मंगलवार, 17 अगस्त 2010

हिंदी दिवस- अनजानी सी, अनचीन्ही सी

हिंदी दिवस, 2010 की दस्तक आने लगी है तथा एक बार फिर राजभाषा अधिकारी के रूप में मैं अनेकों सार्थक, अनर्थक, सुघड़ और अनगढ़ टिप्पणियों से रू--रू होने के लिए तैयार होने लगा हूँ। केवल मैं ही नहीं बल्कि राजभाषा से जुड़े सभी लोग इसके लिए तैयार हैं। वर्षों से हिंदी दिवस विशेषकर राजभाषा अधिकारियों के लिए प्रश्नों की बारिश लेकर आती है। इन प्रश्नों की बारिश में हिंदी भाषा से जुड़े सभी लोग भींगते हैं परन्तु केंद्र में रहता है राजभाषा अधिकारी। रहना भी चाहिए अन्यथा वर्ष भर ना तो राजभाषा अधिकारी की चर्चा होती है और ना ही राजभाषा की। मैं चर्चा का उल्लेख लोकप्रियता को दृष्टिगत रखकर नहीं कर रहा हूँ मेरा आशय तो राजभाषा और राजभाषा अधिकारी से लोगों का परिचय का है। हिंदी दिवस पर लिखे तमाम लेख, कविताओं आदि में या तो हिंदी की क्षमताओं, विशिष्टताओं की गाथा रहती है अथवा राजभाषा और अधिकारी पर प्रतिकूल टिप्पणियॉ रहती हैं। हिंदी दिवस का यह सिलसिला अनवरत चलते आ रहा है, किसी भी प्रकार का फेर-बदल नहीं हुआ है जिससे प्रमाणित होता है कि राजभाषा और राजभाषा अधिकारी अभी भी लोगों के लिए अनजाने और अनचीन्हें हैं।

हिंदी दिवस को यह माना जाना कि यह एक सरकारी आयोजन है जो हिंदी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के बजाए उसकी लोकप्रियता को कम करने में अधिक कारगर रही है, एक भ्रामक मानसिक स्थिति का द्योतक है, अपरिचय का द्योतक है। इस प्रकार की सोच रखनेवाले यदि अस्सी के दशक के कार्यालयों में राजभाषा की स्थिति से वर्तमान में कार्यालयों के राजभाषा कार्यान्वयन की तुलना करें तो उन्हें अति व्यापक परिवर्तन नज़र आएगा। यदि हिंदी दिवस का समर्थन राजभाषा को न प्राप्त होता तो वर्तमान की राजभाषा तक पहुंच पाना असम्भव होता। अंग्रेजी के कार्यालयीन साहित्य को राजभाषा में परिवर्तित करते समय साहित्यिक हिंदी का अत्यधिक कम भूमिका होती है और बोलचाल की हिंदी के उपयोग की तो संभावना ही नहीं ऊभरती है तब ऐसी स्थिति में कौन सी शब्दावली दी जाए का भाव लिए प्रश्न उभरता है। इस प्रकार की स्थिति में आडमान, दृष्टिबंधक, पावती आदि जैसे शब्द निकलते हैं। सभी भारतीय भाषाओं को तलाशना पड़ता है अंग्रेजी शब्दों के भावों को बखूबी दर्शाते हुए हिंदी के या भारतीय भाषाओं के सटीक अर्थी शब्दों के लिए। कामकाजी भाषा की इस आरम्भिक क्रिया को अनगढ़, अप्राकृतिक, दुरूह, उबाऊ आदि नाम देकर नकारने की कोशिश करना आसान है परन्तु अंग्रेजी के उस पाठ का सटीक अर्थ अभिव्यक्त करते हुए शब्द देना कठिन है। इसलिए हिंदी दिवस पर जब राजभाषा की आधारहीन आलोचना होती है तो राजभाषा चुप रहती है। वह निरंतर अपने विकास की प्रक्रिया में संलग्न रहती है।

हिंदी दिवस पर सरकारी कार्यालयों में कई आयोजन होते हैं जो समय और धन की बर्बादी करते हैं जैसे अनेकों वाक्य संजाल में घूम रहे हैं जैसे अश्वमेध का घोड़ा दौड़ रहा हो यह चुनौती देते हुए कि पकड़ सकते हो पकड़ कर दिखाओ वरना मान लो कि सत्य यही है। अंग्रेजी के कामकाजी साम्राज्य में राजभाषा का महल खड़ा करना उतना ही कठिन हाँ जितना सागर की तूफानी लहरों के बीच नौका के मस्तूल को बनाए रखना। वर्षों से कार्यालय की आबोहवा में घुली अंग्रेजी को हिंदी दिवस धूप की तरह राजभाषा को प्रसारित कर राजभाषा को स्थापित करती है। जिन कर्मचारियों को आदतन अंग्रेजी में काम करने की आदत पड़ चुकी है उन्हीं कर्मचारियों को हिंदी दिवस की विभिन्न प्रतियोगिताओं,आयोजनों आदि में सम्मिलित कर लेने पर राजभाषा के प्रति उनकी झुकाव बढ़ता है,कार्य की गति बढ़ती है,राजभाषा कार्यान्वयन के प्रभाव की समीक्षा होती है। वर्षों से हिंदी दिवस अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभा रही है और स्वंय को अति उपयोगी साबित कर रही है। लोग हिंदी दिवस पर प्रतिकूल टिप्पणियॉ देते रहे हैं परन्तु हिंदी दिवस वर्ष दर वर्ष राजभाषा की उपलब्धियों के नए मुकाम हासिल करती रही है।

हिंदी दिवस का अभिन्न हिस्सा राजभाषा अधिकारी तो इतना अपरिचित है जितना कि दूसरे ग्रह का प्राणी एलियन। अंग्रेजी के कार्यालयीन साहित्य से लेकर अंग्रेजी मानसिकता से जूझता राजभाषा अधिकारी कभी राजभाषा के सरल शब्दों की तलाश में रहता है तो कभी अनुवाद की जटिलता को कम करने में प्रयासरत रहता है। कभी वह हिंदी की कसौटी पर कसा जाता है तो कभी लक्ष्य के अनुसार परिणाम न दे पाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। हिंदी कार्यशालाओं के आयोजन तथा प्रशिक्षण का दायित्व निर्वहन करते हुए कभी वह प्रशिक्षक की भूमिका निभाता है तो कभी कार्यालयीन आयोजनों के मंच पर संचालन की चुनौतीपूर्ण कार्य को सम्पादित करता है। कार्यालय की पत्रिका के सम्पादन से लेकर प्रौद्योगिकी में हिंदी की उपयोगिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राजभाषा अधिकारी की होती है। अधीनस्थ कार्यालयों में राजभाषा निरीक्षण से लेकर राजभाषा की विभिन्न बैठकों में राजभाषा अधिकारी अपनी संस्था की राजभाषा उपलब्धियों की कुशलतापूर्वक प्रस्तुति करता है। इस तरह के और भी कई राजभाषा के कार्य हैं जो राजभाषा अधिकारी करता है जिसकी जानकारी अन्य लोगों को नहीं होती परिणामस्वरूप इनके विरूद्ध आधारहीन टिप्पणियॉ कर विशिष्ट विशेषणों से इन्हें नवाज़ा जाता है। राजभाषा अधिकारी अपने विभिन्न लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु जूझता रहता है इसलिए अपनी बातें कहने के लिए समय नहीं निकाल पाता जिससे प्रतिकूल टिप्पणी करनेवाले इस भ्रम में रहते हैं कि वह जो बोल रहे हैं वह सच है।

हिंदी दिवस के बल पर तथा राजभाषा अधिकारियों की पहल से राजभाषा की प्रगति तेज़ गति से हो रही है। हिंदी दिवस पर किसी भी प्रकार की प्रतिकूल टिप्पणी राजभाषा से न जुड़े लोगों की सोच को प्रभावित करते हैं जबकि राजभाषा से जुड़े लोग ऐसी टिप्पणियों से यही अर्थ लगाते हैं कि अभी भी राजभाषा अनजानी सी, अनचीन्ही सी है जिसके लिए और अथक सार्थक प्रयास करने हैं, हिंदी दिवस की व्यापकता और प्रभाव में और वृद्धि करनी है। यह सच है कि हिंदी दिवस पर की गई सभी प्रतिकूल टिप्पणियॉ राजभाषा से जुड़े लोगों को और प्रभावी राजभाषा कार्यान्वयन के लिए ही प्रेरित करती हैं किन्तु राजभाषा, को यह दुःख अब भी है कि इतने वर्षों के बाद हिंदी दिवस अब भी अनजानी सी, अनचीन्ही सी है, आखिर क्यों ?



मंगलवार, 10 अगस्त 2010

हिंदी विरूद्ध क्षेत्रीय भाषाएं


भारतीय भाषाओं की एक विचित्र स्थिति देखने को मिल रही है, हिंदी के विरूद्ध क्षेत्रीय भाषाएं खड़ी हो रही हैं। इस तथ्य को विभिन्न कार्यालयों के निमंत्रण की भाषा को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। राजभाषा नीति के मुताबिक इस प्रकार के निमंत्रण पत्र आदि त्रिभाषा में जारी होने चाहिए जिसका क्रम क्रमश: क्षेत्रीय भाषा, हिंदी तथा अंग्रेजी होना चाहिए। प्राय: त्रिभाषा रूप की अनदेखी कर केवल क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता है। इस पर न तो व्यापक चर्चा होती है और ना ही इस त्रुटि को सुधारने का कोई सार्थक प्रयास किया जाता है। यहॉ यह भी प्रश्न ऊभरता है कि राजभाषा निरीक्षण के विभिन्न चरण भी इस पर कोई कारगर कदम नहीं उठा रहे हैं। कभी स्थान की कमी, कभी अतिशीघ्रता की वजह से तो कभी अनजाने में निमंत्रण आदि में हिंदी का प्रयोग नहीं हो पाता है। कुछ समय तक यही चलता रहा तो इन निमंत्रण पत्रों में विशेषकर ग क्षेत्रों में हिंदी की उपयोगिता ना के बराबर होने लगेगी तथा भविष्य में इन निमंत्रण आदि को दिखलाकर यह भी कहा जा सकता है कि हिंदी का उपयोग तो पहले से नहीं हो रहा है अतएव बिना हिंदी के भी काम चल सकता है। ऐसा प्रश्न होगा तो क्या होगा जवाब ?

जवाब की जब कभी भी आवश्यकता होती है तब एक ही उत्तर तैयार रहता है और वह उत्तर है त्रिभाषा फार्मूला का पूरी तरह से अनुपालन। यह भी एक कटु सत्य है कि तथा क्षेत्रों में त्रिभाषा फार्मूला पर बल नहीं दिया जाता है बल्कि इसका अनुपालन ना कर पाने के विभिन्न कारणों का उल्लेख अवश्य किया जाता है। यद्यपि प्रशासनिक कार्यालयों में राजभाषा विभाग कार्यरत है तथापि विशेषकर निमंत्रण कार्डों पर भाषागत मुद्रण को व्यवस्थित नहीं किया जा रहा है। कुछ वर्ष पहले तक भारतीय भाषाओं ने अपने विकास की प्रक्रिया तेज कर दी थी जिसमें राजकीय कार्यों में अंग्रेजी के समकक्ष होने की कोशिश थी वह प्रक्रिया अब भी जारी है परन्तु इसमें हिन्दी को अनदेखा करने की झलक दिखलाई पड़ने लगी है जो समग्र रूप से भारतीय भाषाओं के लिए हितकारी नहीं है। यदि भारतीय भाषाएं एक-दूसरी भाषाओं का सार्वजनिक रूप से सम्मान नहीं करेंगी तो राष्ट्रीय स्तर पर और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय भाषाओं को अपनी पहचान बनाए रखने में कठिनाई होगी। वैश्विक भूमंडलीकरण के दौर में भाषाओं का अपना एक विशेष महत्व है जिसे प्रत्येक राष्ट्र समझ रहा है।

भारतीय भाषाओं की इस स्थिति पर मार्च 2010 में भाषा शोध तथा प्रकाशन केन्द्र द्वारा आयोजित दो दिवसीय भारत भाषा संगम के उद्घाटन अवसर पर भारतीय भाषा केंद्रीय संस्थान के संस्थापक निदेशक तथा प्रतिष्ठित भाषाविद् श्री डी पी पट्टनायक ने कहा कि सभी भारतीय भाषाओं को खतरा है। उन्होंने कहा कि अब यह स्थिति निर्मित हो गई है कि अंग्रेजी शीर्ष पर है जबकि 35 भारतीय भाषाएं तलहटी पर हैं। भारतीय भाषाओं, बोलियों पर बोलते हुए प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्री शिव विश्वनाथन ने कहा कि " यह मृत भाषाओं का संगम नहीं है। हम यहॉ भाषाओं का उत्सव मनाने के लिए एकत्र हुए हैं।" उन्होंने कहा कि आधुनिक प्रजातंत्र अंग्रेजी पर निर्मित नहीं हो सकती है, वास्तविक प्रजातंत्र को बहुभाषी होना ही पड़ेगा। इस संगम में 320 भाषाओं के प्रतिनिधित्व उपस्थित थे। इस भाषा संगम में अंग्रेजी एक तरफ थी तथा भारतीय भाषाएं दूसरी और थीं। यहॉ हिन्दी पर ना तो कोई विशेष चर्चा हुई और ना ही इसे राजभाषा के रूप में विशेष दर्जा देकर जॉचा-परखा गया। यह संगम तो भाषाओं के अस्तित्व को लेकर चिंतित था। यही चिंता मुझे राजभाषा कार्यान्वयन में मिल रह् कुछ संकेतों को लेकर है। भविष्य में राजभाषा हिंदी के रूप को दृष्टिगत रखते हुए वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन को गति और दिशा देनी होगी अन्यथा राजभाषा के साथ अन्याय होगा।

भाषा से विमुखता के कई कारण होते हैं किंतु यदि योजनाबद्ध तरीके से प्रयास किए जाएं तो भाषा की लोकप्रियता और उपयोगिता को प्राप्त किया जा सकता है अथवा उसे बरकरार रखा जा सकता है। विकास की गति ने भारतीय भाषाओं में एक नई सोच ला दी है जिससे वह अपनी विकास योजनाओं पर कार्यरत हैं साथ ही उनमें अपने अस्तित्व को लेकर भय भी है। इतिहासकार श्री ओ सी हॉंडा का कहना है कि भाषा मरती है अथवा जीवित रहती है महत्वपूर्ण नहीं है। भाषा का जन्म तथा मृत्यु तो सामाजिक प्रक्रिया है। भाषा से सामान्य व्यक्ति लाभान्वित होता है अथवा नहीं यह महत्वपूर्ण है। यह सोच कहीं न कहीं भाषा को बाजारवाद से जोड़ती है और यही व्यवहारिक सोच वर्तमान में भाषा की कसौटी बनी हुई है। यद्यपि भारतीय भाषाओं को बोलनेवालों की संख्या लिखनेवालों की संख्या से अधिक है। भारतीय भाषाओं का यह ऊभरता अंतरद्वंद्व एक मानसिक भय का प्रतीक है। राजभाषा से न तो भारतीय भाषाओं की प्रतिद्वद्विता की जानी चाहिए और ना ही राजभाषा को किसी रूप में बाधक मानना चाहिए। राजभाषा का प्रयास सभी भारतीय भाषाओं से यथासंभव तालमेल बनाकर चलना है। राजभाषा तो इस दिशा में पहले से ही अग्रसर है। अनेकों कठिनाईयों के बावजूद हिंदी राजभाषा के रूप में विकसित होकर क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़ रही है। राजभाषा के इस तालमेल के बावजूद भी राजभाषा को मुद्रण में अनदेखा करना राजभाषा विभागों, राजभाषा अधिकारियों और कर्मियों के लिए चुनौती है।





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मंगलवार, 3 अगस्त 2010

राजभाषा का वर्तमान

भारत के संविधान से लेकर भारत के आम नागरिक की राजकाज की भाषा के रूप में राजभाषा हिंदी ने जितना निखार प्राप्त किया है वह सहज ही लोगों को आकर्षित कर देता है। सभी सरकारी कार्यालयों के स्थाई प्रकार के कागज़ात, प्रलेख, मैनुअल आदि बिना चुके हिंदी और अंग्रेजी में ही मिलेंगे। इतना ही नहीं बल्कि विभिन्न बैठकों में हिंदी मिलती है, वार्षिक आम सभा में हिंदी मिलती है और यहॉ तक कि बोर्ड रूम भी हिंदी की पहुंच से बाहर नहीं है। राजभाषा का यह सशक्त और सक्षम रूप राजभाषा को एक सशक्त आधार देता,है और यह प्रमाणित करता है कि किसी भी उन्नत भाषा के समकक्ष राजभाषा को स्वीकारा जा सकता है। स्वीकारा जा सकता है शब्द लिखने की विवशता है क्योंकि तमाम गुणों के बावजूद भी राजभाषा को स्वीकारा जा रहा है अभी तक पूर्णतया स्वीकारा नहीं गया है। पूर्ण स्वीकृति उस समय होगी जब कार्यालयों में अधिकांश मूल कार्य राजभाषा में ही किया जाएगा। इसके बावजूद भी राजभाषा की प्रगति निरंतर जारी है तथा इसमें विभिन्न स्तरों पर विकास की प्रक्रिया जारी है।

वर्तमान में कार्यालयों के प्रत्येक टेबल पर राजभाषा के न केवल कागजात मिलेंगे बल्कि हिंदी के कुछ हद तक जानकार भी मिलेंगे। अब राजभाषा को लेकर कर्मचारियों में विरोध नहीं होता है बल्कि राजभाषा को सीखने की ललक दिखलाई पड़ती है जो राजभाषा के बढ़ते कदमों का एक सशक्त प्रतीक है। आज यदि पीछे मुड़कर देखें तो स्पष्ट ज्ञात होता है कि राजभाषा ने अपने विकास की एक कीर्तिपूर्ण ऐतिहासिक यात्रा पूरी की है। एक वह भी समय था जब कार्यालयों में हिंदी के कागजात मुश्किल से दिखलाई पड़ते थे तथा यह माना जाता था कि कामकाज की भाषा के रूप में राजभाषा सफल नहीं हो पाएगी तथा एक सरकारी अभियान के रूप में यूं ही चलती रहेगी। वर्तमान में राजभाषा नित नए शब्दों से सजती जा रही है तथा कामकाज में इसका प्रयोग लगातार बढ़ते जा रहा है। यह कहना कि राजभाषा की प्रगति सौ दिन चले अढ़ाई कोस है तो यही कहा जा सकता है कि इस प्रकार की सोच रखनेवाले राजभाषा कार्यान्वयन की चुनौतियों तथा कठिनाईयों से पूरी तरह से परिचित नहीं हैं।

कार्यालय की एक पीढ़ी जिसकी शुरूआत 70 के दशक में हुई थी अब वह सेवानिवृत्ति के दायरे में है। यही वह पीढ़ी है जिसे यह बतलाया गया था कि अंग्रेजी के बिना जीवन की प्रगति कठिन है तथा इसके बिना नौकरी की सोच मात्र शेखचिल्ली का ख्वाब ही रह जाएगा। अस्सी की दशक में आई पीढ़ी को ज्ञात हो गया था कि हिंदी को अनदेखा करना कठिन है इसलिए इस पीढ़ी ने राजभाषा से खुद को जोड़ लिया तथा उसके बाद राजभाषा की कठिनाईयॉ बहुत कम हो गई। हिंदी भी कार्यालयों के काम में उपयोग में लाई जाती है यह अब सर्वसामान्य का स्वीकार्य तथ्य है। इसका तात्पर्य यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि वर्तमान में राजभाषा समस्यामुक्त है। विकास की गति के संग चलने के लिए प्रत्येक भाषा को लगातार संवरते और निखरते रहना पड़ता है, राजभाषा भी इससे अछूती नहीं है। सत्तर और अस्सी के दशक की चुनौतियॉ लगभग समाप्त हो गई हैं किंतु नई चुनौतियॉ निरन्तर ऊभर रही हैं। द्वन्द्व और चुनौतियॉ विकास प्रक्रिया का एक स्वाभाविक अंग हैं और राजभाषा भी स्वंय के विकास संग इस दौर से गुजर रही है।

वर्तमान की राजभाषा प्रौद्योगिकी की कसौटी पर कसी जा रही है। नित नए सॉफ्टवेयरों के बावजूद भी प्रयोक्ता को प्रौद्योगिकी उन्मुख बनाना प्रत्येक कार्यालय का लक्ष्य है। देवनागरी की की बोर्ड से लेकर ट्रांसलिटरेशन तक के विस्तार में कहीं न कहीं कर्मचारी के पसन्दनुसार फिट करना आसान कार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त विभिन्न कार्यालयों के कामकाज भी प्रौद्योगिकी के दायरे में है जिसमें हिंदी की सुविधा जोड़ना और उसमें कार्य करने के लिए प्रशिक्षित करना एक प्रमुख लक्ष्य है। प्रौद्योगिकी से वर्तमान नई पीढ़ी जुड़ी हुई है जबकि पुरानी पीढ़ी विशेषकर सत्तर और कुछ हद तक अस्सी के दशक की पीढ़ी स्वंय को प्रौद्योगिकी के अनुकूल ढालने में काफी कठिनाईयों का अनुभव कर रही है जिसमें परिवर्तन करना राजभाषा कार्यान्वयन की एक प्रमुख चुनौती है। यहॉ इस तथ्य का उल्लेख करना भी प्रासंगिक है कि एक समय माऊस ठीक से न पकड़ सकनेवाला कर्मचारी अब बेहिचक अपना काम उसी माऊस से सहजतापूर्वक और सरलतापूर्वक कर लेता है। यह कर्मचारी सत्तर के दशक का ही है। प्रौद्योगिकी से जुड़ने की प्रक्रिया में काफी हैरानी वाली बातें हुई जिसमें सर्वप्रमुख यह है कि जितनी तेजी से प्रौद्योगिकी को कर्मचारियों ने अपनाया वह कल्पना से परे है। राजभाषा इन्हीं झंझावातों में सफलतापूर्वक कार्यनिष्पादन दर्शा रही है।

राजभाषा में सुलभ कार्यालयीन साहित्य भी राजभाषा के उपयोग में अनवरत वृद्धि कर रहा है। कार्यालय के किसी भी विभाग के किसी भी विषय पर राजभाषा में साहित्य है जिससे कर्मचारी आसानी से तथा विश्वासपूर्वक राजभाषा में कार्य कर रहे हैं। इस कार्य को और सरल बनाने में संबंधित कार्यालयों की वेबसाइटों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। इन वेबसाइटों पर कार्यालयीन साहित्य भी हिंदी में उपलब्ध है सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर। आंतरिक कामकाज हो अथवा जनता के साथ सम्पर्क हो हर जगह राजभाषा का उपयोग हो रहा है। विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अधिकांशत: हिंदी का प्रयोग कर राजभाषा के महत्व को प्रतिपादित किया जा रहा है। अब विभिन्न कार्यालयों के उच्चाधिकारी भी जिस उत्साह और प्रेरणा से राजभाषा कार्यान्वयन में संलग्न हैं वह वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन के लिए उर्जा का कार्य कर रहा है। इस तरह प्रगति की अनेकों गाथाएं हैं किंतु मेरा उद्देश्य तो मात्र यह दर्शाना था कि वर्तमान में राजभाषा अत्यधिक सकारात्मक दौर से गुजर रही है और नित ने आब के साथ अपनी सार्थकता प्रमाणित कर रही है। राजभाषा अपने स्वर्णिम काल की और बढ़ रही है।

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रविवार, 1 अगस्त 2010

राजभाषा अनुराग का मिथक

हिंदी जब से सरकारी कामकाज की भाषा के लिए राजभाषा के रूप में सजने-संवरने लगी है तब से राजभाषा अनुरागियों की सतत वृद्धि हो रही है और राजभाषा कार्यान्वयन भी प्रगति दर्शा रही है। इस अनुराग को बहुत करीब से और बहुत वर्षों से देखते- निरखते मुझे राजभाषा अनुरागियों में विशेष आकर्षण दिखलाई देने लगा जिससे इसकी टोह लेने की एक समर्पित भावना मुझमें पनपने लगी। अकसर यह पाया जाता है कि राजभाषा जब किसी कर्मचारी के टेबल पर रबती है तो उसकी स्थिति अधिकांश टेबलों पर शरणार्थी की रहती है। सरकारी कर्मचारी के टेबल पर चूंकि अंग्रेजी का काम अधिक होता है और उसमॆ कार्य करने के अभ्यस्त होते हैं इसलिए हिंदी का जब भी कोई कागज कर्मचारियों के टेबल पर पहुंचता है तब उसकी स्थिति शरणार्थियों जैसी ही होती है। इसमें ना तो कर्मचारी को दोष है और ना उस हिंदी के कागज का यदि दोष है तो रोमन लिपि में लिखने के अभ्यस्त हॉथो को देवनागरी लिपि में लिखने की ज़हमत उठाने की। इस काल्पनिक ज़हमत को उठाने से मुक्ति मिलना संभव नहीं होता इसलिए उसपर कोई तीखी प्रतिक्रिया भी संभव नहीं होती। इन बंधनों की विवशता में एकाएक अनुराग उत्पन्न हो जाता है जिसमें भावनाओं से अधिक विवशताओं का बोलबाला रहता है।

विवशता मिश्रित यह अनुराग राजभाषा को गति प्रदान कर रहा है। यदि विवशता (जो काल्पनिक होती है) ना होती तो ? तो कर्मचारी बिना समय गंवाए बोल उठता कि हिंदी में काम करने नहीं आता है कृपया हिंदी विभाग में यह कागज भेजें। यदि राजभाषा विभाग भी नहीं होता तो ? तो सरकारी कार्यालयों में राजभाषा का कार्यान्वयन नहीं हो पाता। क्या यह सच है ? या फिर यह सच है कि गृह मंत्रालय के अंतर्गत राजभाषा विभाग है इसलिए कार्यालयों को लक्ष्य के अनुसार राजभाषा में अपना कार्यनिष्पादन दर्शाना पड़ता है। हॉ, यही सच है कि यदि गृह मंत्रालय के अंतर्गत राजभाषा विभाग ना होता तो राजभाषा का वर्तमान निखरा रूप अपने अस्तित्व में नहीं आता। इससे यह प्रमाणित होता है कि जैसे गंगा को गंगोत्री से जोड़कर ही गंगा के उद्गम तक पहुंचा जा सकता है वैसे ही राजभाषा को गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग से जोड़कर ही राजभाषा अनुराग को समझा जा सकता है। यह भी कहा जा सकता है कि राजभाषा कार्यान्वयन की धूरी गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग है किन्तु क्या भारतीय संविधान राजभाषा कार्यान्वयन के इसी रूप की और इंगित करता है ? इस प्रश्न का सटीक जवाब विभिन्न कार्यालयों के पास है जिसपर ना तो अधिकांश कार्यालयों के विभाग चिंतन करना चाहते हैं और ना चर्चा। ध्येय यही है कि राजभाषा का अनुराग ऐसा ही बना रहे।

राजभाषा के अनुराग को ऐसे ही बनाए रखने में विभिन्न कार्यालयों के राजभाषा विभागों के एक उद्देश्य की पूर्ति अवश्य होती है कि राजभाषा दिनोंदिन कर्मचारियों के बीच अपनी लोकप्रियता में वृद्धि कर रही है। इस लोकप्रियता के आकर्षक चादर तले उपयोगिता को खूबसूरती से छिपाया जाता है। कौन छिपाता है इसे यह प्रश्न उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना महत्वपूर्ण है इस अनुरागी प्रवृत्ति का विश्लेषण। किसी भी कार्यालय में आप जाईए दीवारों से लेकर कम्प्यूटरों तक में हिंदी के विभिन्न घोष वाक्यों आदि से राजभाषा के अनुराग का जोरदार प्रदर्शन किया जाता है। कार्यालय द्वारा हिंदी में किए गए कार्यों की इस तरह तलाश की जाती है जैसे भूसे के ढेर में सूई ढूंढी जा रही हो। यह प्रवृत्ति जहॉ एक तरफ हिंदी के अनुराग को प्रदर्शित करती है वहीं दूसरी और यह भी दर्शाती है कि संसदीय समिति आदि द्वारा यदि निरीक्षण ना किया जाता तो शायद राजभाषा के कार्यनिष्पादनों का ना तो समुचित रिकॉर्ड रखने की कोशिश की जाती और ना ही उसे सहेजने का प्रयास किया जाता। क्या इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि राजभाषा अनुराग में कहीं कोई दबाव कार्य करता है ? यदि ऐसा कहीं है तो वह राजभाषा नीति के विपरीत है तथा इस अनुरागी प्रवृत्ति की विभिन्न स्तरों पर निवारक उपाय किए जाने चाहिए।

राजभाषा की कोई बैठक हो अथवा राजभाषा पर बोलने पर जब कोई अवसर मिले तब कई प्रेरणापूर्ण बातें होती हैं, कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं और उर्जापूर्ण संचार तथा स्प्न के साथ राजाभाषामयी भविष्य दिखता है किन्तु समय के साथ-साथ प्रेरणापूर्ण बातें तथा लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय हाशिए पर चले जाते हैं जिसकी कौई विश्ष खोज-कबर नहीं ली जाती है। इसके अतिरिक्त इनका समुचित रिकॉर्ड होता है तथा इनको बार-बार प्रदर्शित कर राजभाषा अनुराग को जतलाया जाता है। राजभाषा कार्यान्वयन जगत में लिए गए निर्णयों पर कृत कार्रवाई की गहन समीक्षा नहीं की जाती हाँ जिसकी वजह से अधिकांश कार्यालय राजभाषा का उपयोग राजभाषा अनुराग प्रदर्शन के लिए करते हैं। राजभाषा कार्यान्वयन के हित में वर्तमान राजभाषा अनुराग की प्रवृत्ति घातक है। इससे सहज और स्वाभाविक राजभाषा कार्यान्वयन की गति में बाधा पहुंचती है। राजभाषा अनुराग का प्रदर्शन वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन का एख प्रमुख बाधक है। साहस के संग राजभाषा कार्यान्वयन करने से राजभाषा कार्यालय के प्रत्येक टेबल पर लेकप्रिय और उपयोगी हो जाएगी। राजभाषा अनुराग को मंचों, निरीक्षणों, प्रदर्शनियों आदि के अतिरिक्त टेबलों, कार्य की आदतॆ, फाईलों आदि में भी पहुंचने की आवश्यकता है।








शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

राजभाषा की दुनिया

दुनिया, विस्तृत विशाल दुनिया, दुनिया के भीतर दुनिया, यह अजीब दुनिया, आदि, इन भावों में डूबी अनेकों कथा-कहानियॉ, गीत आदि हम सबने सुना है और दुनिया को कम और इसके रहस्य को समझने का अधिक प्रयास अधिक किया है। सदियों से इंसान दुनिया में किसी नई तलाश के लिए भटक रहा है। तलाश की इस अनवरत प्रक्रिया में एक दुनिया राजभाषा की भी दुनिया है। सागर में सुदूर किसी टापू की तरह पड़ी इस दुनिया के इर्द-गिर्द से असंख्य नाविक गुज़र रहे हैं परन्तु इनमें से की कोलम्बस इस दुनिया को नहीं मिला। सामान्यतया इस दुनिया में हलचल रहती है। इस दुनिया के मूल निवासी प्रत्येक गुजरने वाली नाव या पोत की और ईशारा कर अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करते रहते हैं। इस दुनिया की मूल भाषा राजभाषा है जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है परन्तु बोलचाल की हिंदी से दूर दिखती है. इसलिए इस भाषा को समझने में अकसर लोगों को कठिनाईयों का अनुभव होता है। ऐसा कई बार हुआ है कि नाव या पोत इस दुनिया में रूकते हैं किंतु भाषा पूरी तरह समझ में ना आने से अपनी यात्रा पर निकल पड़ते हैं। दुनिया अबूझी की अबूझी रह जाती है।

आईए, हम इस दुनिया की यात्रा करते हैं। यह यात्रा कितनी सफल होगी वह आपकी सोच और आपकी दूरदर्शिता निर्धारित करेगी। मेरी भूमिका तो मात्र एक सामान्य गाइड की होगी। इस दुनिया में प्रवेस करते ही पहली जॉच होगी कि आगंतुक किस भाषिक क्षेत्र का है तदनुसार उसे क, ख तथा ग क्षेत्र के अनुसार पत्र दिया जाता है। यह प्रक्रिया अत्यंत सरल है इसलिए इसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं होती है। यहॉ यह ध्यान देनेवाली बात यह है कि भाषिक क्षेत्र का पार्मूला केवल भारतीयों पर ही लागू है। यदि विदेशी अर्थात अंग्रेजी भाषिक आगंतुक प्रवेश करता है तो सबसे पहले उसे भारत सरकार के राजभाषा अधिनियम धारा 3(3) के अंतर्गत जॉचा जाता है। यह जॉच प्रक्रिया विशेष विशेषज्ञतायुक्त है अतएव इसमें प्राय: चूक होने की संभावना बरकरार रहती है। अंग्रेजी को हिंदी करना मात्र अंग्रेजी शब्द के स्थान पर हिंदी शब्द रखना नहीं होता है बल्कि संबंधित विषय के भाव को अभिव्यक्ति प्रदान करनी होती है। इसमें कैसी उलझन होती है इसका उदाहरण निम्नलिखित अधूरे वाक्यांश द्वारा प्रस्तुत है –

Parcel is being addressed to their branch or correspondent bank

पार्सल है उनकी शाखा या संवाददाता बैंक को संबोधित किया जा रहा है.

क्या कहेंगे आप कि इस दुनिया में ऐसे ही राजभाषा वाक्य की रचना होती है। जी हॉ, एक हद तक आपकी सोच सही तो हो सकती है पर इस दुनिया में भी अनेकों धुरन्धर हैं जो चुपचाप राजभाषा के विकास में लगे हुए हैं। ऐसे लोग ना तो शोरबाजी करते हैं और ना ही निरर्थक मंचबाजी इसलिए प्राय: चर्चाओं में नहीं रहते हैं। इस दुनिया की प्रथम रीति यह है कि –

राजभाषा की प्रतिभाओं को विकास का पूर्ण अवसर नहीं मिल रहा है।

भूलिएगा नहीं कि मैंने अवसर की बात नहीं की है बल्कि पूर्ण अवसर की बात की है क्योंकि बगैर पूर्णता के किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं की जा सकती है।

यदि मैं कहूं कि मैंने सत्य को बेबाकी से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है तो यह भी उचित नहीं कहा जा सकता क्योंकि कई ऐसे लोग हैं जिन्हें पूर्ण अवसर मिल रहा है परन्तु ऐसे लोग अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए इस अवसर का अधिक प्रयोग कर रहे हैं अन्यथा राजभाषा की दुनिया में दो चीजों की होड़ क्यों लगी होती। शायद आप भी जानते हों इस होड़ को। यह हैं डॉक्टरेट डिग्री की प्राप्ति तथा पुस्तक प्रकाशन की होड़। यह कार्य अधिकांशत: कार्यालयीन सुविधाओं के सहयोग से पूर्णता प्राप्त करते हैं वैसे अपवाद तो हर जगह पाया जाता है।
अतएव राजभाषा की दुनिया का दूसरा तथ्य है कि –

प्राप्त सुविधाओं की सहायता से विशेषतया डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त करना तथा स्वनाम की पुस्तक प्रकाशित कर में व्यक्तिगत विकास की यात्रा की और बढ़ना।

चुनौतियॉ और राजभाषा एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह लगते हैं। हिंदी दिवस,14 सितंबर के उपलक्ष्य आयोजित हिंदी सप्ताह, पखवाड़ा या हिंदी माह के आयोजन के समय राजभाषा जगत में दीवाली, ईद, क्रिसमस आदि जैसा वातावरण रहता है। इस अवधि के दौरान स्टाफ को एकत्रित करना एक बड़ी चुनौती होती है। जी नहीं, कृपया ऐसा मत सोचिए कि यह चुनौती हमेशा रही है। स्टाफ को राजभाषा के किसी आयोजन में इकटअठा करना पिछले 5-6 वर्षों की समस्या है। इसका कारण यह है कि राजभाषा की दुनिया में जो आयोजन वर्ष 1984 में किए जाते थे वह अब भी जारी है। परिवर्तन के नाम पर पुरस्कार आदि की राशि बढ़ गई है किन्तु इसमें गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया है। इसलिए स्टाफ की यह सोच रहती है कि क्यों जाकर बोर होएं इससे अच्छा है कि हिंदी के नाम पर आज जल्दी कार्यालय से चले जाने की सुविधा का उपभोग करें। राजभाषा अधिकारी आयोजन, संयोजन से जूझते हुए अपने उच्चाधिकारी को भीड़ इकट्ठा होने की आश्वासन देते रहता है। इस तथ्य की पुष्टि लगभग सभी कार्यालय के राजभाषा विभाग, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के आयोजन इतिहास के अवलोकन से सहज ही उपलब्ध हो जाता है। इससे तीसरी तथ्य स्पष्ट होता है कि –
राजभाषा की दुनिया में चमक है किंतु अपेक्षित दमक नहीं है इसके बावजूद भी प्रशंसाएं मिलती रहती हैं।

राजभाषा कार्यान्वयन समिति की तिमाही बैठक की कार्यसूची तथा कार्यवृत्त के अवलोकन से यह तथ्य भी उभरता है कि वर्षों से एक ही कार्यसूची तथा लगभग एक जैसे कार्यवृत्त पर राजभाषा की दुनिया दौड़ रही है। कई जगह तो समिति में लिए गए निर्णयों पर कोई ठोस कार्रवाई ही नहीं होती और आधारहीन कारण समिति के समक्ष प्रस्तुत कर कार्यवृत्त की पुष्टि कर ली जाती है। समय-समय पर इस कार्यवृत्त में सदस्यों के नाम बदल जाते हैं। राजभाषा कार्यान्वयन की दिशा निर्धारित करनेवाली यह एक सशक्त समिति अपनी क्षमताओं का बहुत कम उपयोग कर पाती है। इससे यह चतुर्थ निष्कर्ष निकलता है कि –

राजभाषा की दुनिया प्राप्त शक्तियों का उपयोग नहीं कर पाती है तथा बैठकों में परम्पराएं निभाने जैसी झलक मिलती है।

राजभाषा कार्यान्वयन को समुचित गति प्रदान करने तथा आवश्यक दिशानिर्देश देने के लिए अधीनस्थ कार्यालयों का निरीक्षण किया जाना आवश्यक है। यह अनुभव किया गया है कि यह निरीक्षण केवल आवश्यकता पूर्ति के लिए की जाती है। राजभाषा अधिकारी कुछ लोगों से मिलकर लौट आता है या मात्र उपस्थिति दर्ज कराने के उद्देश्य से अधीनस्थ कार्यालय के स्टाफ से मिलता है और निरीक्षण रिपोर्ट तैयार करना अपने एक दायित्व का इतिश्री मान लेता है। स्टाफ से मिलना, बातचीत कर उनकी समस्याओं का तत्काल समाधान करना नहीं हो पाता परिणामस्वरूप राजभाषा कार्यान्वयन को गति नहीं मिल पाती। यह राजभाषा कार्यान्वयन की पॉचवी स्थिति दर्शाता है कि –
राजभाषा निरीक्षण एक औपचारिकता बन गया है जिसका राजभाषा कार्यान्वयन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

यह अंतिम पड़ाव है। अंतिम पड़ाव इसलिए कि इस व्यापक दुनिया का भ्रमण अत्यधिक समय लेनेवाला है। मेरी कोशिश उन महत्वपूर्ण मदों की दर्शाना है जिससे राजभाषा को काफी हानि हो रही है। राजभाषा कार्यान्वयन के स्पंदनों को बखूबी दर्शानेवाली हिंदी की तिमाही रिपोर्ट की स्थिति विवादास्पद बनती जा रही है। इस रिपोर्ट को तैयार करते समय पिछली तिमाही की रिपोर्ट की नकल की जाती है तथा आंकड़ों में थोड़ा सा हेर-पेर कर रिपोर्ट प्रेषित कर दी जाती है। यदि इस रिपोर्ट में दर्शाए आंकड़ों का सत्यापन किया जाए तो कड़ों के समर्थन हेतु कागजात, प्रलेख आदि नहीं मिल पाते हैं। विभिन्न प्रमख कार्यालयों से यह रिपोर्ट व्यवस्थित प्रेषित की जाती है और यथोचित रिकॉर्ड भी रखा जाता है किन्तु अधीनस्थ कार्यालयों में यह स्थिति नहीं है। ज्ञातव्य है कि इसी रिपोर्ट के आधार पर राजभाषा के विभिन्न पुरस्कार निर्धारित के जाते हैं। इससे छठवॉ तथ्य स्पष्ट होता है कि –

राजभाषा कार्यान्वयन का परम लक्ष्य मात्र राजभाषा के विभिन्न पुरस्कार प्राप्त करना है।

यदि यह सिलसिला जारी रहा तो एक स्थिति ऐसी आ जाएगी कि राजभाषा कार्यान्वयन केवल काग़जों में सिमट कर रह जाएगी। समय रहते चेत जाना समाज और राष्ट्र के लिए हितकर होगा।



बुधवार, 21 जुलाई 2010

राजभाषा और नेतृत्व

राजभाषा का प्रचार और प्रसार ही राजभाषा के कामकाज को गति और उन्नति प्रदान करता है। राजभाषा जगत का तथ्य यह है कि इसमें गति तो है किन्तु प्रगति  अपेक्षित नहीं है। इस तथ्य के समर्थन में केवल एक ही उदाहरण काफी है कि प्रत्येक कार्यालय की हिंदी की तिमाही प्रगति रिपोर्ट निर्धारित लक्ष्य से अधिक आंकड़े दर्शा रही है किन्तु कार्यालय में उन आंकड़ों के समर्थन में दस्तावेज, आंकड़े उपलब्ध नहीं है। बिना स्पष्ट आधार के यह गति एक अस्वाभाविक छवि निर्मित कर यह विश्वास दिलाने का प्रयास करती है कि राजभाषा का कार्यालयों में बखूबी प्रचार-प्रसार हो रहा है। वर्तमान में राजभाषा अधिकांश समय अपने प्रगति का विश्वास ही दिलाने में व्यतीत कर रही है। यह एक उदाहरण वर्तमान के राजभाषा कार्यान्वयन की वर्तमान दशा और दिशा की स्थिति का बयान कर रही है। कहॉ हो रही है चूक? किसकी वजह से राजभाषा की यह गति हो रही है? उत्तर स्पष्ट है – नेतृत्व।

क्या है राजभाषा का नेतृत्व? प्रत्येक कार्यालय में स्थित राजभाषा विभाग का विभागाध्यक्ष जो कहीं वरिष्ठ प्रबंधक है,कहीं मुख्य प्रबंधक है तो कहीं सहायक महाप्रबंधक है। राजभाषा विभाग के इन नेतृत्वकर्ताओं के लिए कार्यालयीन कार्यों से निकलकर कुछ नया करने की फुरसत ही नहीं मिलती। नैत्यिक कार्यों की यह व्यस्तता स्वंय में पत्राचार और अनुवाद को ही समेटे रहती है। इन व्यस्तताओं से निकल पाना इन नेतृत्वकर्ताओं की सबसे बड़ी चुनौती है। कार्यालय के सामान्य शब्दावली में इन्हें राजभाषा प्रभारी के रूप में जाना जाता है। राजभाषा कार्यान्वयन के लिए सामान्यतया संपूर्ण कार्यालय इन प्रभारी के सुझावों को अत्यधिक महत्व देता है अर्थात व्यावहारिक तौर पर राजभाषा कार्यान्वयन का नेतृत्व इन्हीं प्रभारियों पर होता है। यदि कोई कार्यालय राजभाषा कार्यान्वयन में उल्लेखनीय कार्य करता है अथवा उपलब्धि प्राप्त करता है तो इसका प्रमुख श्रेय राजभाषा प्रभारी को ही जाता है।

विभिन्न कार्यालयों का यह आम प्रचलन है कि वरिष्ठ कार्यालयों अथवा सरकार से प्राप्त अनुदेशों, आदेशों, दिशानिर्देशों के हद तक ही राजभाषा कार्यान्वयन किया जाए। इस कार्य में भी न्यूनतम समय में अधिकाधिक परिणाम का लक्ष्य रखा जाता है। स्वंय की पहल से कुछ नया और नवीन कार्य करने के कठिन कार्य से प्राय: प्रभारी बचते हुए पाए जाते हैं। वह ना तो शीर्ष प्रबंधन को इस विषयक सूचित करते हैं और ना ही किसी अभिनव कार्य के लिए  अपनी उत्सुकता दर्शाते हुए सार्थक पहल करते हैं। यदि सभी राजभाषा प्रभारी अपनी सार्थक एवं नवीन कार्नीतियों को अपनाएं तो राजभाषा की दुनिया में उल्लेखनीय विकास हो सकता है और राजभाषा स्टाफ में अपनी लोकप्रियता में प्रभावशाली वृद्धि दर्शा सकती है। यह मात्र कल्पना नहीं है बल्कि शुद्ध यथार्थ है। सभी राजभाषा प्रभारी आवधिक तौर पर किसी न किसी मंच पर मिलते हैं और राजभाषा कार्यान्वयन की चर्चाएं करते हैं। ऐसे मंचों पर गिनती के सक्रिय राजभाषा प्रभारी होते हैं जो हर बैठक में अपनी सक्रियता से प्रभावित करते रहते हैं परन्तु अधिकांश मात्र एक आदर्श श्रोता होते हैं।

राजभाषा में नेतृत्व की समस्या वर्तमान में ही नहीं है बल्कि पिछले दशक से यह समस्या गंभीर बनी हुई है। अस्सी तथा नब्बे के दशक में अनेकों राजभाषा प्रभारी थे जिनकी कार्यनीतियॉ तथा कार्यनिष्पादन से राजभाषा कार्यान्वयन को न केवल नई गति मिली बल्कि कई नवोन्मेषी कार्य भी हुए। राजभाषा प्रभारी का जब तक राजभाषा विषयक निजी व्यक्तित्व प्रभावशाली नहीं रहेगा तब तक राजभाषा के तीव्र विकास की संभावना दूर प्रतीत होती रहेगी। वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन की सबसे बड़ी चुनौती विभिन्न कार्यालयों में राजभाषा नेतृत्व का है। वरिष्ठता के आधार पर जब तक राजभाषा प्रभारी का कार्य़भार सौंपा जाता रहेगा तब तक इसमें शिथिलता स्वाभाविक है। राजभाषा प्रभारी के पद को वरिष्ठता के बजाए प्रतिभा और कार्यनिष्पादन के आधार पर करना चाहिए। मानव संसाधन विभाग द्वारा इसमें पहल की आवश्यकता है। प्राय: यह होता है कि वरिष्ठता के आधार पर एक या दो अभ्यर्थी होते हैं जो एक शोचनीय स्थिति है। एक पद और एक या दो अभ्यर्थी ?

वर्तमान समय राजभाषा कार्यान्यवन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ समय है। जिन कार्यालयों के राजभाषा प्रभारी प्रभावशाली हैं उस कार्यालय तथा उसके राजभाषा प्रभारी दोनों की दीप्ति को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। यदि इस दिशा में कार्यालय एक योजनाबद्ध तरीके से कार्य करें तो राजभाषा कार्यान्वयन नए युग में अपनी नई पहचान बखूबी स्थापित कर सकेगी।



सोमवार, 5 जुलाई 2010

राजभाषा और शब्द


राजभाषा कार्यान्वयन की एक प्रमुख समस्या है शब्द। प्राय: यह मांग की जाती है कि राजभाषा के शब्द सरल नहीं हैं। यद्यपि इस समस्या का सार्थक समाधान करने के लिए शब्दावली आयोग के अतिरिक्त विभिन्न विभाग भी सक्रिय हैं किंतु उसके प्रभावशाली प्रयासों का प्रतिफल नहीं मिल पा रहा है। इसी प्रकार बोलचाल की हिंदी के भी की रूप हैं जैसे शुद्ध हिंदी, दक्खिनी हिंदी, बम्बईया हिंदी, मद्रासी हिंदी आदि। इस प्रकार बोलचाल की हिंदी में राष्ट्र के विभिन्न राज्यों के शब्द जुड़ते रहते हैं जिनमें से अधिकांश शब्द लेखन में प्रयुक्त नहीं होते हैं। यदि भाषा के विश्व पटल का आकलन किया जाए तो कुछ महीने पहले प्रकाशित जानकारी के अनुसार प्रमुख भाषाओं की स्थिति निम्नलिखित है –

विश्व में बोली जानेवाली प्रमुख भाषाएं


1. चीनी (मंदारिन)       1.28 मिलियन


2. स्पैनिश                 329 मि


3. अंग्रेजी                  328 मि


4. हिंदी                    260 मि


5. अरबी                  221 मि


6. पुर्तगाली              203 मि


7. बंगला                193 मि


8. रूसी                  144 मि


9. जापानी               122 मि


10. जर्मन               90 मि


स्त्रोत- Ethnologue,16th Edition


उक्त आंकड़ों पर विवाद की संभावना हो सकती है किंतु यहॉ यह तो स्पष्ट है कि मंदारिन भाषा पनी वर्चस्वता बनाए हुए है तथा अंग्रेजी की संख्या को छूने के लिए हिंदी को अभी काफी प्रयास करने पड़ेंगे। स्पेनिश की तथा बँगला की संख्या भी ध्यानाकर्षण करती हैं। इसके अतिरिक्त यदि हम इंटरनेट पर शीर्ष दस भाषाओं का आकलन करें तो निम्नलिखित स्थिति निर्मित होती है –

इंटरनेट की शीर्ष भाषाएं


1. अंग्रेजी           452 मिलियन


2. चीनी             321 मि


3. स्पैनिश         129 मि


4. जापानी         94 मि


5. फ्रेंच             73 मि


6. पुर्तगाली       73 मि


7. जर्मन          65 मि


8. अरबी          41 मि


9. रुसी            38 मि


10. कोरियन     37 मि


स्त्रोत – Internate World States


उक्त आंकड़ों के आधार पर इंटरनेट पर हिंदी की उपयोगिता अत्यधिक कम है। अब हमारे सामने यह स्थिति स्पष्ट हो चुकी है कि हिंदी बोलनेवालों की तुलना में इंटरनेट पर हिंदी का उपयोग करनेवालों की संख्या में काफी अंतर है। भाषा के इन तथ्यों को बाद विश्व के विभिन्न भाषाओं के शब्दों की संख्या का आकलन करते हे हिंदी के शब्द संख्या की स्थिति को भी जान लेना आवश्यक है -
विभिन्न भाषाओं में शब्दों की संख्या


1. अंग्रेजी           999,600


2. चीनी            500,000 +


3. जापानी        232,000


4. स्पैनिश       225,000 +


5. रूसी           195,000


6. जर्मन         185,000


7. हिंदी           120,000


8. फ्रेंच           100,000


9. अरबी        45,000


10. टोकी पोंडा 197


स्त्रोत – Global Language Monitor


यदि हम हिंदी को राजभाषा के रूप में पूर्णतया विकसित कर स्थापित करना चाहते हैं तथा लोकप्रिय बनाना चाहते हैं तो उक्त आंकड़ों की तरह हमें भी अपनी एक व्यवस्था निर्मित करनी चाहे जहॉ अंतर्ष्ट्रीय भाषाओं के अतिरिक्त भारतीय भाषाओं की स्थितियों पर भी निगरानी रखी जा सके। मैं बार-बार एक शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ विवादित। विवादित शब्द के प्रयोग का प्रयोजन यह है कि भाषा विषयक उक्त पहल और प्रयास अनेकों तर्कों और तथ्यों को जन्म देते हैं जिसके आधार पर इस प्रणाली में आवश्यकतानुसार सुधार होता है. आरम्भ में प्रतिक्रियाएं आक्रामक होती हैं जो क्रमश: कम होती जाती हैं। इसी स्थिति से ग्लोबल लैंग्वेज मॉनिटर के अध्यक्ष तथा मुख्य शब्द विश्लेषक पॉल जे.जे. पेएक को गुजरना पडा।


यद्यपि विभिन्न प्रकार की राजभाषा शब्दावलियॉ निरन्तर जुड़ती जा रही हैं तथा उनका प्रयोग भी किया जाता है फिर भी यह कह पाना कठिन है कि प्रति वर्ष या प्रति तिमाही में राजभाषा के कितने नए शब्द जुड़ते हैं। ग्लोबल लैगेवेज मॉनिटर के शोध टीम के अनुसार प्रत्येक 98 मिनट में अंग्रेजी में एक नया शब्द जुड़ता है। शब्द केवल जुड़ते ही नहीं हैं बल्कि लुप्त भी होते हैं। राजभाषा में अनेकों ऐसे शब्द हैं जिन्हें कठिन शब्द कह कर प्रयोग नहीं किया जाता है और धीरे-धीरे ऐसे शब्द प्रयोग में लुप्त हो जाते हैं। उपरोक्त आंकड़ों के अनुसार यह स्पष्ट है कि हिंदी विश्व को अपने प्रभाव में लेने को तत्पर है किंतु प्रश्न यह उभरता है कि इस तत्परता के साथ-साथ क्षमताएं भी होनी चाहिए। क्षमताएं न केवल अभिव्यक्ति की बल्कि नित नए शब्दों को स्वंय में बखूबी रचाने-बसाने की भी। अनिवासी भारतीयों तथा हिंदी फिल्मों. गीतों आदि ने हिंदी के विस्तार में अपनी उल्लेखनीय भूमिकाओं को बखूबी प्रदर्शित किया है और अब भी कार्यरत हैं, इन्हें अब एक विश्व स्तरीय सशक्त आधार की आवश्यकता है। हिंदी के विस्तार संग राजभाषा कार्यान्वयन का प्रयास जुड़ा है।

यहॉ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह कार्य कैसे किया जा सकता है ? लिए हमें ग्लोबल लैंग्वेज मॉनिटर से सीखना पड़ेगा। आधारभूत शब्दों को ही गणना में सम्मिलित किया जाना चाहिए जैसे दौड़, दौड़ता, दौड़ रहा है को एक शब्द ही गिना जाएगा। इस ग्रह पर कुल बोली जानेवाली 6919 भाषाओं में से सभी भाषाओं का अपना सांस्कृतिक महत्ता है। अन्य भाषाओं से शब्दों को ग्रहण कर कुशलतापूर्वक आत्मसात करनेवाली भाषा ही वर्तमान की जीवंत और सक्रिय भाषा कही जाएगी। भाषा की जीवंतता के लिए उसमें प्रयुक्त शब्दों की निगरानी एवं विश्लेषण समय की मॉग है। बैंकिग शब्दावली, प्रशासनिक शब्दावली, बीमा शब्दावली, विधि शब्दावली आदि अनेकों शब्दावलियों का राजभाषा में प्रयोग हो रहा है किन्तु इनका एक सामान्य मंच नहीं है अतएव एक-दूसरे की उपलब्धियों की जानकारी इन्हें नहीं है जो हिंदी भाषा और राजभाषा दोनों के लिए लाभकारी नहीं है।

भाषाविदों का कहना है कि शब्द क्या है इसकी प्रकृति पर ही विवाद है इसलिए शब्द गणना संभव नहीं है। ग्लोबल लैग्वेज मॉनिटर शब्दों तथा मुहावरों, वैश्विक मुद्रण तथा इलेक्ट्रॉनिक मिडिया, इंटरनेट, ब्लॉग में प्रयुक्त शब्द की बारंबराता के अनुसार शब्दों का चयन करता है. इसमें शब्दकोश भी सहायक होते हैं। इस तुलना में यदि हिंदी को देखा जाए तो शब्दकोशों के प्रकाशन की अवधि निर्धारित नहीं है। अतएव हिंदी शब्दों पर निगरानी रखना एक कठिन कार्य हो जाता है। ग्लोबल लैंग्वेज मॉनिटर का मुख्य ध्येय वैश्विक अंग्रेजी के रूप में इंग्लिश के शब्दों पर निगरानी रखना है। हिंदी के ले से पहल की आवश्यकताएं हैं क्योंकि इस कार्य की क्षमता तथा संभावना तो पहले से ही विद्यमान है। कौन शुरू करे, कैसे शुरू करे, कहॉ शुरू करे आदि प्रश्नों से हटकर इस कार्य को आरम्भ कर देना है शेष समस्याएं खुद-ब-खुद हल हो जाएंगी। नि:संदेह यह कार्य राष्ट्रीय स्तर की संस्था ही कर सकती है। एक नए आरंभ की आशा भी है, जिज्ञासा भी है।





धीरेन्द्र सिंह






गुरुवार, 24 जून 2010

राजभाषा और न्यायपालिका

विश्व  के सबसे बड़े जनतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका हमेशा से उल्लेखनीय और प्रशंसनीय रही है परन्तु यह भी एक तथ्य है कि आम जनता को सामान्यतया उच्च न्यायालय की भाषा हमेशा अपरिचित और अबूझी लगती रही है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि उच्च न्यायालय में अंग्रेजी भाषा का ही वर्चस्व है। भारत के संविधान में कहा गया है कि -

अनुच्छेद 210: विधान-मंडल में प्रयोग की जाने वाली भाषा - (1) भाग 17 में किसी बात के होते हुए भी, किंतु अनुच्छेद 348 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य के विधान-मंडल में कार्य राज्य की राजभाषा या राजभाषाओं में या हिंदी में या अंग्रेजी में किया जाएगा

परंतु, यथास्थिति, विधान सभा का अध्यक्ष या विधान परिषद् का सभापति अथवा उस रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति किसी सदस्य को,जो पूर्वोक्त भाषाओं में से किसी भाषा में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता है, अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुज्ञा दे सकेगा ।

अध्याय 3 - उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों आदि की भाषा

अनुच्छेद 348. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा--

(1) इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, जब तक संसद् विधि द्वारा अन्यथा

उपबंध न करे तब तक--

() उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी,

() (i) संसद् के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन में पुरःस्थापित किए जाने वाले सभी विधेयकों या प्रस्तावित किए जाने वाले उनके संशोधनों के,

(ii) संसद या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा पारित सभी अधिनियमों के और राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित सभी अध्यादेशों के ,और

(iii) इस संविधान के अधीन अथवा संसद या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन निकाले गए या बनाए गए सभी आदेशों, नियमों, विनियमों और उपविधियों के, प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी भाषा में होंगे।

(2) खंड(1) के उपखंड () में किसी बात के होते हुए भी, किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में, जिसका मुख्य स्थान उस राज्य में है,हिन्दी भाषा का या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगाः

परंतु इस खंड की कोई बात ऐसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश को लागू नहीं होगी।

(3) खंड (1) के उपखंड () में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी राज्य के विधान-मंडल ने,उस विधान-मंडल में पुरःस्थापित विधेयकों या उसके द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा उस राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों में अथवा उस उपखंड के पैरा (iv‌) में निर्दिष्ट किसी आदेश, नियम, विनियम या उपविधि में प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा से भिन्न कोई भाषा विहित की है वहां उस राज्य के राजपत्र में उस राज्य के राज्यपाल के प्राधिकार से प्रकाशित अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद इस अनुच्छेद के अधीन उसका अंग्रेजी भाषा में प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा।

संविधान के उपरोक्त अनुदेशानुसार उच्चतम न्यायालय की भाषा तो अंग्रेजी रहेगी किन्तु उच्च् न्यायालय की भी भाषा अंग्रेजी बनाए रखना कितना प्रासंगिक है ? इस प्रकार के अनेकों प्रश्न समय-समय पर उठते रहते हैं तथा एक बौद्धिक हलचल मचाते रहते हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल (प्रशासन) ने वकीलों के एसोसिएशन की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल को भेजे ज्ञापन पत्र में कहा है कि उच्च न्यायालय में हिंदी को लेकर विचार किया जा रहा है लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया है। यद्यपि राजस्थान, इलाहाबाद और मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग किया जा रहा है लेकिन राष्ट्रीय राजधानी में इसका प्रयोग नहीं किया जा रहा। जिस बात को विधि महाविद्यालयों की कक्षाओं से उठानी चाहिए उसे न्यायालय परिसर में उठाने से कितना लाभ मिल पाएगा यह विचारणीय है। यह एक कटु सत्य है कि हिंदी में विधि की स्तरीय पुस्तकों की संख्या बहुत कम हैं और इससे भी अधिक चिंता वाली बात यह है कि विधि विषय पर हिंदी में मूल लेखन ना के बराबर है। विधि संबंधी हिंदी में एक भी लोकप्रिय पत्रिका नहीं है। इस तरह के अनेकों मुद्दे हिंदी को विधिक भाषा बनने से रोके हुए है। आवाजें इन क्षेत्रों में उठनी चाहिए, हलचलें यहॉ होनी चाहिए।

न्यायपालिका में अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व इतना अधिक है कि इस प्रकार की भी टिप्पणियॉ की जाती हैं कि अदालतों की भाषा हिन्दी करने से देश की एकता और अखंडता प्रभावित होगी, इससे भाषाई अहमवाद फैलेगा और पूर देश में राजनैतिक तथा कानूनी बदअमनी का माहौल बनेगा। यह ध्यान रखना चाहिए कि देश के हर नागरिक और हर कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित किए गए कानून को समझने का अधिकार है। इसके लिए एक ही भाषा है, और वह है अंग्रेजी। इस प्रकार की टिप्पणी करनेवाले सामान्य जनता की भाषा हिंदी को भूलकर अंग्रेजी की जब इस उन्मुक्तता से चर्चा करते हैं तो उनकी सोच पर संदेह होने लगता है। जिस देश की एकता, संपर्क आदि को बनाए रखने में हिंदी अपने आप को प्रमाणित कर चुकी है उस भाषा के लिए ऐसी टिप्पणी ना जाने क्यों गले के नीचे नहीं उतरती है। इसके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि जिस भाषा में जज प्रवीण नहीं है, क्या उस भाषा में जज फैसला दे सकता है ? यदि ऐसा हुआ तो इससे कानून के प्रावधानों का गलत अर्थ निकलेगा। यह तर्क व्यवहारिक है अतएव इसके लिए न्यायपालिका में मुंबई उच्च न्यायालय की अनुशंसा जैसी तैयारी होनी चाहिए जिसमें यह उल्लेख है कि राज्य सरकार सिविल जज तथा न्यायपालिका के प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट पद हेतु आवेदन करनेवाले अभ्यर्थियों का मराठी में परीक्षा लेने की अनुमति प्रदान करे।

हाल ही में मुंबई उच्च न्यायालय ने मुख्य न्यायाधीश तथा न्यायालय के सभी न्यायाधीशों से यह अनुरोध किया है कि ऐसी प्रणाली तलाश की जाए कि मराठी दस्तावेजों के अंग्रेजी अनुवाद के बगैर याचिका मराठी में दायर की जा सके। इस विषय पर मुंबई उच्च न्यायलय के न्यायाधीशों ने कहा कि उन्होंने पाया है कि अंग्रेजी अनुवाद की तुलना में मराठी मूल की प्रतियॉ ज्यादा विश्वसनीय रही हैं। यह मात्र उदाहरण स्वरूप है जिससे यह स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका को भाषा मुद्दे पर गहन विचार कर तदनुरूप कार्रवाई करनी चाहिए क्योंकि यह समय की मॉग है। देश का 26/11 के चर्चित मुकदमे के न्यायाधीश एम.एल. तहलियानी के उर्दू ज्ञान ने मुकदमे के कठिन क्षणों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की क्योंकि अभियुक्त को उर्दू भाषा ही आती थी। इस तरह के अनेकों तथ्य हैं जो दर्शाते हैं कि न्यायपालिका को क्रमश: हिंदी को उच्च न्यायालय में स्थापित करने हेतु प्रयास आरंभ करना चाहिए।

यह सर्वविदित तथ्य है कि न्यायपालिका में हिंदी लाने के लिए विधि महाविद्यालयों तथा विधि के विद्वानों की सार्थक पहल और प्रयास के बिना विधि क्षेत्र में प्रभावशाली एवं जनोपयोगी हिंदी की कल्पना नहीं की जा सकती है। इस कार्य को निम्नलिखित रूप से आगे बढ़ाया जा सकता है –

1. विधि विषयक सहज, सुबोध एवं बोधगम्य हिंदी पुस्तकों की उपलब्धता।

2. हिंदी में विधि विषयक हिंदी पत्रिका का प्रकाशन।

3. विधि महाविद्यालयों में विधि एव हिंदी को लेकर एक कार्यशील पहल तथा प्रयास जिसमें विधि संकाय सहित विधि विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता हो।

4. विधि शब्दावली का नियमित प्रकाशन जिसमें हिंदी में प्रयोग किए जा रहे अद्यतन शब्दावलियॉ नियमित रूप से सम्मिलित की जाती रहें।

5. विभिन्न कार्यालयों द्वारा अपनी गृहपत्रिकाओं में हिंदी में विधि विषयक लेखों का समावेशन तथा विधिक लेखन को प्रोत्साहन।

6. न्यायालयों में अधिवक्ताओं द्वारा हिंदी कार्य।

उक्त प्रयासों से राजभाषा कामकाज में विधिक लेखन आदि को बल मिलेगा तथा विभागीय विधिक कार्रवाईयों में हिंदी में अनगढ़ अनुदित भाषा के बजाए क सहज, स्वाभाविक हिंदी भाषा का प्रवाह होगा जिसका प्रत्यक्ष सबसे अधिक लाभ कर्मचारियों को होगा।

धीरेन्द्र सिंह







बुधवार, 12 मई 2010

राजभाषा कार्यान्वयन समिति और राजभाषा अधिकारी

भारत सरकार के सभी कार्यालयों,उपक्रमों,बैंकों आदि में राजभाषा कार्यान्वयन को सुचारू, सुनियोजित और सुंदर ढंग से संचालित करने के लिए राजभाषा कार्यान्वयन समिति का गठन किया गया है। इस समिति का गठन प्रत्येक कार्यालय, शाखा आदि में अनिवार्य है। इस समिति की बैठक प्रत्येक तिमाही में कम से कम एक बार अवश्य आयोजित की जानी चाहिए। सामान्यतया अप्रैल-जून, जुलाई-सितम्बर, अक्तूबर-दिसंबर तथा जनवरी-मार्च की कुल चार तिमाहियों में राजभाषा कार्यान्वयन समिति की कुल चार बैठकें आयोजित की जाती हैं। इस समिति के बारे में कुछ बातें प्रश्नोत्तरी शैली में प्रस्तुत हैं :-

प्रश्न – राजभाषा कार्यान्वयन समिति की गठन की आवश्यकता क्यों तथा इसका गठन अनिवार्य क्यों है ?

भारत सरकार अपनी राजभाषा नीति के अनुच्छेद 351 में कहा गया है कि,

संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके...

अतएव यह आवश्यक हो जाता है कि राजभाषा के रूप में हिंदी भाषा का प्रसार एवं उसके विकास के लिए प्रत्येक कार्यालय में राजभाषा विषयक चर्चा एवं राजभाषा प्रगति की समीक्षा हो तथा यह कार्य एक समिति गठित कर सुविधापूर्वक किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त राजभाषा नियम के कुल 12 प्रमुख नियम में से नियम 12 में यह स्पष्ट किया गया है कि केन्द्रीय सरकार के प्रत्येक कार्यालय के प्रशासनिक प्रधान का यह कर्तव्य होगा कि वह यह सुनिश्चित करे कि अधिनियम और नियमों के उपबंधों और उपनियम (2) के अधीन जारी किए गए निदेशों का समुचित अनुपालन हो रहा है और इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त और प्रभावकारी जॉच के लिए उपाय करें। इस प्रकार राजभाषा कार्यान्वयन समिति का गठन आवश्यक एवं अनिवार्य हो जाता है।
प्रश्न 2-इस समिति के पदाधिकारी कौन होते हैं और पदाधिकारियों की अधिकतम संख्या क्या है ?

राजभाषा नियम 12 में कहा गया है कि प्रत्येक सरकारी कार्यालय में राजभाषा कार्यान्वयन का दायित्व प्रशासनिक प्रधान का है इसलिए प्रत्येक कार्यालय में इस समिति का पदेन अध्यक्ष कार्यालय विशेष के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं तथा समिति का पदेन सदस्य-सचिव कार्यालय विशेष का राजभाषा अधिकारी होता है। इन दो पदों के अतिरिक्त समिति के सदस्य होते हैं जो सामान्यतया कार्यालय के विभिन्न विभागों के प्रमुख होते हैं। इस समिति की कोई निर्धारित संख्या नहीं होती है, कार्यालय के आकार के अनुसार संख्या होती है। कार्यालय के सभी विभाग प्रमुखों को इस समिति का सदस्य बनाना अनिवार्य है। इसमें कटौती करने अथवा चयनित विभागों के प्रमुखों को सदस्य बनाने से समिति का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है। अपनी सुविधावश कुछ कार्यालय उपाध्यक्ष पद भी रखते हैं जो आवश्यक नहीं है।

राजभाषा अधिकारी : यहॉ पर राजभाषा अधिकारी का यह दायित्व होता है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कार्यालय के सभी विभागों के प्रमुख इस समिति के सदस्य हों। समिति को चोटी बनाने के प्रयास में किसी विभाग को छोड़ना प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

प्रश्न3- प्रत्येक 3 महीने में अपनी बैठक में क्या चर्चा करती है यह समिति ?

राजभाषा कार्यान्वयन को सुचारू रूप से चलाने के लिए भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष वार्षिक कार्यक्रम जारी किया जाता है जिसमें राजभाषा कार्यान्वयन के विभिन्न लक्ष्यों को दर्शाया गया होता है। इस बैठक में चर्चा करने के लिए सामान्यतया निम्नलिखित मदें कार्यसूची में उल्लिखित होती हैं :

1. पिछली बैठक के कार्यवृत्त की पुष्टि (इस मद में पिछली बैठक में लिए गए निर्णयों की समीक्षा की जाती है तथा उपलब्धियों को समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तथा यदि किसी लिए गए निर्णय पर कार्रवाई नहीं की जा सकी हो तो उसका कारण समिति को बतलाया जाता है। पिछली बैठक के निर्णयों पर कृत कार्रवाई पर संतुष्ट हो जाने के बाद समिति उस कार्यवृत्त को पारित कर देती है। यदि किसी निर्णय पर कृत कार्रवाई से समिति संतुष्ट ना हो तो उस मद को पुन: उस मद को चर्चा हेतु कार्यसूची में शामिल किया जाता है।

2. कार्यालय के विभागों द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन (इस मद में कार्यालय के सभी विभागों के राजभाषा कार्यान्वयन की समीक्षा की जाती है। समीक्षा का आधार वार्षिक कार्यक्रम के विभिन्न लक्ष्य होते हैं।

3. कार्यालय के अधीन शाखाओं के राजभाषा कार्यान्वयन की समीक्षा (इस मद में भी वार्षिक कार्यान्वयन के विभिन्न लक्ष्यों के अनुरूप समीक्षा होती है।

4. गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग, प्रधान कार्यालय और संबंधित मंत्रालय से प्राप्त महत्वपूर्ण पत्र, परिपत्र आदि की चर्चा (इन महत्वपूर्ण पत्रों, परिपत्रों आदि से समिति को अवगत कराया जाता है तथा आवश्यकतानुसार समिति से दिशानिर्देश आदि प्राप्त किया जाता है।

5. अध्यक्ष की अनुमति से कोई अन्य विषय (इस मद से समिति के सदस्यों को अपनी बात रखने में सुविधा होती है। बैठक के कार्यसूची में कोई मद सम्मिलित न हो और किसी सदस्य को लगे कि उस मद पर समिति में चर्चा आवश्यक है तो अध्यक्ष की अनुमति से सदस्य अपनी बात रख सकता है।)

उक्त आधार पर यह समिति अपने क्षेत्राधिकार के प्रत्येक कार्यालय और शाखा आदि की समीक्षा कर लेती है। आवश्यकतानुसार उक्त कार्यसूची में नए मद जोड़े जाते हैं। उक्त मदों की चर्चाएं कार्यालय या शाखा के हिंदी की तिमाही रिपोर्ट के आंकड़ों तथा जॉच बिन्दु के अन्य आधारों पर होती हैं। समिति राजभाषा की उपलब्घि पर चर्चा कर उसमें वृद्धि के अवसरों, उपायों, प्रयासों आदि पर चर्चा करती है, असफलताओं पर चर्चा कर उसकी त्रुटियों, कमज़ोरियों आदि को दूर करने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम बनाती है। ऐसी स्थिति में अकसर राजभाषा अधिकारी स्वंय को आगे रखने का प्रयास करता है जिससे राजभाषा कार्यान्वयन पीछे चली जाती है परिणामस्वरूप समिति को वस्तुस्थिति की जानकारी नहीं मिल पाती है।

राजभाषा अधिकारी : इस मद में राजभाषा अधिकारी की सजगता, सतर्कता और समर्थता की अत्यधिक आवश्यकता होती है। पिछली बैठक के कार्यवृत्त की पुष्टि करते समय यदि सदस्य-सचिव (राजभाषा अधिकारी)  समिति के समक्ष केवल सकारात्मक पक्ष और उपलब्धियों की प्रस्तुति करेगा तो राजभाषा कार्यान्वयन का यह एक ही पक्ष प्रस्तुत कर पाएगा। वस्तुत: अधिकांश राजभाषा अधिकारी श्यामल पक्ष को छुपाने की कोशिश करते हैं। राजभाषा अधिकारी अपनी वाह-वाही के लालच में यहॉ स्वार्थी नज़र आता है।

प्रश्न4- इस बैटक के कार्यवृत्त का क्या महत्व है ?

इस बैठक के कार्यवृत्त का सर्वप्रथम महत्व यह है कि इससे बैठक के संपूर्ण कार्यवाही की जानकारी मिलती है। बैठक में अनुपालनार्थ लिए गए निर्णयों का यह एक प्रामाणिक दस्तावेज होता है। एक अधिकृत दस्तावेज़ होता है। समिति की आगामी बैठक में कार्यवृत्त की पुष्टि में उपयोग में आता है। यह बैठक की मदवार, क्रमवार कार्यवाही अनुसार सदस्य-सचिव द्वारा लिखा जाता है जिसमें महत्वपूर्ण चर्चाएं, निर्णय, चर्चा में भाग लेनेवाले/ पहल करनेवाले सदस्यों आदि का नाम,पदनाम होता है अर्थात संपूर्ण बैठक का यह शाब्दिक आईना होता है। इसे विभिन्न कार्यालयों आदि में प्रेषित किया जाता है।

राजभाषा अधिकारी: कार्यवृत्त लिखना एक कौशल है। कुशल राजभाषा अधिकारी बैठक की संपूर्ण कार्रवाई को क्रमबद्ध, लयबद्ध और सारबद्ध रूप में लिखता है जो पठन में रूचिकर और आकर्षक लगता है। यदि इसे लिखते समय सदस्य-सचिव ने कुशलता नहीं दिखली तो यह एकरसता के संग उबाऊ लगता है तथा पढ़नेवाला बैठक के महत्वपूर्ण पक्षों को बखूबी नहीं समझ पाता परिणामस्वरूप राजभाषा कार्यान्वयन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अंत में : राजभाषा कार्यान्वयन समिति और राजभाषा अधिकारी का अटूट पारस्परिक रिश्ता है। यदि यह समिति सशक्त है तो राजभाषा अधिकारी सशक्त है। यदि राजभाषा अधिकारी परिणामदाई है तो यह समिति परिणाम देनेवाली है। यदि राजभाषा अधिकारी अपने कार्य में प्रभावशाली है तो यह समिति भी प्रभावशाली है। किसी भी कार्यालय के राजभाषा कार्यान्वयन की स्थिति की झलक या तो राजभाषा कार्यान्वयन समिति के कार्यवृत्त से देखी जा सकती है अथवा राजभाषा अधिकारी से मिलकर इसका अनुभव किया जा सकता है। वर्तमान का सत्य यह है कि अधिकांश कार्यालयों में यह समिति एक औपचारिकता बन कर रह गई है।

धीरेन्द्र सिंह.









































मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

राजभाषा ब्लॉगिंग

हिंदी की तमाम विधाओं पर नित नए ब्लॉगर आ रहे हैं तथा इसे सशक्त और प्रभावशाली बनाने में अपना योगदान कर रहे हैं। हिंदी की एक विधा राजभाषा के ब्लॉगरों की और देखें तो ढूंढने पर भी अंगुलियों पर गिनने वाले बहुत कम ब्लॉगर मिलते हैं। यह स्थिति क्यों है यह एक विचारणीय मुद्दा है। यहॉ यह तर्क भी सही नहीं ठहरता है कि राजभाषा से जुड़े लोग ब्लॉगिंग में रूचि नहीं लेते हैं बल्कि राजभाषा से जुड़े अधिकांश लोग ब्लॉग को नियमित रूचिपूर्वक पढ़ते हैं। इनमे से कई ब्लॉगिंग में सक्रिय भी हैं परन्तु राजभाषा जैसे विषय पर नहीं लिखते हैं। राजभाषा के अधिकांश ब्लॉग सिर्फ नाम के लिए हैं। यह स्थिति चिंताजनक है। यदि इस उदासीनता का विश्लेषण किया जाए तो यह संभावना उभरती है कि अधिकांश राजभाषा ब्लॉगर यही नहीं तय कर पाते कि इसमें लिखा क्या जाए। इस सोच का प्रमुख कारण यह है कि अधिकांश कथित राजभाषा ब्लॉगर हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि वाले होते हैं तथा हिंदी साहित्य के तार को राजभाषा से कुशलतापूर्वक जोड़ नहीं पाते हैं। शायद यही कारण है कि यह लोग जितनी सहजता से कविता, कहानी आदि लिख पाते हैं उतनी आसानी से राजभाषा पर नहीं लिख पाते हैं।

राजभाषा ब्लॉगिंग से जुड़े सभी ब्लॉगर राजभाषा कार्यान्वयन से सीधे जुड़े हुए हैं तथा राजभाषा उनके दैनिक कार्य का एक प्रमुख अंग है इसके बाद भी राजभाषा ब्लॉगिंग की वर्तमान दयनीय स्थिति अच्छे भविष्य की और ईशारा नहीं कर कर रही है। राजभाषा ब्लॉगरों में से कोई भी पॉच नाम लेने के लिए यदि आपसे कहा जाए तो शायद आप भी उलझन में पड़ जाएंगे। यदि राजभाषा के बारे में स्वतंत्र चिंतन, समीक्षा आदि नहीं की जाएगी तो कैसे इस विधा को और विकसित किया जा सकेगा . सरकारी कामकाज में हिंदी की उपयोगिता का दायित्व आखिर कार्यालय के राजभाषा या हिंदी विभाग का नहीं है और ना ही इसका विकास कार्यालय की परिधि के अंतर्गत ही किया जा सकता है अतएव यह आवश्यक है कि राजभाषा ब्लॉगर राजभाषा को लेकर खुले में आएं और नई दिशा और दसा से राजभाषा को संपन्न करें। ब्लॉगिंग जगत में राजभाषा अभी भी अपना कोई पहचान नहीं बना सकी है।

राजभाषा से जुड़े लोग हिंदी ब्लॉगिंग की अन्य विधाओं में सक्रिय हैं किंतु राजभाषा विषय पर सक्रिय ना होना एक उदासीनता के अलावा कुछ भी नहीं है। इस उदासीनता का प्रमुख कारण यह हो सकता है कि राजभाषा कार्यान्वयन की व्यस्तताओं से थक कर यह लोग हिंदी की अन्य विधाओं में रूचि लेते हों जिसका प्रभाव राजभाषा ब्लॉगिंग पर पड़ता हो। यह भी कारण हो सकता है कि राजभाषा कार्यान्वयन उनके लिए सिर्फ एक जीवनयापन का ज़रिया हो जिसके साथ उनका एक बेहद औपचारिक रिश्ता हो। अन्यथा 15-20 वर्षों से भी अधिक समय से राजभाषा कार्यान्वयन से जुड़े रहने के बावजूद राजभाषा पर लिखने के लिए कुछ ना हो यह कैसे संभव हो सकता है। राजभाषा कार्यान्वयन से जुड़े लोग विशेषज्ञ के रूप में जाने-माने-पहचाने जाते है और यह कैसी विशेषज्ञता जो कविताएं तो लिख सकती है, कहानियॉ लिख सकती है परन्तु राजभाषा पर कुछ नहीं लिखती अलबत्ता बोलती ज़रूर है राजभाषा की बैठकों में, खालिस दफ्तरी परिवेश में, राजभाषा के सुपरिचित शब्दों से खेलते हुए।

राजभाषा को कार्यालयीन परिवेश से बाहर लाने के लिए विभिन्न कार्यालयों की गृह पत्रिकाओं में लिखा अवश्य जाता है परन्तु उस पर ना तो चर्चा होती है और ना ही सामान्य जनों की उन्मुक्त समीक्षा प्राप्त होती है। ऐसी स्थिति में राजभाषा से जुड़े लोगों को चाहिए कि ब्लॉग पर राजभाषा के बारे में लिखें तथा पाप्त विचारों के अनुसार यथायोग्य राजभाषा कार्यान्वयन की शैली में परिवर्तन-परिवर्धन करें। हिंदी ब्लॉगिंग में समाज के विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाएं हैं जिनकी राजभाषा विषयक सोच केवल कार्यालय के राजभाषा कार्यान्वयन के लिए ही नहीं सहायक होगी बल्कि जनसामान्य में भी राजभाषा की नव चेतना जागृत करने में भी प्रमुख भूमिका निभाएगी। राजभाषा कार्यान्वयन से जुड़े ब्लॉगरों से अनुरोध है कि इस दिशा में अत्यधिक सक्रिय हो जाएं क्यॆकि इस समय राजभाषा की यह भी एक मांग है।

धीरेन्द्र सिंह 





शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

हिंदी प्रशिक्षण को मोहताज राजभाषा अधिकारी

भारत सरकार की राजभाषा नीति के अंतर्गत सभी केन्द्रीय कार्यालयों, उपक्रमों, बैंकों में राजभाषा विभाग की स्थापना की गई है तथा इस विभाग के कार्यों के लिए राजभाषा अधिकारी की नियुक्ति की गई है। विगत 25-30 वर्षों से राजभाषा कार्यान्वयन से जुड़े इन राजभाषा अधिकारियों को राजभाषा कार्यान्वयन विषयक सार्थक और व्यापक प्रशिक्षण प्रदान नहीं किया गया है। सार्थक प्रशिक्षण अर्थात वह प्रशिक्षण जिससे राजभाषा अधिकार को राजभाषा कार्यान्वयन के लिए आधुनिकतम जानकारियॉ तथा ज्ञान प्राप्त हो जाए। व्यापक प्रशिक्षण का मतलब वह व्यापकता प्राप्त हो जिसकी सहायता से सुगमतापूर्वक राजभाषा कार्यान्वयन किया जा सके। इस प्रकार सार्थक और व्यापक प्रशिक्षण द्वारा राजभाषा अधिकारी को आत्मबल प्राप्त हो, आत्मविश्वास प्राप्त हो, स्पष्ट लक्ष्य हों, लक्ष्य की प्राप्ति हेतु आवश्यक कौशल हो, समय-समय पर स्वाभाविक रूप से उठने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की क्षमता हो। इस तरह का प्रशिक्षण राजभाषा अधिकारियों को नहीं मिल पाता है परिणामस्वरूप अपेक्षित प्रभावशाली परिणाम नहीं मिल पाता है। राजभाषा कार्यान्वयन की यह एक प्रमुख समस्या है।

इस विषय पर चर्चा करते हुए प्रमुख प्रश्न यह है कि किन आधारों पर यह कहा जा सकता है कि राजभाषा अधिकारियों को राजभाषा का उचित प्रशिक्षण नहीं मिल रहा है ? इसके लिए बहुत गहराई में उतरने की आवश्यकता नहीं है बल्कि यहॉ वह कहावत चरितार्थ होती है कि-हॉथ कंगन को आरसी क्या। यदि राजभाषा अधिकारियों को उचित प्रशिक्षण प्राप्त होता तो राजभाषा कार्यान्वयन अपनी प्रगति की गवाही कागजी आंकड़ों के बजाए व्यवहार में निरंतर प्रगति करते राजभाषा के जीवंत साक्ष्य द्वारा स्पष्ट करती। आज किसी भी कार्यालय में जाने पर कुछ विभागों या टेबलों को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि उस कार्यालय में राजभाषा कार्यान्वयन अपेक्षित स्तर पर है। इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए दिए जानेवाले आंकड़ों के आधार पर राजभाषा दौड़ रही है और राजभाषा अधिकारी नेपथ्य में गुमशुदा सा प्रतीत हो रहा है। वर्तमान में राजभाषा अधिकारियों को यह ज्ञात ही नहीं है कि वह अपने कार्यों को कहॉ से और कैसे आरंभ करें। विभिन्न सरकारी कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्वयन अपने कठिनतम दौर से गुजर रही है। इस चुनौतीपूर्ण समय में राजभाषा अधिकारियों को एक सार्थक और व्यापक प्रशिक्षण की अत्यधिक आवश्यकता है।

मोहताज शब्द का प्रयोग करना आवश्यक था इसलिए यहॉ इस शब्द को वाक्य नें गूंथा गया है जबकि एक पक्ष यह भी कहनेवाला है कि राजभाषा अधिकारियों को तो प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। इस प्रकार के प्रदान किए जानेवाले प्रशिक्षण कितने उपयोगी होते हैं इसकी यदि समीक्षा की जाए तो दूघ का दूध पानी का पानी साफ नज़र आएगा। मोहताज केवल इसलिए ही नहीं कि इन्हें प्रशिक्षण नहीं मिलता है बल्कि मोहताज इसलिए भी हैं कि राजभाषा अधिकारियों के प्रशिक्षण की एक आदर्श रूप-रेखा तथा सक्षम संकाय की भी कमी है। इसके लिए सभी कार्यालयों को एक निर्धारित कार्यक्रम बनाकर अपने प्रशिक्षण कार्यक्रम में एक स्लॉट के रूप में इसे जोड़ना होगा, तब कहीं जाकर इस दिशा में एक परिणामदाई पहल होगी। राजभाषा अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए अभी तक किसी भी कार्यालय द्वारा एक ठोस रूप-रेखा नहीं बनाई गई है अतएव इस दिशा में पहल करने की आवश्यकता है। जब तक यह अभाव समाप्त नहीं होगा तब तक मोहताज शब्द एक पहल की आवश्यकता का संकेत देते रहेगा।

राजभाषा अधिकारियों को हिंदी का विशेषज्ञ माना जाता है तथा सामान्यतया यह सोचा जाता है कि जो विशेषज्ञ है उसको उसकी विशिष्टता के क्षेत्र में क्या प्रशिक्षण दिया जाए। यह सोच इस तथ्य को अनदेखा कर देती है कि हिंदी और राजभाषा हिंदी में कुछ फर्क भी है। राजभाषा कार्यान्वयन के लिए सरकारी नीतियों के अतिरिक्त राजभाषा अधिकारी को राजभाषा के क्षेत्र में अन्य विधाओं में भी पारंगत होना पड़ता है जिसमें है अनुवाद, सम्प्रेषण, अभिव्यक्ति, लेखन, भाषण कौशल, आयोजन, कर्मचारियों की मानसिकता के अनुरूप कार्यान्वयन की शैलियों में बदलाव आदि। इन सबका सीधा संबंध राजभाषा कार्यान्वयन से होना चाहिए। प्रशिक्षण सामग्री भी अत्यावश्यक है। यद्यपि राजभाषा अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण सामग्री तैयार करना एक शोध करने जैसा कार्य है फिर भी यह है तो बहुत ज़रूरी। यह सामग्री भी विभिन्न कार्यालय अपने प्रशिक्षण महाविद्यालय में तैयार करा सकते हैं। विशेषज्ञों को भी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है अन्यथा उनके कौशल में ठहराव आ जाने का भय रहता है।

कठिन नहीं है यह कार्य आवश्यकता बस निर्णय लेने की है। यहॉ प्रश्न उठता है कि कौन लेगा यह निर्णय ? यह निर्णय विभिन्न कार्यालयों के प्रधान कार्यालय / मुख्यालय के राजभाषा विभाग को लेना होगा। इस कार्यक्रम के विषय, समय-सारिणी, प्रशिक्षण सामग्री, संकाय आदि की व्यवस्था राजभाषा विभाग ही सहजतापूर्वक कर सकता है। राजभाषा अधिकारियों की सहायता राजभाषा अधिकारी ही कर सकता है। विभिन्न कार्यालय के शीर्ष प्रबंधन का राजभाषा कार्यान्वयन के लिए सहयोग, दिशानिर्देश आदि हमेशा से मिलते आ रहा है इसलिए यहॉ किसी प्रकार की कठिनाई नहीं है। राजभाषा अधिकारियों को प्रशिक्षण वर्तमान की आवश्यकता है किन्तु आरम्भ में चुनौतीपूर्ण है। इस दिशा में पहल राजभाषा कार्यान्वयन के एक नए सोपान की रचना करेगी जिसकी प्रतीक्षा वर्तमान भी कर रहा है।

धीरेन्द्र सिंह.



मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

महिला दिवस और राजभाषा

मेरे मन में भी महिला दिवस और राजभाषा विचार कौंधा था तब मैं भी आपकी ही तरह आश्चर्यचकित हुआ था। आख़िरकार इस महिला दिवस पर मैं क्या लिखूँ यह सवाल तो मेरे सामने खड़ा ही था। ना जाने क्यों यह विषय मुझे नया, आकर्षक और चुनौतीपूर्ण लगा। अब आप यह मत कहिएगा कि महिला शब्द ही चुनौतीपूर्ण है इसलिए मैंने कौन सी नई बात कह दी। बात जब कहनी होती है तो एक अंदाज़ में कह दी जाती है। आख़िर अंदाज़ ही तो है जो भावों और विचारों के हिचकोलों से बात की रक्षा करता है, उसकी गरिमा को बनाए रखता है। वरना आज की दुनिया में गरिमा बनाए रखने की बात तो दूर गरिमा शब्द से परिचित होना ही मुश्किल है। गरिमा का किसी व्यक्ति विशेष या महज़ एक नाम से जुड़ जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। वैसे महिला का राजभाषा से जुड़ जाने का खतरा भी खतरा कम नहीं है। कहॉ सीधी, सरल, निर्मल मना महिला और कहॉ पहाड़ी नदी की तरह अनजानी डगर पर भी अपनी गति को बनाए रखनेवाली राजभाषा। कहीं ताल-मेल नहीं दिखता है। पर आधुनिक महिला तो विषम परिस्थितियों से दो-दो हॉथ करने में कहॉ पीछे हैं तो मैंने भी सोचा कि क्यों न महिलाओं से राजभाषा के बारे में थोड़ी चर्चा कर उनके मिज़ाज का ज़ायजा लिया जाए।


अपनी मंज़िल पर लिफ्ट की प्रतीक्षा में खड़ी एक महिला से मैं जा टकराया। मुसकराहट के आदान-प्रदान के बाद मैंने कुछ औपचारिक बातों के बाद अपना सवाल पूछ ही बैठा-मैडम आप केन्द्र की राजभाषा के बारे में क्या जानती हैं ? उन्होंने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने नासमझी भरा सवाल कर दिया हो। पल भर में ही यह प्रमाणित भी हो गया कि अपने बारे में उस समय की मेरी सोच सही थी। उन्होंने कहा कि राजभाषा के बारे में तो बच्चा-बच्चा जानता है। श्री राज ठाकरे की पार्टी द्वारा मराठी भाषा का मुंबई में हर जगह प्रयोग ही राजभाषा है। मैं हतप्रभ रह गया और घबराहट से घिर गया। राजभाषा में राजनीति कैसी ? यह सोचते हुए मैं अपने भावों पर नियंत्रण ना रख सका और अगला प्रश्न पूछ दिया कि राजभाषा और राजनीति से क्या लेना-देना ? उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि राजनीति और राजभाषा एक ही सिक्के के दो महत्वपूर्ण पक्ष है। एक-दूसरे के बिना दोनों अधूरे हैं। मैं आगे कुछ बोल पाता उससे पहले लिफ्ट तल मंज़िल पर रूकी और वो चली गईं। मैंने केन्द्र की राजभाषा के बारे में पूछा और वे राज्य के दायरे में लाकर मेरे प्रश्न को छोड़ गईँ। राजभाषा को किसी व्यक्ति और किसी पार्टी से क्यों जोड़ गईं ? मैं सोचता ही रह गया। अब किसी महिला से प्रश्न पूछने की स्थिति में नहीं था अतएव कल पर छोड़ अपनी सोच में डूबा मैं चलता गया।


सुबह घर से ही तय करके निकला था किसी ऐसी महिला से प्रश्न करूँगा जिसे बहुत जल्दी ना हो और जो मुझे थोड़ा समय दे सके। विश्वविद्यालय की कैंटीन में जब मैं चाय पीने गया था तो कैंटीन के कोने में एक महिला चाय पीते दिखी और मैं बेधड़क जाकर औपचारिकताऍ निभाते हुए बैठ गया। बिना कोई अन्य वार्ता किए मैं पूछ बैठा कि – मैडम केन्द्र की राजभाषा से आप क्या समझती हैं ? प्रश्न समाप्त होते ही उन्होंने तपाक से उत्तर दिया – इंग्लिश। आश्चर्य से मैंने पूछा-वह कैसे ? उनका उत्तर था कि प्रत्येक सरकारी कार्यक्रमों में अंग्रेज़ी में बातचीत, वित्तीय मंच पर अंग्रेज़ी, विदेशों में जाकर अंग्रेज़ी का ही प्रयोग, हिंदी की रोटी खानेवाले बॉलीवुड के कार्यक्रमों में निमंत्रण से लेकर समापन तक अंग्रेज़ी ही अंग्रेजी। चारों तरफ अंग्रेजी ही दिखती है इसलिए जनता अंग्रेजी को ही राजभाषा कहती है। मैं लाजवाब हो गया। अबकी बार महिला नहीं उठी, मैं ही उठ कर चल दिया।


मेरे मन की न तो जिज्ञासा शांत हुई और न उत्सुकता। मैं तो अपने ढंग से महिला दिवस मनाने पर आमादा जो था। एक गम्भीर सी दिखनेवाली महिला से मैंने जब यही प्रश्न पूछा तो उत्तर तपाक से मिला – टाईम पास। अच्छे से अच्छे चिंतन-मनन वाला मस्तिष्क भी इस उत्तर से लड़खड़ा जाएगा यही सोचकर मैं भी हतप्रभ रह गया। मैडम आपने तो अजीब सा उत्तर दे दिया, मैं तो इसका ओर-छोर ही नहीं पकड़ पा रहा, कृपया कुछ स्पष्ट कीजिए। उन्होंने कहा कि राजभाषा कार्यालयों से जुड़ी है, कार्यालयों में राजभाषा विभाग पर राजभाषा कार्यान्वयन की जिम्मेदारी है, राजभाषा विभाग में राजभाषा अधिकारी रहते हैं और राजभाषा अधिकारी टाइम पास करते हैं इसलिए राजभाषा टाइम पास है। मैंने कहा मैडम यह तो विचार कम और आरोप अधिक लग रहा है। उन्होंने ने कहा कि आप के मन में यदि ऐसे विचार उत्पन्न हो रहे हैं तो पहले आप किसी कार्यालय के राजभाषा विभाग की गतिविधियों को गौर से देखिए फिर इस विषय पर मुझसे चर्चा कीजिए। राजभाषा के इस नए अंदाज को समझते हुए मैंने यह तय कर लिया कि अब बस मना लिया मैंने महिला दिवस को, इससे अधिक की क्षमता मुझमें नहीं रह गई थी। महिला दिवस और राजभाषा यह संगम एक ऐसे भँवर की और ले गया जिसमें मंथन की कभी न रूकने वाली प्रक्रिया थी और परिणाम की संभावना नज़र नहीं आ रही थी।


धीरेन्द्र सिंह.

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

हमारी हिंदी

हमारी हिंदी



हमने जब से हिंदी को, हमारा बना दिया

हिंदी को धारा का एक, किनारा बना दिया

दुनिया सिमट रही है, एक गॉव की तरह

हिंदी को भावों का, एक ईशारा बना दिया।


बस ऐसे ही चलती है हिंदी, कभी हिंदी चित्रपट पर, कभी दूरदर्शन के चैनलों पर, कभी गीतों-गज़लों में, कभी बाज़ार से सामान्य खरीददारी आदि में। हिंदी विशेषकर इसी रूपों में हमारी है और हमें इसके रूप पर नाज़ भी है। दुनिया के उन्नत देशों की भाषाएँ हिंदी की तरह अपनी लोकप्रियता बनाए रखते हुए सरकारी कामकाज, उच्च शिक्षा, प्रौद्योगिकी आदि में अपनी प्रगति और लोकप्रियता को बनाए हुए है। क्या हिंदी इस रूप में आज हमारे सामने है ? जिस हिंदी को हम अपनी हिंदी के रूप में अपनाए हुए हैं क्या उसका अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप है ? अंतर्राष्ट्रीय ना सही क्या वर्तमान में हिंदी का एक सशक्त राष्ट्रीय स्वरूप है? हमने हिंदी को गानों, बजानों और दुकानों तक ही समेट कर रख दिया है। भारतीय कार्यालयों के टेबल अब भी तो अंग्रेज़ी से ही जुड़े हुए हैं और हमारी आदतें भी। दैनिक समाचार पत्र हो, एसएमएस हो, किसी लिफाफे पर पता लिखना हो अथवा छुट्टी की अर्जी देनी हो, हमेशा अंग्रेजी ही लिखी जाती है। लिखते वक्त हमारी हिंदी ना जाने कितनी दूर होती है और अंग्रेज़ी अपनी लगती है।

वर्तमान भारतीय एक विडंबना में जी रहे हैं। उनके दिल में हिंदी है और व्यवहार में अंग्रेज़ी है। हिंदी जहॉ अहसासों को सुखद बनाती है वहीं अंग्रेज़ी व्यावहारिक जगत में एक आत्मविश्वास के साथ चलने का आधार प्रदान करती लगती है। यह व्यावहारिकता भारतीय परिवेश पर बरसाती बादलों की तरह छाया हुआ है और अक्सर बरसते रहता है। अक्सर बरसते रहता है से मेरा तात्पर्य है कि जहॉ भी आप शीर्ष के कार्यक्रमों में जाऍ अंग्रेज़ी के फुहारों से भींगना ही पड़ता है। शायद हम इस बारिश के अभ्यस्त भी हो गए हैं। इसे सहजता से लेते हैं। इसका विरोध करना अब हमें अस्वाभाविक प्रक्रिया लगती है। यहॉ एक प्रश्न उठता है कि विरोध क्यों ? वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धांतों पर चलनेवाला हमारा देश भला विरोध क्यों करे ? जो भी हमारे यहॉ आता है उसे हम अपना बना लेते हैं. यह एक तरफ से हमारे विशाल हृदय को दर्शाता है जबकि दूसरी और यह भी संभावना प्रकट करता है कि कहीं हम इस विशालता में अपना कुछ खो तो नहीं रहे। कुछ खो कर कुछ पाना हमेशा स्वीकार्य नहीं होता। तो क्या हम अंग्रेजी को अपनाते हुए कहीं हमारी हिंदी को खो तो नहीं रहे ?

हमारी हिंदी-हमारी हिंदी का यह रट क्यों लगाया जा रहा है। व्यवहार के लिए एक भाषा होनी चाहिए बस। भाषा की भूमिका तो यहीं तक है। गानों, बजानों तथा दुकानों तक तो हिंदी है ना तो क्या यह एक सुखद स्थिति नहीं है ? भारतीय दिलों में तो हिंदी है ना तो क्या यह संतोषप्रद स्थिति नहीं है ? क्यों अंग्रेज़ी के पीछे पडा जा रहा है। यह देखने की कोशिश क्यों नहीं की जाती कि कहीं हिंदी की कमज़ोरी की वजह से तो अंग्रेज़ी आगे नहीं निकल गई ? इस तरह से प्रश्न करनेवालों से एक प्रश्न पूछना आवश्यक है कि भाषा को वह क्या समझते हैं ? केवल सम्प्रेषण का माध्यम या कुछ और ? वर्तमान में विश्व जब एक कुटुंब की तरह होते जा रहा है तो क्या ऐसी स्थिति में हमारी कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं होनी चाहिए।

हमारी हिंदी सिर्फ देवनागरी में लिखी जानेवाली हिंदी ही नहीं है बल्कि भारत की विभिन्न भाषाओं के आपसी ताल-मेल का प्रतीक है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति की ध्वजवाहिका है जिसके संग भारत की अन्य भाषाऍ भी हैं। हिंदी का विकास सभी भारतीय भाषाओं का विकास है। समूचे राष्ट्र की धड़कनों को एक सूत्र में बांधने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है और हमारी हिंदी इसमें सक्षम है। हमारी हिंदी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तब तक पूरी हमारी नहीं हो सकती जब तक भारत की सभी भाषाओं को विकास के समान अवसर नहीं मिलते हैं। पर क्या आप लोगों को यह लग रहा है कि सभी भारतीय भाषाओं को विकास के समान अवसर मिल पाऍगे ? इतन् प्रयासों के बावजूद भी जब हिंदी आपकी टेबल का रोज का हिस्सा नहीं बन सकी है तब अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक इसे ले जाने की तमन्ना एक ख्वाब सा लगता है। कार्यालयों में कार्य करनेवाले अधिकांशत: कर्मचारी कोर्योलय के दूसरे कर्मचारियों का अनुकरण करते हैं। लोग अंग्रेजी का प्रयोग कर रहे हैं इसलिए हम भी अंग्रेजी का प्रयोग करेंगे। कल से हिंदी का लोग प्रयोग करने लगें तो टेबल का सारा काम हिंदी में ही होगा। समस्या मानसिकता की है। कठिनाई चलन से अलग ना हो पाने की है।

कहीं ना कहीं से हमें किसी भारतीय भाषा को संग लेकर आरम्भ करना पड़ेगा। राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को देश की राजभाषा का दर्ज़ा मिल चुका है परन्तु उसका विकास करना हम सब कार्यालय कर्मियों का दायित्व है। हिंदी का विकास देश के सभी भाषाओं का विकास है। वर्तमान में प्रत्येक कार्यालय में हिंदी या राजभा, के विपुल साहित्य पड़े हैं जिनका पूरा उपयोग नहीं किया जा रहा है। प्रत्येक कार्यालय हिंदी के छोटे से पत्र के लिए भी कार्यालय के हिंदी विभाग या राजभाषा विभाग की और देखता है। हमारी हिंदी आज कार्यालयों में हिंदी विभाग पर टिकी हुई है यह कहना कोई गलत नहीं होगा। भाषा को दृष्टिगत रखते हुए जब तक हम नहीं जागेंगे तब तक कार्यालय नहीं जगेगा, जब तक कार्यालय नहीं जगेगा तब तक समाज नहीं जगेगा और जब तक समाज नहीं जगेगा तब तक देश का प्रतिनिधित्व करनेवाली हमारी हिंदी और सशक्त नहीं होगी अतएव हमारी हिंदी हमारे ही हॉथों में है। हमारे हॉथों से विकसित हुई हिंदी विश्वपटल पर जाए इसके लिए भगीरथ प्रयास अपेक्षित है।












मंगलवार, 24 नवंबर 2009

मराठी अस्मिता और भारतीय भाषाऍ

भाषा के लिए सुर्खियों में रहनेवाला महानगर मुंबई संभवत: एकमात्र महानगर है जो वर्षों से मराठी अस्मिता की बातें कर रहा है, संघर्ष कर रहा है। यह केवल कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसे मराठी भाषियों का समर्थन भी प्राप्त है। यदि मैं कहूँ कि कुछ प्रतिशत गैर मराठियों का भी समर्थन प्राप्त है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मराठी अस्मिता किसी व्यक्ति विशेष अथवा समूह विशेष द्वारा उछाला गया मुद्दा नहीं है बल्कि यह मराठी भाषी जनसामान्य की सोच है अतएव इस मुद्दे को जनाधार प्राप्त है। दुकान के नाम पट्ट को देवनागरी में लिखना एक आरम्भिक अभियान है जो प्रदर्शन में देवनागरी लिपि तथा मराठी भाषा के परिचय और प्रयोग का प्रथम चरण है। चूँकि यह एक जनआंदोलन है इसलिए इसमें एक चिंतन है, एक लक्ष्य है। मराठी अस्मिता को केवल स्थानीय समस्या मानकर चलना एक भूल होगी।



क्या है मराठी अस्मिता ? क्या यह केवल मराठी भाषा और मराठी भाषियों के हितों से जुड़ा हुआ मुद्दा है या कुछ और ? यहॉ मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि इस आंदोलन में मुझे एक स्वाभिवकता नज़र आती है न कि राजनीति अतएव मराठी अस्मिता के इस आंदोलन में राजनीतिक महात्वाकांछाऍ नहीं हैं। भारत देश की आर्थिक राजधानी कही जानेवाली मुंबई विश्व के स्पंदनों का बखूबी अहसास करती है। इन स्पंदनों में यदि कोई स्पंदन मुखर है तो वह है भूमंडलीकरण। सूचनाओं, व्यवसायों, सांस्कृतिक प्रभावों आदि के बीच आज प्रत्येक राष्ट्र की प्रमुख समस्या अपनी पहचान को बनाए रखना हो गई है। यह पहचान बनाए रखने के लिए अन्य देशों के प्रभाव से बचना भी बहुत आवश्यक है। स्वंय की पहचान को बनाए रखना और उसे बचाए रखना एक प्रमुख समस्या है जिसका समाधान कहीं और नहीं प्रत्येक राष्ट्र की अपनी संस्कृति और भाषा में छुपा है। महाराष्ट्र की संस्कृति और मराठी भाषा को बचाए रखना, बसाए रखना और विकसित करते रहना ही मराठी अस्मिता है।



भारत देश का एक प्रमुख महानगर तथा वित्तीय राजधानी होने के कारण मुंबई बहुभाषी तथा बहुसंस्कृतिक है जहॉ पर कई भारतीय तथा कुछ विदेशी भाषाऍ पुष्पित तथा पल्लवित हो रही हैं। ऐसी स्थिति में यदि मराठी भाषा का आकलन किया जाए तो उसमें गिरावट नज़र आती है जो निश्चय ही चिन्ता का विषय है। कुछ वर्ष पहले तक मराठी रंगमंच अपनी लोकप्रियता के ऊँचे पायदान पर था लेकिन अब वह पायदान नहीं है। मराठी भाषी विद्यार्थी हमेशा 10 वीं तथा 12वीं कक्षा में महाराष्ट्र राज्य में प्रथम आते हैं फिर भी मराठी माध्यम के विद्यालय बंद होते जा रहे हैं। योग्यता के मानदंड में मराठी भाषा को अपेक्षित महत्व नहीं दिया जाता रहा है। महाराष्ट्र राज्य में दुकान, फर्म, प्रतिष्ठान आदि खोलकर राज्य की भाषा में बोर्ड आदि प्रदर्शित न करना स्थानीय भाषा को नकारने का संकेत देता है। एक उन्नत राज्य होने के कारण मराठी भाषा की बातें जोर-शोर से करना महाराष्ट्र के प्रबुद्ध समाज की एक स्वाभाविक प्रक्रिया ही कही जाएगी।





यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो मुंबई से मराठी अस्मिता की उठती हुई आवाज़ केवल मराठी तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह अन्य भारतीय भाषाओं को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है। मराठी भाषा के प्रचार-प्रसार के अभियान से हिंदी को सीधे फायदा हो रहा है। हिंदी तथा मराठी की लिपि देवनागरी होने के कारण लक्ष्य का केन्द्रबिन्दु देवनागरी लिपि है अतएव देवनागरी लिपि के प्रचार-प्रसार से हिंदी को भी लाभ प्राप्त होगा। गुजराती भाषा की भी स्थिति लगभग ऐसी है। मराठी भाषा का प्रतिद्वंद्वी कोई भी भारतीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय भाषा नहीं है। इसकी प्रतिद्वद्विता महाराष्ट्र की भाषिक परिस्थितियों से है। महाराष्ट्र में मराठी भाषा को महत्व मिले जिससे सर्वत्र मराठी भाषा दिखे, मराठी माध्यम से पढ़े विद्यार्थियों को नौकरी आदि में अपेक्षित स्थान मिले आदि। भारत के संविधान में भी भाषा विषयक व्यवस्था में संघ की राजभाषा हिंदी होने के साथ-साथ संविधान की आठवीं सूची में दर्ज़ सभी भाषाओं को महत्व देने का निर्देश है। भारतीय भाषाओं को एक नई पहचान देने में मराठी अस्मिता की चर्चाऍ और प्रयास अग्रणी भूमिका निभा रही है। भविष्य में संपूर्ण विश्व में भाषिक और सांस्कृतिक द्वंद की संभावना प्रतीत हो रही है।

धीरेन्द्र सिंह