामयी भविष्य दिखता है किन्तु समय के साथ-साथ प्रेरणापूर्ण बातें तथा लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय हाशिए पर चले जाते हैं जिसकी कौई विश्ष खोज-कबर नहीं ली जाती है। इसके अतिरिक्त इनका समुचित रिकॉर्ड होता है तथा इनको बार-बार प्रदर्शित कर राजभाषा अनुराग को जतलाया जाता है। राजभाषा कार्यान्वयन जगत में लिए गए निर्णयों पर कृत कार्रवाई की गहन समीक्षा नहीं की जाती हाँ जिसकी वजह से अधिकांश कार्यालय राजभाषा का उपयोग राजभाषा अनुराग प्रदर्शन के लिए करते हैं। राजभाषा कार्यान्वयन के हित में वर्तमान राजभाषा अनुराग की प्रवृत्ति घातक है। इससे सहज और स्वाभाविक राजभाषा कार्यान्वयन की गति में बाधा पहुंचती है। राजभाषा अनुराग का प्रदर्शन वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन का एख प्रमुख बाधक है। साहस के संग राजभाषा कार्यान्वयन करने से राजभाषा कार्यालय के प्रत्येक टेबल पर लेकप्रिय और उपयोगी हो जाएगी। राजभाषा अनुराग को मंचों, निरीक्षणों, प्रदर्शनियों आदि के अतिरिक्त टेबलों, कार्य की आदतॆ, फाईलों आदि में भी पहुंचने की आवश्यकता है।








शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

राजभाषा की दुनिया

दुनिया, विस्तृत विशाल दुनिया, दुनिया के भीतर दुनिया, यह अजीब दुनिया, आदि, इन भावों में डूबी अनेकों कथा-कहानियॉ, गीत आदि हम सबने सुना है और दुनिया को कम और इसके रहस्य को समझने का अधिक प्रयास अधिक किया है। सदियों से इंसान दुनिया में किसी नई तलाश के लिए भटक रहा है। तलाश की इस अनवरत प्रक्रिया में एक दुनिया राजभाषा की भी दुनिया है। सागर में सुदूर किसी टापू की तरह पड़ी इस दुनिया के इर्द-गिर्द से असंख्य नाविक गुज़र रहे हैं परन्तु इनमें से की कोलम्बस इस दुनिया को नहीं मिला। सामान्यतया इस दुनिया में हलचल रहती है। इस दुनिया के मूल निवासी प्रत्येक गुजरने वाली नाव या पोत की और ईशारा कर अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करते रहते हैं। इस दुनिया की मूल भाषा राजभाषा है जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है परन्तु बोलचाल की हिंदी से दूर दिखती है. इसलिए इस भाषा को समझने में अकसर लोगों को कठिनाईयों का अनुभव होता है। ऐसा कई बार हुआ है कि नाव या पोत इस दुनिया में रूकते हैं किंतु भाषा पूरी तरह समझ में ना आने से अपनी यात्रा पर निकल पड़ते हैं। दुनिया अबूझी की अबूझी रह जाती है।

आईए, हम इस दुनिया की यात्रा करते हैं। यह यात्रा कितनी सफल होगी वह आपकी सोच और आपकी दूरदर्शिता निर्धारित करेगी। मेरी भूमिका तो मात्र एक सामान्य गाइड की होगी। इस दुनिया में प्रवेस करते ही पहली जॉच होगी कि आगंतुक किस भाषिक क्षेत्र का है तदनुसार उसे क, ख तथा ग क्षेत्र के अनुसार पत्र दिया जाता है। यह प्रक्रिया अत्यंत सरल है इसलिए इसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं होती है। यहॉ यह ध्यान देनेवाली बात यह है कि भाषिक क्षेत्र का पार्मूला केवल भारतीयों पर ही लागू है। यदि विदेशी अर्थात अंग्रेजी भाषिक आगंतुक प्रवेश करता है तो सबसे पहले उसे भारत सरकार के राजभाषा अधिनियम धारा 3(3) के अंतर्गत जॉचा जाता है। यह जॉच प्रक्रिया विशेष विशेषज्ञतायुक्त है अतएव इसमें प्राय: चूक होने की संभावना बरकरार रहती है। अंग्रेजी को हिंदी करना मात्र अंग्रेजी शब्द के स्थान पर हिंदी शब्द रखना नहीं होता है बल्कि संबंधित विषय के भाव को अभिव्यक्ति प्रदान करनी होती है। इसमें कैसी उलझन होती है इसका उदाहरण निम्नलिखित अधूरे वाक्यांश द्वारा प्रस्तुत है –

Parcel is being addressed to their branch or correspondent bank

पार्सल है उनकी शाखा या संवाददाता बैंक को संबोधित किया जा रहा है.

क्या कहेंगे आप कि इस दुनिया में ऐसे ही राजभाषा वाक्य की रचना होती है। जी हॉ, एक हद तक आपकी सोच सही तो हो सकती है पर इस दुनिया में भी अनेकों धुरन्धर हैं जो चुपचाप राजभाषा के विकास में लगे हुए हैं। ऐसे लोग ना तो शोरबाजी करते हैं और ना ही निरर्थक मंचबाजी इसलिए प्राय: चर्चाओं में नहीं रहते हैं। इस दुनिया की प्रथम रीति यह है कि –

राजभाषा की प्रतिभाओं को विकास का पूर्ण अवसर नहीं मिल रहा है।

भूलिएगा नहीं कि मैंने अवसर की बात नहीं की है बल्कि पूर्ण अवसर की बात की है क्योंकि बगैर पूर्णता के किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं की जा सकती है।

यदि मैं कहूं कि मैंने सत्य को बेबाकी से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है तो यह भी उचित नहीं कहा जा सकता क्योंकि कई ऐसे लोग हैं जिन्हें पूर्ण अवसर मिल रहा है परन्तु ऐसे लोग अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए इस अवसर का अधिक प्रयोग कर रहे हैं अन्यथा राजभाषा की दुनिया में दो चीजों की होड़ क्यों लगी होती। शायद आप भी जानते हों इस होड़ को। यह हैं डॉक्टरेट डिग्री की प्राप्ति तथा पुस्तक प्रकाशन की होड़। यह कार्य अधिकांशत: कार्यालयीन सुविधाओं के सहयोग से पूर्णता प्राप्त करते हैं वैसे अपवाद तो हर जगह पाया जाता है।
अतएव राजभाषा की दुनिया का दूसरा तथ्य है कि –

प्राप्त सुविधाओं की सहायता से विशेषतया डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त करना तथा स्वनाम की पुस्तक प्रकाशित कर में व्यक्तिगत विकास की यात्रा की और बढ़ना।

चुनौतियॉ और राजभाषा एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह लगते हैं। हिंदी दिवस,14 सितंबर के उपलक्ष्य आयोजित हिंदी सप्ताह, पखवाड़ा या हिंदी माह के आयोजन के समय राजभाषा जगत में दीवाली, ईद, क्रिसमस आदि जैसा वातावरण रहता है। इस अवधि के दौरान स्टाफ को एकत्रित करना एक बड़ी चुनौती होती है। जी नहीं, कृपया ऐसा मत सोचिए कि यह चुनौती हमेशा रही है। स्टाफ को राजभाषा के किसी आयोजन में इकटअठा करना पिछले 5-6 वर्षों की समस्या है। इसका कारण यह है कि राजभाषा की दुनिया में जो आयोजन वर्ष 1984 में किए जाते थे वह अब भी जारी है। परिवर्तन के नाम पर पुरस्कार आदि की राशि बढ़ गई है किन्तु इसमें गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया है। इसलिए स्टाफ की यह सोच रहती है कि क्यों जाकर बोर होएं इससे अच्छा है कि हिंदी के नाम पर आज जल्दी कार्यालय से चले जाने की सुविधा का उपभोग करें। राजभाषा अधिकारी आयोजन, संयोजन से जूझते हुए अपने उच्चाधिकारी को भीड़ इकट्ठा होने की आश्वासन देते रहता है। इस तथ्य की पुष्टि लगभग सभी कार्यालय के राजभाषा विभाग, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के आयोजन इतिहास के अवलोकन से सहज ही उपलब्ध हो जाता है। इससे तीसरी तथ्य स्पष्ट होता है कि –
राजभाषा की दुनिया में चमक है किंतु अपेक्षित दमक नहीं है इसके बावजूद भी प्रशंसाएं मिलती रहती हैं।

राजभाषा कार्यान्वयन समिति की तिमाही बैठक की कार्यसूची तथा कार्यवृत्त के अवलोकन से यह तथ्य भी उभरता है कि वर्षों से एक ही कार्यसूची तथा लगभग एक जैसे कार्यवृत्त पर राजभाषा की दुनिया दौड़ रही है। कई जगह तो समिति में लिए गए निर्णयों पर कोई ठोस कार्रवाई ही नहीं होती और आधारहीन कारण समिति के समक्ष प्रस्तुत कर कार्यवृत्त की पुष्टि कर ली जाती है। समय-समय पर इस कार्यवृत्त में सदस्यों के नाम बदल जाते हैं। राजभाषा कार्यान्वयन की दिशा निर्धारित करनेवाली यह एक सशक्त समिति अपनी क्षमताओं का बहुत कम उपयोग कर पाती है। इससे यह चतुर्थ निष्कर्ष निकलता है कि –

राजभाषा की दुनिया प्राप्त शक्तियों का उपयोग नहीं कर पाती है तथा बैठकों में परम्पराएं निभाने जैसी झलक मिलती है।

राजभाषा कार्यान्वयन को समुचित गति प्रदान करने तथा आवश्यक दिशानिर्देश देने के लिए अधीनस्थ कार्यालयों का निरीक्षण किया जाना आवश्यक है। यह अनुभव किया गया है कि यह निरीक्षण केवल आवश्यकता पूर्ति के लिए की जाती है। राजभाषा अधिकारी कुछ लोगों से मिलकर लौट आता है या मात्र उपस्थिति दर्ज कराने के उद्देश्य से अधीनस्थ कार्यालय के स्टाफ से मिलता है और निरीक्षण रिपोर्ट तैयार करना अपने एक दायित्व का इतिश्री मान लेता है। स्टाफ से मिलना, बातचीत कर उनकी समस्याओं का तत्काल समाधान करना नहीं हो पाता परिणामस्वरूप राजभाषा कार्यान्वयन को गति नहीं मिल पाती। यह राजभाषा कार्यान्वयन की पॉचवी स्थिति दर्शाता है कि –
राजभाषा निरीक्षण एक औपचारिकता बन गया है जिसका राजभाषा कार्यान्वयन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

यह अंतिम पड़ाव है। अंतिम पड़ाव इसलिए कि इस व्यापक दुनिया का भ्रमण अत्यधिक समय लेनेवाला है। मेरी कोशिश उन महत्वपूर्ण मदों की दर्शाना है जिससे राजभाषा को काफी हानि हो रही है। राजभाषा कार्यान्वयन के स्पंदनों को बखूबी दर्शानेवाली हिंदी की तिमाही रिपोर्ट की स्थिति विवादास्पद बनती जा रही है। इस रिपोर्ट को तैयार करते समय पिछली तिमाही की रिपोर्ट की नकल की जाती है तथा आंकड़ों में थोड़ा सा हेर-पेर कर रिपोर्ट प्रेषित कर दी जाती है। यदि इस रिपोर्ट में दर्शाए आंकड़ों का सत्यापन किया जाए तो कड़ों के समर्थन हेतु कागजात, प्रलेख आदि नहीं मिल पाते हैं। विभिन्न प्रमख कार्यालयों से यह रिपोर्ट व्यवस्थित प्रेषित की जाती है और यथोचित रिकॉर्ड भी रखा जाता है किन्तु अधीनस्थ कार्यालयों में यह स्थिति नहीं है। ज्ञातव्य है कि इसी रिपोर्ट के आधार पर राजभाषा के विभिन्न पुरस्कार निर्धारित के जाते हैं। इससे छठवॉ तथ्य स्पष्ट होता है कि –

राजभाषा कार्यान्वयन का परम लक्ष्य मात्र राजभाषा के विभिन्न पुरस्कार प्राप्त करना है।

यदि यह सिलसिला जारी रहा तो एक स्थिति ऐसी आ जाएगी कि राजभाषा कार्यान्वयन केवल काग़जों में सिमट कर रह जाएगी। समय रहते चेत जाना समाज और राष्ट्र के लिए हितकर होगा।