गुरुवार, 27 अक्टूबर 2022
राजभाषा अधिकारी व उच्चाधिकारी
राजभाषा अधिकारी बनाम उच्चाधिकारी
सामान्य जीवन में जिस तरह सास-बहू के आपसी झगड़े को प्रायः आम बोलचाल में एक हास्य निर्मित के लिए किया जाता है वैसा ही कुछ राजभाषा अधिकारी और उच्चाधिकारी के बीच है। यूं तो कार्यालय में प्रत्यक्ष झगड़ा तो नहीं होता है किंतु मानसिक तनाव देखने को मिलते रहता है। यह झगड़ा क्यों होता है इसका सामान्य अवलोकन निम्नानुसार किया जा सकता है :-
1. राजभाषा अधिकारी की कमजोरी : अधिकांश राजभाषा अधिकारियों की राजभाषा कार्यान्वयन कौशल की अज्ञानता कार्यालय में राजभाषा अधिकारी को बेकार में टाइम पास करनेवाला स्थापित करना आरंभ करता है। कार्यालय के अन्य विभाग की उपलब्धियां, चुनौतियां, चपलताएं नित या आवधिक तौर पर प्रस्तुत करते रहते हैं वहीं राजभाषा या हिंदी विभाग यदा-कदा ही अपना उल्लेखनीय प्रदर्शन कर पाते हैं इसलिए यह भ्रम एक विश्वास के रूप में निर्मित होता है कि राजभाषा अधिकारी के पास पूरे दिन का कार्य नहीं रहता है। यही भाव निर्मित होने पर उच्चाधिकारी उस राजभाषा अधिकारी को एक कामचोर अधिकारी के रूप में देखने लगता है। इस प्रक्रिया पर चर्चाओं के कई पक्ष हैं।
2. उच्चाधिकारी की सीमाएं :- उच्चाधिकारी राजभाषा की गहनता से अनभिज्ञ होता है। वह केवल प्रशासनिक निर्णय के लिए होता है। राजभाषा अधिकारी का दायित्व है कि राजभाषा के प्रचार-प्रसार की अपनी योजनाओं को।उच्चाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत कर प्रशासनिक अनुमति ले और यह प्रमाणित कर की राजभाषा या हिंदी विभाग भी अति सक्रिय और अति व्यस्त विभाग है। इस प्रकार की गतिविधाएं दर्शानेवाले गिने-चुने राजभाषा अधिकारी हैं।
3. असफल राजभाषा अधिकारी कहे उच्चाधिकारी :- एक सफल राजभाषा अधिकारी अपने उच्चाधिकारियों से लयबद्धता कायम कर लेता है और राजभाषा कार्यान्वयन में धमाकेदार कार्यनिष्पादन दर्शाता है। उच्चाधिकारियों को ऐसे राजभाषा अधिकारी पर गुरुर होता है। असफल राजभाषा अधिकारी अपनी असमर्थता को छुपाने के लिए प्रायः कहता है कि उच्चाधिकारियों से सहयोग नहीं मिलता है।
इस प्रकार प्रत्येक सरकारी कार्यालय, बैंक तथा उपक्रम में राजभाषा कार्यान्वयन गतिशील है। असमर्थता की खुमारी उच्चाधिकारी, धन्य ऐसे राजभाषा अधिकारी😊
धीरेन्द्र सिंह
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हिंदी के आधुनिक रूप के विकास में कार्यरत जिसमें कार्यालय, विश्वविद्यालय, प्रौद्योगिकी में देवनागरी लिपि, ऑनलाइन हिंदी समूहों में प्रस्तुत हिंदी पोस्ट में विकास, हिंदी के साथ अंग्रेजी का पक्षधर, हिंदी की विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी विकास के प्रति विश्लेषण, हिंदी का एक प्रखर और निर्भीक वक्ता व रचनाकार।
शनिवार, 17 सितंबर 2022
राजभाषा और उलझ गए
राजभाषा और उलझ गई
14 सितंबर, 2022 को सूरत में आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में गृह मंत्री श्री अमित शाह ने हिंदी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं के समामेलन की बात कही। यह नई बात नहीं है। पिछले बीस वर्षों से यही बात की जा रही है। यह विचार व्यावहारिक कितना है उसपर आज तक विचार नहीं किया गया है। कैसे हिंदी में अन्य भारतीय भाषाओं की शब्दावली ग्रहण की जाएगी। शब्दावलियों के निर्माण का अनवरत सिलसिला जारी है। गृह मंत्री ने ऑनलाइन "शब्द सिंधु शब्दकोश" का लोकार्पण किया। प्रश्न यह है कि मात्र शब्दावली निर्माण से क्या होगा? गृह मंत्री श्री अमित शाह ने यह भी सुझाव दिया कि युवा वर्ग को राजभाषा के प्रति विशेष तौर पर जागरूक बनाया जाय। कौन बनाएगा युवा कार्मिकों को राजभाषा में कार्य करने के लिए तत्पर? राजभाषा अधिकारी का यह कार्य है। क्या राजभाषा अधिकारियों में मानसिक सोच में राजभाषा सोच को स्थापित करनी की योग्यता है? उत्तर है नहीं। राजभाषा की गति राजभाषा या हिंदी अधिकारी तक पहुंच कर टूट जाती है। यही कारण है कि वर्ष दर वर्ष हिंदी दिवस पर राजभाषा के एक ही सुर सुनाई देते हैं। इन सबके बावजूद भी गृह मंत्री श्री अमित शाह की बातों में एक आशा अवश्य झलकती मिली है जिसे भारत सरकार के राजभाषा विभाग अपने अथक प्रयास से पूर्ण भी कर सकती है। यदि ऐसा होगा तो निश्चित ही एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक सफलता प्राप्त होगी।
वित्त मंत्री सीतारमण ने अपने संबोधन में स्पष्ट दिशानिर्देश दिया है कि बैंकों में फ्रंट डेस्क पर कार्य करनेवाले स्टाफ को स्थानीय भाषा का ज्ञान होना चाहिए। सामान्यतया फ्रंट डेस्क पर लिपिक रहते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा का ज्ञान होता है और जो सामान्य बैंकिंग के कार्य सुचारू ढंग से अपनाते हैं। यदि किसी ग्राहक को ऋण आदि पर चर्चा करनी हो तो उन्हें अधिकारी वर्ग के पास जाना पड़ता है। वित्त मंत्री का कहना है कि अधिकारी ग्राहक को हिंदी में बात करने के लिए नहीं बोल सकते बल्कि अधिकारी को खुद उस राज्य की भाषा सीखनी चाहिए। बैंकिंग में सामान्यतया एक अधिकारी एक राज्य में चार वर्षों तक कार्यरत रहता है फिर उसका स्थानांतरण दूसरे राज्य में हो जाता है। इस प्रकार वह कई राज्यों में स्थान्तरित होता है तो कैसे वह कई राज्यों की भाषा सीख सकता है? मूलतः वित्त मंत्री का संकेत त्रिभाषा सूत्र की ओर है जो बैंक के लिए एक सामान्य कार्य नहीं।
संविधान में राजभाषा विषयक अधिनियम में परिवर्तन किए बिना ऊक्त दो माननीय मंत्रियों के दिशानिर्देशों का पूर्ण अनुपालन कठिन लगता है। परिवर्तन यह कि राजभाषा हिंदी के साथ अंग्रेजी सह-राजभाषा के रूप में चलती रहेगी। प्रतिवर्ष हिंदी दिवस 14 सितंबर को महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं तदनुसार दिशानिर्देश जारी किए जाते हैं और सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग बढ़ते जाता है।
धीरेन्द्र सिंह
हिंदी के आधुनिक रूप के विकास में कार्यरत जिसमें कार्यालय, विश्वविद्यालय, प्रौद्योगिकी में देवनागरी लिपि, ऑनलाइन हिंदी समूहों में प्रस्तुत हिंदी पोस्ट में विकास, हिंदी के साथ अंग्रेजी का पक्षधर, हिंदी की विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी विकास के प्रति विश्लेषण, हिंदी का एक प्रखर और निर्भीक वक्ता व रचनाकार।
बुधवार, 14 सितंबर 2022
हिंदी दिवस-भ्रमित लोग
हिंदी दिवस - भ्रमित लोग
प्रतिवर्ष 14 सितंबर को मनाए जानेवाले दिवस को हिंदी दिवस के रूप में जाना जाता है। अधिकांश लोग भारतीय संविधान के 343 से 351 तक के तथ्यों से अनभिज्ञ हैं इसलिए हिंदी दिवस को बोलचाल से लेकर साहित्यिक हिंदी से जोड़ते हैं जो हिंदी दिवस से संबंधित ही नहीं है। यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न होता है कि फिर क्या है हिंदी दिवस?
राजभाषा हिंदी की बात है :- हिंदी दिवस का आयोजन सरकारी कार्यालयों, राष्ट्रीयकृत बैंकों, उपक्रमों के कामकाज में हिंदी का प्रयोग बढ़ाना है। इस प्रक्रिया को राजभाषा कार्यान्यवन कहते हैं। यहां साहित्यिक हिंदी की कोई जगह नहीं है क्योंकि राजभाषा हिंदी का अपना अलग साहित्य है जो कार्यालयों तक सीमित है।
राजभाषा/हिंदी विभाग:- सरकारी कार्यालयों आदि में राजभाषा या हिंदी विभाग होता है जिसका कार्य सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाना है। यह विभाग सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी प्रशिक्षण भी प्रदान करता है।
मनोरंजक लेखन:- अति उत्साह में हिंदी दिवस पर लिखे अधिकांश लेख मनोरंजक होते हैं क्योंकि वह राजभाषा हिंदी से भटक साहित्यिक हिंदी आदि पर चर्चा करते हैं जिसका भटकाव गुदगुदाता है।
जटिल है हिंदी दिवस:- हिंदी दिवस संविधान की नीतियों में उलझा एकं जटिल समस्या है जिसका समाधान अत्यंत कठिन है। सरकार के कागजों में अभी भी अंग्रेजी का प्रयोग होता है। कहाँ है हिंदी?
धीरेन्द्र सिंह
हिंदी के आधुनिक रूप के विकास में कार्यरत जिसमें कार्यालय, विश्वविद्यालय, प्रौद्योगिकी में देवनागरी लिपि, ऑनलाइन हिंदी समूहों में प्रस्तुत हिंदी पोस्ट में विकास, हिंदी के साथ अंग्रेजी का पक्षधर, हिंदी की विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी विकास के प्रति विश्लेषण, हिंदी का एक प्रखर और निर्भीक वक्ता व रचनाकार।
सोमवार, 23 मई 2022
प्रकाशक के चंगुल
प्रकाशक का चंगुल
हिंदी के कुछ अति विशाल प्रकाशक हिंदी प्रकाशन की गरिमा को बनाए हुए हैं इसलिए क्योंकि वह बड़े हैं। अनेक हिंदी प्रकाशक विशाल प्रकाशक बनने के प्रयास में हैं। उभरते हुए प्रकाशक निम्नलिखित उपायों से अपने चंगुल में नए लेखक और लेखिकाओं को लेते हैं :
1. महिला रचनाकार :- उभरते हुए प्रकाशक नई रचनाकारों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अपनी युक्तियों का पूर्ण प्रयोग करते हैं और कई नई लेखिकाएं ऐसे प्रकाशकों से जुड़ जाती हैं। जुड़ने वाली महिलाओं में अधिकांश घरेलू महिलाएं या सामान्य कामकाजी महिलाएं होती हैं। इस प्रकार महिलाओं की अच्छी खासी संख्या जोड़कर उनमें से चयनित महिलाओं से अपने प्रकाशन का प्रचार-प्रसार करवाते हैं।
2. पुस्तक लोकार्पण - गलत शब्द और नौटंकी : उभरते प्रकाशक अपने संपर्क जाल से रचनाकारों को आकर्षित करते हैं और यदि कुछ पुस्तकें प्रकाशित करने का अवसर मिल जाता है तो प्रकाशन के बाद लोकार्पण करते हैं। विमोचन शब्द को छोड़कर पुस्तक लोकार्पण जैसा शब्द प्रकाशक और उससे जुड़े लोगों द्वारा प्रयोग किया जाना बौद्धिक दिवालियापन का संकेत देता है।
प्रकाशक रचनाकार से कहता है पुस्तक का प्रचार-प्रसार करिए। रचनाकार को यह बतलाता है कि ऑनलाइन भी "लोकार्पण" हो सकता है। रचनाकार अपने संपर्क के रचनाकारों से संपर्क कर ऑनलाइन आयोजन करता है। इस प्रकार प्रकाशक एक ऐसे समूह को बनाने में सफल हो जाता है जिसमें सभी रचनाकार होते हैं और सब अपनी पुस्तक प्रकाशन की कामना लिए रहते हैं।
"लोकार्पण" नौटंकी का आरंभ होता है। ऑनलाइन एक समूह अनजाने में उभरते प्रकाशक के चंगुल में फंसते जाता है। आयोजन में प्रकाशक भी उपस्थित होता है। आयोजन का संचालन करनेवाला "लोकार्पण" पुस्तक और उसके रचनाकार की एक तरफ रखकर ऑनलाइन "टीम" के सदस्यों के परिचय के दौरान उसके समस्त रचना संसार को प्रस्तुत करने लगता है। ऐसी स्थिति में समझ में नहीं आता कि यह आयोजन "टीम" सदस्यों के रचना संसार से अवगत कराना है या "लोकार्पण" का है। बेहद नीरस और उबाऊ होता है विषय से हटकर "टीम" रचना संसार की कसीदाकारी। चंगुल में फंसे रचनाकार समझ नहीं पाते कि ऐसे संचालन से प्रकाशक यह टोह लेता है कि छपास की बीमारी किस में अधिक है और अपना अगला ग्राहक ढूंढ लेता है।
3. तेरी जय - मेरी जय : प्रकाशक के आयोजन चंगुल में फंसे रचनाकारों द्वारा एक-दूसरे की जम कर तारीफ की जाती है। इसके अतिरिक्त "टीम" के कुछ मित्र दर्शक होते हैं और खूब तारीफ करते हैं। एक नौटंकी अपनी यात्रा में लगातार प्रकाशक की मदत करते जाती है।
4. त्रुटियां स्वीकार नहीं : ऑनलाइन "लोकार्पण" नौटंकी की यदि त्रुटियों का उल्लेख समीक्षा में कर दिया जाए तो प्रकाशक तिलमिला जाता है। चूंकि उभरते ऐसे प्रकाशक धन अर्जन का ही लक्ष्य रखे रहते हैं इसलिए खुद नहीं टकराते बल्कि यदि कोई महिला रचनाकार हो तो अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित करते हैं कि वह त्रुटि दर्शानेवाले टिप्पणीकार से भिड़े। कुछ संवाद के बाद आयोजन की त्रुटियों की सभी टिप्पणियों को डिलीट कर देते हैं।
5. पुस्तक विमोचन नहीं आता : उभरते प्रकाशक का उद्देश्य अपने प्रकाशन संस्था का प्रचार करना होता है इसलिए पुस्तक विमोचन आयोजन में कोई रोए या गाए फर्क नहीं पड़ता बल्कि वाहवाही मिलती है। एक या दो वक्ता पुस्तक विमोचन पर बोल पाते हैं अन्यथा शेष प्रशंसा के सिवा कुछ बोल ही नहीं पाते।
6. रचनात्मक विरोध आवश्यक : हिंदी भाषा और साहित्य के हित में है कि उभरते प्रकाशकों द्वारा नव प्रकाशित पुस्तक विमोचन के नाम पर यदि रचनाकारों का शोषण हो रहा हो और प्रकाशक आयोजन में उपस्थित होकर अपनी दुकानदारी चला रहा हो तो इसका विरोध करना चाहिए। विरोध ऐसे संचालकों का भी किया जाना चाहिए जो पुस्तक और उसके रचनाकार को छोड़ उपस्थित रचनाकारों के लेखन संसार का वर्णन करता है। इस प्रकार के संचालक को यह समझना चाहिए कि आयोजन पुस्तक विमोचन का है न कि सम्मिलित रचनाकारों के लेखन संसार के वर्णन का। समय की बर्बादी है।
ऊक्त विचार काल्पनिक नहीं बल्कि अनुभव आधारित है। कब तक हिंदी लेखन, प्रकाशन में गुटबंदी चलती रहेगी। कौन रोकेगा उसे ? निश्चित एक प्रबुद्ध और जीवंत मस्तिष्क। हिंदी लेखन जगत में उभरते प्रकाशकों के चंगुल के विरोध और रचनात्मक टिप्पणी से त्रुटियों को दर्शाने का सिलसिला आरम्भ न होगा तो हिंदी लेखन का अहित होगा।
धीरेन्द्र सिंह
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शुक्रवार, 25 जून 2021
राजभाषा के थके सिपाही
जब तक एक सियाह घने राजभाषा बादल गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के रूप में छाए रहते हैं तब तक सरकारी बैंकों में देवनागरी लिपि में कामकाज की झलक मिल जाती है। कम्प्यूटर के प्रचलन से प्रौद्योगिकी ने जिस तरह से विकास किया उस गति से राजभाषा कार्यान्वयन अपना विकास नहीं कर सका परिणामतः वर्तमान में भी सरकारी कामकाज में देवनागरी लिपि का प्रयोग दोयम दर्जे का है। संविधान के सशक्त पक्ष का वर्तमान समय लाभ नहीं उठा पा रहा है। इन बैंकों के राजभाषा के आंकड़े भले ही लक्ष्य के अनुसार अपनी रिपोर्ट दें इससे यह कदापि नहीं प्रमाणित होता है कि राजभाषा कार्यान्वयन प्रगति पर है।इस चिंताजनक परिस्थिति का एक बड़े मंच पर विश्लेषण और कार्यान्वयन के लिए एक सक्षम जुझारू नेतृत्व की आवश्यकता है। सामान्य तौर पर देखने से यह लगता है कि राजभाषा के कार्य से जुड़े अधिकारी थक चुके हैं शायद उन्होंने मन में यह जान लिया है कि राजभाषा कार्यान्वयन महज एक सरकारी लक्ष्य पूर्ति का कागजी आंकड़ा है। प्रौद्योगिकी से इतर क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को महत्व दिया जा रहा है और इस प्रकार हिंदी का प्रचार और प्रसार हो रहा है। क्या मात्र हिंदी के विकास से राजभाषा स्वयं विकसित हो जाएगी? इसी प्रश्न के दायरे में राजभाषा उलझी हुई है।
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रविवार, 13 सितंबर 2020
प्रेयसी हिंदी
हिंदी दिवस पर मन अत्यधिक गहनता और व्यापकता से तुम्हारी अनुभूति करता है, विश्लेषण करता है और जीवकोपार्जन में तुम्हारी उपयोगिता की विभिन्न व्याख्या करता है। कल मेरी प्रेमिका ने मेरे राजभाषा के लेख को पढ़कर मुझसे प्रश्न की। बेहद साधारण सा प्रश्न था कि मैं हिंदी को क्या समझता हूँ। मैंने जो उत्तर दिया उनसे वह सहमत न थी और मैं उनको संतोषप्रद उत्तर न दे पा रहा था। प्रश्नों की झड़ी रोककर उन्होंने कहा कि यदि मैं प्रेम करूँगा तो किस भाषा में अभिव्यक्त करूँगा। मेरा उत्तर था हिंदी। उन्होंने कहा क्या आपने कभी अपनी हिंदी को प्रेयसी के रूप में देखा है? यह प्रश्न मुझे रोमांचित कर गया। सच हिंदी हमेशा मेरे निजतम भावनाओं की।संवाहिका रही पर हिंदी के इस स्पंदन से दूर ही रहा। मेरी प्रेमिका ने कहा कि अपनी प्रेमिका के स्थान पर हिंदी को बैठाकर मैं अपने भावों को लिखूँ।
क, ख, ग... से परिचित होते हुए हिंदी के शब्द और वाक्य बनाने की प्रसन्नता की धुंधली यादें अब भी जीवंत हैं। सस्वर वंदना, राष्ट्रगान प्राथमिक विद्यालय में अनुराग के ही द्योतक तो थे। कॉपी में या पुस्तकों के अंतिम पृष्ठ पर लिखे-मिटाए जानेवाले नाम। इस प्रकार हिंदी कब अस्तित्व से जुड़ गई पता ही न चला। जीवन के विभिन्न पक्षों को पहचानने तथा कई तरह के मनोभावों का एकमात्र विश्वसनीय चैनल हिंदी ही तो थी। आज जब अपनी हिंदी प्रेयसी से बातें कर रहा हूँ तो लग रहा है कि एक लंबी उम्र कस्तूरी मृग की तरह गुजार दी।
ओ मेरी प्रेयसी हिंदी आज यह बेहिचक स्वीकार कर रहा हूँ कि यदि तुम न होती तो मेरे अस्तित्व की पहचान भी न होती। सुनो बेहद रूमानी प्रेयसी हो। आदिकाल से आधुनिक काल तक तुम्हारे नूपुर की रुनझुन से खुद को अभिव्यक्त करते आया। कितना तराशा है न तुमने मेरे रूप को। मैं बेढब न दिखूं इसलिए तुमने अपने को विभिन्न रूपों में सजाकर मेरा साथ दिया। जब भी किसी उत्सव में मैं सम्मिलित हुआ तब तुम विशेष रूप से मेरी अभिव्यक्ति को एक नई धार और शब्दों से तराशती रही। मंचों पर लोग मेरी वाणी और प्रस्तुति की प्रशंसा नहीं करते थे बल्कि वह तुम्हारी ही प्रशंसा थी। भाषाओं के इस कठिन दौर में तुम जिस तरह सजी-संवरी कभी बातों में, कभी गीतों में, कभी मंचीय या फिल्मी संवादों में या शैक्षणिक वर्गों में गुंजित होती हो यह तुम्हारी अदाओं की शक्तियां ही तो है।
देखो न न जाने कब से मैं तुम्हारा अनुरागी हूँ पर अनुभूतियों का प्रस्फुटन आज हो रहा है। नसों में भावनात्मक चिंगारियां दौड़ रही हैं और तुम उन चिंगारियों की प्यास हो। तृष्णाएं तुमसे न जाने कब से तृप्त होती रहीं पर मन के भटकाव से तुम्हारे शब्दमयी सोंधेपन से आज रूबरू हो पा रहा हूँ। तुम्हारे पहलू में बैठ श्रृंगार के अनेक अध्यायों को आत्मसात किया पर तुम्हारे साँसों की ऊष्मा से अनभिज्ञ रहा। कई अवसरों पर तुमने किस तरह सहारा देकर संकट से उबारा है फिर चाहे वह अनुवाद हो या घोष वाक्य आदि लिखना हो। प्रेम का इतना मूक और भव्य यात्रा को न तो मैने कहीं पढ़ा न सुना। मेरी हिंदी तुम अद्भुत हो।
प्रज्ञा की असंख्य विधाएं हैं। प्रेम भी एक सशक्त प्रज्ञा है जो सूर्य की मानिंद व्यक्ति को आलोकित रखती है। प्रेम का सबसे आवश्यक अंग अभियक्ति है। अभिव्यक्ति के लिए भाषा आवश्यक है। मेरी हिंदी, मेरी आशा, मेरी भाषा, मेरा विश्वास तुम सजी-धजी हमेशा मेरे पास। आज यह भी स्वीकार करता हूँ कि मेरे प्रति तुम्हारे अगाध प्यार ने मुझे एक विशिष्ट पहचान दिया जो सिर्फ तुम पर ही आधारित है। तो मेरी मौन प्रेयसी यह लिखते समय भावुकता में मेरे नयन कोर भींग उठे हैं। हिंदी दिवस पर मेरा यह वादा है प्रिये कि तुमको सजाने-संवारने और बहुमुखी सौंदर्य वृद्धि में सम्पूर्ण प्रतिभा के संग लगा रहूंगा। सच तुमसा प्यारा, तुमसा रूमानी, तुम्हारे पहलू की जिंदगानी अन्यत्र कहीं नहीं। आ मेरी प्रेयसी नमन।
धीरेन्द्र सिंह
मराठी भाषा की अनिवार्यता
हिंदी के आधुनिक रूप के विकास में कार्यरत जिसमें कार्यालय, विश्वविद्यालय, प्रौद्योगिकी में देवनागरी लिपि, ऑनलाइन हिंदी समूहों में प्रस्तुत हिंदी पोस्ट में विकास, हिंदी के साथ अंग्रेजी का पक्षधर, हिंदी की विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी विकास के प्रति विश्लेषण, हिंदी का एक प्रखर और निर्भीक वक्ता व रचनाकार।
राजभाषा कार्यान्वयन-लिखित हिंदी, चिंदी-चिंदी
संविधान के ऐतिहासिक निर्णय ने 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाने की जो राह प्रदत्त की वह प्रतिवर्ष अगस्त, सितंबर माह में प्रशस्त, प्रखर और प्रयोजनपूर्ण नजर आती है। देवनागरी लिपि हिंदी में सरकारी कामकाज करने की यह वैधानिक शक्ति अब सिर्फ कागजों में सिमट गई है और वर्ष 2020 में वेबनार, वेब संगोष्ठी आदि प्रौद्योगिकी जनित उपायों से भी हिंदी दिवस हंगामा मचाया जा रहा है। इस प्रशस्त पथ पर दो प्रमुख राही हैं जिसमें प्रथम राजभाषा कार्यान्वयन तथा द्वितीय लिखित हिंदी है। इन दो प्रमुख पथिकों का विश्लेषण निम्नलिखित अनुसार है:-
1. राजभाषा कार्यान्वयन: यह पथ सरकारी कार्यालयों, उपक्रमों, बैंकों से निकलता है तथा इन कार्यालयों के सभी स्तर के कर्मचारी पथिक हैं। पद के कारण अग्र पंक्ति पथ प्रदर्शक का ध्वज राजभाषा अधिकारी या हिंदी अधिकारी को सौंपा जाता है। राजभाषा अधिकारी में भी दो वर्ग हैं प्रथम प्रौढ़ तथा द्वितीय नई भर्ती राजभाषा अधिकारी। इन पथ प्रदर्शकों में आपस में ही घमासान होता है। नवांकुर राजभाषा अधिकारी सम्पूर्ण आसमान को देवनागरी लिपि से भरने का कूवत रखता है जबकि प्रौढ़ राजभाषा अधिकारी अपनी पदोन्नति और बेहतर पोस्टिंग पर गिद्ध दृष्टि गड़ाए रखता है। नवांकुर के हर ऐसे कार्यक्रम जो राजभाषा कार्यान्वयन को गति दें उसे प्रौढ़ राजभाषा अधिकारी अपनी वरिष्ठता का उपयोग कर प्रशासनिक अधिकारी को कुछ खोट बताकर रद्द कर देता है। नवांकुर तिलमिलाता है पर खराब पोस्टिंग और पदोन्नति में अड़चन न डाल दें प्रौढ़ राजभाषा अधिकारी सोच चुप हो जाता है। प्रौढ़ राजभाषा अधिकारी नवांकुर राजभाषा अधिकारी के अद्यतन प्रौद्योगिकी ज्ञान का उपयोग कर राजभाषा प्रचार-प्रसार की चीजें बनवाता है और उच्च प्रशासनिक राजभाषा बैठक में अपनी सोच, प्रेरणा आदि बनाकर प्रस्तुत करता है। प्रौढ़ राजभाषा अधिकारी पदोन्नति और बेहतर पोस्टिंग पा लेता है और नवांकुर प्रौद्योगिकी की धुन में कार्यनिष्पादन की नई सरगम को बनाने में लगा रहता है। उसकी पदोन्नत न होने पर घिसे मुहावरे और असंगत दर्शन का प्रसाद दे तृप्ति का अनुभव करने को कहा जाता है। जी हां, यही है सरकारी कार्यालयों की राजभाषा कार्यान्वयन।
कृपया अपूर्ण और तथ्यहीन लेखन का आरोप मत लगाइये। आप सहमत होंगे यदि राजभाषा अधिकारियों की धड़कनों को सुन पाईये। यहां न तो हिंदी कार्यशाला की दयनीय स्थिति का वर्णन कर रहा, न तो भ्रमित कर देनेवाले हिंदी अनुवाद का उल्लेख, न ही हिंदी की तिमाही रिपोर्ट गाथा का वर्णन और न ही राजभाषा अधिकारियों से राजभाषा कार्यान्वयन के अलावा अन्य कार्य लेने की साजिश का उल्लेख है। बस विशुद्ध रूप से राजभाषा प्रवर्ग में फैलते वर्चस्वता और गुटबंदी की ओर इंगित किया जा रहा। राजभाषा कार्यान्वयन के सभी उलझनों का उद्गम है।
2. लिखित हिंदी : उत्तरप्रदेश का चौंका देनेवाला हिंदी विषय में अनुत्तीर्ण विद्यार्थियों का प्रतिशत और सरस्वती कान्वेंट स्कूल जैसे कुकुरमुत्ते की तरह फैल रहे विद्यालय लिखित हिंदी की भयावह तस्वीर पैदा कर रहे। रोमन लिपि में हिंदी लिखने का चलन तमाम देवनागरी लिपि लेखन सुविधाओं के बाद भी बाधित। हिंदी भाषी अवश्य देवनागरी लिपि टंकण की ओर धीमी गति से बढ़ रहे हैं। स्पष्ट उच्चारण के कारण बोलकर टाइप करना प्रचलित नहीं हो पा रहा। यदि बात सरकारी कार्यालयों की करें तो 80 के दशक में द्विभाषिक अग्रेषण पत्र ही हिंदी पत्र संख्या वृद्धि के प्रमुख जनक थे वह आज भी अबाधित गति से जारी है। कहाँ, कौन देवनागरी लिपि में टाइप कर रहा या लिख रहा वही मुट्ठी भर राजभाषा और हिंदी से जुड़े लोग। अपनी डफली-अपनी राग।
यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि 80 के दशक में जिस सुनियोजित ढंग से राजभाषा कार्यान्वयन हुआ वह 90 के उत्तरार्द्ध तक आते-आते थम गया। इसके बाद राजभाषा उच्च पद, अच्छी जगह स्थानांतरण और गुटबंदी का रूप ले लिया जिसका दंड राजभाषा से जुड़ी नई पीढ़ी के अधिकांश लोग अनुभव कर रहे होंगे। लिखित हिंदी तो दिन पर दिन गूलर का फूल होती जा रही। यह सब लिखने के बाद भी नव-जागृति और नव-परिवर्तन की कामना सहित हिंदी दिवस की शुभकामनाएं।
धीरेन्द्र सिंह
13 सितंबर, 2020
हिंदी के आधुनिक रूप के विकास में कार्यरत जिसमें कार्यालय, विश्वविद्यालय, प्रौद्योगिकी में देवनागरी लिपि, ऑनलाइन हिंदी समूहों में प्रस्तुत हिंदी पोस्ट में विकास, हिंदी के साथ अंग्रेजी का पक्षधर, हिंदी की विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी विकास के प्रति विश्लेषण, हिंदी का एक प्रखर और निर्भीक वक्ता व रचनाकार।
सोमवार, 10 सितंबर 2018
हिंदी - अंग्रेजी - राजभाषा
देश में भाषा की सुगबुगाहट तेज होने लगी है। 14 सितंबर कुछ दिनों के बाद है। इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हर तरफ हिंदी की सुगबुगाहट लेख, कविता, चर्चाओं के माध्यम से तथा भांति - भांति के विचार प्रस्तुत किए जा रहे हैं। हिंदी दिवस विषयक कुछ मुद्दे निम्नलिखित हैं : -
1. भारतीय संविधान के अनुसार 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में आयोजित करना चाहिए या राजभाषा दिवस के रूप में ?
2. यदि 14 सितंबर हिंदी दिवस है तो राजभाषा दिवस कब है ?
3. सरकारी कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों के कितने ग्राहक राजभाषा के बारे में जानते हैं ? क्या कभी किसी स्तर पर संस्था विशेष या उद्योग विशेष द्वारा सर्वेक्षण, शोध, जानकारियां आदि संपन्न किया गया है ?
4. हिंदी दिवस आयोजन से क्या तात्पर्य है ? किन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस दिन का आयोजन किया जाता है ?
5. हिंदी मतलब देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी जबकि मोबाइल से अधिकांश लोग हिंदी टाइपिंग रोमन स्क्रिप्ट का उपयोग करते हैं । इस दिशा में क्रमशः देवनागरी लिपि के लुप्त होने की प्रक्रिया पर प्रौद्योगिकी और देवनागरी की बोर्ड विशेषज्ञ क्या प्रयास कर रहे हैं ?
6. सरकारी कार्यालयों,बैंकों, उपक्रमों में पदस्थ हिंदी अधिकारी या राजभाषा अधिकारियों को उनके सेवाकाल में क्या राजभाषा कार्यान्वयन या हिंदी प्रचार - प्रसार का प्रशिक्षण दिया जाता है ?
7. क्या किसी गैर सरकारी राजभाषा विशेषज्ञ द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन की लेखा परीक्षा (आडिट) किया जाता है ?
उक्त कुछ मुद्दे हैं जो सरकारी कार्यालयों में राजभाषा के प्रचार - प्रसार और विस्तार के लिए अहम भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं। क्या उक्त मदों पर कार्य या कार्रवाई हो रही है ? इसका स्पष्ट उत्तर अभी भी प्रतीक्षित है।
धीरेन्द्र सिंह
देश में भाषा की सुगबुगाहट तेज होने लगी है। 14 सितंबर कुछ दिनों के बाद है। इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हर तरफ हिंदी की सुगबुगाहट लेख, कविता, चर्चाओं के माध्यम से तथा भांति - भांति के विचार प्रस्तुत किए जा रहे हैं। हिंदी दिवस विषयक कुछ मुद्दे निम्नलिखित हैं : -
1. भारतीय संविधान के अनुसार 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में आयोजित करना चाहिए या राजभाषा दिवस के रूप में ?
2. यदि 14 सितंबर हिंदी दिवस है तो राजभाषा दिवस कब है ?
3. सरकारी कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों के कितने ग्राहक राजभाषा के बारे में जानते हैं ? क्या कभी किसी स्तर पर संस्था विशेष या उद्योग विशेष द्वारा सर्वेक्षण, शोध, जानकारियां आदि संपन्न किया गया है ?
4. हिंदी दिवस आयोजन से क्या तात्पर्य है ? किन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस दिन का आयोजन किया जाता है ?
5. हिंदी मतलब देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी जबकि मोबाइल से अधिकांश लोग हिंदी टाइपिंग रोमन स्क्रिप्ट का उपयोग करते हैं । इस दिशा में क्रमशः देवनागरी लिपि के लुप्त होने की प्रक्रिया पर प्रौद्योगिकी और देवनागरी की बोर्ड विशेषज्ञ क्या प्रयास कर रहे हैं ?
6. सरकारी कार्यालयों,बैंकों, उपक्रमों में पदस्थ हिंदी अधिकारी या राजभाषा अधिकारियों को उनके सेवाकाल में क्या राजभाषा कार्यान्वयन या हिंदी प्रचार - प्रसार का प्रशिक्षण दिया जाता है ?
7. क्या किसी गैर सरकारी राजभाषा विशेषज्ञ द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन की लेखा परीक्षा (आडिट) किया जाता है ?
उक्त कुछ मुद्दे हैं जो सरकारी कार्यालयों में राजभाषा के प्रचार - प्रसार और विस्तार के लिए अहम भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं। क्या उक्त मदों पर कार्य या कार्रवाई हो रही है ? इसका स्पष्ट उत्तर अभी भी प्रतीक्षित है।
धीरेन्द्र सिंह
हिंदी के आधुनिक रूप के विकास में कार्यरत जिसमें कार्यालय, विश्वविद्यालय, प्रौद्योगिकी में देवनागरी लिपि, ऑनलाइन हिंदी समूहों में प्रस्तुत हिंदी पोस्ट में विकास, हिंदी के साथ अंग्रेजी का पक्षधर, हिंदी की विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी विकास के प्रति विश्लेषण, हिंदी का एक प्रखर और निर्भीक वक्ता व रचनाकार।
रविवार, 14 जनवरी 2018
राहें राजभाषा की
- 1980 के लगभग राष्ट्रीयकृत बैंकों में राजभाषा कक्ष की स्थापना हुई है। तीन से भी अधिक दशक बीत जाने के बाद राजभाषा की प्रगति का स्वतंत्र विश्लेषण नहीं हुआ है। अब भी राजभाषा सरकारी तंत्र के दायरे में पुष्पित और पल्लवित हो रही है। भारत सरकार की राजभाषा नीति और वार्षिक कार्यक्रम के आधार पर राजभाषा कार्यान्वयन को गतिशील बनाने का कागजी प्रगति अधिक और वास्तविक प्रगति कम दिखलाई पड़ती है। हिंदी की तिमाही, छमाही और वार्षिक कागजी रिपोर्ट पर गतिमान राजभाषा कार्यान्वयन अब अपनी प्राकृतिक आभा और अंदाज को धीरे-धीरे खो रही है। राजभाषा की प्रगति का आधार केवल हिंदी की तिमाही प्रगति रिपोर्ट है जिसकी वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएं विभाग, गृह मंत्रालय राजभाषा विभाग द्वारा आवधिक समीक्षा और निरीक्षण किया जाता है। संसदीय राजभाषा समिति द्वारा भी राजभाषा कार्यान्वयन की समीक्षा की जाती है।
हिंदी की तिमाही प्रगति रिपोर्ट की यदि गहन और व्यापक समीक्षा की जाय तो यह शायद ही कहीं कार्यान्वयन की सत्यता दर्शाते हुए मिले। आज भी अधिकांश हिंदी तिमाही रिपोर्ट राजभाषा कार्यान्वयन के आंकड़ों को अधिक दर्शाती हैं। हिंदी की तिमाही रिपोर्ट पर चलनेवाला राजभाषा कार्यान्वयन अपनी सत्यता को दर्शाने में अब भी असफल है। विभिन्न सरकारी राजभाषा कार्यान्वयन के निरीक्षण के कार्यालय अब तक इस तिमाही रिपोर्ट को पूरी तरह से अपने निरीक्षण के दायरे में नहीं ले रहे। एक कठोर कार्रवाई और कार्यवाही नहीं लिया जा रहा जिसका एक कारण प्रेरणा और प्रोत्साहन से राजभाषा कार्यान्वयन हो सकता है। विगत तीन से भी अधिक दशकों से राजभाषा निरीक्षण की एक ही प्रणाली से यह यह प्रणाली अपनी विशिष्ट महत्ता को कमतर करते जा रही है। अब प्रत्येक सरकारी कार्यालयों और उपक्रमों को मालूम हो गया है कि राजभाषा कार्यान्वयन मूलतः हिंदी की तिमाही रिपोर्ट आधारित है इसलिए इस रिपोर्ट को बनाते समय वार्षिक कार्यक्रमों के लक्ष्यों का विशेष ध्यान रखा जाता है तदनुसार आंकड़ों को चयनित कर रिपोर्ट में दर्शस्या जाता है। सिर्फ हिंदी की तिमाही रिपोर्ट में सिमटी राजभाषा अपनी पहचान और कार्यान्वयन की गरिमा को प्रभावित कर रही है।
वर्तमान में राजभाषा की राहों के प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित है जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि सहज, सरल और सुंदर गति की राजभाषा कार्यान्वयन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावनाएं हैं : -
- विशेषकर बैंकों में राजभाषा अधिकारी राजभाषा विभाग के अतिरिक्त अन्य विभाग का कार्य भी प्रति कार्यदिवस कर रहे हैं जिससे कार्यान्वयन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
- अभी भी कार्यालयों में अंग्रेजी में बनी रबड़ की मुहरें मिल जाती हैं। तीन से भी अधिक दशक के बाद धारा 3(3) की यह चूक कार्यान्वयन की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगा रही है।
- क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालयों में पदस्थ राजभाषा निरीक्षण अधिकारी केंद्रीय कार्यालय की प्रणाली से अवगत होते हैं अतएव बैंकों और उपक्रमों में राजभाषा निरीक्षण को वह सम्पूर्णता में नहीं कर पाते। यदि इन कार्यालयों में निरीक्षण के लिए बैंक एवं उपक्रम के सेवानिवृत राजभाषा अधिकारियों को सलाहकार के रूप में रखा जाय तो निरीक्षण और अधिक प्रभावी और फलदायी होगा।
- हिंदी कार्यशालाएं अपनी महत्ता और इयत्ता खोती जा रही हैं। यह कार्यशाला तीन दिन से दो दिनों की हुई और अब एक दिन में सिमट गई है। एक सत्र उद्घाटन का एक सत्र समापन का तो सिर्फ अधिकतम 2 सत्र बचते हैं। इन 2 सत्रों से राजभाषा कार्यशाला कितना लाभकारी होगी यह एक शोध का विषय है।
- बैंकों में प्रायः राजभाषा अधिकारी द्वारा अन्य कार्य करना न केवल राजभाषा की सुगम प्रगति को बाधित करता है बल्कि राजभाषा की छवि को भी प्रभावित करता है।
- राजभाषा कार्यान्वयन के निरीक्षण, अनुवर्ती कार्रवाई और कार्यान्वयन में शिथिलता का आभास होता है क्योंकि राजभाषा की अनुगूंज मंद पड़ती जा रही है।
- राजभाषा के पुरस्कारों के आधार और उसकी सत्यता की जांच के लिए भी उचित स्तर पर कार्रवाई की जानी चाहिए।
- हिंदी पत्रिकाओं की सामग्री के लिए विभिन्न विषयों का प्रतिशत निर्धारित करना चाहिए जिसमें लेख, कविता, समीक्षा, संस्थागत विषयों आदि का प्रतिशत निर्धारित हो। इस प्रकार यह पत्रिका बहुपयोगी और लोकप्रिय बनाई जा सकताई है। स्थानीय राजकीय भाषा को भी एक पृष्ठ निर्धारित किया जाय।
हिंदी के आधुनिक रूप के विकास में कार्यरत जिसमें कार्यालय, विश्वविद्यालय, प्रौद्योगिकी में देवनागरी लिपि, ऑनलाइन हिंदी समूहों में प्रस्तुत हिंदी पोस्ट में विकास, हिंदी के साथ अंग्रेजी का पक्षधर, हिंदी की विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी विकास के प्रति विश्लेषण, हिंदी का एक प्रखर और निर्भीक वक्ता व रचनाकार।
शनिवार, 11 नवंबर 2017
राजभाषा अधिकारी, मूक सिसकी
राजभाषा अधिकारी प्रत्येक सरकारी कार्यालय का वह अधिकारी होता है जिसका एकमात्र दायित्व राजभाषा नीतियों का कार्यान्वयन होता है। यह अधिकारी केवल प्रशासनिक कार्यालयों में पदस्थ होते हैं तथा उस कार्यालय के अधीन कार्यरत सभी कार्यालयों में राजभाषा के निरंतर प्रचार और प्रसार का दायित्व होता है। यदि आप किसी भी केंद्रीय कार्यालय या बैंकों या बीमा कंपनियों में जाएं तो वहां राजभाषा पूरी तरह अपनी एक पहचान लिए नहीं मिलेगी। राजभाषा के इस अधूरी पहचान के लिए प्रमुख रूप से उस क्षेत्र का राजभाषा अधिकारी जिम्मेदार है। पिछले तीन दशक से भी अधिक समय से कार्यरत यह राजभाषा अधिकारी अपने कार्यक्षेत्र के अधीन कार्यालयों राजभाषा की पूर्ण पहचान तक न बना पाए, इस कारण की सामयिक और क्षणिक समीक्षाएं कागजों पर लगभग पूरी तरह दर्ज मिलती हैं।
किसी भी कार्य में किसी भी प्रकार की कमी के लिए किसी को भी जिम्मेदार ठहरा देना बेहद आसान कार्य है। राजभाषा अधिकारी भी समय-समय पर जिम्मेदार ठहराया जाता है किंतु क्या कभी किसी ने राजभाषा अधिकारी के कार्य प्रणाली, कार्य सुविधाओं, कार्य की कठिनाइयों आदि की समीक्षा की है? अमूमन ऐसा नहीं होता है। राजभाषा अधिकारी की सामान्यतया निम्नलिखित कठिनाईयां हैं:-
1. कार्यालय में उनके बैठने का उचित स्थान नहीं रहता।
2. सामान्यतया यह सोच है कि राजभाषा अधिकारी के पास पूरे दिन का कार्य नहीं रहता।
3. राजभाषा विभाग का यदि कार्य लंबित रहता है तो उच्च कार्यालय द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की जाती।
4. राजभाषा के कामकाज की पूर्ण जानकारी कार्यालय प्रमुखों को बतलाने में राजभाषा विभाग असफल रहता है।
5. राजभाषा अधिकारी को दूसरे विभाग का कार्य दिया जाता है जिसपर सतत और गहन अनुवर्ती कार्रवाई होती है अतएव राजभाषा अधिकारी राजभाषा का कार्य छोड़ कार्यालय के दूसरे कार्यों में अपना लगभग पूर्ण समय देने लगता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अधिकांश कार्यालयों के राजभाषा विभाग में गहन अनुवर्ती कार्रवाई का अभाव है।
6. राजभाषा अधिकारियों को राजभाषा कार्यान्वयन का उचित, सार्थक, प्रयोजनपूर्ण राजभाषा प्रशिक्षण नहीं मिल पाता है। राजभाषा जगत में ऐसे राजभाषा प्रशिक्षकों का अभाव है जो राजभाषा कार्यान्वयन की बारीकियों को विश्लेषणात्मक ढंग से स्पष्ट कर सकें। इस प्रकार के प्रशिक्षण प्रायः वार्षिक कार्यक्रम और राजभाषा नीति की परिक्रमा कर पूर्ण हो जाते हैं।
7. अधिकांश राजभाषा अधिकारी राजभाषा कार्यान्वयन के ज्ञान के अभाव में यह नहीं समझ पाते कि उन्हें अपने कार्यक्षेत्र में किस प्रकार राजभाषा कार्यान्वयन करते है जिससे वह अपने कार्यस्थल परिवेश में हीन भावना से ग्रसित होते हैं। यह हीन भावना ही उन्हें अन्य विभाग के कार्य करने को प्रेरित करती है जिससे अधिकारी की एक पहचान बनती है। बहुत कम राजभाषा अधिकारी इस प्रकार की हीन भावना से मुक्त होते हैं।
8. राजभाषा अधिकारी के अतिरिक्त कोई अन्य विधा के विशेषज्ञ अधिकारी को किसी अन्य विभाग का कार्य नहीं सौंपा जाता है।
9. पिछले 5 वर्षों में नियुक्त अधिकांश राजभाषा अधिकारियों को हिंदी साहित्य का ज्ञान नहीं है जिससे वह अपनी भाषा कौशल का प्रदर्शन कर स्टाफ को मोहित और आकर्षित करने में असफल होते हैं। इसके लिए भर्ती प्रणाली जिम्मेदार है। पहले हिंदी और अंग्रेजी भाषा के आधार पर नियुक्तियां होती थीं किंतु कुछ समय से भाषा के अतिरिक्त अन्य पेपर को भी हल करना पड़ता है।
10. किसी भी कार्यालय में राजभाषा की पहचान एक सांविधिक दायित्व तक सीमित है जिसका कार्यान्वयन विभिन्न आवधिक रिपोर्ट प्रेषित कर पूर्ण किया जाता है।
11. विभिन्न केंद्रीय कार्यालयों में राजभाषा विभाग अपनी पहचान खोता जा रहा है। वर्ष 1980 के दशक में राजभाषा विभाग गरिमापूर्ण और सम्मानित पहचान बनाने में सफल था क्योंकि तब राजभाषा विभाग के विभागाध्यक्ष राजभाषा अधिकारी कार्यान्वयन को व्यापक तौर से स्पष्ट कर सके थे। अब वह स्थिति नहीं है और न वैसे विश्लेषण कर कार्यान्वयन करनेवाले विशेषज्ञ राजभाषा प्रभारी हैं।
उपरोक्त कुछ मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में वर्तमान में विशेषकर नए भर्ती राजभाषा अधिकारी किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। लगभग सभी राजभाषा अधिकारी अपने कार्यस्थल पर अपनी और राजभाषा कार्यान्वयन की पहचान बनाने को उत्सुक हैं। यहां यह भी स्पष्ट कर देना प्रासंगिक होगा कि कार्यालयों के प्रशासनिक प्रधान के समक्ष राजभाषा की वास्तविक स्थिति को भी ठीक से प्रस्तुत नहीं किया जा रहा अतएव वह भी राजभाषा की इस स्थिति से अनभिज्ञ है। राजभाषा अधिकारी मूक सिसकी में दूसरे विभाग का अधिक और राजभाषा कार्यान्वयन का कम कार्य किये जा रहा है।
हिंदी के आधुनिक रूप के विकास में कार्यरत जिसमें कार्यालय, विश्वविद्यालय, प्रौद्योगिकी में देवनागरी लिपि, ऑनलाइन हिंदी समूहों में प्रस्तुत हिंदी पोस्ट में विकास, हिंदी के साथ अंग्रेजी का पक्षधर, हिंदी की विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी विकास के प्रति विश्लेषण, हिंदी का एक प्रखर और निर्भीक वक्ता व रचनाकार।
चेन्नई, चंदन और चटकार
चेन्नई और खासकर सम्पूर्ण तमिलनाडु को।हिंदी विरोधी मानने का प्रचार किया गया। अधिकांश लोग यह मानकर चल रहे कि तमिलनाडु में हिंदी का प्रचार-प्रसार बेहद कठिन है। ऐसी सोच रखनेवाले यह नहीं देखते कि दक्षिण हिंदी प्रचार सभा अबाध गति से हिंदी शिक्षण कर रहा। इस प्रकार के लोग चेन्नई की सड़कों पर नहीं घूमते जिससे वह इस तथ्य से अनभिज्ञ रह जाते हैं कि कहीं-कहीं दरवाजे पर हिंदी टीचिंग का बोर्ड लटकता दिखाई देता है। यह सब चल रहा है अनवरत बिना किसी शोर शराबे के। अभिभावक अपने बच्चों को केंद्रीय विद्यालय में दाखिला दिलाने को उत्सुक दिखते हैं जिसका एक प्रमुख उद्देश्य हिंदी ज्ञान प्राप्त करना भी है।
इसी प्रसंग में यदि बात चेन्नई में राजभाषा कार्यान्वयन की करें तो मामला शांत और आराम करता हुआ प्रतीत होता है। बैंक या कार्यालयों में राजभाषा का मूल कार्य भी अधूरा बिखरा पड़ा नज़र आता है। मुख्य नाम बोर्ड और कुछ संवैधानिक पट्ट पट्टिकाएं जिनका निर्माण एक स्थान पर बड़ी संख्या में वितरण हेतु होता है वह त्रिभाषिक या द्विभाषिक नज़र आती है। शेष कार्य बदस्तूर अंग्रेजी में जारी है। नई पीढ़ी के कर्मियों को कार्य में राजभाषा प्रयोग का जोश, उल्लास और उत्साह नहीं मिल रहा। हिंदी की आवधिक रिपोर्टों को प्रेषित न किया जाना अधीनस्थ कार्यालयों की आदत है। नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति केवल सदस्य कार्यालयों तक सिमटी है।
चेन्नई का एक नवीनतम उदाहरण है। अभी हाल में उत्तरभारत से एक अधिकारी स्थान्तरित होकर सपत्नी चेन्नई आये। फो दिनों मरीन ही पास पड़ोस के लोगों से परिचय हुआ।।उस बिल्डिंग में सभी दक्षिण भारतीय रहते थे। पड़ोसी ने अपने लड़के को हिंदी पढ़ने के लिए भेज दिया और दूसरे दिन से बिल्डिंग के कुछ और विद्यार्थी हिंदी पढ़ने के लिए आने लगे। कुछ फिनों बाद उस अधिकारी से जब पूछा गया कि उनकी ष्टिमाती का हिंदी ट्यूशन कैसा चल रहा। उत्तर मिला अचानक विद्यार्थियों ने आना बंद कर दिया। उत्सुकतावश प्रश्न किया गया कि क्या उनकी पत्नी के9 अंग्रेजी आती है उत्तर ना था। हिदी को।अंग्रेजी में पढ़ाती तो विद्यार्थी नहीं जाते।
एक और ज्वलंत उदाहरण । एक कार्यालय में दो वरिष्ठ नागरिक कार्यवश आये और संबंधित स्टाफ से एक वरिष्ठ तमिल में बात करना चाहा टैब अंग्रेजी में बात करने का अनुरोध किया गया। उन वरिष्ठ ने तमिल सीखने की सलाह दी। अचानक दूसरे वरिष्ठ बोल पड़े ऐसी अनुचित राय मत दीजिए। इन लोगों का दो तीन वर्ष में स्थानांतरण हो जाता है।। तमिल एक कठिन भाषा है यह नहीं सीख पाएंगे। बेशक आप।हिंदी सीख लीजिये, यह एक आसान भाषा है। दिलचस्प बात यह कि दोनों तमिल भाषी थे और अच्छी हिंदी में बातें कर रहे थे। यह जानकारी एक तीसरे वरिष्ठ ने देते हुए कहा कि फोनों तमिल।भाषी हैं पर बातें हिंदी में कर रहे।
तीसरा ज्वलंत उदाहरण। मुम्बई से चेन्नई यात्रा करते समय एक भजन मंडली समूह मिला जो तमिल भजन करने मुंबई गय्या था। उस समूह के मुखिया ने कहा कि मुम्बई जाकर यह ज्ञान हुआ कि हिंदी के बिना गुजारा नहीं। हम सब हिंदी सीखेंगे।
नई पीढ़ी स्टाफ के रूप में हिंदी सीखने की लालसा लिए है। ख़ुद के प्रयास से ऐसे स्टाफ हिंदी बोलने का प्रयास भी करते हैं किंतु इनकी अभिला अभी तक अधूरी है। चेन्नई में कार्यरत स्टाफ हिंदी सीखने को तत्पर हैं किंतु इन्हें कार्यालयीन समय में हिंदी सीखने का प्रयास नदारद है। प्राज्ञ, प्रवीण और प्रबोध प्रशिक्षण की जानकारी नहीं और न ही प्रोत्साहन राशि के बारे में अवगत हैं। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि चेन्नई चंदनीय सुगंध और शीतलता को लिए है बस एक दमदार और प्रभावशाली राजभाषा का तिलक लगानेवाला चाहिए।
धीरेन्द्र सिंह
हिंदी के आधुनिक रूप के विकास में कार्यरत जिसमें कार्यालय, विश्वविद्यालय, प्रौद्योगिकी में देवनागरी लिपि, ऑनलाइन हिंदी समूहों में प्रस्तुत हिंदी पोस्ट में विकास, हिंदी के साथ अंग्रेजी का पक्षधर, हिंदी की विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी विकास के प्रति विश्लेषण, हिंदी का एक प्रखर और निर्भीक वक्ता व रचनाकार।
रविवार, 26 अक्टूबर 2014
नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति - प्रयोजन, प्रयास, प्रतिबद्धता
नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति प्रत्येक भारतीय नगर में राजभाषा का एक मुखर मंच है। केंद्रीय कार्यालय, बैंक, उपक्रम, बीमा कंपनियाँ इस समिति की सदस्य हैं। यदि सम्पूर्ण भारत की नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के कार्यनिष्पादन का विश्लेषण किया जाये तो यह स्पष्ट होता है कि इन समितियों के कार्यनिष्पादन में भिन्नता है जबकि लक्ष्य सबका एक है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के वार्षिक कार्यक्रमों के विभिन्न लक्ष्यों को प्राप्त करने में नराकास (नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति) के सभी सदस्य प्रयासरत रहते हैं तथा यह समिति मिलजुलकर और एक दूसरे को सहायता प्रदान कर प्रगति करती है। यद्यपि अभी भी कई नगर ऐसे हैं जहां पर नराकास गठित नहीं की गयी है किन्तु ऐसे नगरों में नराकास के गठन की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है।
गठन : किसी भी नगर में स्थित कार्यालयों में से किसी एक कार्यालय का चयन राजभाषा विभाग द्वारा किया जाता है जिसे नराकास के संयोजन का दायित्व दिया जाता है । नगर के एक कार्यालय का चयन चयनित कार्यालय के कार्यालयाध्यक्ष की सहमति से होता है। सामान्यतया यह कोशिश रहती है कि नगर में स्थित ऐसे कार्यालय को नराकास के संयोजन का दायित्व दिया जाये जहां नगर स्थित कार्यालयों के वरिष्ठतम प्राधिकारी पदस्थ हों। यह स्थिति सामान्यतया केंद्रीय कार्यालयों के नराकास में दिखलाई पड़ती है। यहाँ पर यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि किसी नगर में अधिकतम तीन प्रकार के नराकास का गठन हो सकता है यथा - केंद्रीय कार्यालयों की नराकास, बैंको की नराकास और उपक्रमों की नराकास। यह तीनों नराकास सामान्यतया महानगरों में गठित होते हैं अन्यथा केंद्रीय कार्यालयों की नराकास और बैंकों की नराकास अधिकांश नगरों में पाये जाते हैं। इसके बावजूद बहुत छोटे नगरों में केवल एक नराकास गठित होती है जिसमें केंद्रीय कार्यालय, बैंक और उपक्रम सदस्य होते हैं।
सदस्य -सचिव : यह एक पदेन पद है तथा संयोजक कार्यालय का राजभाषा अधिकारी स्वतः समिति का सदस्य - सचिव बन जाता है। यह पद नराकास की एक ऐसी धुरी है जिसपर नराकास की गतिविधियां व गति पूरी तरह निर्भर रहती है। संबन्धित क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय से सदस्य-सचिव का सीधा संबंध जुड़ा रहता है तथा कार्यान्वयन, प्रशिक्षण आदि के अधिकारियों से समय-समय पर संपर्क होते रहता है तथा तदनुसार नगर में राजभाषा कार्यान्वयन गतिशील रहता है। सदस्य-सचिव एक तरफ समिति के पदेन अध्यक्ष को राजभाषा कार्यान्वयन विषयक सहायता प्रदान करता है तो दूसरी ओर समिति के सदस्यों के विचारों, सोच और सहयोग के आधार पर राजभाषा विषयक विविध गतिविधियों को अंतिम रूप प्रदान करता है। सामान्यतया सदस्य-सचिव की गतिशीलता के अनुरूप समिति गतिशील रहती है यद्यपि समिति पर नियंत्रण अध्यक्ष का रहता है।
अध्यक्ष : समिति का अध्यक्ष पद एक पदेन पद होता है जो संयोजक कार्यालय के कार्यालय प्रमुख के लिए है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के दिशानिर्देशानुसार तथा राजभाषा नीति के परिप्रेक्ष्य में नगर में राजभाषा कार्यान्वयन की प्रगति की जाती है। समिति की बैठक का आयोजन, समिति की गतिविधियों को मंजूरी, समिति के सदस्य कार्यालयों के हिन्दी की रिपोर्ट की समीक्षा आदि महत्वपूर्ण कार्यों का दायित्व अध्यक्ष का होता है। इस समिति में लिए गए निर्णय केवल अध्यक्ष द्वारा लिए गए निर्णय नहीं होते हैं बल्कि समिति के सभी सदस्यों से विचार-विमर्श कर निर्णय लिए जाते हैं। इस समिति के अध्यक्ष की दोहरी भूमिका होती है जिसमें एक तरफ तो समिति के सदस्यों के पक्ष को ध्यान में रखना पड़ता है तो दोसारी ओर राजभाषा नीति, वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्यों आदि को वरीयता देते हुये समिति को गतिशील बनाए रखना पड़ता है। अध्यक्ष का पद अत्यधिक दायित्व वाला पद है।
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय : : प्रत्येक समिति का संबन्धित क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय में उप-निदेशक (कार्यान्वयन) पदस्थ होते हैं। इस कार्यालय की भूमिका प्रेरक और प्रोत्साहक की भूमिका होती है। राजभाषा नीति एवं वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्यों के अनुसार प्रगति का जायजा लेने के लिए सामान्यतया इस समिति के प्रत्येक बैठक में क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के प्रतिनिधि होते हैं जो उप-निदेशक (कार्यान्वयन) होते हैं या सहायक निदेशक (कार्यान्वयन) होते हैं अथवा शोध अधिकारी (कार्यान्वयन) उपस्थित होते हैं। इन अधिकारियों द्वारा भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के दिशानिर्देशों को समिति तक प्रभावशाली ढंग से संप्रेषित की जाती है। क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय की निगरानी के अंतर्गत नराकास कार्य करता है।
संयोजक कार्यालय के प्रधान कार्यालय की भूमिका : नराकास के संयोजनकर्ता यदि केंद्रीय कार्यालय, बैंक, उपक्रम के प्रधान कार्यालय नहीं हैं तब उस कार्यालय के नरकस की बैठकों में कार्यालय के प्रधान कार्यालय की भूमिका रहती है। कुछ लोग इस मत के भी होते हैं कि नराकास में संबन्धित बैंक के प्रधान कार्यालय की क्या भूमिका है ? यहाँ इस तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है कि राजभाषा कार्यान्वयन के निर्धारित लक्ष्य होते हैं तथा स्पष्ट राजभाषा नीति है जिसके अनुसार राजभाषा कार्यान्वयन करना होता है। संयोजक कार्यालय चूंकि राजभाषा विषयक महत्वपूर्ण दायित्यों का निर्वहन करता है अतएव नराकास में लिए गए निर्णयों के उचित एवं प्रभावशाली कार्यान्वयन के लिए समिति के अध्यक्ष को उपयुक्त मशवरा दे सकता है और सदस्य-सचिव को कार्यान्वयन के लिए यथोचित दिशानिर्देश दे सकता है। नराकास के निर्णयों के कुशल एवं प्रभावशाली कार्यान्वयन के लिए संयोजक बैंक के प्रधान कार्यालय की भूमिका मत्वपूर्ण है अतएव नराकास की प्रत्येक बैठक में प्रधान कार्यालय के प्रतिनिधि की उपस्थिती जरूरी है।
प्रयास एवं पहल : नराकास द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन को अब केवल समिति के सदस्य कार्यालयों तक सीमित रखने की आवश्यकता नहीं है। राजभाषा कार्यान्वयन के अंतर्गत अब समय आ गया है की राजभाषा की गूंज को समिति के सदस्यों से बाहर ले जाया जाये। इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि नराकास नगर के महाविद्यालयों, विश्वविद्यालय में राजभाषा की जानकारी का प्रचार-प्रसार करें। ग्राहकों के बीच राजभाषा को लेकर जाएँ। इस प्रकार नगर की स्थानिक परिस्थितियों और विशेषताओं को दृष्टिगत रखते हुये नए प्रयास और पहल की जा सकती है। यह समय की और राजभाषा कार्यान्वयन की मांग है कि नराकास अपने सशक्त मंच का प्रयोग करते हुये राजभाषा को नए प्रयासों और पहल से एक नयी गति, ऊर्जा और दिशा प्रदान करे।
प्रतिबद्धता : प्रतिबद्धता किसी भी कार्य एवं लक्ष्य के लिए परम आवश्यक है। नराकास के संयोजन, संचालन और नवोन्मेषी राजभाषा कार्यान्वयन के लिए प्रतिबद्धता अत्यावश्यक है। यदि समिति के सदस्य-सचिव की प्रतिबद्धता प्रबल होगी तो समिति के सदस्य कार्यालयों में पदस्थ राजभाषा अधिकारियों की प्रतिबद्धता उच्च स्तर की होगी। यदि किसी नराकास में यह स्थिति है तो सदस्य बैंकों के कार्यालय प्रमुख सहित समिति के अध्यक्ष कार्यान्वयन को अपना उत्साहपूर्ण सहयोग उल्लासित मन से देते रहेगे और ऐसी समिति अपनी एक विशेष पहचान बनाने में कामयाब होगी। प्रतिबद्धता के लिए प्रमुख प्रेरक की भूमिका संयोजक बैंक के प्रधान कार्यालय और क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय बखूबी निभा सकते हैं।
गठन : किसी भी नगर में स्थित कार्यालयों में से किसी एक कार्यालय का चयन राजभाषा विभाग द्वारा किया जाता है जिसे नराकास के संयोजन का दायित्व दिया जाता है । नगर के एक कार्यालय का चयन चयनित कार्यालय के कार्यालयाध्यक्ष की सहमति से होता है। सामान्यतया यह कोशिश रहती है कि नगर में स्थित ऐसे कार्यालय को नराकास के संयोजन का दायित्व दिया जाये जहां नगर स्थित कार्यालयों के वरिष्ठतम प्राधिकारी पदस्थ हों। यह स्थिति सामान्यतया केंद्रीय कार्यालयों के नराकास में दिखलाई पड़ती है। यहाँ पर यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि किसी नगर में अधिकतम तीन प्रकार के नराकास का गठन हो सकता है यथा - केंद्रीय कार्यालयों की नराकास, बैंको की नराकास और उपक्रमों की नराकास। यह तीनों नराकास सामान्यतया महानगरों में गठित होते हैं अन्यथा केंद्रीय कार्यालयों की नराकास और बैंकों की नराकास अधिकांश नगरों में पाये जाते हैं। इसके बावजूद बहुत छोटे नगरों में केवल एक नराकास गठित होती है जिसमें केंद्रीय कार्यालय, बैंक और उपक्रम सदस्य होते हैं।
सदस्य -सचिव : यह एक पदेन पद है तथा संयोजक कार्यालय का राजभाषा अधिकारी स्वतः समिति का सदस्य - सचिव बन जाता है। यह पद नराकास की एक ऐसी धुरी है जिसपर नराकास की गतिविधियां व गति पूरी तरह निर्भर रहती है। संबन्धित क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय से सदस्य-सचिव का सीधा संबंध जुड़ा रहता है तथा कार्यान्वयन, प्रशिक्षण आदि के अधिकारियों से समय-समय पर संपर्क होते रहता है तथा तदनुसार नगर में राजभाषा कार्यान्वयन गतिशील रहता है। सदस्य-सचिव एक तरफ समिति के पदेन अध्यक्ष को राजभाषा कार्यान्वयन विषयक सहायता प्रदान करता है तो दूसरी ओर समिति के सदस्यों के विचारों, सोच और सहयोग के आधार पर राजभाषा विषयक विविध गतिविधियों को अंतिम रूप प्रदान करता है। सामान्यतया सदस्य-सचिव की गतिशीलता के अनुरूप समिति गतिशील रहती है यद्यपि समिति पर नियंत्रण अध्यक्ष का रहता है।
अध्यक्ष : समिति का अध्यक्ष पद एक पदेन पद होता है जो संयोजक कार्यालय के कार्यालय प्रमुख के लिए है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के दिशानिर्देशानुसार तथा राजभाषा नीति के परिप्रेक्ष्य में नगर में राजभाषा कार्यान्वयन की प्रगति की जाती है। समिति की बैठक का आयोजन, समिति की गतिविधियों को मंजूरी, समिति के सदस्य कार्यालयों के हिन्दी की रिपोर्ट की समीक्षा आदि महत्वपूर्ण कार्यों का दायित्व अध्यक्ष का होता है। इस समिति में लिए गए निर्णय केवल अध्यक्ष द्वारा लिए गए निर्णय नहीं होते हैं बल्कि समिति के सभी सदस्यों से विचार-विमर्श कर निर्णय लिए जाते हैं। इस समिति के अध्यक्ष की दोहरी भूमिका होती है जिसमें एक तरफ तो समिति के सदस्यों के पक्ष को ध्यान में रखना पड़ता है तो दोसारी ओर राजभाषा नीति, वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्यों आदि को वरीयता देते हुये समिति को गतिशील बनाए रखना पड़ता है। अध्यक्ष का पद अत्यधिक दायित्व वाला पद है।
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय : : प्रत्येक समिति का संबन्धित क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय में उप-निदेशक (कार्यान्वयन) पदस्थ होते हैं। इस कार्यालय की भूमिका प्रेरक और प्रोत्साहक की भूमिका होती है। राजभाषा नीति एवं वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्यों के अनुसार प्रगति का जायजा लेने के लिए सामान्यतया इस समिति के प्रत्येक बैठक में क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के प्रतिनिधि होते हैं जो उप-निदेशक (कार्यान्वयन) होते हैं या सहायक निदेशक (कार्यान्वयन) होते हैं अथवा शोध अधिकारी (कार्यान्वयन) उपस्थित होते हैं। इन अधिकारियों द्वारा भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के दिशानिर्देशों को समिति तक प्रभावशाली ढंग से संप्रेषित की जाती है। क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय की निगरानी के अंतर्गत नराकास कार्य करता है।
संयोजक कार्यालय के प्रधान कार्यालय की भूमिका : नराकास के संयोजनकर्ता यदि केंद्रीय कार्यालय, बैंक, उपक्रम के प्रधान कार्यालय नहीं हैं तब उस कार्यालय के नरकस की बैठकों में कार्यालय के प्रधान कार्यालय की भूमिका रहती है। कुछ लोग इस मत के भी होते हैं कि नराकास में संबन्धित बैंक के प्रधान कार्यालय की क्या भूमिका है ? यहाँ इस तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है कि राजभाषा कार्यान्वयन के निर्धारित लक्ष्य होते हैं तथा स्पष्ट राजभाषा नीति है जिसके अनुसार राजभाषा कार्यान्वयन करना होता है। संयोजक कार्यालय चूंकि राजभाषा विषयक महत्वपूर्ण दायित्यों का निर्वहन करता है अतएव नराकास में लिए गए निर्णयों के उचित एवं प्रभावशाली कार्यान्वयन के लिए समिति के अध्यक्ष को उपयुक्त मशवरा दे सकता है और सदस्य-सचिव को कार्यान्वयन के लिए यथोचित दिशानिर्देश दे सकता है। नराकास के निर्णयों के कुशल एवं प्रभावशाली कार्यान्वयन के लिए संयोजक बैंक के प्रधान कार्यालय की भूमिका मत्वपूर्ण है अतएव नराकास की प्रत्येक बैठक में प्रधान कार्यालय के प्रतिनिधि की उपस्थिती जरूरी है।
प्रयास एवं पहल : नराकास द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन को अब केवल समिति के सदस्य कार्यालयों तक सीमित रखने की आवश्यकता नहीं है। राजभाषा कार्यान्वयन के अंतर्गत अब समय आ गया है की राजभाषा की गूंज को समिति के सदस्यों से बाहर ले जाया जाये। इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि नराकास नगर के महाविद्यालयों, विश्वविद्यालय में राजभाषा की जानकारी का प्रचार-प्रसार करें। ग्राहकों के बीच राजभाषा को लेकर जाएँ। इस प्रकार नगर की स्थानिक परिस्थितियों और विशेषताओं को दृष्टिगत रखते हुये नए प्रयास और पहल की जा सकती है। यह समय की और राजभाषा कार्यान्वयन की मांग है कि नराकास अपने सशक्त मंच का प्रयोग करते हुये राजभाषा को नए प्रयासों और पहल से एक नयी गति, ऊर्जा और दिशा प्रदान करे।
प्रतिबद्धता : प्रतिबद्धता किसी भी कार्य एवं लक्ष्य के लिए परम आवश्यक है। नराकास के संयोजन, संचालन और नवोन्मेषी राजभाषा कार्यान्वयन के लिए प्रतिबद्धता अत्यावश्यक है। यदि समिति के सदस्य-सचिव की प्रतिबद्धता प्रबल होगी तो समिति के सदस्य कार्यालयों में पदस्थ राजभाषा अधिकारियों की प्रतिबद्धता उच्च स्तर की होगी। यदि किसी नराकास में यह स्थिति है तो सदस्य बैंकों के कार्यालय प्रमुख सहित समिति के अध्यक्ष कार्यान्वयन को अपना उत्साहपूर्ण सहयोग उल्लासित मन से देते रहेगे और ऐसी समिति अपनी एक विशेष पहचान बनाने में कामयाब होगी। प्रतिबद्धता के लिए प्रमुख प्रेरक की भूमिका संयोजक बैंक के प्रधान कार्यालय और क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय बखूबी निभा सकते हैं।
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हिंदी के आधुनिक रूप के विकास में कार्यरत जिसमें कार्यालय, विश्वविद्यालय, प्रौद्योगिकी में देवनागरी लिपि, ऑनलाइन हिंदी समूहों में प्रस्तुत हिंदी पोस्ट में विकास, हिंदी के साथ अंग्रेजी का पक्षधर, हिंदी की विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी विकास के प्रति विश्लेषण, हिंदी का एक प्रखर और निर्भीक वक्ता व रचनाकार।
शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014
पुरस्कारों से दबी राजभाषा
राजभाषा कार्यान्वयन प्रेरणा और प्रोत्साहन से किया जाता है, यह सर्वविदित है। इसी क्रम में श्रेष्ठ राजभाषा कार्यान्वयन के विभिन्न महत्वपूर्ण पुरस्कारों को भी प्रदान किया जाता है। पुरस्कार जीतना हमेशा अच्छा होता है और प्रत्येक कार्यालय इसे पाने के लिए राजभाषा कार्यान्वयन में श्रेष्ठ कार्यनिष्पादन में व्यस्त रहता है। इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार प्राप्त करना प्रत्येक कार्यालय की चाहत होती है क्योंकि वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन की श्रेष्ठता प्रमाणित करने के लिए इससे बड़ा पुरस्कार कोई नहीं है। सब लोग जानते हैं कि प्रत्येक योजना अपने आप में विशिष्ट और विशेष लक्ष्यों के प्राप्ति के लिए एक प्रेरक होती है। इस प्रकार राजभाषा के कई पुरस्कार हैं जो अपनी विशिष्टता के लिए राजभाषा जगत में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। राजभाषा के इन पुरस्कारों को पाने के लिए होड सी लगी हुयी है। ऐसी प्रबल और स्वस्थ प्रतिद्वंदिता में कुछ ऐसी भी घटनाएँ हो जाती हैं जो राजभाषा कार्यान्वयन के इस प्रयास को प्रभावित करती हैं।
किसी भी सरकारी कार्यालय के उच्च प्रशासक से राजभाषा विषयक चर्चा करने पर राजभाषा पुरस्कार चर्चा का एक प्रमुख विषय रहता है। इन चर्चाओं में यह भी टिप्पणी रहती है कि पुरस्कारों को "मैनेज" किया जाता है। यहाँ यह प्रश्न उभरता है कि उच्च प्रशासक किस आधार पर अपरोक्ष में इस प्रकार कि बातें कर जाते हैं? यहाँ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि सभी सरकारी कार्यालयों के प्रशासक अपरोक्ष में ऐसी ही बातें करते हैं । कभी कहीं किसी उच्च प्रशासक से इस तरह कि बातें अनौपचारिक बातचीत के दौरान सुनने को मिलती है। यदि उनसे इस तरह कि बातों का आधार पूछा जाय तो प्रायः यही उत्तर मिलता है कि उनके कार्यालय के राजभाषा अधिकारी द्वारा यह बात बार-बार उनसे कही जाती है। यदि देखा जाय तो इस प्रकार कि बातें अक्सर ऐसे ही राजभाषा अधिकारी करते हैं जिन्हें अपने कार्यकाल में राजभाषा का एक भी पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ है।
क्या राजभाषा कार्यान्वयन वस्तुतः राजभाषा के विभिन्न पुरस्कारों से दबी है या कि चतुराईपूर्वक उसे पुरस्कारों से दबाने की असफल कोशिशें की जा रही हैं। राजभाषा कार्यान्वयन के विभिन्न चुनौतीपूर्ण कार्यों को करने की आवश्यक कौशल न रखनेवाले राजभाषा अधिकारी इस प्रकार के अतार्किक शोर मचाते हैं और अपनी राजभाषा कार्यान्वयन विषयक कमजोरी को छुपने का प्रयास करते हैं। राजभाषा के विभिन्न पुरस्कारों के निर्णय का आधार होता है। सरकारी कार्यालयों के राजभाषा का प्रत्येक सजग विभाग अन्य कार्यालयों की राजभाषा प्रगति की जानकारी रखता है। राजभाषा की विभिन्न बैठकों में कार्यालयों के राजभाषा विषयक प्रगति की चर्चा व समीक्षा की जाती है। सब कुछ स्पष्ट रहता है फिर भी उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को कल्पित कथा सुनाकर कुछ राजभाषा अधिकारी राजभाषा को बदनाम करने की भूमिका निभाते हैं।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि उच्च प्रशासनिक अधिकारी सामान्यतया राजभाषा विषयक सूचनाओं के लिए अपने कार्यालय के राकभाषा विभाग पर निर्भर रहते हैं। उच्च प्रशासनिक अधिकारी राजभाषा कार्यान्वयन की वास्तविकता से परिचित हों इसीलिए नगर राजभाषा कार्यन्वयन समिति की बैठकों में कार्यालय प्रमुख की सहभागिता पर बल दिया जाता है। अब समय आ गया है कि वृहद परिप्रेक्ष्य में राजभाषा को संबन्धित राजभाषा विभाग से बाहर निकाल कर एक नयी व्यापकता दें जिससे राजभाषा कार्यालय के प्रत्येक स्तर तक अपने स्पष्ट रूप में रहे। राजभाषा कार्यन्वयन के लिए पुरस्कार अति आवश्यक है किन्तु राजभाषा पुरस्कारों को विचित्र अफवाहों के दल-दल से बचाना भी बहुत जरूरी है।
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रविवार, 17 अगस्त 2014
बैंकों में राजभाषा का क्रान्ति वर्ष 2013-14
भारत सरकार की राजभाषा नीति के कार्यान्वयन के लिए बैंकों द्वारा प्रयास में काफी तेजी आई है। इस तेज़ी का एक प्रमुख कारण यह भी है कि भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग द्वारा तथा वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन के प्रति पिछले एक वर्ष के दौरान जो तेज़ी, गति और दिशानिर्देशों संग अनुवर्ती कार्रवाई की जा रही है उससे बैंकों के राजभाषा विभाग में एक नयी गति तथा तत्परता आई है। कृपया इसका यह अर्थ मत निकालिएगा कि इससे पहले बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन धीमी गति में था वस्तुतः इससे पहले कुछ गिने-चुने बैंकों में ही राजभाषा गतिशील थी अन्यथा शेष बैंक धारा 3(3) के अनुपालन तक ही सिमटे हुये थे। पिछले एक वर्षों से अर्थात वर्ष 2013 से विभिन्न राजभाषा विभागों द्वारा जितनी अनुवर्ती कार्रवाई की गयी उतनी पहले नहीं दिखलाई देती थी अतएव राजभाषा के इतिहास में वर्ष 2013 से राजभाषा कार्यान्वयन के परंपरागत ढंग में नवीनता लायी गयी जिसे सभी बैंकों ने खुले दिल से स्वीकारा और उसका कार्यान्वयन भी किया। यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।
अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसा क्या हो गया वर्ष 2013 में कि राजभाषा में एक नवीन परिवर्तन संग नयी गति आई। इस विषय पर बहुत अधिक चर्चा ना कर यह कहा जा सकता है कि भारत सरकार, राजभाषा विभाग के सचिव द्वारा बैंकों के प्रशासनिक कार्यालयों तथा शाखाओं का सघन और गहन निरीक्षण का अभियान तथा इस अभियान के अंतर्गत तात्कालिक समीक्षा और दिशनिर्देशों ने राजभाषा कार्यान्वयन को अधिक स्पष्ट और सरल बना दिया। बैंकों की प्रत्येक बैठक में संबन्धित बैंकों के उच्चाधिकारियों तथा कार्यपालकों की उपस्थिती ने बैंकों में राजभाषा के प्राथमिकता में वृद्धि की । यहाँ यह भी उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि वर्ष 2013 से पहले भारत सरकार, राजभाषा विभाग के सचिव को अधिकांशतः सरकारी आयोजनों में ही सुना जा सकता था। जबकि अब सचिव विभाग के निदेशक संग स्वयंउपस्थित होकर संवाद करती हैं। सचिव द्वारा इस पहल ने राजभाषा को एक नयी गरिमा और बैंकिंग कार्य के एक अनिवार्यता का स्वरूप प्रदान किया जो किसी अति कुशल शिल्पकार की कलाकृति से कम नहीं है।
प्रायः यह अनुभव किया गया है कि यदि उच्च स्तर से किसी कार्य के प्रति तेज़ी दिखलाई पड़ती है तो स्वतः वह प्रवाह सम्पूर्ण कार्यालयीन व्यवस्था को प्रभावित करता है। भारत सरकार, राजभाषा विभाग द्वारा नए दृष्टिकोण से राजभाषा कार्यान्वयन से प्रभावित होकर वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग ने सघन अनुवर्ती कार्रवाई आरंभ की । सघन शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया कि जब तक किसी पत्र का संतोषप्रद उत्तर वित्तीय सेवाएँ विभाग को प्राप्त नहीं हो जाता है तब तक लगातार अनुस्मारकों की बौछार लगी रहती है। यहाँ पर यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि वर्ष वर्ष 2013 से पहले वित्तीय सेवाएँ विभाग द्वारा पत्रों और अनुस्मारकों के इतने कार्रवाई को अनुभव नहीं किया गया था। वित्तीय सेवाएँ विभाग ने आपसी संवाद-सार्थक दिशा अभियान द्वारा राजभाषा को बैंकिंग कामकाज का अभिन्न हिस्सा बनाने की योजना आरंभ की जो मूलतः राजभाषा विभाग द्वारा की गयी पहल का प्रभाव था।
भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के वार्षिक कार्यक्रम के आधार पर वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग के सचिव ने राजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए विशेषकर उन बैंकों को दिशानिर्देश दिया जिन बैंकों के कार्यालय या शाखाएँ विदेशों में स्थित हैं। तदनुसार कुछ बैंकों के शीर्ष कार्यपालक विदेशों में राजभाषा कार्यान्वयन के लिए विभिन्न आयोजन किए। एक बैंक के कार्यपालक निदेशक ने विदेश स्थित अपने कार्यालय और शाखा में भारत से बैनर तैयार कर स्वयं ले गए और वहाँ प्रदर्शित किए। इसके अतिरिक्त आपसी संवाद-सार्थक दिशा पर चर्चा भी की। आपसी संवाद-सार्थक दिशा का मॉडल -2 भी तैयार होकर कार्यान्वयन की दिशा में अग्रसर है। वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग की यह एक उल्लेखनीय पहल और दिशानिर्देश है जिसने बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन को गति प्रदान की ।
भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के वार्षिक कार्यक्रम के आधार पर वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग के सचिव ने राजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए विशेषकर उन बैंकों को दिशानिर्देश दिया जिन बैंकों के कार्यालय या शाखाएँ विदेशों में स्थित हैं। तदनुसार कुछ बैंकों के शीर्ष कार्यपालक विदेशों में राजभाषा कार्यान्वयन के लिए विभिन्न आयोजन किए। एक बैंक के कार्यपालक निदेशक ने विदेश स्थित अपने कार्यालय और शाखा में भारत से बैनर तैयार कर स्वयं ले गए और वहाँ प्रदर्शित किए। इसके अतिरिक्त आपसी संवाद-सार्थक दिशा पर चर्चा भी की। आपसी संवाद-सार्थक दिशा का मॉडल -2 भी तैयार होकर कार्यान्वयन की दिशा में अग्रसर है। वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग की यह एक उल्लेखनीय पहल और दिशानिर्देश है जिसने बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन को गति प्रदान की ।
भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग और वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवाएँ विभाग, राजभाषा विभाग की जुगलबंदी ने राजभाषा अधिकारियों की चेतना को और प्रखर कर धारदार बनाया जिससे कई बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन में उल्लेखनीय प्रगति हुयी जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यहाँ यह सोचना पूर्ण सत्य नहीं होगा कि चूंकि भारत सरकार, राजभाषा विभाग अति सक्रिय होकर निरीक्षण आदि करने लगा तो राजभाषा अति गतिशील हो गया। यद्यपि इस सोच में बहुत अधिक सत्यता तो है किन्तु इससे भी प्रमुख सत्य यह है कि बैंक कर्मियों को एक ऐसी सशक्त और स्वाभाविक प्रेरणा मिली कि वे स्वतः प्रेरित होकर राजभाषा में कार्य करने लगे। श्रेष्ठ राजभाषा कार्यान्वयन वही है जिसमें कर्मचारी स्वतः प्रेरित होकर कार्य करने लगें।
लगभग एक वर्ष से कम समय में राजभाषा इतनी सशक्त हो गयी कि अब सभी बैंक ए टी एम से पर्ची द्विभाषिक (हिन्दी और अँग्रेजी ) देना आरंभ कर रहे हैं। ग्राहकों को उनके खाते की विवरणियाँ, पास बूक में प्रविष्टियाँ, डिमांड ड्राफ्ट आदि हिन्दी में देने की तैयारी को पूर्ण करने के अंतिम चरण में बैंक है। अब विभिन्न बैंकों के राजभाषा विभाग अपने दायित्वों को पूर्ण करने में व्यस्त हैं तथा इससे राजभाषा की लोकप्रियता में वृद्धि हुई है। यह भी अति महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है कि अपने सभी निरीक्षणों में और आयोजनों में सचिव राजभाषा द्वारा स्थानीय भाषा के महत्व को स्पष्ट किया जाता है तथा यह आग्रह भी किया जाता है कि राजभाषा में यथासंभव स्थानीय शब्दों को सम्मिलित किया जाये। सचिव द्वारा स्थानीय भाषा के महत्व को सुनकर स्थानीय स्टाफ और ग्राहक खुश होते हैं और राजभाषा से जुड़ जाते हैं। सचिव केवल बैंक कर्मियों को ही संबोधित नहीं करतीं हैं बल्कि ग्राहकों, विद्यार्थियों,हिन्दी के प्राध्यापकों, पत्रकारों आदि से भी राजभाषा विषय पर चर्चा कर राजभाषा पर आम सोच का विश्लेषण करती हैं और यथावश्यक दिशानिर्देश देती हैं।
राजभाषा की उक्त गतिविधियां जारी हैं और आगे कुछ नया और क्या होनेवाला है इसकी उत्सुकता भी है। भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग और वित्त मंत्रालय,वित्तीय सेवाएँ, राजभाषा विभाग के राजभाषा कार्यान्वयन की उक्त नयी शैली ने वर्ष 2012-13 को राजभाषा कार्यान्वयन का क्रान्ति वर्ष बना दिया है। प्रसंगवश उल्लिखित किया जा रहा है कि जब भी कोई नया कदम उठाया जाता है तो ऐसा भी होता है कि कुछ लोगों को असुविधा होती है क्योंकि ढर्रे पर चल रहे कार्य में कई घुमाव आ जाते हैं जिससे आरंभिक दौर में कुछ अनावश्यक हलचल होती है। इस क्रान्ति वर्ष में उपलब्धियों के अंबार विरुद्ध कुछ असुविधाओं के टीले भी उभरते और लुप्त हो जाते हैं। राजभाषा कार्यान्वयन की यह नयी गति ऐसे टीलों को राजभाषाई जुगनू मानकर अनदेखा कर प्रगति मार्ग प्रशस्त करते जा रही है।
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गुरुवार, 11 जुलाई 2013
क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन – आयोजन, संयोजन
मोहक आयोजन स्थल भी होता है क्योंकि देश के प्रत्येक राज्य में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक आदि विविधताएँ लिए कई स्थल
होते हैं जहां नगर राजभाषा कार्यान्यवन समिति कार्यरत होती है। अन्य कार्यालयों के मित्रों, परिचितों, नवागंतुकों आदि से मिलकर उनके कार्यालय के राजभाषा कार्यान्यवन में सुविधापूर्वक और स्वतंत्रतापूर्वक ताकने-झाँकने और जाँचने का अवसर मिलता है। इस प्रकार
मोहकता के विभिन्न रूप हैं जिनकी यहाँ पर पूर्णरूपेण चर्चा कर पाना संभव नहीं है। यहाँ यह उल्लेखनीय
है कि आवश्यकता में यदि मोहकता का मिश्रण हो जाता है तब वह सम्मेलन महज एक कामकाजी
आवश्यकता नहीं रह जाता बल्कि राजभाषा के सुरों से सजा एक एक ऐसा अनुपम गुलदस्ता हो
जाता है जिसकी सुरभि प्रेरणा, प्रोत्साहन और प्रीति से ओत –प्रोत कर देती है। क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन में
प्रत्येक प्रतिभागी को बोलने और सुनने का मौका मिलता है जिससे सम्प्रेषण केवल
एकतरफा नहीं रहता बल्कि अभिव्यक्ति का एक ऐसा सशक्त मंच बन जाता है जहां न केवल भावनाओं, विचारों को प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है बल्कि उनपर निर्णय लिए जाने का
प्रस्ताव भी पारित होता है। यह वस्तुतः एक रोमांचकारी अनुभव है।
यह सम्मलेन एक दिवसीय होता है किन्तु इसके
आयोजन, संयोजन में कई दिनों का अथक परिश्रम जुड़ा होता है। जिस नगर या महानगर में इसका आयोजन होता है उससे संबन्धित क्षेत्रीय कार्यान्यवन कार्यालय के
उप-निदेशक के कंधों पर काफी ज़िम्मेदारी होती है। इन जिम्मेदारियों में से कुछ
प्रमुख ज़िम्मेदारी निम्नलिखित हैं :
(1)
कार्यस्थल का चयन : सम्मेलन के लिए उचित कार्यस्थल का
चयन काफी महत्वपूर्ण है। न्यूनतम 250 से 300 प्रतिभागियों के बैठने की
व्यवस्था आवश्यक है। चयनित सभागार में यथोचित ध्वनि व्यवस्था का होना आवश्यक है।
मंच कम से कम मध्यम आकार का होना चाहिए। पार्किंग की व्यवस्था होनी
चाहिए। चयनित कार्यस्थल परिसर में चाय, भोजन के लिए उपयुक्त स्थान होना चाहिए। पंजीकरण तथा पत्रिका आदि प्रदर्शन के लिए
परिसर में उचित जगह होनी चाहिए। सुविधापूर्वक जहां सब पहुँच सके ऐसा स्थल होना
चाहिए।
(2)
सचिव से तिथि की प्राप्ति : चूंकि इस सम्मेलन के एक प्रमुख आकर्षण राजभाषा विभाग के सचिव होते हैं इसलिए
सर्वप्रथम सम्मेलन आयोजन की तिथि का अनुमोदन सचिव से प्राप्त करना होता है। यदि
किसी सम्मेलन के आयोजन तिथि से कुछ दिन पहले यह भनक तक लग जाती है कि
सम्मेलन में सचिव की उपस्थिती संदेहपूर्ण है तो तत्काल 25% उपस्थिती में गिरावट आ जाती है विशेषकर वरिष्ठ प्रबंधन के अधिकारियों में। उप-निदेशक
(कार्यान्यवन) पर यह दबाव रहता है कि सम्मेलन की तिथि निर्धारण से पहले तिथि का अनुमोदन सचिव
से अवश्य करवाएँ और तिथि की घोषणा से पूर्व सचिव से तिथि अनुमोदन की पुष्टि अवश्य प्राप्त कर लें।
(3)
सूचना प्रेषण : प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय के अंतर्गत आनेवाले सभी
कार्यालयों को यदि सम्मेलन में आमंत्रित किया जाये तो संभवतः आयोजन स्थल छोटा पड़ जाये। प्रायः ऐसा होता है कि आमंत्रण में उन कार्यालयों को प्राथमिकता दी जाती है जो राजभाषा कार्यान्यवन में सक्रिय हैं। आमंत्रण के
दूसरे क्रम में ऐसे कार्यालय आते हैं जिनके अधीन कई छोटे कार्यालय (जैसे बैंकों की शाखाएँ) होते हैं। तीसरे क्रम में छोटे कार्यालय आते हैं। अक्सर यह तीसरे
कार्यालय छूट जाते हैं क्योंकि इनमें ना तो राजभाषा विभाग होता है ना ही राजभाषा
अधिकारी पदस्थ होता है। ऐसा आवश्यक नहीं कि निमंत्रित सभी कार्यालय सम्मेलन में
सहभागी हों। सम्मेलन सभागार भर जाएगा कि खाली रहेगा यह अंदेशा आयोजन तिथि तक रहता
है।
(4)
भोजन बनानेवाले का चयन : सम्मेलन में मंच, विशिष्ट अतिथियों, सहभागियों के बाद यदि कुछ महत्वपूर्ण होता है तो वह है चाय-पान और भोजन। इसके चयन में
आयोजन कार्यस्थल के नाराकास की सक्रिय सहभागिता होती है। निर्धारित बजट में
संतोषप्रद भोजन प्रदान करना भी एक चुनौतीपूर्ण कारी है, जिसे आखिर में सफलतापूर्वक अंजाम दे ही दिया जाता है।
(5)
सक्रिय कार्यकर्ताओं का चयन : आयोजन में विभिन्न कार्यों के लिए मानव श्रम की भी आवश्यकता होती है। कुशल और
तत्काल उचित निर्णय ले सकनेवाले अधिकारियों का चयन कठिन कार्य है। निम्नलिखित
कार्यों के लिए कुशल कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है :
(1) पंजीकरण और फ़ाइल आदि प्रदान करने के लिए। (अक्सर यह कार्य राजभाषा विभाग के स्टाफ संभालते
हैं)
(2) सम्मेलन सभागार में बैठने की व्यवस्था नियंत्रित करने के लिए।
(3) उद्घोषक/उद्घोषिका का चयन।
(4) मंच पर पुरस्कार वितरण की प्रक्रिया को नियंत्रित करना। (प्रायः यह कार्य राजभाषा
विभाग के अधिकारी संभालते हैं)
(5) वाहन व्यवस्था का नियंत्रण।
(6) आयोजन नगर में विभिन्न स्थलों पर बैनर लगाने के लिए उपयुक्त स्थल चयन।
(7) अतिथियों को विमानपत्तन/रेल्वे स्टेशन से ले आना-ले जाना।
(8) विशिष्ट व्यक्तियों की देखभाल।
(6)
सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु : सम्मेलन में स्थल विशेष की सांस्कृतिक विरासत की झलक के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम भी
आयोजित किया जाता है। एक राजी में अनेकों सांस्कृतिक विधाएँ होती हैं उनमें से प्रमुखतम विधाओं का चयन तथा उन्हें बखूबी प्रदर्शित करनेवाले
कलाकारों के चयन के लिए कार्यकर्ता की आवश्यकता होती है।
(7)
प्रेस नोट और पत्रकारों के लिए कार्यकर्ता : सम्मेलन से पहले
और सम्मेलन के दिन तक स्थानीय प्रेस में सम्मेलन विषयक समाचार प्रकाशित करना और
सम्मेलन की रिपोर्ट पत्रकारों को प्रदान करने के लिए कार्यकर्ता की जरूरत होती है।
यद्यपि सम्मेलन रिपोर्ट में राजभाषा विभाग के अधिकारियों का सहयोग होता है किन्तु
रिपोर्ट तैयार करने के लिए एक अनुभवी कार्यकर्ता की आवश्यकता होती है।
उक्त प्रकार से और कई मदें हैं जिनमें सक्रिय कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है।
अधिकांश कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजन स्थल से ही मिल जाते हैं, यदा-कदा क्षेत्रीय कार्यान्यवन कार्यालय आयोजन स्थल
से बाहर के अपने सदस्य कार्यालय से कोई अनुभवी कार्यकर्ता की सहायता प्राप्त करता
है। यद्यपि क्षेत्रीय
राजभाषा सम्मेलन में सम्पूर्ण नियंत्रण गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग, नयी दिल्ली का होता है किन्तु यह
नियंत्रण निगरानी और आवश्यक दिशानिर्देश का होता है। सम्मेलन गरिमापूर्ण तरीके से
सम्पन्न हो जाये राजभ्शा विभाग का यह मुख्य उद्देश्य होता है। निर्धारित ढांचे के अंतर्गत सम्मेलन को
कौन सा क्षेत्र कितनी भव्यता और कुशलता से सम्पन्न कर पाता है इसका बहुत अधिक
दारोमदार उस क्षेत्र के उप-निदेशक (कार्यान्यवन) के कंधों पर होता है।
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